रीना ढाका, शांतनु और निखिल, अंजना भार्गव की डिज़ाइनों की परिकल्पना को प्रदर्शित किया जा रहा है।
अगर आपको इस तरह के आयोजनों को नजदीक से देखने का अवसर मिला हो तो निश्चित रूप से कई सवाल आपके जेहन में भी उभरे होंगे। प्रदर्शित अधिकांश डिजाइनों में से कितनीं इस देश की बहुसंख्यक आबादी के उपयोग की होती हैं। यह भी सत्य है कि भले इन आयोजनों को व्यावसायिकता का अमलीजामा पहना दिया गया हो मगर असल में यह आयोजन पूरी तरह अश्लील लगता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण की दलील के आगे तो संस्कृति व सभ्यता की बात करना भी आजकल दकियानूसी समझा जाने लगा है मगर ईमानदारी से सोचें तो पारंपरिक परिधानों को सिरे से नकारा जा रहा है। दरअसल बाजारवाद के खांचे में पारंपरिक परिधान उतने फिट नहीं बैठते जितने कि कम और तंग आधुनिक कपड़े। अश्लीलता को प्रदर्शित करके बाजार को पकड़ना शायद ज्यादा आसान होता है। और असल उद्देश्य तो बाजार को पकड़ना है। शायद इसी आपाधापी में डिजाइनदार कपड़े बेचने के हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। रैंप पर माडलों के अर्धनग्न प्रदर्शन भी ऐसे ही हथकंडे हैं। हो भी क्यों नहीं। आजकल उत्पादों के एडवरटाइजमेंट की दुनियां में यह सब जायज जो माना जाता है। यह भी सही है कि इन डिजाइनरों की परिकल्पना ने परिधानों की दुनिया में क्रांति ला दी है मगर यह तब खटकने लगता है जब ऐसी डिजाइनों को तरजीह दी जाती है जो अश्लील तो होती ही हैं, उनकी उपयोगिता भी संदिग्ध लगती है। क्या बाजारवाद की चकाचौंध में आकंठ डूबे ये डिजाइनर आधुनिक परिधानों की खोज के साथ अपने हिंदुस्तान की पहचान भी कायम रख पाएंगे? फिलहाल जो दौर जारी है उसमें तो मुश्किल ही लगता है। इनमे से जो अपनी पहचान भी कायम रखने की दिशा में काम कर रहे हैं उनको हमारी शुभकामनाएं। कृपया बाजारवाद के नाम रोक दीजिए नग्नता का यह प्रदर्शन।
नीचे रैंप की जो तस्वीरें हैं वे बीबीसी से साभार ली गईं हैं। महज आपके अवलोकन के लिए। आप भी तय कर सकें कि इन परिधानों में कितनी भरी है अश्लीलता और कितना अपनी देशज पहचान का ध्यान रखा गया है।








