Wednesday, 11 May 2011

एक्जिट पोल की बजी ढोल- ढह गया कम्युनिस्टों का लाल किला

छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव संपन्न हो गया है। नतीजे तो १३ को ही आएँगे मगर मंगलवार की शाम को ही एक्जिट पोल के नतीजे आ गए। सर्वे की रिपोर्ट को हकीकत मानें तो ३४ सालों बाद पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का अभेद्य लाल गढ़ ढहता दिख रहा है। वैसे तो १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों में कम्युनिस्टों को भारी पराजय का सामना करना पड़ सकता है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का आखिरी दौर भी खत्म हो चुका है। शुरू से ही निरपेक्ष भाव से मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू करा रहा था। जीत का सेहरा किसके सिर होगा, यह को १३ मई को ही मुकम्मल तौरपर पता चल पाएगा। फिलहाल आइए एक्जिट पोल पर नजर डालें।

यह भी जान लें कि किस चरण में कितना हुआ मतदान
पहला चरण - 54 सीटें - 83.75%
दूसरा चरण - 50 सीटें - 85.32%
तीसरा चरण - 75 सीटें - 78.3%
चौथा चरण - 63 सीटें - 84.8%
पाँचवाँ चरण - 38 सीटें - 83%
छठवाँ चरण - 14 सीटें - 83.48%

ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह

  बंगाल व केरल में होगा सत्ता परिवर्तन, वाममोर्चा का सफाया कर देगा तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन - स्टार न्यूज टेलिविजन चैनल सर्वे

    आजतक, हेडलाइन्स, ओआरजी सर्वे और स्टार न्यूज टीवी ने अलग-अलग कराए सर्वे में बताया है कि ममता बनर्जी की तृणमूल और कांग्रेस गठबंधन पश्चिम बंगाल में आसानी से दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेगा। यानी सर्वे की मानें तो कम्युनिस्टों का लाल किला ढह चुका है। हालांकि माकपा के राज्यसचिव विमान बोस ने कोलकाता में माकपा मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट में मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में सर्वे को सिरे से खारिज करके फिर दावा किया कि- सरकार वाममोर्चा की ही बनेगी। अभी हाल ही में बीबीसी हिंदी को कोलकाता स्थित संवाददाता से बातचीत में कहा था- लिख लो वाममोर्चा की ही सरकार बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि ये जो समाज शास्त्री चुनाव विश्लेषक 2009 के लोक सभा चुनावों के नतीजों को आधार बना कर कहते हैं कि वाम मोर्चा हार जाएगा. ये 13 मई को मतगणना के दिन चुप हो जाएँगें।


    दावे तो राजनीतिक स्तर पर किए ही जा सकते हैं। मगर इतना तो तय है कि ममता बनर्जीं की कम्युनिस्टों के साथ छिड़ी इस जंग ने पश्चिम बंगाल को एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर में ला खड़ा किया है और कुशासन से लड़ना भी सिखा दिया। कांग्रेस भी पश्चिम बंगाल में मजबूत विपक्ष रह चुकी है मगर कभी परिवर्तन की वह इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाई जो आज ममता बनर्जीं के कारण दिख रही है। कांग्रेस की इसी चरित्र के कारण उसके विरोधी उसे माकपा की बी टीम कहने लगे थे। यह सच है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता मगर अपनी जान को जोखिम में डालकर पश्चिम बंगाल में संगठित वाममोर्चा से लड़ने की हिम्मत तो ममता बनर्जी ने ही जुटाई। बंगाल के इस परिवर्तनवादी मुकाम का एक ही चेहरा है-ममता बनर्जी।


ममता बनर्जी का सीएम बनना लगभग तय : आजतक सर्वे

   क्या पश्चिम बंगाल में बदला जाएगा इतिहास. 35 साल से सत्ता पर काबिज वाममोर्चे को बंगाल की जनता कर देगी सत्ता से बेदखल. आजतक, हेडलाइन्स, ओआरजी सर्वे ने पश्चिम बंगाल में सभी चरणों के मतदान के बाद तैयार की है बंगाल की पोस्टपोल तस्वीर इस तस्वीर में ममता अपने विरोधियों से काफी आगे दिख रही हैं जबकि वाममोर्चा का किला टूटता दिख रहा है.

   आजतक-हेडलाइन्स-ओआरजी सर्वे के मुताबिक पोस्ट पोल में वाममोर्चा को 65 से 70 सीट मिल सकती हैं. इन्हें 39 फीसदी वोट मिल सकता है. पोस्टपोल के मुताबिक वाममोर्चे को 160 सीटों का घाटा है जबकि उसका वोट प्रतिशत 9 फीसदी घटा है.

    2006 विधानसभा के मुताबिक वाममोर्चा को 294 में से 227 सीट मिलीं थीं जबकि उसका वोट प्रतिशत 48 फीसदी था. इस तरह से अगर मुकम्मल तस्वीर देखें तो 2011 में पोस्टपोल के मुताबिक वाममोर्चा 65 से 70 सीट पा सकता है उसे 39 फीसदी वोट मिलेंगे उसे 9 फीसदी वोटों के साथ 160 सीटों का नुकसान होगा जबकि 2006 में उसने 48 फीसदी वोट के साथ 227 सीट जीतीं थीं.

इस तरह से आजतक-हेडलाइन्स-ओआरजी पोस्ट सर्वे के मुताबिक लेफ्ट का लाल गढ़ ढहता दिख रहा है और ममता बनर्जी, कांग्रेस और अन्य की सरकार बनती दिख रही है. आंकड़ों की जुबानी अगर इस बात को समझें तो ममता बनर्जी गठबंधन को 210 से 220 सीट मिल सकती हैं. गठबंधन को 48 फीसदी मत मिल सकते हैं. ममता गठबंधन को 186 सीटों का फायदा होता दिख रहा है जबकि गठबंधन का वोट प्रतिशत 19 फीसदी बढ़ा है.

   2006 विधानसभा में ममता को बीजेपी के साथ 29 फीसदी वोट और 30 सीट मिलीं थीं जबकि कांग्रेस को 17 फीसदी वोट के साथ 21 सीट मिलीं थीं. पर 2011 में दोनो साथ में हैं लिहाजा पोस्ट पोल से जो मुकम्मल तस्वीर बनती है वो ये है कि गठबंधन को 210 से 220 सीट मिलेंगी इन्हें 48 फीसदी वोट मिल सकता है. इन्हें 2006 की अपेक्षा 186 सीट का फायदा हो सकता और उनका वोट प्रतिशत करीब 19 फीसदी बढ़ सकता है.

    इस तरह से साफ है कि ममता बनर्जी अपने गठबंधन के साथ बड़ी जीत पाती दिख रही हैं. यानी बंगाल में एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव के संकेत दो तिहाई से ज्यादा के बहुमत से साफ हैं. सर्वे में बाकी सीटों के बारे में संकेत हैं कि अन्य 6 फीसदी वोट के साथ 16 सीट पर काबिज हो सकते हैं जो पिछली बार से 26 सीट कम होगा और वोट प्रतिशत में 10 फीसदी कम हो सकता है. इस तरह से ममता सत्ता पर काबिज दिखती हैं और लेफ्ट सत्ता से बाहर.

बंगाल व केरल में होगा सत्ता परिवर्तन, वाममोर्चा का सफाया कर देगा तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन - स्टार न्यूज टेलिविजन चैनल सर्वे
    एक और चुनाव बाद सर्वे ने दावा किया है कि बंगाल व केरल में सत्ता परिवर्तन होगा जबकि तमिलनाडु में यह बेहद करीबी मामला होगा। चैनल के एक्जिट पोल सर्वे के मुताबिक बंगाल में तृणमूल को १८१, कांग्रेस को ४० और वाममोर्चा को ६२ सींटे मिल सकती हैं। अगर इस सर्वे पर भरोसा करें तो ३५ साल पुरानी वाममोर्चा सरकार का बंगाल से सफाया हो जाएगा जबकि इसके पूर्व विधानसभा में इसकी २२७ सीटें थीं।

इसी तरह केरल में कांग्रेस की संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा को ८८ और माकपा के वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को ४९ सीटें मिलेंगी। तमिलनाडु की २३४ सीटों में से आलइंडिया अन्नाद्रमुक को ११० और द्रमुक को १२४ सीटें मिलने की संभावना जताई गई है।

असम में तरुण गोगोई सरकार को इस सर्वे में तीसरी बार भी सत्ता में आने की बात कही गई है। हेडलाइन्स टूडे के सर्वे के मुताबिक असम में कांग्रेस को १२६ में ४४ सीटें जीतने का दावा किया गया है। विपक्ष को महज १४ सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया है।


प. बंगाल चुनाव: छठे चरण में 84 फीसदी मतदान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के छठे एवं अंतिम चरण में 14 सीटों के लिए हुए मतदान में 84.8 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. मतदान पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहा.

