Saturday, 9 June 2007
विश्व के सात आश्चर्यो में ताजमहल
राष्ट्रपति पद की चुनावी होड़
हाल ही में अस्तित्व में आए कुछ क्षेत्रीय दलों के तीसरे मोर्चे का राष्ट्रपति पद के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग उम्मीदवार पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। यदि निर्वाचक मंडल पर नजर डाली जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है। ताज कॉरीडोर मामले में हाल ही के घटनाक्रम को देखते हुए 10 लाख 98 हजार 882 के निर्वाचक मंडल में बसपा के हिस्से के 58 हजार 300 मतों को मिलाकर संप्रग समर्थित उम्मीदवार आसानी से पाँच लाख 70 हजार मत हासिल कर सकता है। दूसरी ओर भाजपा और इसके सहयोगी दलों के मतों को मिलाकर राजग समर्थित उम्मीदवार को तीन लाख 54 हजार 689 मत मिलने की उम्मीद है। हाल ही में तीसरा मोर्चा बनाने वाली अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी, रालोद, टीडीपी, एमडीएमके और एजीपी के मतों की कुल संख्या एक लाख छह हजार 281 है। यदि तीसरे मोर्चे के मतों को राजग के साथ मिला दिया जाए तो यह संख्या चार लाख 60 हजार 970 तक पहुँच जाएगी लेकिन तब भी संप्रग के मुकाबले यह लगभग एक लाख 10 हजार कम रहेगी। ऐसी स्थिति में आँकड़ों का खेल संप्रग के साथ नजर आता है। आठ दलों के तीसरे मोर्चे को अभी यह फैसला लेना है कि वह निर्दलीय उम्मीदवार भैरों सिंह शेखावत का समर्थन करें या फिर संप्रग उम्मीदवार का। राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर संदेह बरकरार राष्ट्रपति पद के लिए संप्रग उम्मीदवार को लेकर संदेह अभी भी बरकरार है। गृहमंत्री शिवराज पाटिल के नाम पर राकांपा ने शुक्रवार को एक तरह से असहमति जताई। दूसरी ओर राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल पाटिल के कैबिनेट सहयोगी प्रणब मुखर्जी ने सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवार के नाम को अंतिम रूप देने के लिए सहयोगी दलों के साथ बातचीत शुरू की। बहरहाल राजग की ओर से 84 वर्षीय उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत को राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर उतारे जाने के संकेत के बाद शीर्ष पद के लिए टक्कर होना लगभग तय है। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने राकांपा प्रमुख शरद पवार के साथ बैठक की। बैठक के समय वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, आस्कर फर्नांडीस और जनार्दन द्विवेदी भी मौजूद थे। यह बैठक उस रिपोर्ट के बाद हुई है जिसमें कहा गया है कि पार्टी हाईकमान ने संप्रग उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाने के लिए मुखर्जी को प्राधिकृत किया है। फर्नांडीस ने कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की यह केवल तैयारी है। उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा। कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर इस समय भारत के राजनीतिक गलियारों में सौ टके का एक सवाल है - 'कौन बनेगा राष्ट्रपति.' वीवी गिरी और संजीवा रेड्ड़ी के बीच 1969 की राष्ट्रपति पद की चुनावी होड़ के बाद शायद अब पहली बार ये चुनाव चर्चा का विषय बना है. राजनीतिक विश्लेषक महेश रंगराजन कहते हैं, "इस बार केंद्र की यूपीए सरकार के पास पचास फ़ीसदी से कम मत हैं. अगर किसी वजह से यूपीए, वामपंथियों और बसपा में समझौता नहीं हो पाता है तो