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Tuesday, 28 June 2011

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मजीठिया बोर्ड का समर्थन किया


कोलकाता में मंगलवार को राईटर्स बिल्डिंग में प्रेस ट्रस्ट यूनियन के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्रकारों व गैरपत्रकारों के मजीठिया वेतनमान की सिफारिशों को लागू करने के संदर्भ में फौरन अधिसूचना जारी करने की मांग का ग्यापन सौंपा।   
ममता बनर्जी ने पत्रकारों से कहा - बीते दिनों में भी मैं आपके संघर्षों में साथ रही हूं और आगे भी रहूंगी..........
   पत्रकारों व गैर पत्रकारों के लिए नए वेतनमान दिए जाने की सिफारिशों का मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने समर्थन किया है। उन्होंने आज राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग में उनसे मिलने गए अखबार कर्मियों और समाचार एजंसी के लोगों को कहा कि मैं मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के कार्यान्वयन के पक्ष में हूं। मुख्यमंत्री को इस बाबत कान्फेडेरेशन आफ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजंसी इंप्लाइज आर्गेनाईजेशन की ओर से एक ज्ञापन भी दिया गया। मुख्यमंत्री से मिलने वालों में पीटीआई वर्कर्स यूनियन के लोग भी शामिल थे। ममता ने पत्रकारों से कहा कि बीते दिनों में भी मैं आपके संघर्षों में साथ रही हूं और आगे भी रहूंगी। ममता ने अखबारी प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के दौरान ही केंद्रीय सूचना व प्रसारण राज्य मंत्री सीएम जटुआ को फोन लगाया और उनसे वेतनमान की ताजा स्थिति की जानकारी ली।
मुख्यमंत्री ने ज्ञापन लेने के बाद पत्रकारों से कहा कि मैं इस बाबत केंद्र से बात करूंगी। मुख्यमंत्री के अलावा यही ज्ञापन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन को भी सौंपा गया है।

 सिफारिशें जल्द अधिसूचित करने के लिए देशभर में धरने

मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें जल्द अधिसूचित करने के लिए पत्रकारों और गैर-पत्रकारों की मांग को मंगलवार को राजनीतिक दलों से भी समर्थन मिला। विभिन्न दलों के नेताओं ने संसद के मानसून सत्र में इस मुद्दे को उठाने का वादा किया। माकपा, भाकपा और जद (एकी)के वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह इस मुद्दे पर हिचकिचा रही है क्योंकि वह पत्रकारों की बजाए कॉरपोरेट घरानों के हितों के लिए काम करना चाहती है। कन्फेडरेशन आफ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजंसी एंप्लॉइज आर्गेनाइजेशन्स के तत्वावधान में जंतर मंतर पर पत्रकारों और गैर-पत्रकारों ने धरना दिया। इसमें कान्फेडरेशन से संबद्ध संगठन फेडरेशन आफ पीटीआई एम्प्लॉयज यूनियन, यूएनआई वर्कर्स यूनियन, आल इंडिया न्यूजपेपर एम्प्लॉयज फेडरेशन, इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (आई) के सदस्यों ने भी हिस्सा लिया। नई दिल्ली में पत्रकारों और गैर-पत्रकारों ने अपनी मांगों को लेकर दिन भर का धरना दिया। इस मुद्दे पर प्रदेशों की राजधानियों और कई शहरों में भी अखबारी कर्मचारियों ने धरने दिए।

धरने के दौरान माकपा के तपन सेन और नीलोत्पल बसु ने कहा कि उनकी पार्टी संसद के अंदर और संसद के बाहर यह मुद्दा उठाएगी। दोनों नेताओं ने कहा कि वे इस अभियान को अपना पूरा समर्थन देंगे। भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने सरकार पर कॉरपोरेट जगत के हितों के लिए काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से हिचक रही है। राजा ने कहा कि उनकी पार्टी इस मुश्किल दौर में प्रदर्शनकारियों के साथ है। जद (एकी) प्रमुख शरद यादव ने आरोप लगाया कि वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की सरकार की कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। उन्होंने कहा हम यह बात संसद में उठाएंगे और सरकार से सवाल करेंगे कि आखिर वह क्यों अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं कर रही है।

