Sunday, 17 April 2011

तृणमूल पर आरोपों के साए में उत्तरबंगाल में मतदान


छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के पहले चरण का मतदान सोमवार यानी १८ अप्रैल को होने जा रहा है। इस चरण के माहौल की झलक के साथ अब हर चरण के मतदान से पहले हाजिर होता रहूंगा। चुनाव के लिहाज से पश्चिम बंगाल की फिजा अलग ही होती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल की मुहिम ने माहौल को और गरमा दिया है। १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का बिगुल बज चुका है। मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू कराना चाहता हूं। निरपेक्ष भाव से इस महाभारत की कथा सुनाऊंगा। रखिए मेरे ब्लाग के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-२०११ धारावाहिक की हर कड़ी पर नजर।
ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह
  कई घटनाक्रमों के साए में सोमवार १८ अप्रैल को पश्चिम बंगाल के उत्तरबंगाल में वोट पड़ेंगे। मतदान से ठीक एक दिन पहले तृणमूल नेता व जहाजरानी मंत्री मुकुलराय का बेटा शुभ्रांशु राय को चुनाव अधिकारियों पर हमला करने के आरोप में नैहाटी इलाके से ममता की चुनावी सभा होने के बाद सभास्थल से गिरफ्तार कर लिया गया। शुभ्रांशु बीजपुर से तृणमूल का उम्मीदवार भी है। इस बड़ी घटना के अलावा दमदम सीट से वाममोर्चा उम्मीदवार व राज्य के आवास मंत्री गौतम ने ममता पर उम्मीदवारों के बीच ३४ करोड़ से अधिक कालाधन बांटने का आरोप लगाया है। जब मुकुल राय ने इसे गलत बताते हुए मानहानि का दावा करने की बात कही तो गौतम देव ने चुनौती दी कि हिम्मत हो तो ममता मानहानि का दावा करें। गौतम ने इस आरोप के पुख्ता सबूत होने का दावा किया। इन दोनों घटनाओं ने उत्तरबंगाल में मतदान से ठीक एक दिन पहले वाममोर्चा में जहां उत्साह भर दिया है वहीं तृणमूल को पशोपेश में डाल दिया है। उत्तरपबंगाल वैसे तो कांग्रोस का गढ़ है मगर विधानसभा चुनावों में वहां वाममोर्चा ही भारी पड़ता रहा है। मालदा इलाके में तो गनीखान परिवार में मतभेद काग्रेस का खासा नुकसान कर चुका है। उत्तरबंगाल में काग्रेस व तृणमूल गठबंधन उम्मीदवार के साथ इनके विद्रोही भी नुकसान पहुंचाने को तैयार खड़े हैं। ऐसे में इन दो बड़ी घटनाओं ने और असमंजस पैदा कर दिया है। क्या सचमुच इन आरोपों से तृणमूल व कांग्रेस के मतदाता दिग्भ्रमित होंगे ? यह तो मतदाता ही जाने मगर परिवरिवर्तन की जो लहर बंगाल में है उसे इस तरह की घटनाएं शायद ही रोक पाएं। कल के मतदान को तो फिलहाल यह प्रभावित करने वाला नहीं दिखता मगर मुद्दा इसी तरह गरम रहा तो कोलकाता और उत्तर २४ परगना के मतदान पर शायद कुछ असर दिखा पाए।
   पर्वतीय उत्तरी इलाके दार्जीलिंग से लेकर मालदा जिले तक चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राजनीति के बड़े दिग्गजों जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पार्टी महासचिव राहुल गांधी, केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी और अरुण जेटली ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार किया। वाम मोर्चा के अध्यक्ष एवं मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्य सचिव बिमान बोस, माकपा पॉलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी तथा तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने छह जिलों में चुनाव प्रचार कर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया।

10 मंत्रियों के भाग्य का फैसला
पश्चिम बंगाल के छह जिलों के 54 विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले प्रथम चरण के चुनाव में 97.42 लाख मतदाता अपना वोट देंगे। यहां पर मुख्य लड़ाई माकपा की अगुवाई में वाम मोर्चा और तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन के बीच है। प्रथम चरण के इस चुनाव से राज्य के 10 मंत्रियों के भाग्य का फैसला तय होगा। पहले चरण के मतदान में माकपा के 32, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दो, फॉरवार्ड ब्लॉक के 10, रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी (आरएसपी) के नौ, सोशलिस्ट पार्टी के एक, तृणमूल कांग्रेस के 26, कांग्रेस के 27, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक तथा भाजपा के 49 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है।

    इन 54 सीटों पर कुल 364 उम्मीदवार भाग्य आजमा रहे हैं। शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चत करने के लिए सुरक्षा के कड़े प्रावधान किए गए हैं। राज्य के जिन जिलों में चुनाव होना है उनमें-कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और मालदा शामिल है। इसके लिए 12,133 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी सुनील कुमार गुप्ता ने बताया कि सुरक्षा बल विभिन्न इलाकों में पहुंच चुके हैं। राज्यों और अंतरराष्ट्रीय सीमा को सील कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि दार्जीलिंग और कलिमपोंग के सुदूरवर्ती इलाकों के लिए मतदानकर्मी शनिवार को ही रवाना हो गए थे।

सत्ता में लंबे समय तक बना रहना ही सबसे बड़ी कमज़ोरी

सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के लिए सत्ता में एक लंबे समय तक बना रहना ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी कही जा रही है। पश्चिम बंगाल में 21 जून, 1977 को लेफ़्ट फ्रंट ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगतार बने रहते हुए इसे 34 साल पूरे होने को आ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ ही पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड भी बनाया है। लेकिन आगामी चुनावों में इसी बात को इस पार्टी की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानी जाए तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही जो सत्ताधारी सीपीआई-एम की गले की फाँस बन गई है। हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 के लोक सभा चुनावों में मिले करारे झटके के बाद इस लहर का रुख़ मोड़ने की कोशिश की है पर इसे 'देर से जागने वाला' क़दम बताया जा रहा है।

सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने ख़ेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन कर उभरा है।

पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों का आंकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 294 सीटों में से 75 से 77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की संभावना हैं जिन्हें मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। इन चुनावों में ऐसा भी कहा जा रहा है कि एक लंबे समय तक लेफ़्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज़्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बंद कर दिया है।

Monday, 11 April 2011

जन लोकपाल बिल अपडेट-- कहीं विवादों में ही फंसकर दम न तोड़ दे यह आंदोलन

   जिन लोगों ने फोन नंबर 022-61550789 पर मिस कॉल देकर या ‘इंडियाअगेंस्टकरप्शन डॉट 2010 एट जीमेल’ पर मेल करके अभियान में समर्थन जताया है, उन्हें जानकारी मिलती रहेगी।


  ९७ घंटे आमरण अनशन के बाद सरकार के जारी अधिसूचना को २४ घंटे भी नहीं बीते कि जनलोकपाल बिल तैयार करने के लिए गठित कमिटी पर ही सवाल खड़ हो गया है। कमिटी के गठन में भाई-भतीजावाद का आरोप बाबा रामदेव ने लगाया है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जन लोकपाल विधेयक का प्रारूप तय करने के लिए बनी सामाजिक संगठनों की समिति में भाई-भतीजावाद के योग गुरु बाबा रामदेव के आरोपों को रविवार को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि रामदेव के साथ इस मुद्दे का समाधान कर लिया गया है। वक्त की नजाकत समझते हुए इस बीच रामदेव भी अपने पिछले बयान से पलट गए और कहा कि पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण के समिति में होने से उन्हें कोई परेशानी हैं, बल्कि वह किरण बेदी को भी इसमें शामिल करना चाहते थे। रामदेव ने शनिवार को समिति में भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था।

रामदेव ने शनिवार को एक टेलीविजन चैनल से कहा था, "देश की 121 करोड़ आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली सामाजिक संगठनों की पांच सदस्यीय समिति में भाई-भतीजावाद के मुद्दे को लोगों द्वारा उठाए जाने पर मैंने किरण (बेदी) जी से बात की है और अन्ना (हजारे) जी से भी बात करूंगा।"
योग गुरु रविवार को हालांकि अपने इस बयान से पलट गए। उन्होंने कहा, "जन लोकपाल विधेयक समिति में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मैं समिति में शांति भूषण और प्रशांत भूषण को शामिल करने से नाखुश नहीं हूं। हम अन्ना हजारे में यकीन करते हैं और उन्होंने जो भी निर्णय लिया, वे सही हैं। मैंने केवल यही सलाह दी कि किरण बेदी को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।"