उप चुनाव आयुक्त विनोद जुत्शी ने मतदान की समाप्ति के बाद संवाददाताओं को बताया, ‘पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा, पुरूलिया और पश्चिमी मिदनापुर जिलों के 14 विधानसभा सीटों के लिए 84.8 प्रतिशत मतदान हुआ. मतदान बहुत ही शांतिपूर्ण रहा और कहीं से भी किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं है.’

उन्होंने बताया कि मतदान का प्रतिशत कुछ और बढ़ सकता है क्योंकि मतदान की समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद भी अनेक मतदान केन्द्रों पर लोग वोट डालने के लिए लाइनों में लगे थे. गौरतलब है कि वर्ष 2006 में हुए विधानसभा चुनाव में इन निर्वाचन क्षेत्रों में 82.53 फीसदी और 2009 के लोकसभा चुनाव में 76.49 प्रतिशत मतदान हुआ था.

सबसे ज्यादा 86.6 प्रतिशत मतदान पश्चिमी मिदनापुर जिले में हुआ जबकि पुरूलिया जिले में 80.1 प्रतिशत और बाकुंड़ा जिले में 85.5 प्रतिशत मतदान हुआ. छठे चरण के इस मतदान से 97 उम्मीदवारों के राजनीतिक भाग्य का फैसला इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में कैद हो गया. इन उम्मीदवारों में राज्य की मंत्री सुसांता घोष और पीसीपीए नेता छत्रधर महतो शामिल हैं.

अंतिम चरण में कुल 7 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में थीं. 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए इस बार 18 अप्रैल से 10 मई के बीच छह चरणों में चुनाव कराये गये. सभी सीटों के लिए मतगणना 13 मई को होगी. उप चुनाव आयुक्त ने बताया कि इन 14 निर्वाचन क्षेत्रों के 26 लाख 57 हजार से ज्यादा मतदाताओं के लिए कुल 3534 मतदान केन्द्र बनाये गये थे.

शांतिपूर्ण तरीके से मतदान संपन्न कराने के लिये सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने एक विशेष पर्यवेक्षक, 14 सामान्य पर्यवेक्षक और तीन व्यय पर्यवेक्षकों के अलावा पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में भारतीय पुलिस सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को तैनात किया था.

जुत्शी ने बताया कि कानून व्यवस्था बनाये रखने के इरादे से निरोधात्मक कार्रवाई के तहत ऐहतियात के तौर पर 22 व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया. उन्होंने बताया कि पुरूलिया जिले में एक मतदान केन्द्र में लोगों ने स्थानीय मुद्दे को लेकर मतदान का बहिष्कार किया.

उन्होंने राज्य की सभी 294 सीटों के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से पूरी होने पर प्रसन्नता जताई और साथ ही कहा कि इस बार राज्य में पिछले विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा मतदान हुआ.

पहले दौर के चुनाव में 54 सीटों के लिए मतदान हुआ था जिसमें 70 प्रतिशत से भी अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. दूसरे चरण का मतदान 23 अप्रैल को हुआ था जिसमें 83 फ़ीसदी मतदान हुआ था.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए तीसरा चरण का मतदान ख़त्म हो गया है. चुनाव आयोग के मुताबिक़ इस चरण में 78.3 फ़ीसदी मतदान हुआ है. इस दौर में कुल 479 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला होगा जिसमें मुख्यमंत्री बु्द्धदेव भट्टाचार्य भी शामिल हैं. मतदान के लिए सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे. कुल 17792 मतदान केंद्र बनाए गए थे. जिन 75 सीटों पर चुनाव हुए हैं, उनमें से 11 कोलकाता, 33 उत्तरी 24 परगना और 31 दक्षिणी परगना में हैं. मुख्यमंत्री के अलावा वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता, आवास मंत्री गौतम देब, ट्रांसपोर्ट मंत्री रंजीत कुंडू, विपक्ष के नेता पार्था चटर्जी, फ़िक्की के महासचिव अमित मित्रा और फ़िल्म अभिनेत्री देबाश्री रॉय भी तीसरे दौर में प्रत्याशी हैं.

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के लिए हुए मतदान के चौथे दौर में 84.8 प्रतिशत मतदान हुआ है. चौथे चरण का मतदान हुगली और पूर्वी मिदनापुर ज़िले में हुआ है, जबकि बर्दवान ज़िले के कुछ हिस्से में भी इस चरण का मतदान संपन्न हुआ. जिन क्षेत्रों में मतदान हुआ है, उनमें नंदीग्राम और सिंगुर भी शामिल हैं. इन दोनों शहरों ने पिछले कुछ समय में राज्य की राजनीति का चेहरा बदल दिया।

राज्य में सत्ताधारी वाम मोर्चे के लिए पांचवे चरण का मतदान खासतौर पर अहमियत रखता है. 2006 के विधानसभा चुनावों में 38 में से 35 सीटें वाम मोर्चा ने जीती थी. शेष तीन में से दो कॉंग्रेस और एक पर तृणमूल कॉंग्रेस किसी सफल हो पाए थे. 2006 में वाम मोर्चा की ज़बरदस्त जीत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे डाले गए कुल मतों में से क़रीब 92 फ़ीसदी मत मिले थे.अभूतपूर्व सुरक्षा के बीच पश्चिम बंगाल के चार जिलों की 38 सीटों के लिए मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया है. राजनीतिक हिंसा के ख़ूनी इतिहास वाले राज्य में चुनाव आयोग ने इस बार वेबकास्ट और हेलीकॉप्टरों के सहारे मतदान प्रक्रिया पर नज़र रखी. पांचवे चरण में 82.2 फ़ीसदी मतदान हुआ है.



'लिख लो वाम मोर्चा फिर जीतेगा

सोमवार, 9 मई, 2011


अविनाश दत्त


बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/05/110509_biman_iv_pp.shtml

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के कोलकाता दफ़्तर में सुबह से रात तीन-चार बजे तक बैठकें करने वाले राज्य इकाई के सचिव बिमान बसु दावे के साथ कहते हैं कि उन्हें आठवीं बार राज्य में वाम मोर्चा सरकार बनाने का पूरा भरोसा है.

बिमान बसु कहते हैं, "ये जो समाज शास्त्री चुनाव विश्लेषक 2009 के लोक सभा चुनावों के नतीजों को आधार बना कर कहते हैं कि वाम मोर्चा हार जाएगा. ये 13 मई को मतगणना के दिन चुप हो जाएँगें."

साल 2000 से पश्चिम बंगाल की कमान ज्योति बसु से लेने वाले बुद्धदेब भट्टाचार्य की जनता से अपने कार्यकर्ताओं की ग़लतियों के लिए बारंबार माफ़ी मांगने की बात पर पश्चिम बंगाल में पार्टी के मुखिया बसु कहते हैं कि हज़ारों ग़लत कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल बाहर किया गया है.
उन्होंने कहा कि साल 2009 के चुनावी नतीजों से उन्होंने सबक लिया और भीतर बहस करके सुधार कार्यक्रम चलाए, जिनका अच्छा असर हुआ है.
आप उनसे पूछिए कि अगर सब कुछ उनके इच्छा के मुताबिक़ चल रहा है तो फिर उन्हें पार्टी से निकाल फेंके गए पूर्व लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की प्रचार में मदद क्यों लेनी पड़ी.
इस पर उन्होंने कहा, "कुछ लोग बाहर रहते हुए पार्टी की मदद करना चाहते हैं वो करते हैं. कुछ भाषण भी दे देते हैं. सोमानाथ चटर्जी ने भी दो सीटों पर पार्टी के समर्थन में इसी तरह की सभाएं की."