सिफारिशें जल्द लागू करने की मांग करते हुए कन्फेडरेशन आफ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजंसी एंप्लॉइज आर्गेनाइजेशन्स के महासचिव एमएस यादव ने सरकार को आगाह किया कि अगर पत्रकारों और गैर-पत्रकारों की मांगों को जल्द नहीं माना गया तो विरोध प्रदर्शन को तेज किया जाएगा। मजीठिया वेतनबोर्ड ने पत्रकारों और गैर.पत्रकारों के वेतनमान में संशोधन के संबंध में अपनी सिफारिशें सरकार को 31 दिसंबर 2010 को सौंप दी थीं। लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी इसे अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है।

उधर लखनऊ में सैकडों पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मियों ने प्रदर्शन किया और सिफारिशों को फौरन लागू करने की मांग को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। धरने में शामिल मीडिया कर्मी अपने हाथों में ’ मंहगाई की मार है वेज बोर्ड की दरकार है’ लिखी तख्तियां लिए थे। खराब मौसम और बारिश के बावजूद धरने में सैकड़ो की संख्या में पत्रकार शामिल हुए और जिला प्रशासन के जरिये भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संबोधित ज्ञापन सौपा ,जिसमें वेजबोर्ड की सिफारिशों को फौरन अधिसूचित करने की मांग की गई है। धरने को विधानपरिषद में प्रतिपक्ष के नेता अहमद हसन ने भी संबोधित किया और समाचारकर्मियों के वेतनमान में संशोधन में हो रही देरी के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की। हसन ने कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव वेतन बोर्ड की सिफारिशों को तुरंत लागू करने के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर अनुरोध करेंगे बल्कि संसद में भी इस मुद्दे को पुरजोर ढंग से उठाया जाएगा। आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रमराव ने अफसोस और आक्रोश जताते हुए कहा कि देश में केवल समाचार पत्रों में ही आज भी 1996 का वेतनमान लागू है, जबकि सरकारी एवं गैर सरकारी तमाम संगठनों में उसके बाद से कई बार वेतन पुनरीक्षण हो चुका है और केंद्र की कांग्रेस नीत यूपीए सरकार समाचार पत्रों के मालिकों के दबाव में सिफारिशें लागू नहीं कर रही है। समाचारपत्र कर्मियों के प्रतिनिधिमंडल ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के माध्यम से भी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी को संबोधित ज्ञापन भिजवाया है।

पटना में आर ब्लाक चौराहे के पास पत्रकार संगठनों ने धरना दिया। इस मौके पर बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अध्यक्ष कमलेश कुमार और महासचिव अरुण कुमार ने जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लेकर किए जा रहे इस दुष्प्रचार को गलत बताया कि बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू किए जाने से कई अखबार बंद हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस समय कई अखबारों की राजस्व वृद्धि सौ फीसद से ज्यादा है। धरने के बाद पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री आवास और राजभवन जाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्यपाल देवानंद कुंवर को ज्ञापन सौंपा।

राजस्थान में जयपुर, बीकानेर, हनुमागढ़, चूरू, जोधपुर, नागौर, श्रीगंगानगर समेत कई जिला मुख्यालयों पर समाचार पत्र उद्योग के कर्मचारियों के अलावा राजनीतिक दलों ने भी मांग के समर्थन में धरना दिया।

चेन्नई में 150 से ज्यादा पत्रकारों और गैर-पत्रकारों ने प्रदर्शन किया। जिलाधीश कार्यालय के सामने किए गए इस प्रदर्शन में समाचारपत्रों के अलावा दो संवाद समितियों, पीटीआई और यूएनआई के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस आंदोलन का नेतृत्व हिंदू के कर्मचारियों और नेशनल प्रेस वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष ई गोपाल ने किया। तिरुवनंतपुरम में यूपीए सरकार पर मीडियाकर्मियों को आंदोलन करने के लिए ‘मजबूर’ करने का आरोप लगाते हुए माकपा नेता वीएस अच्युतानंदन ने वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को तुरंत अधिसूचित करने के मामले में प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की मांग की है। केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता ने आरोप लगाया कि अखबार और संवाद समितियों के पत्रकारों और गैरपत्रकारों के वेतन संशोधन में देरी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यही वह एकमात्र क्षेत्र है जहां लंबे समय से वेतन स्थिर बने हुए हैं।

