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Thursday, 6 March 2014

धैर्य की कठिन परीक्षा थी जलकर खाक हुआ दवाखाना व उसपर आश्रित जीविका को संभालना


( श्रद्धांजलि भाग-2 ..आज भी खोजता हूं उस वटवृक्ष की छाया )


     यह मेरे बचपन के उस हिस्से की बात है जब मैं स्कूल जाना शुरू नहीं किया था और तब मां और पूरा परिवार गदाईपुर में ही पुस्तैनी मकान में रहता था। इसी मकान के बड़े हिस्से में मेरे काका ( परमहंस सिंह जिन्हें हम गुल्ली काका  कहते थे, इनकी कोई संतान नहीं थी। काफी पहले काकी का इंतकाल हो गया था।), चाचा, चाची ,  व उनके बेटे सुभाष भईया, विजय भईया व प्रेम भईया रहते थे। इनके हिस्से का प्रवेश द्वार दक्षिण व पश्चिम दोनों तरफ था। दरअसल पूरा घर तीन हिस्से में बांटा गया था जिसमें से दो हिस्सा काका व चाचा का था और एक हिस्सा पिताजी को मिला था। यह सिर्फ घर, खेत-जमीन व संपत्ति का बंटवारा था मगर परिवार के सर्वमान्य मुखिया पिताजी ही थे। बड़े भईया हों या छोटे भईया विजय सभी पिताजी के सानिध्य को पसंद करते थे। सभी भाईयों की शादी की बात हो या अन्य समस्या पिताजी के ही सामने सबकुछ रखा जाता था। यह भी विचित्र बात थी कि अलग होते हुए भी निर्विकार भाव से पिताजी बड़े होने की भूमिका निभा रहे थे। उनकी इस भूमिका को हम लोगों ने काफी बड़े होकर भी देखा। यह था उनके विलक्षण व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्णपहलू ।
    पश्चिमी-उत्तरी कोने में हमारे घर का हिस्सा था। पश्चिम की तरफ हमारा दरवाजा था। उधर ही पिताजी की घोड़ी का अस्तबल व खाने का हौदा नीम के पेड़ के नीचे था। ईधर ही हम लोग दरवाजे पर खेलते थे। गदाईपुर गांव ( उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के तरवां ब्लाक के पास गाजीपुर व आजमगढ़ सीमा का वह गांव जिसकी आबादी गाजीपुर में मगर गांव के तमाम लोगों की खेती की जमीन आजमगढ़ में थी ) के पूरब तरफ एक विशाल मैदान और पोखरा था। पोखरा तो आज भी है मगर मैदान अतिक्रमण की भेट चढ़ गया है। पोखरे के उत्तरी -पश्चिमी कोने पर पिताजी का बड़ा सा दवाखाना था जहां आयुर्वेदिक दवाओं का भंडार था। यह सिर्फ दवाखाना नहीं था। इसमें पिताजी की बहुमूल्य आध्यात्मिक पुस्तकें व दवा बनाने के निमित्त बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का इतना भंडार था कि महीनों तक हजारों रोगियों को रोग के हिसाब से हर तरह की दवाएं बनाई जा सकें। पिताजी की खासियत यह थी कि जो भी दवाएं मरीजों को देते थे उनका निर्माण इसी दवाखाने में खुद करते थे। अर्थात आयुर्वेदिक फार्मेसी के साथ यह वह चैम्बर भी था जहां रोगियों के इलाज के लिए पिताजी बैठा करते थे। दवाखाना के साथ पिताजी के लिए यह एक ऐसा सामुदायिक केंद्र था जहां अध्यात्म व भक्ति चर्चा भी प्रमुखता से होती थी। वर्षों की तपस्या के बाद उन्होंने इसे खड़ा किया था। इसमें इतनी इफरात जगह थी कि पिताजी के अतिथिगण भी अक्सर शरण लेते थे। हम लोग इसे बाबूजी की कुटिया और गांव के लोग बैद भईया का दवाखाना कहते थे। सचमुच में वहां बैठना इतना मनोरम लगता था जैसे पंचवटी में बैठे हों। दरअसल अब समझ में आता है कि पिताजी को ऐसी कुटिया बनाने की प्रेरणा रामचरित मानस में वर्णित राम के वनवास के दौरान कई जगहों पर बनी कुटिया से मिली होगी। इस परमपावन जगह को भी लोगों की नजर लग गई।
  हम लोग मनिहारी गए हुए थे। वहीं सूचना मिली कि पिताजी का दवाखाना जल गया और कुछ भी नहीं बचा। दरअसल हुआ यह कि दवाखाना के बगल में जो विशाल खाली जगह थी , उसमें गांव का खलिहान होता था। फसलें काटकर वहां रखी जाती थी फिर मड़ाई वगैरह करके अनाज निकालकर घर ले जाया जाता था। तब मड़ाई के आज जैसे आधुनिक साधन नहीं थे। महीनों तक खलिहान पड़ा रहता था। इसी खलिहान में अरहर के डंठे को सूखने के लिए दवाखाने के पिछवाड़े दीवाल के सहारे खड़ा किया गया था। गांव में अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में घूम रहे विजयी चाचा ने किसी वजह से खलिहान में आग लगा दी। आरोप विजई चाचा पर लगा था। यह विजई चाचा मेरे गांव के काफी शिक्षित व्यक्ति थे मगर किसी वजह से उनका दिमाग फेल हो गया था। इस कारण यत्र-तत्र घूमते रहते थे। किसी विषय पर बहस में लोग उनसे टकराने से बचतेथे। एक बार का बात है कि हमलोग मौसम पर बात कर रहे थे। मैंने कह दिया कि अभी जो तूफान व बारिश हुई है वह एक साइक्लोनिक डिस्टर्बेंस था। चाचा वहां से गुजर रहे थे। ठिठककर रुक गए। मुझसे् ही पूछा कि साइक्लोनिक डिस्टर्बेंस क्या होता है । मुझे इतनी गहरी जानकारी नहीं थी। अब चाचा ने अंगरेजी में इसकी व्य़ाख्या शुरू कर दी। सभी की बोलती बंद थी। चाचा बड़े विद्वान थे मगर विक्षिप्तता ने उन्हें नकारा बना दिया था। कहते हैं कि चाचा ने ही जानबूझकर आग लगाई थी।
          बहरहाल दवाखाना जलने की कहानी बता रहा था। आग लगने का जब तक लोगों को पता चलता पूरा खलिहान धू-धू कर जलने लगा। सूख चुकी अरहर की डंठलों से तो ऐसी लपटें उठीं कि सारा दवाखाना पलभर में आग की लपटों में घिर गया। कुछ भी नहीं बचाया जा सका। नतो खलिहान में ऱखीं सालभर की कमाई की फसलें और नही बाबूजी के अरमानों की कुटिया । कुछ घंटों में चारो तरफ राख ही राख था। यह विवरण बाद में जैसा मैंने सुना था, वैसा ही वर्णित किया है। पिताजी के लिए दवाखाना जलने के बाद तो जीवन नए सिरे से शुरू करने जैसा था। किसी से कोई गिला शिकवा नहीं। उन्होंने जल चुके दवाखाने की जगह उस घर में मरीजों को देखना शुरू किया जहां हमलोग रहते थे। सबकुछ जो घटा उसे ईश्वर की मर्जी और नए सिरे से जीवन संघर्ष को ईश्वर का आदेश मानकर जब चलना शुरू किया तो पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। निर्विकार भाव से मरीजों को देखते हुए संतों का सा जीवन जीने लगे। पूजापाठ फिर जनसेवा। कई बार सुना कि कई गरीब मरीज दवा व फीस देने के काबिल नहीं मगर उन्हें इलाज की जरूरत थी। पिताजी ने उनसे कुछ नहीं मांगा। खेतों व बगीचों से कुछ जड़ी बूटियां खोजकर लाने को कहते और खल-मूसर देकर उससे ही दवा बनवाते थे। वही दवा उसे दे देते। ऐसी जीवन शैली व धैर्य ने ही उनको लोगों से अलग मुकाम दिया। गृहस्थ जीवन में भी निर्विकार संन्यासियों का सा धैर्य था उनमें। जो कुछ था उसे ईश्वर की कृपा मानते थे। आज बस इतना ही। उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर फिर कुछ लिखूंगा।