विपक्ष की ममता

बसु से जब मैंने पूछा कि 34 साल बाद सत्ता से बहार हुए तो क्या पार्टी मुश्किल में नहीं पड़ जाएगी तो बसु ने सामने पड़ी काली चाय की चुस्की ली और चारों तरफ़ चलते पंखों की तेज़ हवा के बीच अपनी सिगरेट जलाई और बोले, "जो तेज़ हवा के बीच सिगरेट नहीं जला सकता वो स्मोकर नहीं है."
दोबारा पूछने पर बसु बोले प्रश्न बेमतलब है और आठवीं सरकार फिर उनकी बनेगी.
वर्षों पहले घर छोड़ कर पार्टी दफ़्तर में आ बसे बसु से जब ये पूछिए कि उनमे और सीपीएम के उन बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं में क्या अंतर है जिन्होंने पैदा होते ही पार्टी की सत्ता देखी है, तो वो कहते हैं- जो ज़माने में फर्क आया है, समाज में आया है, वही कार्यकर्ता में आया है. मैं और बुद्धो बाबु धोती-कुर्ता पहनते हैं, हमारे पास बैंक अकाउंट नहीं है. लेकिन आजकल कार्यकर्ता नए तरह के कपड़ों में रहना चाहते हैं और ज़माने के साथ चलते हैं."
बिमान बसु बात करते-करते तेज़ी से हाथ उठा कर सामने की टेबल पर दौड़ रहे एक छोटे से कॉकरोच को मारने की कोशिश करते हैं और ममता बनर्जी के बारे में कहते हैं, "ममता कहती हैं कि माओवादी और मार्क्सिस्ट एक हैं. पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से हमारे 400 कार्यकर्ता और नेता माओवादियों ने मार डाले. कितनों को उनके इलाक़ों से भगा दिया. ममता ने कभी माओवादियों के ख़िलाफ़ एक नारा तक नहीं दिया."
पार्टी के विरोध और आम लोगों के ग़ुस्से की बात करते हुए दोबारा टेबल पर भटक आए उस कॉकरोच को सफलता पूर्वक ठंडा करते हुए बसु कहते हैं, "तारीख़ समय नोट कर लीजिए मैं कहता हूँ कि आठवीं बार सरकार बनाएँगें."
लेकिन शायद 34 साल सत्ता में रहने के बाद चौतरफ़ा उपजे विरोध को दबाना सामने दौड़ रहे कीड़े को दबाने से बहुत ज़्यादा मुश्किल है

Sunday, 17 April 2011

तृणमूल पर आरोपों के साए में उत्तरबंगाल में मतदान


छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के पहले चरण का मतदान सोमवार यानी १८ अप्रैल को होने जा रहा है। इस चरण के माहौल की झलक के साथ अब हर चरण के मतदान से पहले हाजिर होता रहूंगा। चुनाव के लिहाज से पश्चिम बंगाल की फिजा अलग ही होती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल की मुहिम ने माहौल को और गरमा दिया है। १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का बिगुल बज चुका है। मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू कराना चाहता हूं। निरपेक्ष भाव से इस महाभारत की कथा सुनाऊंगा। रखिए मेरे ब्लाग के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-२०११ धारावाहिक की हर कड़ी पर नजर।
ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह
  कई घटनाक्रमों के साए में सोमवार १८ अप्रैल को पश्चिम बंगाल के उत्तरबंगाल में वोट पड़ेंगे। मतदान से ठीक एक दिन पहले तृणमूल नेता व जहाजरानी मंत्री मुकुलराय का बेटा शुभ्रांशु राय को चुनाव अधिकारियों पर हमला करने के आरोप में नैहाटी इलाके से ममता की चुनावी सभा होने के बाद सभास्थल से गिरफ्तार कर लिया गया। शुभ्रांशु बीजपुर से तृणमूल का उम्मीदवार भी है। इस बड़ी घटना के अलावा दमदम सीट से वाममोर्चा उम्मीदवार व राज्य के आवास मंत्री गौतम ने ममता पर उम्मीदवारों के बीच ३४ करोड़ से अधिक कालाधन बांटने का आरोप लगाया है। जब मुकुल राय ने इसे गलत बताते हुए मानहानि का दावा करने की बात कही तो गौतम देव ने चुनौती दी कि हिम्मत हो तो ममता मानहानि का दावा करें। गौतम ने इस आरोप के पुख्ता सबूत होने का दावा किया। इन दोनों घटनाओं ने उत्तरबंगाल में मतदान से ठीक एक दिन पहले वाममोर्चा में जहां उत्साह भर दिया है वहीं तृणमूल को पशोपेश में डाल दिया है। उत्तरपबंगाल वैसे तो कांग्रोस का गढ़ है मगर विधानसभा चुनावों में वहां वाममोर्चा ही भारी पड़ता रहा है। मालदा इलाके में तो गनीखान परिवार में मतभेद काग्रेस का खासा नुकसान कर चुका है। उत्तरबंगाल में काग्रेस व तृणमूल गठबंधन उम्मीदवार के साथ इनके विद्रोही भी नुकसान पहुंचाने को तैयार खड़े हैं। ऐसे में इन दो बड़ी घटनाओं ने और असमंजस पैदा कर दिया है। क्या सचमुच इन आरोपों से तृणमूल व कांग्रेस के मतदाता दिग्भ्रमित होंगे ? यह तो मतदाता ही जाने मगर परिवरिवर्तन की जो लहर बंगाल में है उसे इस तरह की घटनाएं शायद ही रोक पाएं। कल के मतदान को तो फिलहाल यह प्रभावित करने वाला नहीं दिखता मगर मुद्दा इसी तरह गरम रहा तो कोलकाता और उत्तर २४ परगना के मतदान पर शायद कुछ असर दिखा पाए।
   पर्वतीय उत्तरी इलाके दार्जीलिंग से लेकर मालदा जिले तक चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राजनीति के बड़े दिग्गजों जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पार्टी महासचिव राहुल गांधी, केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी और अरुण जेटली ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार किया। वाम मोर्चा के अध्यक्ष एवं मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्य सचिव बिमान बोस, माकपा पॉलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी तथा तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने छह जिलों में चुनाव प्रचार कर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया।

10 मंत्रियों के भाग्य का फैसला
पश्चिम बंगाल के छह जिलों के 54 विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले प्रथम चरण के चुनाव में 97.42 लाख मतदाता अपना वोट देंगे। यहां पर मुख्य लड़ाई माकपा की अगुवाई में वाम मोर्चा और तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन के बीच है। प्रथम चरण के इस चुनाव से राज्य के 10 मंत्रियों के भाग्य का फैसला तय होगा। पहले चरण के मतदान में माकपा के 32, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दो, फॉरवार्ड ब्लॉक के 10, रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी (आरएसपी) के नौ, सोशलिस्ट पार्टी के एक, तृणमूल कांग्रेस के 26, कांग्रेस के 27, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक तथा भाजपा के 49 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है।

    इन 54 सीटों पर कुल 364 उम्मीदवार भाग्य आजमा रहे हैं। शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चत करने के लिए सुरक्षा के कड़े प्रावधान किए गए हैं। राज्य के जिन जिलों में चुनाव होना है उनमें-कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और मालदा शामिल है। इसके लिए 12,133 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी सुनील कुमार गुप्ता ने बताया कि सुरक्षा बल विभिन्न इलाकों में पहुंच चुके हैं। राज्यों और अंतरराष्ट्रीय सीमा को सील कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि दार्जीलिंग और कलिमपोंग के सुदूरवर्ती इलाकों के लिए मतदानकर्मी शनिवार को ही रवाना हो गए थे।

सत्ता में लंबे समय तक बना रहना ही सबसे बड़ी कमज़ोरी

सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के लिए सत्ता में एक लंबे समय तक बना रहना ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी कही जा रही है। पश्चिम बंगाल में 21 जून, 1977 को लेफ़्ट फ्रंट ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगतार बने रहते हुए इसे 34 साल पूरे होने को आ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ ही पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड भी बनाया है। लेकिन आगामी चुनावों में इसी बात को इस पार्टी की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानी जाए तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही जो सत्ताधारी सीपीआई-एम की गले की फाँस बन गई है। हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 के लोक सभा चुनावों में मिले करारे झटके के बाद इस लहर का रुख़ मोड़ने की कोशिश की है पर इसे 'देर से जागने वाला' क़दम बताया जा रहा है।

सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने ख़ेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन कर उभरा है।

पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों का आंकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 294 सीटों में से 75 से 77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की संभावना हैं जिन्हें मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। इन चुनावों में ऐसा भी कहा जा रहा है कि एक लंबे समय तक लेफ़्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज़्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बंद कर दिया है।

Monday, 11 April 2011

जन लोकपाल बिल अपडेट-- कहीं विवादों में ही फंसकर दम न तोड़ दे यह आंदोलन

   जिन लोगों ने फोन नंबर 022-61550789 पर मिस कॉल देकर या ‘इंडियाअगेंस्टकरप्शन डॉट 2010 एट जीमेल’ पर मेल करके अभियान में समर्थन जताया है, उन्हें जानकारी मिलती रहेगी।