भोपाल में धरने में शामिल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव बादल सरोज, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व महामंत्री एवं प्रवक्ता मानक अग्रवाल एवं सैय्यद साजिद अली, जनवादी लेखक संघ के नेता रामप्रकाश और मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ अध्यक्ष शलभ भदौरिया ने कहा कि पिछले दस-बारह साल में महंगाई ने आसमान छू लिया है और सरकारी एवं निजी संस्थानों के कर्मचारियों के वेतनमान कई बार संशोधित हो चुके हैं लेकिन पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों को अब भी पुराना वेतनमान ही दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन वर्षों में अखबारों का ‘टर्नओवर’ और मुनाफा कई करोड़ बढ़ा है, लेकिन अखबार मालिक इस वेतनबोर्ड के खिलाफ दुष्प्रचार कर अपने कर्मचारियों को बेहतर जीवन जीने का अवसर छीनना चाहते हैं।

   कर्नाटक की राजधानी बंगलूर में आयोजित धरने में कर्नाटक श्रमजीवी पत्रकार संगठन, बंगलूर अखबार पत्रकार संगठन, कर्नाटक पत्रकार परिसंघ, फेडरेशन आॅफ पीटीआई एंपलाइज यूनियन और यूएनआई वर्कर्स यूनियन ने भी हिस्सा लिया। गोवा की राजधानी पणजी में गोवा पत्रकार संगठन (जीयूजे) और अखबार एवं समाचार एजंसी कर्मचारी संगठन परिसंघ की अगुवाई में आजाद मैदान में धरना दिया गया। वेतनबोर्ड के प्रस्तावों के क्रियान्वयन के लिए राज्यपाल एसएस सिद्धू, मुख्यमंत्री दिगंबर कामत, मुख्य सचिव संजय श्रीवास्तव और श्रमायुक्त को ज्ञापन सौंपे गए। जीयूजे के अध्यक्ष पांडुरंग गावंकर ने कहा कि केंद्र जानबूझकर वेतनबोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में देर कर रहा है। ( साभार - जनसत्ता संवाददाता और एजंसियां )।

Friday, 20 May 2011

शून्य से बंगाल की पहली मुख्यमंत्री तक का ममता का सफर


जुझारू तेवर और सादगी व ईमानदारी की मिशाल बनकर लड़ीं

   जैसे ही घड़ी में दोपहर को घड़ी की सुईयां एक बजकर एक मिनट पर पहुंची ममता बनर्जी भी शपथ ग्रहण के लिए मंच पर पहुंच चुकी थीं। गर्मजोशी से राज्यपाल व शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित अतिथियों का अभिवादन करके पश्चिम बंगाल की नई मुख्‍यमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ली। शपथ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन ने दिलाई। ममता ने बांग्ला में शपथ ग्रहण किया। इसके साथ ही ममता राज्य की 11 वीं और पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं। शपथ ग्रहण समारोह राजभवन में आयोजित किया गया। ममता के बाद अमित मित्रा, मनीष गुप्ता, सुब्रत मुखर्जी, अब्दुल करीम चौधरी, उपेंद्र विश्वास, जावेद खान, साधन पांडेय , सावित्री मित्रा, मदन मित्रा और नूर आलम चौधरी सहित 42 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली। इनमें तृणमूल कांग्रेस के ३५ कांग्रेस के ७ विधायक थे। शपथ ग्रहण के बाद शाम करीब 4 बजे ममता बनर्जी ने राजभवन में राज्‍यपाल से मुलाकात की। इसके बाद वह राइटर्स बिल्डिंग पैदल ही रवाना हुईं। उनके साथ करीब 1 हजार समर्थक भी चल रहे थे। इसके बाद ममता ने कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग में नई कैबिनेट की पहली बैठक की।