समिति के सम्बंध में अन्ना हजारे ने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी कानून का प्रारूप तय करने के लिए अनुभवी और कानूनी विशेषज्ञ की आवश्यकता थी। रविवार सुबह उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "समिति स्थाई नहीं है। यह दो महीने के लिए बनी है और हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह या वह वहां क्यों है और क्यों नहीं है? कड़े कानून के लिए हमें अनुभवी और कानूनी विशेषज्ञों की जरूरत थी। यही वजह है कि मैं स्वयं भी समिति में शामिल होना नहीं चाहता था, लेकिन उन्होंने कहा कि यदि मैं रहूंगा तो सरकार पर दबाव बनेगा।"

वहीं, रामदेव पर पलटवार करते हुए शांति भूषण ने कहा, "अन्ना हजारे ने इसे लोगों की जीत बताई है और बाबा रामदेव भी इसमें शामिल हैं। प्रारूप समिति के बारे में वह क्या समझते हैं.. वह उसमें नहीं हो सकते, क्योंकि वहां कानूनी विशेषज्ञों की आवश्यकता है, योग गुरु की नहीं।" किरण बेदी ने कहा, "यह बेहतर टीम है, जो सरकार के साथ लड़ सकती है और कानून की पेचीदगियों को समझती है।" समिति के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि शांति भूषण और प्रशांत भूषण जन लोकपाल विधेयक के पहले प्रारूप का हिस्सा थे, जिसे उन्होंने तैयार किया। वे विधेयक के सार को समझते हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसका हिस्सा हैं।

लोकपाल बिल की खातिर जॉइंट कमिटी बनाने के लिए सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना हजारे ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि जिस तरह इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने निचले स्तर पर गांवों में काम किया है, वह सराहनीय है। उन्होंने कहा कि बाकी मुख्यमंत्रियों को उनसे सीख लेनी चाहिए। एनडीए के दोनों मुख्यमंत्रियों की तारीफ करने के बाद अन्ना ने यह भी कहा कि उनके इस बयान से कोई राजनीतिक संदर्भ नहीं निकाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'मैं किसी पार्टी के समर्थन में नहीं हूं।'

अन्ना हजारे ने कहा कि उन्हें संसद और लोकतंत्र में पूरा विश्वास है लेकिन प्रतिनिधियों के भ्रष्ट होने की सूरत में जनता के पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। उन्होंने कहा कि सख्त लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति पूरी पारदर्शिता बरतेगी। विडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए जनता मसौदे के निर्माण को देखेगी। इस महीने में 12 से 16 तारीख से मसौदा तैयार करने का काम शुरू हो जाएगा।

आम लोगों को पूरी जानकारी मिलती रहेगी - केजरीवाल


लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए सरकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की संयुक्त समिति के कामकाज के बारे में आम लोगों को पूरी जानकारी मिलती रहेगी जिन्होंने इस अभियान में अपना समर्थन जताया है।
संयुक्त समिति में शामिल आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने सरकार के मंत्रियों द्वारा ‘जन लोकपाल विधेयक’ के मसौदे को पूरी तरह मान लेने पर संदेह जताया और कहा कि इसलिए जनता को संयुक्त समिति में चल रहे पूरे कामकाज से अवगत कराया जाएगा।

केजरीवाल ने बताया कि जिन लोगों ने फोन करके और ईमेल करके इस अभियान को समर्थन जताया है उन सभी का पंजीकरण हो चुका है। संयुक्त समिति में मसौदे को लेकर क्या चल रहा है इसकी जानकारी पंजीकरण कराने वाले लोगों को एसएमएस और ई-मेल के माध्यम से मिलती रहेगी।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार किसी भी तरह नागरिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की बात को दरकिनार करती है तो अन्ना हजारे की तरफ से जनता को सड़कों पर उतरने का आह्वान किया जाएगा और यह आंदोलन जारी रहेगा।

    जिन लोगों ने फोन नंबर 022-61550789 पर मिस कॉल देकर या ‘इंडियाअगेंस्टकरप्शन डॉट 2010 एट जीमेल’ पर मेल करके अभियान में समर्थन जताया है, उन्हें जानकारी मिलती रहेगी।

आंदोलन से जुड़े संगठन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के सूत्रों के अनुसार इस अभियान में फोन पर करीब 11 लाख लोग देशभर में अपना समर्थन दर्ज करा चुके हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है। इसके अलावा फेसबुक पर अभियान के होमपेज पर एक लाख 90 हजार लोगों ने और इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर अन्ना हजारे के पन्ने पर एक लाख लोग जुड़े हैं।

अन्ना हजारे ने भी शनिवार को अनशन तोड़ते हुए एक मजबूत भ्रष्टाचार निरोधी विधेयक पारित कराने की सांसदों की इच्छाशक्ति पर आशंका जताई और अपने समर्थकों को आगाह किया कि उन्हें ‘बड़ी लड़ाई’ के लिए तैयार रहना चाहिए।

मीडिया से बातचीत में 72 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि ‘सत्ता के भूखे’ नेता ऐसे किसी भी विधेयक को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे जिनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रावधान हों या जिससे उनका सत्ता का सुख छीना जाता हो।

हजारे ने कहा कि मुझे लगता है कि भविष्य में (संसद में इस विधेयक को पारित कराने के लिए) बड़ा आंदोलन चलाने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि वे (सांसद) विधेयक को आसानी से पारित कर देंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी शक्तियाँ कम हो जाएँगी।

संयुक्त समिति के अध्यक्ष वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और समाज की तरफ से इसके सहअध्यक्ष अधिवक्ता शांति भूषण होंगे। इसमें सरकार की तरफ से कानून मंत्री वीरप्पा मोइली, संचार मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री पी चिदंबरम और जल संसाधन मंत्री सलमान खुर्शीद सदस्य होंगे।
दूसरी तरफ समाज की तरफ से इसमें शांति भूषण के अलावा हजारे, वकील प्रशांत भूषण, उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश संतोष हेगड़े और आरटीआई कार्यकर्ता केजरीवाल शामिल हैं। (भाषा)

97 घंटे के बाद अन्‍ना ने तोड़ा अनशन

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे गांधीवादी और जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अन्‍ना हजारे का 97 घंटे से अधिक का उपवास शनिवार को खत्‍म हो गया। अन्‍ना हजारे ने जन लोकपाल बिल पर सरकार की रजामंदी को देश की जनता की जीत करार दिया है। हालांकि उन्‍होंने कहा कि यह ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ की शुरुआत भर है और आगे अभी लंबा सफर तय करना है।



गत मंगलवार को राजधानी स्थित जंतर मंतर पर शुरू किया गया आमरण अनशन खत्‍म करने के बाद देश को संबोधित करते हुए अन्‍ना हजारे ने कहा कि लोकपाल बिल के मसौदे से जुड़ा शासनादेश जारी होने के बाद उनकी जिम्‍मेदारियां और बढ़ गई हैं। उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी ‘लड़ाई’ का तीन सूत्रीय मसौदा पेश करते हुए कहा है कि पहली सफलता जन लोकपाल बिल पर सरकार का राजी होना है लेकिन इसके बाद यह मसौदा मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा और जरूरत पड़ी तो उस वक्‍त भी अभियान चलाया जाएगा। उन्‍होंने आगे कहा कि यदि इस बिल को पारित करने को लेकर संसद में कोई अड़ंगा आया तो भी उन्‍हें देशवासियों के साथ मिलकर अभियान चलाने की जरूरत पड़ेगी।



अन्‍ना ने कहा कि अगर 15 अगस्त तक सरकार ने लोकपाल बिल पारित नहीं किया तो हम फिर से आंदोलन करेंगे। उन्‍होंने कहा, ‘लोकपाल बिल पारित होने के बाद भ्रष्‍टाचार को रोकने के लिए सरकार पर इस बात के लिए दबाव डालने की जरूरत होगी कि सत्‍ता का विकेंद्रीकरण किया जाए।’ उन्‍होंने ग्राम सभाओं, नगर परिषदों, नगरपालिकाओं के जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार (राइट टू रिकॉल) की भी वकालत की। उन्‍होंने कहा कि यदि सरपंच या उप सरपंच जनता से बिना पूछे पैसा खर्च करते हैं तो उसे वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास होना चाहिए जो उन्‍हें चुनती है।



चुनाव व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए अन्‍ना हजारे ने कहा कि इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में गड़बड़ी होने की शिकायतें सामने आती रही हैं, इसे दुरुस्‍त किया जाना चाहिए। उन्‍होंने भरोसा दिलाया कि ईवीएम की गड़बड़ी ठीक करने की उनकी पेशकश सरकार ने मान ली है। अन्‍ना हजारे ने ‘नापसंद का अधिकार’ की भी वकालत की। उन्‍होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे सभी उम्‍मीदवार दागी हैं तो जनता के पास यह विकल्‍प होना चाहिए कि वो इनमें से किसी को भी ना चुने और वहां का चुनाव रद्द कर फिर से चुनाव कराए जाएं।