यूपीए को चुनाव जीतने में मुश्किल हो सकती है. और मुझे लगता है कि हमारे पिछले दो राष्ट्रपतियों केआर नारायणन और और अब्दुल क़लाम ने लोगों के मन में पद की गरिमा को बहुत बढ़ाया है." हालत ये है कि अगर आप किसी बाज़ार या नुक्कड़ में आम जनता के बीच भी ये सवाल पूछें तो सभी राष्ट्रपति कैसा हो इस पर अपनी राय व्यक्त करते नज़र आते हैं. शायद जनता के राष्ट्रपति या पीपुल्स प्रेसीडेंट के नाम से पहचाने जाने वाले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल क़लाम, राष्ट्रपति के पद को छोटे-बड़े सभी के मानस पटल तक पहुँचाने में सफल हुए हैं. बहस मीडिया ने राष्ट्रपति पद को लेकर कई सर्वेक्षण करवा कर इस बहस को जीवित कर रखा है. चर्चा इस पर भी ज़ोरों पर है कि राष्ट्रपति एक राजनीतिक पृष्ठभूमि का हो या कोई बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता जो देश की शान बढ़ा सके? इस बार केंद्र की यूपीए सरकार के पास पचास फ़ीसदी से कम मत हैं. अगर किसी वजह से यूपीए, वामपंथियों और बसपा में समझौता नहीं हो पाता है तो यूपीए को चुनाव जीतने में मुश्किल हो सकती है. और मुझे लगता है कि हमारे पिछले दो राष्ट्रपतियों केआर नारायणन और और अब्दुल क़लाम ने लोगों के मन में पद की गरिमा को बहुत बढ़ाया है अंग्रेज़ी दैनिक 'पाइनियर' के संपादक चंदन मित्रा का मानना है कि राजनीतिक परिपक्वता वाला व्यक्ति ही गठबंधन राजनीति के इस दौर में सही रहेगा. चंदन मित्रा कहते हैं, "राजनीति और संविधान का कोई जानकार ही देश का राष्ट्रपति होना चाहिए. अगर देश के सामने कोई जटिल विषय आए तो वो इन मुद्दों को सुलझा सके." पत्रकार नीरजा चौधरी तो राष्ट्रपति के राजनीति से जुड़े होने या न होने की पूरी बहस को ही बेमानी मानती है. उनका कहना है, "ये एक नकली बहस है. उम्मीदवार राजनीतिक हो या न हो. इससे अधिक ज़रूरी ये देखना है कि उम्मीदवार कैसा है." ये एक नकली बहस है. उम्मीदवार राजनीतिक हो या न हो. इससे अधिक ज़रूरी ये देखना है कि उम्मीदवार कैसा है राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए जो ज़ैल सिंह की तरह अपने प्रधानमंत्री के कहने पर झाड़ू उठा कर सफाई करने को तैयार न हो. पर कुछ हद तक केआर नारायणन की तरह हो जो कांग्रेस से जुड़े रहे हों लेकिन पद पर रहने के दौरान वो अपने व्यवहार और कार्यशैली से किसी भी पार्टी से जुड़े नज़र नहीं आए. राष्ट्रपति का कद ऐसा हो कि जो रोज़मर्रा के झगड़ों के ऊपर रहे. राष्ट्रपति अब्दुल क़लाम कुछ हद तक एपीजे अब्दुल क़लाम को सफल राष्ट्रपति माना जा सकता है. पर महेश रंगराजन इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं कि हाल के उनके कुछ बयान दिखाते हैं कि क़लाम जैसे राष्ट्रपति की दिक्कतें क्या हैं. रंगराजन बताते हैं,"अभी दो हफ़्ते पहले राष्ट्रपति ने कह दिया कि देश में दो दलीय व्यवस्था हो. ये एक कठिन सवाल है. इस पर तय करने वाले मतदाता हैं और देश के राजनीतिक दल हैं. उन्होंने नदियों के जोड़े जाने पर भी परियोजना बनाने के वकालत की है. ये सब विवादास्पद मामले हैं. इस तरह मुद्दों पर वो न बोलें तो ही अच्छा है." नज़रें कुछ हद तक बहुजन सामज पार्टी नेता मायावती पर हैं कि वे किस उम्मीदवार पर अपनी मुहर लगाती हैं. उम्मीदवारों के नाम लगातार आ रहे हैं और बदल रहे हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वाम नेताओं से हुई बातचीत में प्रणव मुखर्ज़ी, सुशील कुमार शिंदे