  पश्चिम बंगाल में 34 साल बाद वामपंथी सरकार को हराकर तृणमूल कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई है। इसके साथ कांग्रेस का भी गठबंधन है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ गृहमंत्री पी चिदंबरम कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। बिमान बोस, रक्षा मंत्री एके एंटनी भी ममता को बधाई देने पहुंचे। दिलचस्प बात यह रही कि कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विदेश यात्रा के कारण इस कार्यक्रम में शिरकत नहीं कर पाए जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी किसी और कारण से समारोह में शामिल नहीं हुईं।

जहां हुई थी बेइज्जती वहीं अब शान से पहुंचीं ममता


पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का किला ध्वस्त करने के बाद धुन की पक्की ममता बनर्जी शान से शुक्रवार २० मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर रॉयटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया। कभी इसी रॉयटर्स बिल्डिंग में ममता बनर्जी को जीवन की सबसे बड़ी बेइज्जती का सामना करना पड़ा था। पुलिस ने ममता बनर्जी को इस बिल्डिंग से बाल पकड़कर बाहर निकाला था और लॉकअप में बंद कर दिया था। ममता का जुर्म सिर्फ यह था कि वो एक गूंगी बहरी लड़की के बलात्कार के मामले में न्याय चाहती थीं।

पश्चिम बंगाल के नदियाया जिले के फूलिया गांव की रहने वाली गूंगी बहरी लड़की दीपाली बसक का एक सीपीएम कार्यकर्ता ने बलात्कार किया था। ममता बनर्जी ने 1992 के इस मामले को रॉयटर्स बिल्डिंग में उठाने की कोशिश की थी। वो दीपाली को लेकर सचिवालय पहुंची थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलना चाहती थी। ममता ने ज्योति बसु से मिलने के लिए पहले समय नहीं लिया था इसलिए उन्हें उनसे नहीं मिलने दिया गया बल्कि पुलिस ने ममता के साथ बदतमीजी की। 1992 की इस घटना के बाद ममता कभी भी रॉयटर्स बिल्डिंग में नहीं गईं और न ही उन्होंने कभी अपने बाल ठीक से बांधे।

दीपाली का क्या हुआ
दीपाली का बलात्कार एक सीपीएम कार्यकर्ता ने किया था जो बलात्कार के बाद गांव छोड़कर फरार हो गया। पुलिस ने भी इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली। ममता बनर्जी ने मुद्दों को कलकत्ता में तो उठाया लेकिन वो भी कभी उससे मिलने फूलिया नहीं पहुंची। कुछ नेता दीपाली के घर पहुंचे लेकिन बंगाल ने धीरे-धीरे उसे भुला दिया। बलात्कार की शिकार दीपाली गर्भवती हो गई थी। उसने एक बेटी को जन्म दिया जो एक आश्रम में पल रही है। दो साल पहले सांप के काटने से दीपाली की मौत हो गई। दीपाली का परिवार अभी भी न्याय की आस लगाए बैठा है।

क्यों अलग हैं ममता


पश्चिम बंगाल में 34 साल से सत्ता में बने हुए वामपंथियों के ख़िलाफ़ एक बड़ा राजनीतिक युद्ध लड़ने के बाद ममता बनर्जी आगे की योजनाएँ बना रही हैं. कहने को इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी, मायावती, उमा भारती और महबूबा मुफ़्ती से जयललिता तक, भारत में महिला राजनेताओं की बड़ी फ़ेहरिस्त है. लेकिन ममता अलग हैं. इंदिरा गांधी के पीछे जवाहर लाल नेहरु थे, सोनिया के पीछे राजीव गांधी, मायावती के पीछे कांशी राम, उमा भारती के पीछे पहले विजयाराजे सिंधिया और बाद में गोविंदाचार्य, महबूबा मुफ़्ती मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी हैं तो जयललिता एमजीआर की उत्तराधिकारी हैं. लेकिन ममता के पीछे किसी भी ऐसे बड़े पुरुष राजनेता का नाम नहीं लिया जा सकता जिसके बिना वो वहां पहुँच सकती थीं, जहाँ वो आज हैं. आज जब ममता बोलती है तो उनके शत्रु तक ध्यान से सुनते हैं. वो देश में वामपंथ विरोधी आंदोलन का एक मात्र चेहरा हैं."