  ९७ घंटे आमरण अनशन के बाद सरकार के जारी अधिसूचना को २४ घंटे भी नहीं बीते कि जनलोकपाल बिल तैयार करने के लिए गठित कमिटी पर ही सवाल खड़ हो गया है। कमिटी के गठन में भाई-भतीजावाद का आरोप बाबा रामदेव ने लगाया है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जन लोकपाल विधेयक का प्रारूप तय करने के लिए बनी सामाजिक संगठनों की समिति में भाई-भतीजावाद के योग गुरु बाबा रामदेव के आरोपों को रविवार को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि रामदेव के साथ इस मुद्दे का समाधान कर लिया गया है। वक्त की नजाकत समझते हुए इस बीच रामदेव भी अपने पिछले बयान से पलट गए और कहा कि पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण के समिति में होने से उन्हें कोई परेशानी हैं, बल्कि वह किरण बेदी को भी इसमें शामिल करना चाहते थे। रामदेव ने शनिवार को समिति में भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था।

रामदेव ने शनिवार को एक टेलीविजन चैनल से कहा था, "देश की 121 करोड़ आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली सामाजिक संगठनों की पांच सदस्यीय समिति में भाई-भतीजावाद के मुद्दे को लोगों द्वारा उठाए जाने पर मैंने किरण (बेदी) जी से बात की है और अन्ना (हजारे) जी से भी बात करूंगा।"
योग गुरु रविवार को हालांकि अपने इस बयान से पलट गए। उन्होंने कहा, "जन लोकपाल विधेयक समिति में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मैं समिति में शांति भूषण और प्रशांत भूषण को शामिल करने से नाखुश नहीं हूं। हम अन्ना हजारे में यकीन करते हैं और उन्होंने जो भी निर्णय लिया, वे सही हैं। मैंने केवल यही सलाह दी कि किरण बेदी को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।"

समिति के सम्बंध में अन्ना हजारे ने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी कानून का प्रारूप तय करने के लिए अनुभवी और कानूनी विशेषज्ञ की आवश्यकता थी। रविवार सुबह उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "समिति स्थाई नहीं है। यह दो महीने के लिए बनी है और हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह या वह वहां क्यों है और क्यों नहीं है? कड़े कानून के लिए हमें अनुभवी और कानूनी विशेषज्ञों की जरूरत थी। यही वजह है कि मैं स्वयं भी समिति में शामिल होना नहीं चाहता था, लेकिन उन्होंने कहा कि यदि मैं रहूंगा तो सरकार पर दबाव बनेगा।"

वहीं, रामदेव पर पलटवार करते हुए शांति भूषण ने कहा, "अन्ना हजारे ने इसे लोगों की जीत बताई है और बाबा रामदेव भी इसमें शामिल हैं। प्रारूप समिति के बारे में वह क्या समझते हैं.. वह उसमें नहीं हो सकते, क्योंकि वहां कानूनी विशेषज्ञों की आवश्यकता है, योग गुरु की नहीं।" किरण बेदी ने कहा, "यह बेहतर टीम है, जो सरकार के साथ लड़ सकती है और कानून की पेचीदगियों को समझती है।" समिति के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि शांति भूषण और प्रशांत भूषण जन लोकपाल विधेयक के पहले प्रारूप का हिस्सा थे, जिसे उन्होंने तैयार किया। वे विधेयक के सार को समझते हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसका हिस्सा हैं।

लोकपाल बिल की खातिर जॉइंट कमिटी बनाने के लिए सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना हजारे ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि जिस तरह इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने निचले स्तर पर गांवों में काम किया है, वह सराहनीय है। उन्होंने कहा कि बाकी मुख्यमंत्रियों को उनसे सीख लेनी चाहिए। एनडीए के दोनों मुख्यमंत्रियों की तारीफ करने के बाद अन्ना ने यह भी कहा कि उनके इस बयान से कोई राजनीतिक संदर्भ नहीं निकाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'मैं किसी पार्टी के समर्थन में नहीं हूं।'

अन्ना हजारे ने कहा कि उन्हें संसद और लोकतंत्र में पूरा विश्वास है लेकिन प्रतिनिधियों के भ्रष्ट होने की सूरत में जनता के पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। उन्होंने कहा कि सख्त लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति पूरी पारदर्शिता बरतेगी। विडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए जनता मसौदे के निर्माण को देखेगी। इस महीने में 12 से 16 तारीख से मसौदा तैयार करने का काम शुरू हो जाएगा।

आम लोगों को पूरी जानकारी मिलती रहेगी - केजरीवाल


लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए सरकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की संयुक्त समिति के कामकाज के बारे में आम लोगों को पूरी जानकारी मिलती रहेगी जिन्होंने इस अभियान में अपना समर्थन जताया है।
संयुक्त समिति में शामिल आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने सरकार के मंत्रियों द्वारा ‘जन लोकपाल विधेयक’ के मसौदे को पूरी तरह मान लेने पर संदेह जताया और कहा कि इसलिए जनता को संयुक्त समिति में चल रहे पूरे कामकाज से अवगत कराया जाएगा।

केजरीवाल ने बताया कि जिन लोगों ने फोन करके और ईमेल करके इस अभियान को समर्थन जताया है उन सभी का पंजीकरण हो चुका है। संयुक्त समिति में मसौदे को लेकर क्या चल रहा है इसकी जानकारी पंजीकरण कराने वाले लोगों को एसएमएस और ई-मेल के माध्यम से मिलती रहेगी।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार किसी भी तरह नागरिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की बात को दरकिनार करती है तो अन्ना हजारे की तरफ से जनता को सड़कों पर उतरने का आह्वान किया जाएगा और यह आंदोलन जारी रहेगा।

    जिन लोगों ने फोन नंबर 022-61550789 पर मिस कॉल देकर या ‘इंडियाअगेंस्टकरप्शन डॉट 2010 एट जीमेल’ पर मेल करके अभियान में समर्थन जताया है, उन्हें जानकारी मिलती रहेगी।

आंदोलन से जुड़े संगठन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के सूत्रों के अनुसार इस अभियान में फोन पर करीब 11 लाख लोग देशभर में अपना समर्थन दर्ज करा चुके हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है। इसके अलावा फेसबुक पर अभियान के होमपेज पर एक लाख 90 हजार लोगों ने और इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर अन्ना हजारे के पन्ने पर एक लाख लोग जुड़े हैं।

अन्ना हजारे ने भी शनिवार को अनशन तोड़ते हुए एक मजबूत भ्रष्टाचार निरोधी विधेयक पारित कराने की सांसदों की इच्छाशक्ति पर आशंका जताई और अपने समर्थकों को आगाह किया कि उन्हें ‘बड़ी लड़ाई’ के लिए तैयार रहना चाहिए।

मीडिया से बातचीत में 72 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि ‘सत्ता के भूखे’ नेता ऐसे किसी भी विधेयक को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे जिनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रावधान हों या जिससे उनका सत्ता का सुख छीना जाता हो।

हजारे ने कहा कि मुझे लगता है कि भविष्य में (संसद में इस विधेयक को पारित कराने के लिए) बड़ा आंदोलन चलाने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि वे (सांसद) विधेयक को आसानी से पारित कर देंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी शक्तियाँ कम हो जाएँगी।

संयुक्त समिति के अध्यक्ष वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और समाज की तरफ से इसके सहअध्यक्ष अधिवक्ता शांति भूषण होंगे। इसमें सरकार की तरफ से कानून मंत्री वीरप्पा मोइली, संचार मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री पी चिदंबरम और जल संसाधन मंत्री सलमान खुर्शीद सदस्य होंगे।
दूसरी तरफ समाज की तरफ से इसमें शांति भूषण के अलावा हजारे, वकील प्रशांत भूषण, उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश संतोष हेगड़े और आरटीआई कार्यकर्ता केजरीवाल शामिल हैं। (भाषा)

97 घंटे के बाद अन्‍ना ने तोड़ा अनशन

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे गांधीवादी और जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अन्‍ना हजारे का 97 घंटे से अधिक का उपवास शनिवार को खत्‍म हो गया। अन्‍ना हजारे ने जन लोकपाल बिल पर सरकार की रजामंदी को देश की जनता की जीत करार दिया है। हालांकि उन्‍होंने कहा कि यह ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ की शुरुआत भर है और आगे अभी लंबा सफर तय करना है।