और कर्ण सिंह के नामों की चर्चा हुई थी. फिर जब सोनिया गांधी डीएमके नेता करुणानिधि से मिलीं तो करण सिंह का नाम सूची से बाहर हुआ और शिवराज पाटिल और अर्जुन सिंह का नाम जुड़ गया. आगे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे मोती लाल बोरा का नाम भी उछला. कांग्रेस में उम्मीदवार का अपनी नेता के प्रति आस्था होना उम्मीदवार बनने का सबसे बड़ा मापदंड हैं. जहाँ तक यूपीए सरकार का सवाल है तो उसके लिए कई मंत्रिमंडलीय समूहों की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी संभाल रहे प्रणव मुखर्ज़ी को सरकार से हटाना मुश्किल नज़र आ रहा है. मेरा मानना है कि मायावती किसी भी उम्मीदवार पर नहीं अटकेगीं. उनका ताज़ कॉरिडोर का मामला सुलझ गया है. अपने राज्य के लिए उन्होंने बड़ा आर्थिक पैकेज़ मांगा है. फिर भी वो किसी दलित नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने की बात उठा सकती हैं. मायावती नहीं चाहेंगी कि कोई अन्य नेता दलित राजनीति का केंद्र बनकर उभरे बीएसपी नेता मायावती की पसंद पर नीरजा चौधरी का कहना है,"मेरा मानना है कि वो किसी उम्मीदवार पर तो नहीं अटकेगीं. उनका ताज़ कॉरिडोर का मामला सुलझ गया है. अपने राज्य के लिए उन्होंने बड़ा आर्थिक पैकेज़ मांगा है. फिर भी वो किसी दलित नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने की बात उठा सकती हैं. मायावती नहीं चाहेंगी कि कोई अन्य नेता दलित राजनीति का केंद्र बनकर उभरे." शेखावत की उम्मीदवारी मौज़ूदा उपराष्ट्रपति भैरोसिंग शेखावत भी राष्ट्रपति के उम्मीदवार हैं. अगर वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ते हैं तो भी उनेक लिए जीत हासिल करना आसान नहीं नज़र आता. यूपीए और वाम दलों के पास 5.2 लाख मत हैं, एनडीए के पास 3.5 लाख और अन्य क्षेत्रीय दलों के पास 1.2 लाख मत हैं. अगर एनडीए और अन्य दल साथ भी हो जाते हैं तो भी वो यूपीए और बसपा के साथ होने की स्थिति में इस दौड़ में ख़ासे पीछे रह जाएंगे. कुल मिलाकर अब 10 जनपथ की पसंद और मायावती की उस पर मुहर ही तय करेगी कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा.
आंकड़ों का खेल ही है राष्ट्रपति का निर्वाचन : प्रणव मुख़र्जी
उन्हे संप्रग सरकार में 'मिस्टर डिपेंडेबल' यूं ही नहीं कहते। टेढ़े संवैधानिक मसले हों या पेचीदा राजनीतिक संकट, हर मामले में कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक उनकी सलाह लेते है। जीवन के 70 से अधिक बसंत देख चुके विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी को लोग सरकार की धुरी कहते हैं। विदेशी मंत्री होने के साथ वह दर्जनों समितियों के मुखिया भी हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रणव राष्ट्रपति पद के लिए गैर-राजनीतिक उम्मीदवार की बहस को पूरी तरह खारिज करते है। उनकी राय में यह पूरी तरह आंकड़ों का खेल है। यह टिप्पणी तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जबकि उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए संभावित उम्मीदवारों में गिना जा रहा है। पेश है विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर प्रणव मुखर्जी से दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता प्रणय उपाध्याय की बातचीत के अंश-
प्र: आपको इस सरकार में मिस्टर डिपेंडेबल कहा जाता है। क्या कभी लगता है कि आप पर काम का बोझ काफी ज्यादा है?