उग्र स्वभाव, सादे जीवन ने ममता को बनाया बंगाल की दीदी
ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। ममता ने छात्र जीवन के शुरुआती दिनों से ही राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरु कर दी थी और 1970 के दशक में वो कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई। 1976 में ममता बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव बन गई थीं। जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर कूदकर ममता सुर्खियों में आई और उसके बाद से बंगाल की राजनीति में अपना स्थान बनाती चली गईं। 1984 के चुनाव में जादवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी को हराकर ममता बनर्जी ने सबसे युवा सांसद बनने का इतिहास रचा।

1989 में कांग्रेस विरोधी माहौल में ममता सांसद का चुनाव हार गई लेकिन 1991 के आमचुनावों में उन्होंने दक्षिण कलकत्ता सीट से जीत दर्ज की। 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनावों में ममता ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। 1991 में राव सरकार में ममता मानव संसाधन विकास, खेल ओर युवा कल्याण तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री भी रहीं। हालांकि अप्रैल 1993 में ममता से मंत्रीपद ले लिया गया। ममता बनर्जी अपने उग्र स्वभाव के चलते काफी विवादों में भी रहीं। 1996 में उन्होंने अलिपुर में एक रैली के दौरान अपने गले में काली शाल से फांसी लगाने की धमकी भी दी। जुलाई 1996 में पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने के विरोध में ममता सरकार का हिस्सा रहते हुए भी लोकसभा के पटल पर ही विरोध में पालथी मारकर बैठ गई थीं।

ममता ने इसी दौरान तत्कालीन समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर भी पकड़ लिया था। फरवरी 1997 में रेल बजट पेश होने के दौरान ममता ने रेलमंत्री रामविलास पासवान पर अपनी शाल फेंककर बंगाल की अनदेखी के विरोध में अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। हालांकि बाद में उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया था। 11 दिसंबर 1998 को ममता ने समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर कॉलर पकड़कर संसद के बाहर खींच लिया था।

कांग्रेस से अलग होकर ममता ने 1 जनवरी 1998 को अपनी पार्टी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और 1999 में एनडीए की गठबंधन सरकार में वो रेलमंत्री रहीं। हालांकि वो ज्यादा दिनों तक सरकार का हिस्सा नहीं रही और 2001 में सरकार से अलग हो गई। इसके बाद 2004 में चुनाव से पहले वो फिर एनडीए सरकार में आई और खदान एवं कोयला मंत्री रहीं। 2004 चुनाव में ममता की पार्टी की बुरी हार हुई लेकिन 2009 चुनाव में पार्टी ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। ममता फिलहाल केंद्र सरकार में रेल मंत्री हैं। आजीवन कुंवारी रहने वाली ममता बनर्जी ने उतार-चढ़ाव भरे अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में सादगी को बनाए रखा है और वो गहनों या कपड़ों पर कभी खर्च नहीं करती हैं। पार्टी में दीदी के नाम से जानी जाती हैं और बेहद सादा जीवन व्यतीत करती हैं।

कभी दूध बेचा करती थीं ममता बनर्जी, 28 किताबें लिख चुकी हैं

आज पश्चिम बंगाल की जिम्‍मेदारी संभालने वालीं ममता बनर्जी को कभी घर की जिम्‍मेदारी पूरी करने के लिए दूध बेचना पड़ा था। ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वे बहुत छोटी थीं तभी उनकी मृत्यु हो गई थी। तब दूध बेच कर उन्होंने अपनी विधवा मां की परिवार चलाने में मदद की। ममता ने 70 के दशक में कांग्रेस की छात्र इकाई से अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी। उस समय इस इकाई ने कोलकाता से नक्सलियों को उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाई थी।