'नेता नहीं मानेंगे तो फिर शुरू होगी लड़ाई'



अन्‍ना ने शनिवार सुबह साढ़े दस बजे जंतर मंतर स्थित मंच पर सबसे पहले 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाए। वहां मौजूद बड़ी संख्‍या में लोगों ने भी अन्‍ना के सुर में सुर मिलाए। अन्‍ना ने वहां मौजूद लोगों को इस आंदोलन की सफलता की बधाई देते कहा, 'आज हमारी जो जीत हुई, आपके चलते हुई। हमारी लड़ाई अभी खत्‍म नहीं हुई। हमारे राजनेता अब भी नहीं मानेंगे तो लड़ाई फिर से शुरू होगी। हम मिलते रहेंगे। इस आंदोलन में युवाओं का साथ आना आशा की किरण जगाता है। हमने काले अंग्रेजों की नींद उड़ा दी है।' अन्‍ना और उनके समर्थकों ने इसे जनता की जीत करार दिया है।



73 साल के अन्‍ना ने धरना स्‍थल पर अनशन पर बैठे अन्‍य लोगों को पहले जूस पिलाया, इसके बाद खुद एक बच्‍ची के हाथों नींबू पानी पीकर (देखें तस्‍वीर) अपना उपवास तोड़ा। अन्‍ना के उपवास तोड़ने के साथ ही धरना स्‍थल के साथ साथ पूरे देश में जश्‍न का माहौल पैदा हो गया है। प्रदर्शन स्‍थल पर बीच-बीच में ‘अन्‍ना हजारे जिंदाबाद’ , ‘अन्‍ना तुम संघर्ष करो हम तुम्‍हारे साथ हैं’ के नारे सुनाई दिए। मंच पर मौजूद कई कलाकारों ने 'रघुपति राघव राजा राम...' की धुन छेड़ी।



इससे पहले सुबह करीब साढ़े नौ बजे सरकार की ओर से सीनियर कैबिनट मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में संयुक्‍त समिति गठित किए जाने की अधिसूचना जारी की गई जो एक प्रभावी लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करेगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्‍बल ने इस अधिसूचना की कॉपी अन्‍ना की इस मुहिम से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता स्‍वामी अग्निवेश को सौंपी गई। अग्निवेश इस कॉपी को लेकर जंतर मंतर पहुंचे और वहां मंच से इसकी अधिसूचना की प्रति मीडिया के जरिये पूरे देश को दिखाई गई। स्‍वामी अग्निवेश ने कहा, ‘हमने सरकार से इस बारे में शासनादेश मांगा था लेकिन सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अधिसूचना जारी कर दी है।’ अन्‍ना के सहयोगियों में शामिल पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने इसे 'आत्‍म सम्‍मान' की जीत करार दिया है।



सरकार और सिविल सोसाइटी का गठबंधन शुभ संकेत: पीएम



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकपाल बिल मुद्दे पर सरकार और सिविल सोसाइटी के गठबंधन को लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत मानते हुए कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक कानून को संसद के मानसून सत्र में लाने पर विचार कर रही है।



मनमोहन सिंह ने शनिवार को जारी बयान में कहा, 'मुझे इस बात की खुशी है कि सरकार और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि भ्रष्टाचार को खत्म करने के मुद्दे पर एकजुट हैं। मुझे इस बात की भी खुशी है कि अन्ना हजारे अपना उपवास खत्म करने के लिए मान गए हैं।'



भ्रष्टाचार को सबके लिए एक अभिशाप बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस ऐतिहासिक कानून को लेकर सिविल सोसाइटी और सरकार का हाथ मिलाना लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। सरकार और हजारे के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत को सफल बताते हुए उन्होनें उम्मीद जताई कि इस कानून को तैयार करने की प्रक्रिया सही तरीके से आगे बढ़ेगी जिससे कि सभी संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद यह कानून कैबिनेट के समक्ष मानसून सत्र के दौरान रखा जा सके।





जानिए, क्या है जन लोकपाल बिल?


- इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।



- यह संस्था इलेक्शन कमिशन और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी।



- किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा।



- भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को 2 साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।



- भ्रष्टाचार की वजह से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा।



- अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा।



- लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।



- लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।



- सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा।



- लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।



-जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया है।

Monday, 28 March 2011

बंगाल की राजनीति में मतुआ का भूचाल


१८ अप्रैल २०११ से छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव के लिहाज से पश्चिम बंगाल की फिजा अलग ही होती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल की मुहिम ने माहौल को और गरमा दिया है। १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का बिगुल बज चुका है। मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू कराना चाहता हूं। निरपेक्ष भाव से इस महाभारत की कथा सुनाऊंगा। रखिए मेरे ब्लाग के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-२०११ धारावाहिक की हर कड़ी पर नजर।
ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह
धर्मतला में मतुआ महासंघ की महारैली में जुटे नेता। इसमें सभी दलों के नेता मसलन वाममोर्चा के गौतम देव, कांग्रेस के मानस भुइंया व तृणमूल के पार्थ चटर्जी एक मंच पर थे।
बड़ो मां वीणापाणि का आशीर्वाद लेने पहुंचीं तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी।

ठाकुरनगर में मतुआ महासंघ का मुख्यमंदिर।

कामनासागर।

मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचांद ठाकुर।
मतुआ गोविंददेवजी मंदिर वृंदावन।

मतुआ रंगजी मंदिर वृंदावन।
ठाकुरनगर में अपने घर के दरवाज पर बैठीं बड़ोमां।
   
    राजनीति में संगठित समुदायों के मह्त्व का आकलन सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि विगत की दशकों से जाति या सामुदायिक आधारों से चुनावों से दूर रहने वाले पश्चिम बंगाल में भी इस बार सामुदायिक छाया में चुनाव होने जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश से बंगाल में आकर बसा मतुआ संप्रदाय है। इनकी राजनीतिक हलकों में गूंज २००६ से ही सुनाई देने लगी थी, जो २००९ के लोकसभा चुनावों में वामपंथियों समेत सभी को अपने दर पर मत्था टेकने को मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं जब मतुआ ने अपनी नागरिकता समेत कई मांगों के लिए कोलकाता में महारैली की तो उसके मंच पर वह दृश्य भी दिखा जो इसके पहले असंभव सा लगता था। मतुआ के मंच पर वाममोर्चा , कांग्रेस, तृणमूल समेत कई विरोधी दलों ने एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद से उनकी मदद के एलान की सभी में होड़ भी मच गई। और हो भी क्यों नहीं ? बंगाल में रह रहे सवा करोड़ मतुआ तो राजनीति किसी भी धारा को बदल देने की औकात जो रखते हैं। जो हाल तक वाममोर्चा के परंपरागत वोट थे मगर जब नाराज हुए तो इन्हें तृणमूल की ममता बनर्जी ने लपक लिया। मतुआ की नाराजगी का खामियाजा भुगत चुके वाममोर्चा ने इनका मानमनौव्वल अपने काबिल नेता और राज्य के आवास मंत्री गौतम देव को इस काम में लगाकर कर रहा है। ममता भी इनके वोट पाने का दावा कर रही हैं। मतुआ अभी खामोस हैं मगर उनके वोट किसका बेड़ा पार करंगे यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा। शायद ये भी हवा का रुख भांपने में लगे हैं। फिलहाल तो मतुआ को महिमामंडित किया जा रहा है। उनपर एक फिल्म बनाए जोने का पोस्टर भी दमदमकैंट समेत तमाम जगहों पर लग चुके हैं। मुक्ति प्रोडक्शन की इस फिल्म को मतुआ संप्रदाय की बड़ो मां वीणापाणि देवी का आशीर्वाद भी प्राप्त है। बांग्लाभाषा की इस फिल्म का नाम है- पूर्ण ब्रह्म श्री श्री श्री हरिचंद। हरिचंद ठाकुर ही इस मतुआ संप्रदाय के संस्थापक थे। आगे हम इस पर विस्तार से आपको बताने वाले हैं कि मतुआ आखिर कौन हैं और बंगाल की राजनीति में कैसे इनकी वजह से भूचाल सा आ गया है।