उ: यह सच है कि मैंने लगभग 50 मंत्रिसमूहों की अध्यक्षता की है, जो जरूरत पड़ने पर सरकार की तरफ से फैसले लेते हैं, लेकिन सारे 'ग्रुप आफ मिनिस्टर' एक साथ काम नहीं करते है। इस समय करीब 12 मंत्री समूह मेरे पास हैं। अपने पूरे कैरियर में मंत्री के रूप में मैंने एक-साथ कई जिम्मेदारियां निभाई है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं होगा कि मैं काम के बोझ से लदा हूं।
प्र: एक सामान्य धारणा है कि प्रणव मुखर्जी को अपनी क्षमता के मुकाबले कम मिला है।
उ: नहीं, मैं ऐसा नहीं कहूंगा। अपने पूरे कैरियर में मैंने वो भूमिकाएं निभाई है जो पार्टी ने मुझे सौंपी। पार्टी नेतृत्व हमेशा उदार रहा है, जिसने न केवल मुझे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं, बल्कि उन्हें निभाने में मदद भी की। हमारे यहां जिस तरह की प्रशासन व्यवस्था है उसमें सभी को योगदान देना पड़ता है। यह एक आदमी का शो नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी की व्यवस्था है।
प्र: केंद्र में गठबंधन सरकार बनाने का कांग्रेस का यह पहला प्रयोग अपने तीन साल पूरे करने जा रहा है। कौन सी गलतियां है जिन्हें कांग्रेस भविष्य की गठबंधन सरकारों में दोहराना नहीं चाहेगी?
उ: सब जानते है इससे पहले हमने कभी गठबंधन सरकार नहीं बनाई। कुछ गठबंधनों को बाहर से समर्थन जरूर दिया, जो अपने निहित अंतर्विरोधों के कारण ज्यादा समय चल नहीं पाए। 1996 के पहले तक कांग्रेस ने जिन गठबंधनों को समर्थन दिया वे कहीं न कहीं आम चुनावों में कांग्रेस की हार का भी कारण थे, लेकिन संप्रग सरकार चुनाव पूर्व और चुनाव के बाद हुए गठजोड़ का प्रतिफल है। अत: यदि हम इसे जारी रख सकें तो यह अधिक स्थायी हो सकता है।
प्र: क्या आपको लगता है वामदल गठबंधन धर्म का पालन कर रहे है?
उ: लंबे समय तक विपक्ष में रहने के कारण वाम विचारधारा में कांग्रेस के प्रति एक निहित विरोध का विकास हो चुका है। अत: कुछ अंतर्विरोध जरूर है, लेकिन इतने नहीं कि सरकार गिर जाए। यह कहना ठीक नहीं होगा कि वामदल गठबंधन का खेल खराब करने वाले घटक है। साझा न्यूनतम कार्यक्रम और समन्वय के सहारे हम वैचारिक मतभेद को यथासंभव दूर करने की कोशिश करते रहते है।
प्र: क्या भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर आगामी जी-8 शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली बुश-मनमोहन मुलाकात में अंतिम मुहर लग पाएगी या अभी लंबा इंतजार करना होगा?
उ: अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुदं्दे पर बातचीत चल रही है और कुछ प्रगति भी हुई। जी-8 सम्मेलन के दौरान जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बुश मिलेंगे तो इस बारे में बात होगी। हम कोशिश कर रहे है कि इस मामले को जल्द से जल्द अपने अंजाम तक पहुंचाया जा सके, लेकिन कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती।
प्र: परमाणु समझौते राज्यसभा में दिया प्रधानमंत्री का बयान भारतीय वार्ताकारों के लिए बंधन बन रहा है। क्या इससे बचना उचित होता?
उ: वह एक जरूरत थी। अंतराष्ट्रीय समझौता करना तकनीकी तौर पर कार्यपालिका का विशेषाधिकार हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में बड़े नीतिगत विषय पर हम संसद के प्रति जवाबदेह है। संसद में प्रधानमंत्री के सामने कुछ सवाल उठाए गए थे जिनका जवाब देना उनकी जिम्मेदारी थी। राष्ट्रहित की रक्षा हर दृष्टि से करने की जरूरत है। हमें अपने सार्वभौमिक हितों को भी बचाए रखना है इसलिए जो भी समझौता हो उसमें इन दोनों पहलुओं का ध्यान रखने की जरूरत है।
प्र: कूटनीति लेन-देन के आधार पर चलती है। अत: परमाणु परीक्षण के अधिकार, प्रयुक्त ईधन के पुन: इस्तेमाल और तकनीक लौटाने जैसे मुदं्दों पर भारत कहां तक लचीलापन दिखाने को तैयार है?