ममता ने कानून और शिक्षा के अलावा कला में भी डिग्री हासिल की है। ममता को राजनीति में सुब्रत मुखर्जी लाए थे। अब मुखर्जी तृणमूल कांग्रेस में ममता के अनुयायियों में से एक हैं। ममता को 1984 से पहले पश्चिम बंगाल के बाहर कोई नहीं जानता था, लेकिन जब उन्होंने इस साल के अपने पहले लोकसभा चुनाव में ही जादवपुर से माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को पराजित कर दिया तो वे देशभर में मशहूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ममता राजनीति के अलावा चित्रकारी और लेखन में भी रुचि रखती हैं। वे एक अच्छी रसोईया भी हैं। वे धार्मिक भी हैं और हर साल काली पूजा में जरूर हिस्सा लेती हैं।साल 2009 के और इस बार के चुनावों में भी ममता का नारा 'मां, माटी और मानुष' था। बंगाल के जनमानस में ‘पोरीबोर्तन’ का सपना भरने वाली ममता बनर्जी के जीवन का एक अनजाना पहलू यह भी है कि वे एक संवेदनशील कवयित्री हैं। उनकी कविताओं में भी ‘बदरंग’ हो चुकी राजनीति के ‘पोरीबर्तन’ (बदलाव) की छटपटाहट है और साथ-साथ इसकी इस आशय की हुंकार भी है। उनकी अब तक 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से 25 बांग्ला और तीन अंग्रेजी में हैं। इसके अलावा वह कुछ बांग्ला गीत लिखने के साथ-साथ उन गीतों को संगीतबद्ध भी कर चुकी हैं। सहयोगियों के अनुसार ममता चित्रकार भी हैं और लगभग पांच हजार से अधिक चित्र उकेर चुकी हैं। उन चित्रों को बेचने से हुई आय वे अपनी पार्टी के फंड एवं अन्य दान कार्यों के लिए देती रही हैं।


राजनीतिक सफर


जीवन के शुरुआती दिनों से ही राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरु कर दी थी और 1970 के दशक में ममता बनर्जी कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई. 1976 में ममता बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव बन गई थीं. जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर कूदकर ममता सुर्खियों में आई और उसके बाद से बंगाल की राजनीति में अपना स्थान बनाती चली गईं. 1984 के चुनाव में जादवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी को हराकर ममता बनर्जी ने सबसे युवा सांसद बनने का इतिहास रचा. 1989 में कांग्रेस विरोधी माहौल में ममता सांसद का चुनाव हार गई लेकिन 1991 के आमचुनावों में उन्होंने दक्षिण कलकत्ता सीट से जीत दर्ज की.

1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनावों में ममता ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा. 1991 में राव सरकार में ममता मानव संसाधन विकास, खेल ओर युवा कल्याण तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री भी रहीं. हालांकि अप्रैल 1993 में ममता से मंत्रीपद ले लिया गया. ममता बनर्जी अपने उग्र स्वभाव के चलते काफी विवादों में भी रहीं. 1996 में उन्होंने अलीपुर में एक रैली के दौरान अपने गले में काली शॉल से खुद को फांसी लगाने की धमकी भी दी. जुलाई 1996 में पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने के विरोध में ममता सरकार का हिस्सा रहते हुए भी लोकसभा के पटल पर ही विरोध में ज़मीन पर बैठ गई थीं. फरवरी, 1997 में रेल बजट पेश होने के दौरान ममता ने रेलमंत्री रामविलास पासवान पर अपनी शॉल फेंककर बंगाल की अनदेखी के विरोध में अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी. हालांकि बाद में उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया था.

11 दिसंबर 1998 को ममता ने समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर कॉलर पकड़कर संसद के बाहर खींच लिया था. कांग्रेस से अलग होकर ममता ने 1 जनवरी, 1998 को अपनी पार्टी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और 1999 में एनडीए की गठबंधन सरकार में वो रेलमंत्री रहीं. हालांकि वो ज्यादा दिनों तक सरकार का हिस्सा नहीं रही और 2001 में सरकार से अलग हो गई. इसके बाद 2004 में चुनाव से पहले वो फिर एनडीए सरकार में आई और खदान एवं कोयला मंत्री रहीं. 2004 चुनाव में ममता की पार्टी की बुरी हार हुई लेकिन 2009 चुनाव में पार्टी ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया.