मतुआ का वर्चस्व

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर २००६ के विधानसभा चुनावों के बाद से मतुआ का वर्चस्व दिखने लगा है। इसके पहले बेहद गरीब लोगों के इस संप्रदाय का वोट एकतरफा वाममोर्चा को जाता था। मगर लगातार उपेक्षा ने मतुआ को ममता की शरण में जाने पर मजबूर कर दिया। अपनी नागरिकता के सवाल पर तो इनकी नाराजगी थी ही मगर सामुदायिक विकास में भी उपेक्षा से उपजी नाराजगी को ममता ने भांप लिया। इनकी तरफ से इनकी मांगों को उठाने के साथ ही बतौर रेलमंत्री तमाम सहायता देने का भी एलान कर दिया। नतीजा सामने था। पश्चिमबंगाल की राजनीति में इनके ममता को समर्थन ने भूचाल खड़ा कर दिया। मतुआ ने वह कर दिखाया जो वाममोर्चा के ३५ सालों के शासन में कभी नहीं हुआ। इसके बाद से ही मतुआ के समर्थन और ममता के वाममोर्चा के खिलाफ नन्दीग्राम, सिंगुर, लालगढ़ जैसे आंदोलनों ने पश्चिम बंगाल के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया। कहा जा रहा है कि कम्युनिष्ट सत्ता के लालदुर्ग में तृणमूल की घुसपैठ ने पश्चिम बंगाल में 35 सालों बाद परिवर्तन की लहर पैदा कर दी है। अब २०११ के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में इन्हीं मतुआ, आदिवासी और वाममोर्चा से नाराज मुसलमान मतदाताओं ने सत्ता के नए समीकरण की लकीर खींच दी है। जंग छिड़ गई है। बेसुध वाममोर्चा भी अब सावधान है। मतुआ को मनाने की कोशिश के साथ मुसलमानों और मेदिनीपुर (लालगढ़ ) के आदिवासियों तक पुनः अपनी पैठ बनाई है। लेकिन गलतियां सुधारने में वाममोर्चा से देरी की चूक हो गई है। अब तो 35 सालों की सत्ता के मद से हुई गलतियों से बंगाल के अवाम की नाराजगी ही अब ममता की ताकत बन चुकी है और उसमें सबसे बड़ी ताकत सवा करोड़ की तादाद वाले मतुआ ही होंगे।


कौन हैं मतुआ ?

१९ शताब्दी के मध्य में वर्तमान बांग्लादेश के फरीदपुर राज्य के गोपालगंज में हरीचंद नें मतुआ संप्रदाय की स्थापना की थी। ठाकुर हरिचंद (१८१२-१८७८) और उनके पुत्र गुरूचंद (१८४७-१९३७ ) दोनों बांग्लादेश में समाज सुधारक थे। इनके उत्तराधिकारी बंगाल के विभाजन के बाद बांग्लादेश के फरीदपुर, खुलना समेत कई राज्यों से १९४८ के बाद से भारत के विभिन्न राज्यों खासतौर पर राज्य पश्चिम बंगाल में आए और अब ये संगठित तौर पर भारत में रह रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा से सटा पश्चिमबंगाल राज्य का एक शहर है बनगांव। इसी बनगांव के पास है मतुआ का मुख्यालय है- ठाकुरनगर। कोलकाता से करीब ७५ किलोमीटर की दूरी पर है यह ठाकुरनगर। यहीं पर हर साल २४ मार्च को मतुआ संप्रदाय का मेला लगता है। इसे बारूनि मेला कहते हैं। इस मेले को मतुआ महासंघ के संश्थापक हरिचंद ने बांग्लादेश गोपारगंज के अपने गांव ओराकांडी में शुरू किया था। अब यह १९४८ के बाद से पश्चिम बंगाल के ठाकुरनगर में लगता है।

हालही में ममता बनर्जीं ने मतुआ संप्रदाय की सुविधा के मद्देनजर ठाकुरनगर रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया है। मतुआ लोगों का मुख्यालय इस रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर दूर पड़ता है। यहीं एक बड़े घर में रहती हैं मतुआ संप्रदाय की मुखिया वीणापाणि देवी यानी बड़ोमां। मतुआ संप्रदाय ( मतुआ महासंघ ) की स्थापना इनके ही पति के परदादा हरिचंद ठाकुर ने मौजूदा बांग्लादेश फरीदपुर के गोपालगंज में की थी। भारत में इस संप्रदाय के ज्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हैं। कहते हैं कि गोपालगंज के इस ब्राह्मण ने जीवनभर पिछड़ी जातियों, जनजातियों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ी। मतुआ महासंघ जनजातियों व पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें ज्यादातर बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत में आकर बसे लोग हैं। क्या मतुआ हिंदू या मुस्लिम संप्रदाय की तरह कोई संप्रदाय है ? शायद नहीं। मतुआ महासंघ भी एक धर्म है मगर इनके भगवान गुरू हरिचंद हैं और इनकी संघ को दी गई शिक्षाओं को ही मतुआ महासंघ मानता है। यह संघ वह आंदोलन है जो समाज के दबे-कुचले तबके के उत्थान के लिए काम करता है। हरिचंद ने अपने महासंघ के लोगों को लोगों से स्नेह, एक दूसरे के प्रति सहनशीलता, स्त्री-पुरूष में समानता, जाति आधारित भेदभाव को न मानने के साथ लालची न होंने की शिक्षा दी। विश्वास व समर्पण का भाव रखने वाले मतुआ किसी वौदिक कर्मकांड को नहीं मानते।

अभी महासंघ की सर्वेसर्वा प्रमथ रंजन विश्वास की पत्नी वीणापाणि देवी यानी बड़ो मां हैं। प्रमथरंजन १३ मार्च १९४८ को ठाकुरनगर आए और एक छोटा सा घर बनाकर रहने लगे। वे कोलकाता हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। उन्होंने स्थानीय जमीदार जगतकुमारी दासी से जंगल व जमीन खरीद ली। सही मायने में प्रमथ रंजन ने ही मतुआ महासंघ को संगठित किया। वे १९३७ में विधानसभा चुनाव जीते और १९६२ में विधानचंद राय की सरकार में जनजातीय विकास राज्य मंत्री भी रहे। १९६७ में नवद्वीप से कांग्रेस के सांसद भी हुए मगर कुछ मतभेद के कारण पार्टी छोड़ दी।

मतुआ महासंघ का पश्चिम बंगाल के सभी जिलों में ५०० लोगों का पंजीकृत समूह है और सभी समूहों का एक मुखिया है जिसे दलपति कहते हैं। इन दलपतियों की अपने समूह पर बेहद मजबूत पकड़ होती है। इसी कारण इनके निर्देश पर वोट भी एकतरफा पड़ते हैं। इसी कारण मतुआ पर ममता की इनायत इतनी हुई कि मतुआ के पुरखों के नाम पर मेट्रो स्टेशन व रेलवे स्टेशन के नाम रखने का एलान कर दिया है। सियालदह बनगाव सेक्शन में ठाकुरनगर और चांदपाड़ा के बीच मतुआधाम हाल्ट स्टेशन और बड़ो मां बीणापाणि देबी के पति स्व.पीआर ठाकुर के नाम पर बनगांव सेक्शन में ही मसलन्दपुर से स्वरूप नगर तक रेललाइन बिछाने का भी ममता एलान कर चुकी हैं।


कामनासागर है इनका पवित्र तीर्थ

पश्चिम बंगाल के उत्तर २४ परगना जिले में बनगांव के पास ठाकुरनगर में हरिचंद गुरूचंद ठाकुर मंदिर है। इसी मंदिर से लगा एक तालाब है, जिसे मतुआ लोग कामनासागर कहते हैं। हर साल २४ मार्च को यहां एक सालाना मेला लगता है। यह उत्सव सप्ताह भर चलता है। इस मेला को बारुनि मेला कहते हैं। लाखों मतुआ श्रद्धालु इस कामनासागर में स्नान करते हैं। एक सप्ताह बाद बाकी संप्रदायों के लोगों को भी इस मेले में शामिल होने की इजाजत मिल जाती है। इस मेले में मतुआ संप्रदाय के महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और उत्तरप्रदेश से लोग आते हैं। भारत के आजाद होने से पहले यह मेला मौजूदा बांग्लादेश के गोपालपुर में हरिचंद गुरूचंद ठाकुर के जन्मस्थान औराकांडी में लगता था। अब इसका केंद्र भारत के पश्चिमबंगाल राज्य के ठाकुरनगर में है।