गत मंगलवार को राजधानी स्थित जंतर मंतर पर शुरू किया गया आमरण अनशन खत्‍म करने के बाद देश को संबोधित करते हुए अन्‍ना हजारे ने कहा कि लोकपाल बिल के मसौदे से जुड़ा शासनादेश जारी होने के बाद उनकी जिम्‍मेदारियां और बढ़ गई हैं। उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी ‘लड़ाई’ का तीन सूत्रीय मसौदा पेश करते हुए कहा है कि पहली सफलता जन लोकपाल बिल पर सरकार का राजी होना है लेकिन इसके बाद यह मसौदा मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा और जरूरत पड़ी तो उस वक्‍त भी अभियान चलाया जाएगा। उन्‍होंने आगे कहा कि यदि इस बिल को पारित करने को लेकर संसद में कोई अड़ंगा आया तो भी उन्‍हें देशवासियों के साथ मिलकर अभियान चलाने की जरूरत पड़ेगी।



अन्‍ना ने कहा कि अगर 15 अगस्त तक सरकार ने लोकपाल बिल पारित नहीं किया तो हम फिर से आंदोलन करेंगे। उन्‍होंने कहा, ‘लोकपाल बिल पारित होने के बाद भ्रष्‍टाचार को रोकने के लिए सरकार पर इस बात के लिए दबाव डालने की जरूरत होगी कि सत्‍ता का विकेंद्रीकरण किया जाए।’ उन्‍होंने ग्राम सभाओं, नगर परिषदों, नगरपालिकाओं के जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार (राइट टू रिकॉल) की भी वकालत की। उन्‍होंने कहा कि यदि सरपंच या उप सरपंच जनता से बिना पूछे पैसा खर्च करते हैं तो उसे वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास होना चाहिए जो उन्‍हें चुनती है।



चुनाव व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए अन्‍ना हजारे ने कहा कि इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में गड़बड़ी होने की शिकायतें सामने आती रही हैं, इसे दुरुस्‍त किया जाना चाहिए। उन्‍होंने भरोसा दिलाया कि ईवीएम की गड़बड़ी ठीक करने की उनकी पेशकश सरकार ने मान ली है। अन्‍ना हजारे ने ‘नापसंद का अधिकार’ की भी वकालत की। उन्‍होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे सभी उम्‍मीदवार दागी हैं तो जनता के पास यह विकल्‍प होना चाहिए कि वो इनमें से किसी को भी ना चुने और वहां का चुनाव रद्द कर फिर से चुनाव कराए जाएं।



'नेता नहीं मानेंगे तो फिर शुरू होगी लड़ाई'



अन्‍ना ने शनिवार सुबह साढ़े दस बजे जंतर मंतर स्थित मंच पर सबसे पहले 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाए। वहां मौजूद बड़ी संख्‍या में लोगों ने भी अन्‍ना के सुर में सुर मिलाए। अन्‍ना ने वहां मौजूद लोगों को इस आंदोलन की सफलता की बधाई देते कहा, 'आज हमारी जो जीत हुई, आपके चलते हुई। हमारी लड़ाई अभी खत्‍म नहीं हुई। हमारे राजनेता अब भी नहीं मानेंगे तो लड़ाई फिर से शुरू होगी। हम मिलते रहेंगे। इस आंदोलन में युवाओं का साथ आना आशा की किरण जगाता है। हमने काले अंग्रेजों की नींद उड़ा दी है।' अन्‍ना और उनके समर्थकों ने इसे जनता की जीत करार दिया है।



73 साल के अन्‍ना ने धरना स्‍थल पर अनशन पर बैठे अन्‍य लोगों को पहले जूस पिलाया, इसके बाद खुद एक बच्‍ची के हाथों नींबू पानी पीकर (देखें तस्‍वीर) अपना उपवास तोड़ा। अन्‍ना के उपवास तोड़ने के साथ ही धरना स्‍थल के साथ साथ पूरे देश में जश्‍न का माहौल पैदा हो गया है। प्रदर्शन स्‍थल पर बीच-बीच में ‘अन्‍ना हजारे जिंदाबाद’ , ‘अन्‍ना तुम संघर्ष करो हम तुम्‍हारे साथ हैं’ के नारे सुनाई दिए। मंच पर मौजूद कई कलाकारों ने 'रघुपति राघव राजा राम...' की धुन छेड़ी।



इससे पहले सुबह करीब साढ़े नौ बजे सरकार की ओर से सीनियर कैबिनट मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में संयुक्‍त समिति गठित किए जाने की अधिसूचना जारी की गई जो एक प्रभावी लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करेगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्‍बल ने इस अधिसूचना की कॉपी अन्‍ना की इस मुहिम से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता स्‍वामी अग्निवेश को सौंपी गई। अग्निवेश इस कॉपी को लेकर जंतर मंतर पहुंचे और वहां मंच से इसकी अधिसूचना की प्रति मीडिया के जरिये पूरे देश को दिखाई गई। स्‍वामी अग्निवेश ने कहा, ‘हमने सरकार से इस बारे में शासनादेश मांगा था लेकिन सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अधिसूचना जारी कर दी है।’ अन्‍ना के सहयोगियों में शामिल पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने इसे 'आत्‍म सम्‍मान' की जीत करार दिया है।



सरकार और सिविल सोसाइटी का गठबंधन शुभ संकेत: पीएम



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकपाल बिल मुद्दे पर सरकार और सिविल सोसाइटी के गठबंधन को लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत मानते हुए कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक कानून को संसद के मानसून सत्र में लाने पर विचार कर रही है।



मनमोहन सिंह ने शनिवार को जारी बयान में कहा, 'मुझे इस बात की खुशी है कि सरकार और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि भ्रष्टाचार को खत्म करने के मुद्दे पर एकजुट हैं। मुझे इस बात की भी खुशी है कि अन्ना हजारे अपना उपवास खत्म करने के लिए मान गए हैं।'



भ्रष्टाचार को सबके लिए एक अभिशाप बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस ऐतिहासिक कानून को लेकर सिविल सोसाइटी और सरकार का हाथ मिलाना लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। सरकार और हजारे के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत को सफल बताते हुए उन्होनें उम्मीद जताई कि इस कानून को तैयार करने की प्रक्रिया सही तरीके से आगे बढ़ेगी जिससे कि सभी संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद यह कानून कैबिनेट के समक्ष मानसून सत्र के दौरान रखा जा सके।





जानिए, क्या है जन लोकपाल बिल?


- इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।



- यह संस्था इलेक्शन कमिशन और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी।



- किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा।



- भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को 2 साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।



- भ्रष्टाचार की वजह से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा।



- अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा।



- लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।



- लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।



- सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा।



- लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।



-जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया है।

Monday, 28 March 2011

बंगाल की राजनीति में मतुआ का भूचाल


१८ अप्रैल २०११ से छह चरणों में पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव के लिहाज से पश्चिम बंगाल की फिजा अलग ही होती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल की मुहिम ने माहौल को और गरमा दिया है। १९७७ से लगातार तीन दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कम्युनिष्ट सरकार की नींव पिछले पंचायत , लोकसभा और कोलकाता नगर निगम व नगरपालिका चुनावों में हिल चुकी है। अब विधानसभा चुनावों पर भारत समेत पूरी दुनिया की नजर है। कौतूहल भरी इस दिलचस्प लड़ाई का बिगुल बज चुका है। मैं भी अपने ब्लाग के माध्यम से आपको इस जंग से रूबरू कराना चाहता हूं। निरपेक्ष भाव से इस महाभारत की कथा सुनाऊंगा। रखिए मेरे ब्लाग के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-२०११ धारावाहिक की हर कड़ी पर नजर।
ब्लाग नियंत्रक - डा.मान्धाता सिंह
धर्मतला में मतुआ महासंघ की महारैली में जुटे नेता। इसमें सभी दलों के नेता मसलन वाममोर्चा के गौतम देव, कांग्रेस के मानस भुइंया व तृणमूल के पार्थ चटर्जी एक मंच पर थे।
बड़ो मां वीणापाणि का आशीर्वाद लेने पहुंचीं तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी।

ठाकुरनगर में मतुआ महासंघ का मुख्यमंदिर।

कामनासागर।

मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचांद ठाकुर।
मतुआ गोविंददेवजी मंदिर वृंदावन।