बंगाल में 34 साल बाद ईश्वर के नाम पर शपथ


पश्चिम बंगाल में बदलाव के पहले प्रतीक के रूप में तृणमूल कांग्रेस की नई सरकार के कई मंत्रियों ने शुक्रवार को ईश्वर को साक्षी मानकर पद और गोपनीयता की शपथ ली। इससे पहले वामपंथी सरकारों के मंत्री संविधान के प्रति निष्ठा के नाम पर शपथ लेते थे प्रदेश में वर्ष 1977 के बाद से लगातार सत्ता में रहे वाम मोर्चे की राजनीतिक विचारधारा नास्तिक है इसलिए मोर्चे के नेता शपथ ग्रहण के दौरान संविधान के प्रति निष्ठा व्यक्त करते थे। इसके विपरीत तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के ज्यादातर मंत्रियों ने शुक्रवार को भगवान के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ ली। तृणमूल कांग्रेस के पूर्णेदू बोस जैसे कुछ ही नेताओं ने संविधान के प्रति सत्यनिष्ठा के नाम पर शपथ ली।
एक अन्य बदलाव के तहत प्रदेश की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजभवन से प्रदेश सचिवालय तक का दो किलोमीटर का रास्ता पैदल चलकर तय किया। इससे पहले वामपंथी शासन के समय नेतागण कार से ही यह रास्ता तय करते थे। ममता बनर्जी ने सभी मंत्रियों को धोती-कुर्ता पहनकर और महिला मंत्रियों को साड़ी पहनकर शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने का निर्देश दिया था।



कभी मारी थी सिर पर लाठी, अब पैरों पर गिरना चाहता है

16 अगस्त 1990 को पश्चिम बंगाल में बंद के दौरान ममता बनर्जी कांग्रेस की रैली लेकर कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के हाजरा रोड पर निकली थीं। इस रैली के दौरान सीपीआई की यूथ ब्रिगेड डीवाईएफआई का कार्यकर्ताओं ने चारों से घेरकर ममता पर हमला किया था। डीवाईएफआई के कार्यकर्ता लालू आलम ने ममता के सिर पर लाठी मारी थी। ममता के सिर में फ्रैक्चर हुआ था और उन्हें एक महीने अस्पताल में रहना पड़ा था। लालू अब अपने किए पर पछता रहा है। लालू अब अपने किए पर इतना ज्यादा शर्मिंदा है कि वो ममता के पैर पकड़कर माफी मांगना चाहता है। 21 साल पहले ममता पर हमला करने के मामले में लालू पर मुकदमा चल रहा है। 51 वर्षीय आलम का कहना है कि वो निर्दोष है क्योंकि उसका इरादा ममता की हत्या करने का नहीं था। ममता पर हमले के बाद सीपीआई ने भी लालू को पार्टी से निकाल दिया था। लालू आलम फिलहाल एक स्टूडियो चलाता है।


अब बंगाल के लिए खजाना खोलने को तैयार हैं 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिली ऐतिहासिक जीत के बाद अब अप्रवासी भारतीय भी वहां निवेश के लिए अपना खजाना खोलने को तैयार दिख रहे हैं। कनाडा में रह रहे अप्रवासी भारतीयों ने ममता बनर्जी से अपील की है कि वे पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीकरण को अपने एजेंडे में खास प्राथमिकता दें।

इस सिलसिले में कनाडा के सेर्टेक्स कार्पोरेशन के अध्यक्ष जय सरकार ने कहा है कि यह वक्त की बात है कि पश्चिम बंगाल बदलाव चाहता है और बदलाव हुआ है। नई सरकार को लोगों की आवाज सुनते हुए तेजी से काम करने की जरुरत है। उन्होंने यह भी कहा है कि वे पश्चिम बंगाल में उद्योग स्थापित करना चाहते हैं। और इसके लिए काम भी कर रहे हैं लेकिन पश्चिम बंगाल की स्थिति को लेकर अब तक वे आशंकित थे। लेकिन उन्हे उम्मीद है कि अब उद्योगों के लिए पश्चिम बंगाला में स्थिति बेहतर होगी।