Tuesday, 4 March 2014

आज भी खोजता हूं उस वटवृक्ष की छाया



श्रद्धांजलि उस पिता को जो मेरे 
आध्यात्मिक गुरु भी थे
५२ साल का हो गया हूं। 19 साल होगए पिताजी को गुजरे। आज भी जब भी मुश्किल में होता हूं और आसपास कुछ भी नजर नहीं आता तो आकुल मन उस पिता को खोजने लगता है जिसका सिर्फ होना ही मेरी ताकत थी। ऐसा आत्मविश्वास जो मुझे कठिन हालातों में भी टूटने नहीं देता था। दरअसल मेरे पिता मेरे आध्यात्मिक गुरू थे। बहुत छोटा था तो मां के साथ ननिहाल रहने लगा था। ऐसे में जब स्कूल बंद होते थे और गर्मी की छुट्टियां होती थी तो मां मुझे पिताजी के पास मेरे गांव गदाईपुर भेज देती थी। जब से मां ननिहाल की संपत्ति की देखभाल के लिए मनिहारी चली गईं थी तब से गदाईपुर को पिताजी ने आश्रम बना दिया था। खुद खाना बनाना। सादगी का जीवन। साधु सन्यासियों का आना-जाना , यह सब बेहद अनुशासित व नियमबद्ध था। पिताजी मशहूर वैद्य थे। काशी से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि तो ली ही थी साथ ही काशी नरेश ने उन्हें उनकी काबिलियत के लिए वैद्य शिरोमणि उपाधि से नवाजा था। सुबह सात बजे से दिनभर मरीज पिताजी के दवाखाने पर आते रहते थे। पिताजी इन मरीजों को दवा के साथ नसीहत भी देते रहते थे। दरअसल पिताजी किसी गुरुकुल के आचार्य जैसा जीवन तो जी रहे थे मगर अपनी पूरी गृहस्थी भी गदाईपुर से लेकर मनिहारी तक संभाल रखी थी। इसीलिए हमलोगों का दो घर हो गया था और कभी भी दोनों जगह आना-जाना करना पड़ता था।