तृणमूल और माकपा में मतुआ को अपनी ओर खींचने की जंग

पूर्वी पाकिस्तान से पलायन कर कई चरणों में बंगाल पहुंचते रहे हिंदु समुदाय की समस्यायें उनके पलायन के इतिहास जितनी ही पुरानी हैं लेकिन अब लगता है समय बदलने वाला है। मंगलवार २८ दिसंबर २०१० को मतुआ महासंघ ने कोलकाता में नागरिकता के सवाल पर विशाल रैली की। अपने सभामंच पर सभी प्रमुख दलों के नेताओं को एक साथ लाकर खड़ा करते हुए वह मिसाल पेश की जो अब तक पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में कभी देखने को नहीं मिला। सभा में सभी प्रमुख दल के नेताओं ने एक स्वर में समुदाय के उत्थान के लिये सक्रियता दिखाने का आह्वान किया। सभा में मौजूद आवास मंत्री गौतम देव ने महासंघ के नेताओं को विशेष पर धन्यवाद किया और कहा कि उन्होंने जो किया है वह कम बड़ी बात नहीं। देव ने समुदाय के कल्याण के लिये सर्वदलीय कमेटी के गठन का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि माकपा इस बारे में पहल करने को तैयार है अन्य दल भी इस बारे में सकारात्मक कदम उठायें। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मानस भुइयां ने आवास मंत्री के सुझाव का स्वागत किया। भुइयां ने कहा कि जनवरी के मध्य में प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह,यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के अलावा गृहमंत्री पी चिदम्बर से वे व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात कर नागरिकता कानून में दुबारा संसोधन की अपील करेंगे। केन्द्रीय जहाजरानी राज्य मंत्री मुकुल राय ने कहा कि नागरिकता से वंचित समुदाय के लोगों के हित में कानून का संसोधन होना चाहिये। सभा को प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष तथागत राय ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश से उत्पीड़ित होकर आये हिंदुओं को पूरा अधिकार मिलना चाहिये। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस बारे में तत्काल आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। मतुआ महासंघ की सभा में हजारों की संख्या में समर्थक मौजूद थे।


नागरिकता कानून में संशोधन चाहते हैं मतुआ

राज्य में करीब डेढ़ करोड़ की आबादी वाले मतुआ समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले महासंघ की मांग है कि 2003 के भारतीय नागरिकता कानून में हुए संशोधन का दुबारा संशोधन किया जाय। उनकी नजर में २००३ के कानून में संशोधन के बाद से ही समुदाय के लोगों को घुसपैठिये की नजर से देखा जाने लगा है। जो लोग नागरिकता प्राप्त करने से वंचित रह गये है कानूनी जटिलताओं के चलते उनके लिये नयी नागरिकता प्राप्त करना मुश्किल हो गया है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने भी इस बारे में केन्द्र से बात करने का आश्वासन दिया है। महासंघ की धर्मतल्ला में हुई सभा में प्रमुख नेत्री वीणापाणि ठाकुरमां ने भी कानून में दोबारा संशोधन की मांग की। महासंघ से जुड़े प्रमुख नेताओं के अनुसार 2003 का कानूनी संशोधन काफी जटिलताओं से भरा है। इसकी एक धारा में कहा गया है कि जब तक माता और पिता दोनो भारत के वैध नागरिक न हों तब तक उसके बेटे या बेटी को देश की नागरिकता नहीं मिल सकती। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद पलायन भारत आये अनेक हिंदुओं को अभी तक देश की नागरिकता नहीं मिल सकी है। १९७२ में हुए इंदिरा-मुजीब समझौते के अनुसार जो लोग १९७१ तक बांग्लादेश से भारत आए हैं , सिर्फ वहीं लोग भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं।

राज्य सरकार ने अपने प्रभाव को बनाए रखने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए मतुआ आंदोलन के संस्थापक हरिचंद और गुरूच्द ठाकुर के नाम पर पुरस्कार दिए जाने का भी एलान कर दिया है। इतना ही नहीं वाममोर्चा सरकार के आवास मंत्नी गौतम देब ने मतुआ ट्रस्ट के लिए राजारहाट में २० कट्ठा जमीन भी दे दी है। यह जमीन सौंपे जाने के मौके पर मतुआ संप्रदाय के करीब चार हजार समर्थक मौजूद थे। यह जमीन मतुआ रिसर्च फाउंडेशन के लिए सौंपते हुए बड़ी साफगोई से गौतम देब ने स्वीकार किया कि वे इसके पहले वे मतुआ लोगों और उनके ३०० साल के इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने कहा कि राज्य के शिक्षा मंत्री कांति विश्वास और माकपा के वरिष्ठ नेता विमान बोस से इनके बारे में जानकारी मिली। उन्होंने कहा कि यह राजनीति की बात नहीं है बल्कि मतुआ संप्रदाय की मदद करके हम गर्व महसूस कर रहे हैं। वैसे भी हमें इनका शतप्रतिशत समर्थन मिलता रहा है। दरअसल वाममोर्चा २००६ के चुनाव और २००९ के आम चुनाव में मतुआ संप्रदाय के तृणमूल की ओर झुक जाने से चिंतित है। ममता बनर्जी ने भी व्यक्तिगत तौर पर मतुआ महासंघ की प्रमुख बड़ोमां वीणापाणि से आशीर्वाद हासिल कर वाममोर्चा खेमे में खलबली मचा चुकी हैं। यहां बता दें कि करीब पांच करोड़ मतुआ सिर्फ बड़ोमां के इशारे पर चलते हैं। इनके लिए बड़ोमां का आदेश ही कानून है। करीब ७४ विधानसभा क्षेत्रों में जीत-हार कराने का दम रखने वाले मतुआ की वाममोर्चा से नाराजगी ने ममता को राजनौतिक तौर पर शक्तिशाली बना दिया है। यह बात वाममोर्चा को काफी देर से तब समझ में आई जब नगरपालिका, लोकसभा चुनावों में वाममोर्चा की जमान ही खिसक गई। यह बात यहां मैं इसलिए बता रहा हूं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मतुआ बंगाल की राजनीति में कितना दखल दे सकते हैं और ममता व वाममोर्चा दोनों को क्यों इनकी जीहजूरी करनी पड़ रही है।

     वाममोर्चा से मतुआ महासंघ की नाराजगी को ममता २००६ के विधानसभा और २००९ के लोकसभा चुनावों में भुना लिया। इससे पहले वाममोर्चा का यह अभेद्य वोट बैंक था। वाममोर्चा के इस वोटबैंक में पहली सेंध तृणमूल ने २००६ के चुनावों में लगाई। अब २०११ के विधानसभा चुनावों में ममता और वाममोर्चा दोनों की इस वोटबैंक पर नजर है। ७४ विधानसभाओँ में जीत दिलाने का माद्दा रखने वाला करीब सवा करोड़ की आबादी वाला मतुआ महासंघ भी इस बार अपनी अहमियत समझ रहा है। यह तो २००९ के लोकसभा चुनावों में ही समझ में आ गया था जब माकपा की वृंदा कारत, माकपा के राज्य सचिव विमान बोस, फारवर्ड ब्लाक प्रमुख अशोक घोष और तत्कालीन खेलमंत्री सुभाष चक्रवर्ती बड़ो मां से आशीर्वाद लेने ठाकुरनगर पहुंच गए थे। यह अलग बात हैं कि तब महासंघ की संरक्षक बन चुकी ममता को ही आशीर्वाद मिला और संसदीय सीटें ममता की झोली में चली गईं। इसके बाद से ममता निरंतर मतुआ महासंघ को अपने पक्ष करने का प्रयास कर रही हैं।

ममता ने यह राजनीतिक खेल मतुआ महासंघ के विकास का एलान करके शुरू किया। मतुआ के महापुरुषों हरिचंद, इनके पुत्र गुरूचंद और पोता प्रमथरंजन के नाम पर रेलवे स्टेशनों के नाम का एलान कर दिया। इतना ही नहीं मतुआ संप्रदाय के ठाकुरनगर स्थित पवित्र तालाब कामनासागर के जीर्णोद्धार के लिए ३३ लाख रुपए दिए। पास में एक रेलवे अस्पताल और स्पोर्टस स्टेडियम बनवाने के लिए भी ६० लाख देने का वायदा किया। इसके एवज में बड़ोमां ने ममता बनर्जी को मतुआ संप्रदाय का मुख्य संरक्षक बना दिया। यही पर वोममोर्चा को ममता का खेल समझने में देर हो गई। मगर देर से ही सही वाममोर्चा ने अपने आवास मंत्री गौतम देब को मतुआ महासंघ को प्रभावित करने में लगा दिया। अब दमदम सीट से गौतम देब चुनाव भी लड़ रहे हैं। इस इलाके में भी मतुआ के वोट निर्णायक होंगे।

Thursday, 24 March 2011

पत्रकारों ने वेतनबोर्ड पांच अप्रैल तक लागू करने का दिया अल्टीमेटम, सांसदों ने सरकार से जवाब मांगा

नई दिल्ली में श्रम मंत्रलाय पर वृहस्पतिवार को जस्टिस मजीठिया की पत्रकारों व गैरपत्रकारों के वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में देरी के विरोध में प्रदर्शन करते देशभर से जुटे पत्रकार। (सभी फोटो साभार-एपी, पीटीआई)
   श्रम मंत्रालय के समक्ष करीब दो घंटे तक अभूतपूर्व प्रदर्शन
अखबारी कर्मचारियों के लिए मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने की मांग पर आज देश भर के पत्रकारों ने नयी दिल्ली में श्रम मंत्रालय के समक्ष करीब दो घंटे तक अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। कर्मचारी नेताओं ने वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें पांच अप्रैल तक लागू करने का सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि ऐसा नहीं होने पर वह नतीजे भुगतने को तैयार रहे। संसद में आज कांग्रेस, आरजेडी, जद (यू) और भाजपा सांसदों ने भी मजीठिया की सिफारिशें फौरन लागू करने की मांग की। सदन में मौजूद सूचना प्रसारण मंत्री से भी इस मामले पर जवाब देने को कहा।