जय सरकार ने यह भी कहा कि उनके अलावा भी ऐसे तमाम एनआरआई हैं जो बंगाल में निवेश करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन इसके लिए वहां सुस्त पड़ी औद्योगिक विकास की रफ्तार में तेजी लाने की जरूरत है। दरअसल जानकारों का यह मानना है कि बीते कई सालों से बंगाल में औद्योगिक मामले में खास तेजी नहीं देखी गई है। ऐसे में वहां निवेश करना उद्योगपतियों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। दूसरी ओर इससे मुश्किल दौर से गुजर रही बंगाल की इकोनॉमी को भी मदद मिलेगी। ऐसे में इसे नई सरकार के लिए भी एक सुनहरे मौके के तौर पर देखा जा सकता है।

बंगाल में लहराया ममता का परचम, लेफ्ट के 26 मंत्री हारे

देश के चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर बंगाल में हुआ है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के गठबंधन ने 34 साल से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चे का लाल गढ़ ढहा दिया है। विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई वाले गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य सहित लेफ्ट के कई दिग्‍गज अपनी सीट भी नहीं बचा सके हैं। तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन 228 सीटें जीत चुका है। चुनाव परिणामों से उत्‍साहित ममता बनर्जी ने राज्‍य के मतदाताओं का शुक्रिया अदा किया है। उन्‍होंने कहा, ‘हमें उन शहीदों को याद करना चाहिए जो तीन दशक तक चले लंबे संघर्ष में मारे गए हैं।’ यह कहते-कहते ममता भावुक हो उठीं और उनकी आंखों से आंसू छलक उठे।

ममता ने दक्षिण कोलकाता में हरीश चटर्जी स्‍ट्रीट स्थित अपने घर के बाहर जुटी समर्थकों की भारी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, 'यह बंगाल की दूसरी आज़ादी है। यह मां, माटी और मानुष की जीत है। यह लोकतंत्र की जीत है। यह वामपंथियों की उत्‍पीड़न पर जीत है। अब राज्‍य में शांति और खुशहाली बहाल होगी।' ममता बनर्जी ने राज्‍य के लोगों से शांति की अपील की है। उन्‍होंने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि उन्‍हें यह जीत रविंद्र नाथ टैगोर की 150वीं जयंती पर मिली है। उन्‍होंने कहा कि राज्‍य में शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी नीतियों में बदलाव की जरूरत है और ऐसा अब किया जाना संभव है। उन्‍होंने पीएम मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के समर्थन के लिए शुक्रिया अदा किया।

क्‍यों ढहा लेफ्ट का किला?

लेफ्ट का गढ़ माने जा रहे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ने सेंध लगा दी। राज्य में वाम मोर्चे का 34 साल पुराना किला ढहने के संकेत पिछले लोकसभा चुनाव में ही मिल गए थे, जब तृणमूल कांग्रेस का जादू जनता के सिर चढ़कर बोला। 2010 में हुए स्‍थानीय निकाय के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का जोरदार प्रदर्शन रहा था। भूमि अधिग्रहण का शिकार हुए कमजोर गांववालों और किसानों की आवाज बनकर उभरी। वाम मोर्चा की अगुवाई वाली सरकार ने वर्ष 2006 में सत्ता में आने के बाद औद्योगिक नीतियों में बदलाव किया जिसके कारण सरकार के प्रति लोगों का विश्वास घट गया था। इसके बाद ‘नंदीग्राम’ और ‘सिंगूर’ की घटना ने आग में घी का काम किया। तृणमूल कांग्रेस ने इन मौका का भरपूर फायदा उठाया और खासकर ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की।


पश्चिम बंगाल : सीट- 294
तृणमूल कांग्रेस 186
कांग्रेस 42
माकपा 39
सहयोगी 19
अन्य 08

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