मतुआ रंगजी मंदिर वृंदावन।
ठाकुरनगर में अपने घर के दरवाज पर बैठीं बड़ोमां।
   
    राजनीति में संगठित समुदायों के मह्त्व का आकलन सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि विगत की दशकों से जाति या सामुदायिक आधारों से चुनावों से दूर रहने वाले पश्चिम बंगाल में भी इस बार सामुदायिक छाया में चुनाव होने जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश से बंगाल में आकर बसा मतुआ संप्रदाय है। इनकी राजनीतिक हलकों में गूंज २००६ से ही सुनाई देने लगी थी, जो २००९ के लोकसभा चुनावों में वामपंथियों समेत सभी को अपने दर पर मत्था टेकने को मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं जब मतुआ ने अपनी नागरिकता समेत कई मांगों के लिए कोलकाता में महारैली की तो उसके मंच पर वह दृश्य भी दिखा जो इसके पहले असंभव सा लगता था। मतुआ के मंच पर वाममोर्चा , कांग्रेस, तृणमूल समेत कई विरोधी दलों ने एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद से उनकी मदद के एलान की सभी में होड़ भी मच गई। और हो भी क्यों नहीं ? बंगाल में रह रहे सवा करोड़ मतुआ तो राजनीति किसी भी धारा को बदल देने की औकात जो रखते हैं। जो हाल तक वाममोर्चा के परंपरागत वोट थे मगर जब नाराज हुए तो इन्हें तृणमूल की ममता बनर्जी ने लपक लिया। मतुआ की नाराजगी का खामियाजा भुगत चुके वाममोर्चा ने इनका मानमनौव्वल अपने काबिल नेता और राज्य के आवास मंत्री गौतम देव को इस काम में लगाकर कर रहा है। ममता भी इनके वोट पाने का दावा कर रही हैं। मतुआ अभी खामोस हैं मगर उनके वोट किसका बेड़ा पार करंगे यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा। शायद ये भी हवा का रुख भांपने में लगे हैं। फिलहाल तो मतुआ को महिमामंडित किया जा रहा है। उनपर एक फिल्म बनाए जोने का पोस्टर भी दमदमकैंट समेत तमाम जगहों पर लग चुके हैं। मुक्ति प्रोडक्शन की इस फिल्म को मतुआ संप्रदाय की बड़ो मां वीणापाणि देवी का आशीर्वाद भी प्राप्त है। बांग्लाभाषा की इस फिल्म का नाम है- पूर्ण ब्रह्म श्री श्री श्री हरिचंद। हरिचंद ठाकुर ही इस मतुआ संप्रदाय के संस्थापक थे। आगे हम इस पर विस्तार से आपको बताने वाले हैं कि मतुआ आखिर कौन हैं और बंगाल की राजनीति में कैसे इनकी वजह से भूचाल सा आ गया है।

मतुआ का वर्चस्व

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर २००६ के विधानसभा चुनावों के बाद से मतुआ का वर्चस्व दिखने लगा है। इसके पहले बेहद गरीब लोगों के इस संप्रदाय का वोट एकतरफा वाममोर्चा को जाता था। मगर लगातार उपेक्षा ने मतुआ को ममता की शरण में जाने पर मजबूर कर दिया। अपनी नागरिकता के सवाल पर तो इनकी नाराजगी थी ही मगर सामुदायिक विकास में भी उपेक्षा से उपजी नाराजगी को ममता ने भांप लिया। इनकी तरफ से इनकी मांगों को उठाने के साथ ही बतौर रेलमंत्री तमाम सहायता देने का भी एलान कर दिया। नतीजा सामने था। पश्चिमबंगाल की राजनीति में इनके ममता को समर्थन ने भूचाल खड़ा कर दिया। मतुआ ने वह कर दिखाया जो वाममोर्चा के ३५ सालों के शासन में कभी नहीं हुआ। इसके बाद से ही मतुआ के समर्थन और ममता के वाममोर्चा के खिलाफ नन्दीग्राम, सिंगुर, लालगढ़ जैसे आंदोलनों ने पश्चिम बंगाल के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया। कहा जा रहा है कि कम्युनिष्ट सत्ता के लालदुर्ग में तृणमूल की घुसपैठ ने पश्चिम बंगाल में 35 सालों बाद परिवर्तन की लहर पैदा कर दी है। अब २०११ के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में इन्हीं मतुआ, आदिवासी और वाममोर्चा से नाराज मुसलमान मतदाताओं ने सत्ता के नए समीकरण की लकीर खींच दी है। जंग छिड़ गई है। बेसुध वाममोर्चा भी अब सावधान है। मतुआ को मनाने की कोशिश के साथ मुसलमानों और मेदिनीपुर (लालगढ़ ) के आदिवासियों तक पुनः अपनी पैठ बनाई है। लेकिन गलतियां सुधारने में वाममोर्चा से देरी की चूक हो गई है। अब तो 35 सालों की सत्ता के मद से हुई गलतियों से बंगाल के अवाम की नाराजगी ही अब ममता की ताकत बन चुकी है और उसमें सबसे बड़ी ताकत सवा करोड़ की तादाद वाले मतुआ ही होंगे।


कौन हैं मतुआ ?

१९ शताब्दी के मध्य में वर्तमान बांग्लादेश के फरीदपुर राज्य के गोपालगंज में हरीचंद नें मतुआ संप्रदाय की स्थापना की थी। ठाकुर हरिचंद (१८१२-१८७८) और उनके पुत्र गुरूचंद (१८४७-१९३७ ) दोनों बांग्लादेश में समाज सुधारक थे। इनके उत्तराधिकारी बंगाल के विभाजन के बाद बांग्लादेश के फरीदपुर, खुलना समेत कई राज्यों से १९४८ के बाद से भारत के विभिन्न राज्यों खासतौर पर राज्य पश्चिम बंगाल में आए और अब ये संगठित तौर पर भारत में रह रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा से सटा पश्चिमबंगाल राज्य का एक शहर है बनगांव। इसी बनगांव के पास है मतुआ का मुख्यालय है- ठाकुरनगर। कोलकाता से करीब ७५ किलोमीटर की दूरी पर है यह ठाकुरनगर। यहीं पर हर साल २४ मार्च को मतुआ संप्रदाय का मेला लगता है। इसे बारूनि मेला कहते हैं। इस मेले को मतुआ महासंघ के संश्थापक हरिचंद ने बांग्लादेश गोपारगंज के अपने गांव ओराकांडी में शुरू किया था। अब यह १९४८ के बाद से पश्चिम बंगाल के ठाकुरनगर में लगता है।

हालही में ममता बनर्जीं ने मतुआ संप्रदाय की सुविधा के मद्देनजर ठाकुरनगर रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया है। मतुआ लोगों का मुख्यालय इस रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर दूर पड़ता है। यहीं एक बड़े घर में रहती हैं मतुआ संप्रदाय की मुखिया वीणापाणि देवी यानी बड़ोमां। मतुआ संप्रदाय ( मतुआ महासंघ ) की स्थापना इनके ही पति के परदादा हरिचंद ठाकुर ने मौजूदा बांग्लादेश फरीदपुर के गोपालगंज में की थी। भारत में इस संप्रदाय के ज्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हैं। कहते हैं कि गोपालगंज के इस ब्राह्मण ने जीवनभर पिछड़ी जातियों, जनजातियों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ी। मतुआ महासंघ जनजातियों व पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें ज्यादातर बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत में आकर बसे लोग हैं। क्या मतुआ हिंदू या मुस्लिम संप्रदाय की तरह कोई संप्रदाय है ? शायद नहीं। मतुआ महासंघ भी एक धर्म है मगर इनके भगवान गुरू हरिचंद हैं और इनकी संघ को दी गई शिक्षाओं को ही मतुआ महासंघ मानता है। यह संघ वह आंदोलन है जो समाज के दबे-कुचले तबके के उत्थान के लिए काम करता है। हरिचंद ने अपने महासंघ के लोगों को लोगों से स्नेह, एक दूसरे के प्रति सहनशीलता, स्त्री-पुरूष में समानता, जाति आधारित भेदभाव को न मानने के साथ लालची न होंने की शिक्षा दी। विश्वास व समर्पण का भाव रखने वाले मतुआ किसी वौदिक कर्मकांड को नहीं मानते।

अभी महासंघ की सर्वेसर्वा प्रमथ रंजन विश्वास की पत्नी वीणापाणि देवी यानी बड़ो मां हैं। प्रमथरंजन १३ मार्च १९४८ को ठाकुरनगर आए और एक छोटा सा घर बनाकर रहने लगे। वे कोलकाता हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। उन्होंने स्थानीय जमीदार जगतकुमारी दासी से जंगल व जमीन खरीद ली। सही मायने में प्रमथ रंजन ने ही मतुआ महासंघ को संगठित किया। वे १९३७ में विधानसभा चुनाव जीते और १९६२ में विधानचंद राय की सरकार में जनजातीय विकास राज्य मंत्री भी रहे। १९६७ में नवद्वीप से कांग्रेस के सांसद भी हुए मगर कुछ मतभेद के कारण पार्टी छोड़ दी।