उ: यह सही है कि कूटनीति में लेन-देन होता है, लेकिन मोटे तौर पर इस बात को समझिए कि मूलभूत क्षेत्रों में कोई समझौता नहीं होता। अमेरिकी एक जुमले का प्रयोग हमेशा करते है 'सर्वोच्च राष्ट्रहित'। देश हित के आड़े कोई चीज आएगी तो अमेरिका समझौता नहीं करेगा। इसी तरह यदि कोई बात हमारे सार्वभौमिक अधिकार और राष्ट्रहित के विपरीत जाएगी तो हम समझौता नहीं करेगे।
प्र: पाकिस्तान के साथ बने आतंकवाद निरोधी तंत्र के संदर्भ में अब धारणा बन रही है कि यह ठीक से काम नहीं कर रहा है।
उ: हम कुछ आगे बढ़े है, लेकिन यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि रातों-रात हालात में बदलाव आ जाएगा। हमने जो कुछ पाया है उसे भी कमतर नहीं कहा जा सकता। पिछले साल नवंबर में बने आतंकवाद निरोधी साझा तंत्र को भी हमें अभी कुछ समय देने की जरूरत है।
प्र: इन दिनों एक बहस चल रही है कि भारत में राष्ट्रपति राजनीतिक होना चाहिए या गैर-राजनीतिक। इस बारे में आपका क्या कहना है?
उ: राष्ट्रपति चुनाव के मामले में मुझे जो कहना था मैं अपने बयान में कह चुका हूं। डा. कलाम देश के 11वें राष्ट्रपति है। एस. राधाकृष्णन तथा जाकिर हुसैन ख्यात शिक्षाविदं् थे वहीं के. आर. नारायणन सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ एक प्रख्यात बुद्धिजीवी तथा राजनेता भी थे। राष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है और इसका चुनाव इलेक्टोरल कालेज के जरिए होता है। दरअसल एकमात्र योग्यता यही है कि जिसे इलेक्टोरल कालेज का विश्वास हासिल है और उसे ही राष्ट्रपति बनना चाहिए। अत: यह सब बौद्धिक बहस है और मैं इसे कोई गंभीर विषय नहीं मानता।
Wednesday, 6 June 2007
अक्षरग्राम
मैं हिंदी पत्रकार हूँ । खबरों की दुनिया में तो रहता ही हूँ इसी लिए अब अपने विचारों को लेकर अक्षरग्राम के चिट्ठाकारों से भी जुडना चाहता हूँ। खबर उनकी भी लेनी है जिन्होंने अपने विचारों से अक्षरग्राम में धूम मचा रखी है। मैं काशी का रहने वाला हूँ। और अब कोलकाता में पत्रकारिता कर रहा हूँ। हिंदी पत्रकार हूँ इस लिए हिंदी जगत से जुडना मेरी हाबी है। आपलोगों का सानिध्य पाकर मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।
धन्यवाद
डा.मान्धाता सिंह
कोलकाता
Monday, 4 June 2007
हिंदी पत्रकारिता : फैलता साम्राज्य, गिरता स्तर
Sunday, 3 June 2007
धर्मांतरण
छठीं शताब्दी में जब हिन्दू धर्मं का घोर पतन हो चुका था तब बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने जो सामाजिक और धार्मिक क्रान्ति का दौर शुरू किया था उसमें हिन्दू धर्मावलंबियों ने बड़ी तेजी से अपनी आस्था बदल ली थी। फलतः सनातन हिन्दू धर्म के आडम्बर और कर्मकांड से ऊबे लोगों ने अपेक्षाकृत प्रगतिशील बौद्ध धर्म को अपनाया। शंकराचार्य के प्रादुर्भाव तक हालत यह हो गयी थी कि अपने आडम्बर में डूबे हिन्दू धर्माचार्य किकर्तव्य विमूढ़ होकर सनातन हिन्दू समाज कि दुर्गति देखते रहे। आख़िर ऐसा क्यों हुआ ? क्यों हिन्दू समाज अपनी आस्था बदलने को मजबूर हुआ ? इन दोनों सवालों और वर्त्तमान भारत में दलितों के धर्मान्तरण पर उठे सवालों का शायद एक ही जवाब है।