अखबारी कर्मचारियों की विभिन्न फ़ेडरेशनों ने परस्पर मिलकर बनाये गये कान्फ़ेडरेशन के बैनर तले नई दिल्ली में अपने आक्रोश का इजहार कर अपनी जोरदार एकजुटता का परिचय दिया.। श्रम मंत्रालय के समक्ष रफ़ी मार्ग पर पत्रकारों के करीब दो घंटे तक चले प्रदर्शन के कारण यातायात पूरी तरह ठप रहा।

प्रदर्शन के दौरान कांफ़ेडरेशन आफ़ न्यूजपेपर एंड न्यूज एजेंसी एम्प्लायज आर्गेनाइजेशन्स के महासचिव एम एस यादव ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने के लिए सरकार को पांच अप्रैल तक का समय दिया। उन्होंने कहा कि यदि उक्त अवधि तक सिफ़ारिशें लागू नहीं हुई तो श्रम मंत्री नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें। पत्रकारों ने प्रदर्शन के दौरान वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने के साथ साथ टिब्यून अखबार से निलंबित कर्मचारियों को भी बहाल करने की जोरदार मांग की।

यादव ने कहा, ‘कान्फ़ेडरेशन के बैनर तले देश भर से आये विभिन्न कर्मचारी महासंघों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर अपनी भारी एकजुटता का परिचय दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 31 दिसंबर की तयसीमा के भीतर वेतनबोर्ड का रिपोर्ट दिये जाने के बावजूद सरकार जानबूझ कर इस मामले में देर कर रही है।’ ( स्रोत- प्रभात खबर )।

सांसदों ने भी सरकार से जवाब मांगा

आज सदन के दोनों सदनों में जस्टिस मजीठिया की सिफारिशों को अविलंब लागू करने की मांग सांसदों ने की। लोक सभा में शून्यकाल में यह मुद्दा कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि वेतनबोर्ड लागू करने की मांग को लेकर देशभर में पत्रकार प्रदर्शन कर रहे हैं। मालूम हो कि पत्रकारों ने आज २४ मार्च को देश भर में प्रदर्शन किया है। मनीष तिवारी ने कहा कि २००८ से वेतनबोर्ड की सिफारिशें फौरन लागू करना चाहिए। मालूम हो कि पत्रकारों व गैरपत्रकारों के वेतन की समीक्षा के लिए बोर्ड का गठन २००७ में किया गया था।

राज्यसभा में आरजेडी के रामकृपाल यादव ने सरकार को आड़े हाथे लेते हुए कहा कि जस्टिस जीआर मजीठिया ने अपनी सिफारिशें २०१० के दिसंबर में ही श्रममंत्रालय को सौंप दी मगर सरकार ने अभी तक इसे लागू नहीं किया। उन्होंने सिफारिशें अबतक लागू नहीं करने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया जबकि पत्रकार व गैरपत्रकार राजधानी दिल्ली व देशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं।

भाजपा के रूद्रनारायण पैनी ने सदन में मौजूद सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी से इस मुद्दे पर उनसे जवाब देने को कहा।

काग्रेस के शाताराम नाइक ने जानना चाहा कि सिफारिशें लागू करने में आखिर क्या अड़चने हैं।

जद(यू) के अली अनवर अंसारी ने कही कि सरकार को आज ही इस संबंध में घोषणा कर देनी चाहिए। मालूम हो कि जस्टिस मजीठिया ने दिसंबर २०१० को सौंपे अपनी रिपोर्ट में पांच मानदंड तय किए हैं। इसमें समाचार पत्रों को पुनर्वर्गीकरण, ८ जनवरी २००८ से वेतन भत्ता का भुगतान, वेतनमान में सालाना इनक्रीमेंट में वृद्धि, आवास भत्ता में वृद्धि शामिल है। (स्रोत- पीटीआई )

मुंबई में भी पत्रकारों ने किया प्रदर्शन

पीटीआई के पत्रकारों ने मुंबई में आज दोपहर बाद मजीठिया की सिफारिशों को फौरन लागू करने की मांग पर पीटीआई दफ्तर के सामने प्रदर्शन किया। इस मौके पर फेडरेशन आफ पीटीआई कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष जान गोंसाल्वेज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सिफारिशों को फौरन लागू नहीं कर रही है जबकि रिपोर्ट तान महीने पहले ही सौंपी जा चुकी है। इस मौके पर हुई सभा में पत्रकार व गैर पत्रकार दोनो शामिल थे। (स्रोत-पीटीआई)





Saturday, 19 March 2011

कांग्रेस ने फिर दिया धोखा, अकेले चलने पर मजबूर हुईं ममता बनर्जी


१८ अप्रैल २०११ से छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव के लिहाज से पश्चिम बंगाल की फिजा अलग ही होती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल की मुहिम ने माहौल को और गरमा दिया है। १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का बिगुल बज चुका है। मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू कराना चाहता हूं। निरपेक्ष भाव से इस महाभारत की कथा सुनाऊंगा। रखिए मेरे ब्लाग के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-२०११ धारावाहिक की हर कड़ी पर नजर।
ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह


सीटों के बंटवारे का नाटक खत्म, ममता ने ६४ सीटें कांग्रेस को छोड़कर २२८ पर तृणमूल उम्मीदवार खड़े किए
कांग्रेस को समझौता मानलेने का सोमवार तक समय दिया
  पहली मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के एलान के बाद से कांग्रेस व तृणमूल के बीच गठबंधन कर चुनाव लड़ने का नाटक शुरू हो गया था। १८ दिन तक चले नाटक में तृणमूल को अंततः अकेले चलने का फैसला लेना पड़ा। कांग्रेस का यह नाटक नया नहीं है। कोलकाता महानगर कारपोरेशन के ३० मई २०१० को हुए चुनाव  में भी कांग्रेस की इसी खींचतान के कारण तृणमूल को अंततः अकेले चुनाव लड़ना पड़ा और इस चुनाव में महानगर के मतदाताओं ने वाममोर्चा को उसके कुशासन और कांग्रेस को उसके वाहियात नाटक के कारण दंडित किया। १४१ वार्डों वाले कोलकाता नगर निगम पर दो तिहाई बहुमत से तृणमूल का कब्जा हो गया। तृणमूल ने अपनी सहयोगी पार्टी एसयूसीआई के साथ ९५ सीटें हथिया ली। कांग्रेस १० सीटों पर सिमट गई। पिछले कारोपोरेशन में ७५ सीटों हासिल कर चुका वाममोर्चा भी इस बार ३३ सीटों पर सिमट गया। कुल मिलाकर कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से भी कोई सीख नहीं लेना चाहती है। अब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने वही रवैया अख्तियार कर जनता में यह संदेश दे दिया है कि वह बंगाल में परिवर्तन में बाधा बन रही है। हालांकि तृणमूल के एकतरफा सूची जारी होने से कांग्रेस व उसके आलाकमान नाराज है। उसने कह दिया है कि वह अब विचार कर रही है कि कांग्रेस ६४ सीटों पर चुनाव लड़े या फिर सभी २९४ सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करे। यहां कांग्रेस उपने उस सिद्धांत को लेकर चल रही है जिसमें कहा गया था कि वह सिर्फ सम्मानजनक समझौता ही मानेगी। इसी के तहत तमिलनाडु में अपनी मनचाही सीटे हासिल की और असम में तृणमूल को दरकिनार कर अकेले ही चुनाव लड़ रही है। तृणमूल ने भी असम में अपने अलग उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं।
  यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल में मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा नहीं पाई है और बंगाल की जनता को वाममोर्चा के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। कांग्रेस के इसी रवैए ने ममता बनर्जी जैसे लोगों को पार्टी से अलग होने पर मजबूर किया। १९९८ में तब सीताराम केशरी काग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे जब ममता ने अलग होकर अपने कुछ राजनैतिक सलाहकारों के साथ तृणमूल का गठन किया। तब से तृणमूल को पश्चिम बंगाल में दो मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी पड़ी। एक तो वाममोर्चा और दूसरा मोर्चा रहा कांग्रेस। ममता बनर्जी की वाममोर्चा से लड़ाई में कभी कांग्रेस ने साथ दिया तो कभी धोखा दिया। कुल मिलाकर कांग्रेस का रवैया तब से और आज २०११ के विधानसभा चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे तक तृणमूल को भटकाना ही रहा है। ईमानदारी से मिलकर लड़ते तो शायद वाममोर्चा को पश्चिम बंगाल की जनता के साथ मनमानी करने की हिमम्त नहीं होती। मगर यह बंगाल का दुर्भाग्य रहा कि उसे लड़ाका विपक्ष नसीब नहीं हुआअब शायद ममता बनर्जी बंगाल की अवाम के परिवर्तन का सपना पूरा कर पाएं। इसमें कुछ संशय इस लिए है क्यों कि अभी भी कांग्रेस अपने सम्मान व बंगाल में समाप्ति की ओर जा रहे राजनीतिक वजूद को बचाने की आड़ में तृणमूल का साथ नहीं दे रही है। यह उसकी राजनैतिक मजबूरियां हो सकती है मगर बंगाल के अवाम की नहीं। क्यों कि अवाम को अब परिवर्तन चाहिए और बंगाल में परिवर्तन का एक ही चेहरा है- ममता बनर्जीं और उनकी तृणमूल पार्टी। शायद इस बात को ममता बनर्जी भी समझती है इसी लिए कांग्रेस का ज्यादा इंतजार न करके अकेले चलना तय कर लिया है। 

   पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2011 के लिए तृणमूल कांग्रेस ने आज 228 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नामों की सूची तय कर दी। तृणमूल ने २९४ सीटों के लिए सूची जारी की है जिसमें कांग्रेस के लिए ६४ सींटें हैं और २२८ तृणमूल उम्मीदवारों की सूची है। सोमवार तक अगर कांग्रेस सीटों का यह तालमेल नहीं मानती है तो इन ६४ सीटों पर भी तृणमूल उम्मीदवार खड़े कर दिए जाएंगे। पूरी सूची इस प्रकार है।---
1. मेखलीगंज (कांग्रेस) 2. माथाभांगा से बिनय कुमार बर्मन, 3. कूचबिहार उत्तर से प्रसेनजीत बर्मन, 4. कूचबिहार दक्षिण से जलील अहमद, 5. शीतलकूची से हितेन बर्मन, 6. सिताई (कांग्रेस), 7. दिनहाटा से मिहिर गोस्वामी, 8. नटबाड़ी से रवींद्रनाथ घोष, 9. तूफानगंज से अग्रहा राय प्रधान, 10. कुमारग्राम से जोयाचिम बाक्सला, 11. कालचीनी से पवन लाकरा, 12. अलीपुरदुआर (कांग्रेस), 13. फालाकाटा से अनिल अधिकारी, 14. मदारीहाट (कांग्रेस), 15. धूपगुड़ी से मीना बर्मन, 16. मोयनागुड़ी से जुथीका राय बासुनिया, 17. जलपाईगुड़ी (कांग्रेस), 18. राजगंज से खगेश्वर राय, 19. देवग्राम-फूलबाड़ी से गौतम देव, 20. माल (कांग्रेस), 21. नगराकाटा (कांग्रेस), 22. कलिम्पोंग (कांग्रेस), 23. दार्जिलिंग (कांग्रेस), 24. कर्सियांग (कांग्रेस), 25. माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी (कांग्रेस), 26. सिलीगुड़ी से रूद्रनारायण भट््टाचार्य, 27. फांसीदेवा से सुषमा केरकेटा, 28. चोपड़ा से एसके जलालुद्दीन 29. इस्लामपुर से करीम चौधरी, 30. गोपालपोखड़ (कांग्रेस), 31. चाकुलिया (कांग्रेस), 32. करण दिघी (कांग्रेस), 33. हेमताबाद से शेखर राय, 34. कालियागंज (कांग्रेस), 35. रायगंज (कांग्रेस), 36. इटाहार से रब्बल बक्स, 37. खुशमंडी (कांग्रेस), 38. कुमारगंज से मामुदा बेगम, 39. बालूरघाट से शंकर चक्रवर्ती, 40. तपन से बचू हांसदा, 41. गंगारामपुर से सत्येन राय, 42. हरिरामपुर से विप्लव मित्र, 43. हबीबपुर से मोहन टुबू, 44. गाजोल (कांग्रेस), 45. चांचल (कांग्रेस), 46. हरीश्चंद्रपुर (कांग्रेस), 47. मालतीपुर से गौतम चक्रवर्ती ,48. रातुआ (कांग्रेस), 49. माणिकचक से सावित्री मित्रा, 50. मालदा (कांग्रेस), 51. इंग्लिशबाजार (कांग्रेस), 52. मोथाबाड़ी (कांग्रेस), 53. सूजापुर (कांग्रेस), 54. वैष्णवनगर (कांग्रेस), 55. फरक्का (कांग्रेस), 56. शमशेरगंज (कांग्रेस), 57. सुती (कांग्रेस), 58. जंगीपुर (कांग्रेस), 59. रघुनाथगंज (कांग्रेस), 60. सागरदिघी से सुब्रत साहा, 61. लालगोला (कांग्रेस), 62. भगवानगोला से सागीर हुसैन, 63. रानीनगर (कांग्रेस), 64. मुर्शिदाबाद (कांग्रेस), 65. नवग्राम (कांग्रेस), 66. खारग्राम (कांग्रेस) 67. बरवान (कांग्रेस), 68. कांदी (कांग्रेस), 69. भरतपुर (कांग्रेस), 70. रेजीनगर (कांग्रेस), 71. बेलडांगा (कांग्रेस), 72. बहरमपुर (कांग्रेस), 73. हरिहरपाड़ा से एसके नियामत, 74. नवदा (कांग्रेस), 75. डोमकल (कांग्रेस), 76. जालंगी से महुआ मित्रा, 77. करीमपुर से रमेन सरकार, 78. तेहट््टा से गौरीशंकर दत्त, 79. पलाशीपाड़ा से मानिक भट््टाचार्य, 80. कालीगंज से नसीरुद्दीन हमद, 81. नक्काशीपाड़ा से कोलोल खां, 82. चापरा से रुकवानुर रहमान, 83. कृष्णनगर उत्तर से अवनी जोआरदार 84. नवद्वीप से नंदा साहा, 85. कृष्णनगर दक्षिण से उज्जल विश्वास, 86. शांतिपुर (कांग्रेस), 87.रानाघाट उत्तर पश्चिम से पार्थ सारथी चटर्जी, 88. कृष्णागंज से सुशील विश्वास, 89. रानाघाट उत्तर पूर्व से समीर पोद्दार, 90. रानाघाट दक्षिण से अबीर विश्वास, 91. चाकदा से नरेशचंद्र चाकी 92. कल्याणी से रमेंद्रनाथ विश्वास, 93. हरिणघाट से नीलिमा नाग, 94. बागदा से उपेन विश्वास, 95. बनगांव उत्तर से विश्वजीत दास, 96. बनगांव दक्षिण से सुरजीत विश्वास, 97. गाईघाटा से मजुलकृष्ण ठाकुर, 98. स्वर्णनगर से बीना मंडल, 99. बादुरिया (कांग्रेस), 100. हाबरा से ज्योतिप्रिय मल्लिक, 101. अशोकनगर से धीमन राय, 102. आमडांगा से रफीकूर रहमान ,103. बीजपुर से सुब्रांशु राय, 104. नैहाटी से पार्थ भौमिक, 105. भाटपाड़ा से अर्जुन सिंह, 106. जगदल से प्रभाष दत्त, 107. नोयापाड़ा से मंजू बोस,108. बैरकपुर से शीलभद्र दत्त 109. खरदह से अमित मित्र, 110. दमदम उत्तर सीट से चंद्रिमा भट््टाचार्य, 111.पानीहाटी से निर्मल घोष, 112. कमरहट््टी से मदन मित्र, 113. बरानगर से तापस राय,114. दमदम से ब्रात्य बसु, 115. राजारहाट न्यूटाउन से सब्यसाची दत्त, 116. विधाननगर से सुजीत बोस, 117. राजारहाट गोपालपुर से पुर्णेंदु बोस, 118. मध्यमग्राम से रथीन घोष, 119. बारासात से दीपक चक्रवर्ती, 120. देगंगा से नरूज्जमान, 121. हाड़ोआ से जुल्फीकार अली मौल्ला, 122. मिनाखां से उषा रानी मंडल, 123. संदेशखाली से पद्मा महतो, 124. बशीरहाट दक्षिण से नारायण गोस्वामी, 125. बशीरहाट उत्तर से सरदार अमजद अली, 126. हिंगलगंज से देवाशीष मंडल, 127. गोसाबा से जयंत नस्कर, 128. बासंती (कांग्रेस) 129. कुलतली (एसयूसीआई), 130. पाथरप्रतिमा से समीर जाना, 131. काकद्वीप से मंगतुराम पखारिया, 132. सागर से बंकिम हाजरा, 133. कुल्पी से जोगरंजन हालदार, 134. रायदिघी से देवश्री राय, 135. मंदिरबाजार से जयदेव हालदार, 136. जयनगर (एसयूसीआई), 137. बारुईपुर पूर्व से निर्मल मंडल, 138. कैनिंग पश्चिम से श्यामल मंडल, 139. कैनिंग पूर्व से इदरीश अली, 140. बारुईपुर पश्चिम से विमान बनर्जी, 141. मगराहाट पूर्व से नमिता साहा, 142. मगराहाट पश्चिम से गियासुद्दीन मल्लाह, 143. डायमंड