मतुआ महासंघ का पश्चिम बंगाल के सभी जिलों में ५०० लोगों का पंजीकृत समूह है और सभी समूहों का एक मुखिया है जिसे दलपति कहते हैं। इन दलपतियों की अपने समूह पर बेहद मजबूत पकड़ होती है। इसी कारण इनके निर्देश पर वोट भी एकतरफा पड़ते हैं। इसी कारण मतुआ पर ममता की इनायत इतनी हुई कि मतुआ के पुरखों के नाम पर मेट्रो स्टेशन व रेलवे स्टेशन के नाम रखने का एलान कर दिया है। सियालदह बनगाव सेक्शन में ठाकुरनगर और चांदपाड़ा के बीच मतुआधाम हाल्ट स्टेशन और बड़ो मां बीणापाणि देबी के पति स्व.पीआर ठाकुर के नाम पर बनगांव सेक्शन में ही मसलन्दपुर से स्वरूप नगर तक रेललाइन बिछाने का भी ममता एलान कर चुकी हैं।


कामनासागर है इनका पवित्र तीर्थ

पश्चिम बंगाल के उत्तर २४ परगना जिले में बनगांव के पास ठाकुरनगर में हरिचंद गुरूचंद ठाकुर मंदिर है। इसी मंदिर से लगा एक तालाब है, जिसे मतुआ लोग कामनासागर कहते हैं। हर साल २४ मार्च को यहां एक सालाना मेला लगता है। यह उत्सव सप्ताह भर चलता है। इस मेला को बारुनि मेला कहते हैं। लाखों मतुआ श्रद्धालु इस कामनासागर में स्नान करते हैं। एक सप्ताह बाद बाकी संप्रदायों के लोगों को भी इस मेले में शामिल होने की इजाजत मिल जाती है। इस मेले में मतुआ संप्रदाय के महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और उत्तरप्रदेश से लोग आते हैं। भारत के आजाद होने से पहले यह मेला मौजूदा बांग्लादेश के गोपालपुर में हरिचंद गुरूचंद ठाकुर के जन्मस्थान औराकांडी में लगता था। अब इसका केंद्र भारत के पश्चिमबंगाल राज्य के ठाकुरनगर में है।


तृणमूल और माकपा में मतुआ को अपनी ओर खींचने की जंग

पूर्वी पाकिस्तान से पलायन कर कई चरणों में बंगाल पहुंचते रहे हिंदु समुदाय की समस्यायें उनके पलायन के इतिहास जितनी ही पुरानी हैं लेकिन अब लगता है समय बदलने वाला है। मंगलवार २८ दिसंबर २०१० को मतुआ महासंघ ने कोलकाता में नागरिकता के सवाल पर विशाल रैली की। अपने सभामंच पर सभी प्रमुख दलों के नेताओं को एक साथ लाकर खड़ा करते हुए वह मिसाल पेश की जो अब तक पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में कभी देखने को नहीं मिला। सभा में सभी प्रमुख दल के नेताओं ने एक स्वर में समुदाय के उत्थान के लिये सक्रियता दिखाने का आह्वान किया। सभा में मौजूद आवास मंत्री गौतम देव ने महासंघ के नेताओं को विशेष पर धन्यवाद किया और कहा कि उन्होंने जो किया है वह कम बड़ी बात नहीं। देव ने समुदाय के कल्याण के लिये सर्वदलीय कमेटी के गठन का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि माकपा इस बारे में पहल करने को तैयार है अन्य दल भी इस बारे में सकारात्मक कदम उठायें। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मानस भुइयां ने आवास मंत्री के सुझाव का स्वागत किया। भुइयां ने कहा कि जनवरी के मध्य में प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह,यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के अलावा गृहमंत्री पी चिदम्बर से वे व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात कर नागरिकता कानून में दुबारा संसोधन की अपील करेंगे। केन्द्रीय जहाजरानी राज्य मंत्री मुकुल राय ने कहा कि नागरिकता से वंचित समुदाय के लोगों के हित में कानून का संसोधन होना चाहिये। सभा को प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष तथागत राय ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश से उत्पीड़ित होकर आये हिंदुओं को पूरा अधिकार मिलना चाहिये। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस बारे में तत्काल आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। मतुआ महासंघ की सभा में हजारों की संख्या में समर्थक मौजूद थे।


नागरिकता कानून में संशोधन चाहते हैं मतुआ

राज्य में करीब डेढ़ करोड़ की आबादी वाले मतुआ समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले महासंघ की मांग है कि 2003 के भारतीय नागरिकता कानून में हुए संशोधन का दुबारा संशोधन किया जाय। उनकी नजर में २००३ के कानून में संशोधन के बाद से ही समुदाय के लोगों को घुसपैठिये की नजर से देखा जाने लगा है। जो लोग नागरिकता प्राप्त करने से वंचित रह गये है कानूनी जटिलताओं के चलते उनके लिये नयी नागरिकता प्राप्त करना मुश्किल हो गया है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने भी इस बारे में केन्द्र से बात करने का आश्वासन दिया है। महासंघ की धर्मतल्ला में हुई सभा में प्रमुख नेत्री वीणापाणि ठाकुरमां ने भी कानून में दोबारा संशोधन की मांग की। महासंघ से जुड़े प्रमुख नेताओं के अनुसार 2003 का कानूनी संशोधन काफी जटिलताओं से भरा है। इसकी एक धारा में कहा गया है कि जब तक माता और पिता दोनो भारत के वैध नागरिक न हों तब तक उसके बेटे या बेटी को देश की नागरिकता नहीं मिल सकती। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद पलायन भारत आये अनेक हिंदुओं को अभी तक देश की नागरिकता नहीं मिल सकी है। १९७२ में हुए इंदिरा-मुजीब समझौते के अनुसार जो लोग १९७१ तक बांग्लादेश से भारत आए हैं , सिर्फ वहीं लोग भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं।

राज्य सरकार ने अपने प्रभाव को बनाए रखने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए मतुआ आंदोलन के संस्थापक हरिचंद और गुरूच्द ठाकुर के नाम पर पुरस्कार दिए जाने का भी एलान कर दिया है। इतना ही नहीं वाममोर्चा सरकार के आवास मंत्नी गौतम देब ने मतुआ ट्रस्ट के लिए राजारहाट में २० कट्ठा जमीन भी दे दी है। यह जमीन सौंपे जाने के मौके पर मतुआ संप्रदाय के करीब चार हजार समर्थक मौजूद थे। यह जमीन मतुआ रिसर्च फाउंडेशन के लिए सौंपते हुए बड़ी साफगोई से गौतम देब ने स्वीकार किया कि वे इसके पहले वे मतुआ लोगों और उनके ३०० साल के इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने कहा कि राज्य के शिक्षा मंत्री कांति विश्वास और माकपा के वरिष्ठ नेता विमान बोस से इनके बारे में जानकारी मिली। उन्होंने कहा कि यह राजनीति की बात नहीं है बल्कि मतुआ संप्रदाय की मदद करके हम गर्व महसूस कर रहे हैं। वैसे भी हमें इनका शतप्रतिशत समर्थन मिलता रहा है। दरअसल वाममोर्चा २००६ के चुनाव और २००९ के आम चुनाव में मतुआ संप्रदाय के तृणमूल की ओर झुक जाने से चिंतित है। ममता बनर्जी ने भी व्यक्तिगत तौर पर मतुआ महासंघ की प्रमुख बड़ोमां वीणापाणि से आशीर्वाद हासिल कर वाममोर्चा खेमे में खलबली मचा चुकी हैं। यहां बता दें कि करीब पांच करोड़ मतुआ सिर्फ बड़ोमां के इशारे पर चलते हैं। इनके लिए बड़ोमां का आदेश ही कानून है। करीब ७४ विधानसभा क्षेत्रों में जीत-हार कराने का दम रखने वाले मतुआ की वाममोर्चा से नाराजगी ने ममता को राजनौतिक तौर पर शक्तिशाली बना दिया है। यह बात वाममोर्चा को काफी देर से तब समझ में आई जब नगरपालिका, लोकसभा चुनावों में वाममोर्चा की जमान ही खिसक गई। यह बात यहां मैं इसलिए बता रहा हूं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मतुआ बंगाल की राजनीति में कितना दखल दे सकते हैं और ममता व वाममोर्चा दोनों को क्यों इनकी जीहजूरी करनी पड़ रही है।