      अभी मैं पिताजी की पुण्यतिथि ( 4 मार्च-1995) पर श्रद्धांजलि  देने के बहाने उन्हें याद कर रहा हूं ,इसलिए उन्हीं तक सीमित होकर कुछ बातें करना चाहूंगा। श्रद्धांजलि के इसक्रम में पारिवारिक विवरण व दूसरी स्मृतियों को बाद में रखूंगा।
  भगवान राम के अनन्य भक्त पिताजी का बाद का जीवन भी बनवास या वानप्रस्थ जैसा ही रहा। मैं जब गर्मी की छुट्टियों में गदाईपुर पहुंचता था तो पिताजी की हर शाम और राममय हो जाती थी। होता यह था कि शाम को संध्या भजन के बाद हमलोगों की मंडली जिसमें अक्सर रामबदन बाबा, कभी-कभी मेरे घर पधारे साधु सन्यासी व दूसरे लोग एक साथ बैठते थे। मैं सस्वर रामचरित मानस का पाठ करता था और पिताजी उसकी भक्तिमय व्याख्या करते थे। यह क्रम जबतक मैं गदाईपुर में रहता था तब तक चलता था। यही वह बड़ी वजह थी जिसके कारण पिताजी मुझसे बेहद खुश रहते थे। मुझे संध्या करने को भी बैठाते थे। बड़ी कोशिश से कई मंत्रों को याद करके मैं भी संध्या करता था मगर मेरा चंचल बालमन इसे ज्यादा स्वीकार नहीं कर पाया। अक्सर संध्या के समय गायब हो जाता। पिताजी ने कारण पूछा तो बड़ी सहजता से कह दिया कि मन नहीं लगता। लेकिन मन में आस्था का भाव कम नहीं था। दिनभर कल्याण व दूसरी धार्मिक कहानियां पढ़ता रहता था। बड़े फक्र के साथ कह सकता हूं कि मेरे आज के आध्यात्मिक ज्ञान का वही आधार बना।
  मैं पिताजी को अपना आध्यात्मिक गुरू मानता हूं तो इसकी वजह भी यही है कि धर्म, अनुशासन व सनातनी संस्कार मुझे उनसे ही मिले हैं। पिताजी के 4 मार्च 1995 को जब गुजरने की खबर मिली तो मैं उस वक्त कोलकाता में था। आफिस के मेरे वरिष्ठ सहयोगी अनिल त्रिवेदी ने दोपहर में मेरे घर आकर सूचना दी कि आफिस में फोन आया था- आपके पिताजी नहीं रहे। मेरे उपर वज्र टूट पड़ा। क्यों कि मैंने सोचा था कि पिताजी को घर में भजन वगैरह सुनने व टीवी पर आने वाले रामायण के कैसेट लेकर पूरा रामायण दिखाउंगा। मेरे सपने तो टूटे ही,  साथ ही लगा जैसे मैं एकदम अकेला हो गया हूं। घर में सभी को खाना खा लेने का इंतजार करने लगा मगर मेरा धैर्य डोल रहा था। कंबल में मुंह ढककर फफक- फफक कर रोया मगर पत्नी व बच्चों को तबतक नहीं बताया जबतक वे खाना नहीं खा लिए। बच्चे बेहद छोटे थे और सबसे छोटा विष्णु तो कुछ महीने का ही था। दुख असह्य था। उसी पीड़ा के साथ घर को रवाना हुआ मगर मेरे लिेए यह एक और पीड़ादायी रहा कि मैं अपने आध्यात्मिक गुरू और पिता की न तो शवयात्रा में शामिल हो सका और नही उनके अंतिम दर्शन कर पाया। यह पीड़ा मेरे अंतर्मन में इतनी घर कर चुकी है कि मैं चाहकर भी भुला नहीं पाता हूं। जब पुण्यतिथि आती है तो आंखे उसी बोधिवृक्ष को खोजने लगती है।
आज जब पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर आफिस में काम खत्म करने के बाद श्रद्धांजलि देने बैठा हूं तो मन बोझिल हो चला है। अब और कुछ कह सकने की स्थिति मे नहीं हूं मगर  पिताको श्रद्धांजलि के इस क्रम में लिखना जारी रखूंगा।………………...

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