हार्बर से दीपक घोष, 144. पालता से तमोनाश घोष, 145. सातगाछिया से सुनाली गुहा, 146. विष्णुपुर से दीपक मंडल, 147. सोनारपुर दक्षिण से फिरदोषी बेगम/ शमीमा शेख, 148. भांगड़ से अराबुल इस्लाम, 149. कसबा से जावेद खान, 150. यादवपुर से मनीष गुप्त, 151. सोनारपुर   उत्तर से जीवन मुखर्जी, 152. टालीगंज से अरूप विश्वास, 153. बेहला पूर्व से शोभन चटर्जी, 154. बेहला पश्चिम से पार्थ चटर्जी,155. महेशतला से कस्तुरी दास, 156. बजबज सीट से अशोक देव, 157. मटियाबुर्ज से मुमताज बेगम, 158. कोलकाता पोर्ट से फिरहाद हकीम, 159. भवानीपुर से सुब्रत बक्सी, 160. रासबिहारी से शोभनदेव चट््टोपाध्याय, 161. बालीगंज से सुब्रत मुखर्जी, 162. चौरंगी से शिखा मित्र, 163. इंटाली से तारक बनर्जी, 164. बेलेघाटा से परेश पाल, 165. जोड़ासांको से शांतिलाल जैन, 166. श्यामपुकुर से शशि पांजा,167. मानिकतला से साधन पांडेय, 168. काशीपुर-बेलगछिया से माला साहा, 169. बाली से सुल्तान सिंह, 170. हावड़ा उत्तर से अशोक घोष, 171. हावड़ा मध्य से अरूप राय, 172. शिवपुर से जाटू लाहिरी 173. हावड़ा दक्षिण से ब्रजमोहन मजुमदार, 174. सांकराइल से शीतल सरदार, 175. पांचला से गुलशन मल्लिक, 176. उलबेड़िया पूर्व से हैदर अली शफी, 177. उलबेड़िया उत्तर से निर्मल माझी, 178. उलबेड़िया दक्षिण से पुलक राय, 179. श्यामपुर से कालीपद मंडल, 180. बागनान से राजा सेन, 181. आमता सीट (कांग्रेस), 182. उदयनारायणपुर से समीर पांजा, 183. जगतबल्लभपुर से डा. एमए कासिम, 184. डोमजूर से राजीव बनर्जी, 185. उत्तरपाड़ा से अनूप घोषाल, 186. श्रीरामपुर से सुदीप्त राय, 187. चांपदानी से मुजफ्फर खान, 188. सिंगुर से रवींद्रनाथ भट््टाचार्य, 189. चंदननगर से अशोक साव, 190. चूंचुड़ा से तपन मजुमदार, 191. बलागढ़ से असीम मांझी, 192. पांडुआ से नरगिस बेगम, 193. सप्तग्राम से तपन दासगुप्ता, 194. चंडीतला से स्वाति खांडेकर, 195. जंगीपाड़ा से स्नेहाशीष चक्रवर्ती, 196. हरिपाल से बच्चाराम मन्ना, 197. धनियाखाली असीमा पात्र, 198. तारकेश्वर से रछपाल सिंह, 199. पुरसुरा से परवेज रहमान, 200. आरामबाग से कृष्ण सांतरा, 201. गोघाट (कांग्रेस), 202. खानाकुल से इकबाल अहमद, 203. तमलुक से सोमैन महापात्र, 204. पांशकुड़ा पूर्व से विप्लव राय चौधरी, 205. पांशकुड़ा पश्चिम से अमर अली, 206. मोयना से भूषण दुलाई, 207. नंदकुमार से सुकुमार दे, 208. महिषादल से सुदर्शन घोष दस्तीदार, 209. हल्दिया से साउली साहा, 210. नंदीग्राम से फिरोजा बीबी, 211. चंडीपुर से अमिय भट््टाचार्य, 212. पटाशपुर से ज्योतिमय कर, 213. कांथी उत्तर से बनारसी माइती, 214. भगवानपुर से अर्द्धेंदु माइती, 215. खेजुरी से पार्थ प्रतीम दास, 216. कांथी दक्षिण से देवेंदु अधिकारी, 217. रामनगर अखिल गिरी, 218. एगरा से शर्मेश दास, 219. दांतन से साइबल गिरी, 220. नयाग्राम से दुलाल मुर्मू, 221. गोपीवल्लभपुर से चारूमनी महतो, 222. झाड़ग्राम से सुकुमार हांसदा, 223. केशियारी से श्याम मांडी, 224. खड़गपुर सदर से बिलकिस बेगम, 225. नारायणगढ़ से कौशर अली, 226. संबग (कांग्रेस), 227. पिंगला से अजीत मााइती, 228. खड़गपुर (कांग्रेस), 229. डेबरा से राधाकांत माइती, 230. दासपुर से अजीत भुइयां, 231. घाटाल से शंकर दुलई, 232. चंद्रकोना से शिवराम दास, 233. गड़बेता (कांग्रेस), 234. सालबनी से श्रीकांत महतो, 235. केशपुर (कांग्रेस), 236. मेदिनीपुर से मृगेन माइती, 237. बीनपुर(कांग्रेस), 238. बांदवान (कांग्रेस), 239. बलरामपुर से शांतिराम महतो, 240. बाघमुंडी सीट से मंगल महतो (कांग्रेस), 241.जयपुर से सुजय बनर्जी/ कीर्तन महतो, 242. पुरुलिया से एसपी सिंहदेव 243. मानबाजार से संध्या टुडू, 244. काशीपुर से स्वपन बेलटोरिया, 245. पारा (कांग्रेस), 246. रघुनाथपुर से पूर्णचंद्र बारूई, 248. छातना से शुभाशीष बात्याबल, 249. रानीबांध से ममता मुर्मू, 250. रायपुर से प्रमिला मुर्मू, 251. तालडांगा (कांग्रेस), 252. बांकुड़ा से काशीनाथ मिश्रा, 253. बड़जोरा से आशुतोष मुखर्जी, 254. ओंदा से अरूप खां, 255. विष्णुपुर से श्याम मुखर्जी, 256. कतुलपुर (कांग्रेस), 257. इंदस से गुरुपद मेते, 258. सोनामुखी से दीपाली साहा, 259. खंडघोष से अशोक माझी, 260. बर्दवान दक्षिण से स्वरूप दत्त, 261. रायना से नेपाल गोराई, 262. जमालपुर से उज्जवल प्रमाणिक, 263. मंतेश्वर से अबू आयास मंडल, 264. कालना से विश्वजीत कुंडू, 265. मेमारी से अब्दुल हसन मंडल, 266. बर्दवान उत्तर से निशीथ मल्लिक, 267. भातार से बनमाली हाजरा 268. पूर्वस्थली दक्षिण से स्वपन देवनाथ, 269. पूर्वस्थली उत्तर से तपन चटर्जी, 270. कटवा (कांग्रेस), 271. केतुग्राम से एसके शहनवाज, 272. मंगलकोट से अपूर्व चौधरी, 273. आउसग्राम (कांग्रेस), 274. गलसी से जयदेव साहा, 275. पांडेश्वर से जहीर आलम, 276. दुर्गापुर पूर्व से निखिल बनर्जी, 277. दुर्गापुर पश्चिम से अपूर्व मुखर्जी, 278. रानीगंज से शोहराब अली, 279. जामुड़िया (कांग्रेस), 280. आसनसोल दक्षिण से तापस बनर्जी, 281. आसनसोल उत्तर से मलय घटक, 282. कुल्टी से उज्जवल चटर्जी, 283. बाराबनी से विधान उपाध्याय, 284. दुबराजपुर से संतोषी साहा, 285. सुरी से स्वपन घोष 286. बोलपुर से चंद्रनाथ सिन्हा, 287. नानूर गदाधर हाजरा, 288. लाभपुर से परीक्षित बाला, 290. मयूरेश्वर से जितेलेश्वर मंडल, 291. रामपुरहाट से आशीष बनर्जी, 292. हासन (कांग्रेस), 293. नलहाटी (कांग्रेस) व 294. मुरारई से नूर आलम चौधरी।

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