छठीं शताब्दी में हिदू समाज घोर कर्मकांड ,जातिवाद और उंच-नींच का भेदभाव ,धार्मिक अनुष्ठानों में अकारण बलि जैसे कर्मकांड से ऊब चुका था। ऐसे में बौद्ध धर्म के तर्कों ने उन्हें काफी प्रभावित किया। सदाचार अपनाकर और जति भेदभाव व कर्मकांड से दूर रहकर एक ऐसे मार्ग पर चलने का बौद्ध धर्म के प्रणेता गौतमबुद्ध ने उपदेश दिया। ही नहीं गौतमबुद्ध ने किसी पूजा व कर्मकांड को अपने धर्म में कोई जगह नही दीं । मगर आज का बौद्ध धर्म वैसा नहीं है। यह भी कर्मकांड से युक्त है। पतन इसका भी हुआ है।अब भी यह जति-पात से दूर सवर्ण अधिकारो से वंचित दलितों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। tab to jagatguru shankaracharya ne hindu samaj ko ubara tha. hindu samaj ka dharmantaran roka tha. us samaya bhi jagrook lagon ne bauddh dharm apnaya tha. itana hee nahee bauddh dharm ko rajkiya sanrakshan mila tha to aaj dharmantaran ko rajnaitik sanrakshan mila huaa hai. aaiye aaj ke dharmantaran ke karno ke awalokan karate hain. vartamaan aadhunik bharat mein bhee धर्मांतरण सबसे ज़्यादा वो जातियाँ कर रही हैं, जो जागरूक हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से कुछ तरक्की कर गईं हैं. मेरा मानना है कि दलितों का बौद्ध के रूप में धर्मांतरण उन्हें बरगलाकर या जबरन नहीं होता है. अधिकांश दलित सामाजिक और राजनीतिक वजहों से बौद्ध धर्म अपनाते हैं.
धर्मांतरण की ये प्रक्रिया राजनीतिक है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसकी अहम वजहें सामाजिक ही होती हैं. वर्ण या जाति व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रही. अन्य जातियों में भी वर्ण व्यवस्था में बदलाव का असर साफ़ देखा जा सकता है. दलितों की बात आती है तो कई स्थानों पर अस्पृश्यता का असर अब भी देखा जा सकता है. मुझे लगता है कि यही वजह है कि समाज में बेहतर स्थिति के लिए दलित धर्मांतरण का रुख़ करते हैं.
हालाँकि प्रत्येक राज्य में दलितों की स्थिति अलग-अलग है. मसलन दक्षिण भारत की स्थिति उत्तर से एकदम भिन्न है. दक्षिण के दलित जहाँ भूमिहीन रहे हैं, वहीं उत्तर भारत में दलितों के पास थोड़ी बहुत ज़मीन रही है.
भारत में कई राज्यों में दलितों की सामूहिक हत्या की घटनाएँ भी होती रहती हैं
यह बात सही है कि दलितों की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन कुछेक राज्यों मसलन बिहार और गुजरात में अब भी कई गाँव ऐसे हैं जहाँ आज भी दलितों का बहिष्कार होता है.
ये कहा जा सकता है कि जब तक गैरदलित, दलितों पर अत्याचार करते रहेंगे, तब तक धर्मांतरण जैसी चहल-पहल भी होती रहेगी.
जहाँ तक मुझे सूचना है महाराष्ट्र में महार और माला जाति अधिक धर्मांतरण कर रही है यानी जो दलित जातियाँ समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ी हैं, धर्मांतरण का प्रतिशत उनमें अधिक है.
हालाँकि उत्तर प्रदेश में जाटव इसका अपवाद हैं. ये आर्थिक रूप से मजबूत और जागरूक होने के बावजूद धर्मांतरण नहीं कर रहे हैं.
होता ये है कि जब दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देने, बाजा नहीं बजाने देने जैसी घटनाएँ होती हैं तो दलितों में ये संदेश जाता है कि जब तक वे हिंदु व्यवस्था में बने रहेंगे, तब तक अस्पृश्यता से उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी.