     वाममोर्चा से मतुआ महासंघ की नाराजगी को ममता २००६ के विधानसभा और २००९ के लोकसभा चुनावों में भुना लिया। इससे पहले वाममोर्चा का यह अभेद्य वोट बैंक था। वाममोर्चा के इस वोटबैंक में पहली सेंध तृणमूल ने २००६ के चुनावों में लगाई। अब २०११ के विधानसभा चुनावों में ममता और वाममोर्चा दोनों की इस वोटबैंक पर नजर है। ७४ विधानसभाओँ में जीत दिलाने का माद्दा रखने वाला करीब सवा करोड़ की आबादी वाला मतुआ महासंघ भी इस बार अपनी अहमियत समझ रहा है। यह तो २००९ के लोकसभा चुनावों में ही समझ में आ गया था जब माकपा की वृंदा कारत, माकपा के राज्य सचिव विमान बोस, फारवर्ड ब्लाक प्रमुख अशोक घोष और तत्कालीन खेलमंत्री सुभाष चक्रवर्ती बड़ो मां से आशीर्वाद लेने ठाकुरनगर पहुंच गए थे। यह अलग बात हैं कि तब महासंघ की संरक्षक बन चुकी ममता को ही आशीर्वाद मिला और संसदीय सीटें ममता की झोली में चली गईं। इसके बाद से ममता निरंतर मतुआ महासंघ को अपने पक्ष करने का प्रयास कर रही हैं।

ममता ने यह राजनीतिक खेल मतुआ महासंघ के विकास का एलान करके शुरू किया। मतुआ के महापुरुषों हरिचंद, इनके पुत्र गुरूचंद और पोता प्रमथरंजन के नाम पर रेलवे स्टेशनों के नाम का एलान कर दिया। इतना ही नहीं मतुआ संप्रदाय के ठाकुरनगर स्थित पवित्र तालाब कामनासागर के जीर्णोद्धार के लिए ३३ लाख रुपए दिए। पास में एक रेलवे अस्पताल और स्पोर्टस स्टेडियम बनवाने के लिए भी ६० लाख देने का वायदा किया। इसके एवज में बड़ोमां ने ममता बनर्जी को मतुआ संप्रदाय का मुख्य संरक्षक बना दिया। यही पर वोममोर्चा को ममता का खेल समझने में देर हो गई। मगर देर से ही सही वाममोर्चा ने अपने आवास मंत्री गौतम देब को मतुआ महासंघ को प्रभावित करने में लगा दिया। अब दमदम सीट से गौतम देब चुनाव भी लड़ रहे हैं। इस इलाके में भी मतुआ के वोट निर्णायक होंगे।

Thursday, 24 March 2011

पत्रकारों ने वेतनबोर्ड पांच अप्रैल तक लागू करने का दिया अल्टीमेटम, सांसदों ने सरकार से जवाब मांगा

नई दिल्ली में श्रम मंत्रलाय पर वृहस्पतिवार को जस्टिस मजीठिया की पत्रकारों व गैरपत्रकारों के वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में देरी के विरोध में प्रदर्शन करते देशभर से जुटे पत्रकार। (सभी फोटो साभार-एपी, पीटीआई)
   श्रम मंत्रालय के समक्ष करीब दो घंटे तक अभूतपूर्व प्रदर्शन
अखबारी कर्मचारियों के लिए मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने की मांग पर आज देश भर के पत्रकारों ने नयी दिल्ली में श्रम मंत्रालय के समक्ष करीब दो घंटे तक अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। कर्मचारी नेताओं ने वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें पांच अप्रैल तक लागू करने का सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि ऐसा नहीं होने पर वह नतीजे भुगतने को तैयार रहे। संसद में आज कांग्रेस, आरजेडी, जद (यू) और भाजपा सांसदों ने भी मजीठिया की सिफारिशें फौरन लागू करने की मांग की। सदन में मौजूद सूचना प्रसारण मंत्री से भी इस मामले पर जवाब देने को कहा।

अखबारी कर्मचारियों की विभिन्न फ़ेडरेशनों ने परस्पर मिलकर बनाये गये कान्फ़ेडरेशन के बैनर तले नई दिल्ली में अपने आक्रोश का इजहार कर अपनी जोरदार एकजुटता का परिचय दिया.। श्रम मंत्रालय के समक्ष रफ़ी मार्ग पर पत्रकारों के करीब दो घंटे तक चले प्रदर्शन के कारण यातायात पूरी तरह ठप रहा।

प्रदर्शन के दौरान कांफ़ेडरेशन आफ़ न्यूजपेपर एंड न्यूज एजेंसी एम्प्लायज आर्गेनाइजेशन्स के महासचिव एम एस यादव ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने के लिए सरकार को पांच अप्रैल तक का समय दिया। उन्होंने कहा कि यदि उक्त अवधि तक सिफ़ारिशें लागू नहीं हुई तो श्रम मंत्री नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें। पत्रकारों ने प्रदर्शन के दौरान वेतनबोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने के साथ साथ टिब्यून अखबार से निलंबित कर्मचारियों को भी बहाल करने की जोरदार मांग की।

यादव ने कहा, ‘कान्फ़ेडरेशन के बैनर तले देश भर से आये विभिन्न कर्मचारी महासंघों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर अपनी भारी एकजुटता का परिचय दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 31 दिसंबर की तयसीमा के भीतर वेतनबोर्ड का रिपोर्ट दिये जाने के बावजूद सरकार जानबूझ कर इस मामले में देर कर रही है।’ ( स्रोत- प्रभात खबर )।

सांसदों ने भी सरकार से जवाब मांगा

आज सदन के दोनों सदनों में जस्टिस मजीठिया की सिफारिशों को अविलंब लागू करने की मांग सांसदों ने की। लोक सभा में शून्यकाल में यह मुद्दा कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि वेतनबोर्ड लागू करने की मांग को लेकर देशभर में पत्रकार प्रदर्शन कर रहे हैं। मालूम हो कि पत्रकारों ने आज २४ मार्च को देश भर में प्रदर्शन किया है। मनीष तिवारी ने कहा कि २००८ से वेतनबोर्ड की सिफारिशें फौरन लागू करना चाहिए। मालूम हो कि पत्रकारों व गैरपत्रकारों के वेतन की समीक्षा के लिए बोर्ड का गठन २००७ में किया गया था।

राज्यसभा में आरजेडी के रामकृपाल यादव ने सरकार को आड़े हाथे लेते हुए कहा कि जस्टिस जीआर मजीठिया ने अपनी सिफारिशें २०१० के दिसंबर में ही श्रममंत्रालय को सौंप दी मगर सरकार ने अभी तक इसे लागू नहीं किया। उन्होंने सिफारिशें अबतक लागू नहीं करने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया जबकि पत्रकार व गैरपत्रकार राजधानी दिल्ली व देशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं।

भाजपा के रूद्रनारायण पैनी ने सदन में मौजूद सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी से इस मुद्दे पर उनसे जवाब देने को कहा।

काग्रेस के शाताराम नाइक ने जानना चाहा कि सिफारिशें लागू करने में आखिर क्या अड़चने हैं।

जद(यू) के अली अनवर अंसारी ने कही कि सरकार को आज ही इस संबंध में घोषणा कर देनी चाहिए। मालूम हो कि जस्टिस मजीठिया ने दिसंबर २०१० को सौंपे अपनी रिपोर्ट में पांच मानदंड तय किए हैं। इसमें समाचार पत्रों को पुनर्वर्गीकरण, ८ जनवरी २००८ से वेतन भत्ता का भुगतान, वेतनमान में सालाना इनक्रीमेंट में वृद्धि, आवास भत्ता में वृद्धि शामिल है। (स्रोत- पीटीआई )

मुंबई में भी पत्रकारों ने किया प्रदर्शन

पीटीआई के पत्रकारों ने मुंबई में आज दोपहर बाद मजीठिया की सिफारिशों को फौरन लागू करने की मांग पर पीटीआई दफ्तर के सामने प्रदर्शन किया। इस मौके पर फेडरेशन आफ पीटीआई कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष जान गोंसाल्वेज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सिफारिशों को फौरन लागू नहीं कर रही है जबकि रिपोर्ट तान महीने पहले ही सौंपी जा चुकी है। इस मौके पर हुई सभा में पत्रकार व गैर पत्रकार दोनो शामिल थे। (स्रोत-पीटीआई)





LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...