जहाँ तक आदिवासियों के धर्मांतरण का सवाल है तो यह दलित धर्मांतरण से एकदम अलग है.
आदिवासी
आदिवासियों की अपनी अलग व्यवस्था और पहचान होती है. आदिवासियों का धर्मांतरण ईसाई धर्म में अधिक हो रहा है.
इसकी वजह ये भी है कि ऐसा प्रचार किया जाता है कि ईसाई बनने से उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएँ मिलेंगी.
हालाँकि धर्मांतरण की यह प्रक्रिया दोतरफा है. यानी कुछ आदिवासी ईसाई धर्म अपना रहा हैं तो कुछ लोग शुद्धिकरण के नाम पर ईसाई बने आदिवासियों को वापस हिंदु धर्म में ला रहे हैं.
छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, गुजरात में आदिवासियों के धर्मांतरण से सामाजिक टकराव भी बढ़ रहा है और कभी-कभी तो यह हिंसक रूप भी ले लेता है.
आदिवासियों की धर्मांतरण प्रक्रिया दलितों से भिन्न है.
जहाँ दलित सामूहिक तौर पर धर्मांतरण कर रहे हैं, वहीं आदिवासियों में ऐसा नहीं है।
मुंबई में huye धर्मांतरण कार्यक्रम में कई हज़ार दलितों और आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इसमें लगभग 35 हज़ार लोग शामिल हुए.
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने 50 वर्ष पहले बौद्ध धर्म अपनाया था और इसी के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम में सबसे ज़्यादा लोग महाराष्ट्र के थे और इनमें वंजारा समुदाय के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी.
इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है
आयोजकों ने पाँच लाख लोगों के पहुँचने का दावा किया था लेकिन भीड़ सिर्फ़ 30 से 35 हज़ार लोगों की थी जिनमें से कुछ हज़ार लोगों ने धर्मांतरण कराया.
हालाँकि मुख्य आयोजकों में से एक राहुल बोधी का दावा है कि एक लाख लोग धर्मांतरित हुए हैं.
इस कार्यक्रम में बौद्ध आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भी आने वाले थे लेकिन अस्वस्थ होने के कारण नहीं पहुँच सके.
राजनीति और समाज पर गहरी नज़र रखने वाले योगेंद्र यादव कहते हैं कि यह रस्मी घटना बन गई है. उनका कहना है, "इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है."
वे कहते हैं, "यह बाबा साहेब अंबेडकर की शुरू की हुई परंपरा है जिसे हिंदू वर्ण व्यवस्था के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए दलित प्रतीकात्मक तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन बहुजन समाज पार्टी जैसे दलित नेतृत्व ने अब इसे तिलांजलि दे दी है क्योंकि उन्हें इसका बहुत लाभ नहीं दिखता."
दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं
जस्टिस पार्टी के प्रमुख उदित राज धर्मांतरण को जायज ठहराते हुए कहते हैं, "दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं."
कुछ दक्षिणपंथी हिंदू संगठन इस तरह के धर्मांतरणों का विरोध करते रहे हैं.
धर्मांतरण करने वालों को उम्मीद है कि इसके ज़रिए वे उस जातिप्रथा से बाहर निकल सकेंगे जिसमें उन्हें सबसे निचले तबके का माना जाता है.
हालांकि सरकार ने दलितों और आदिवासियों को आरक्षण देने की व्यवस्था की है लेकिन इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है.
वैसे भारत में धर्मांतरण एक विवादित विषय रहा है. विशेषकर अगर वह हिंदू से इस्लाम या ईसाइयत में धर्मांतरण हो.
हालांकि हिंदुओं के बौद्ध हो जाने का अब तक ख़ास विरोध नहीं हुआ है क्योंकि बौद्ध धर्म को एक तरह से हिंदू धर्म का ही विस्तार माना जाता है.
aaj fir hindu amaj ko ek aur shankaraacharya kee jaroorat hai. halaki aaj bhee shankaracharya hain magar ve aksham hokar rajneeti mein ulajh gaye hain. bahratvasee ko dharmantaran se ubarane vaale he aadi shankaracharya kahaan ho. ab to aa jaao aur dharmantaran se dukhee bharat ko is rajneetik sankat se ubaaro.