Saturday, 9 June 2007

विश्व के सात आश्चर्यो में ताजमहल

दुनिया में मुहब्बत का पैगाम देने वाले ताजमहल को अगर आप विश्व के सात आश्चर्यो की सूची में शामिल देखना चाहते हैं तो आज से ही आप अपने मोबाइल पर एसएमएस तथा फोन या इंटरनेट के जरिए उसके पक्ष में अभियान चलाना शुरू कर दीजिए। आपका बेशकीमती वोट ताजमहल को दुनिया के नए सात आश्चर्यो की सूची में डाल सकता है। आप देर न कीजिए। अब आपके लिए केवल एक महीना बचा है। सात जुलाई को पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में ताजमहल की तकदीर का फैसला हो जाएगा, क्योंकि दुनिया के सात आश्चर्यो की सूची में कई नए स्थल शामिल हो सकते हैं और हट भी सकते हैं। इस अनोखे एवं दिलचस्प चुनाव में विश्व के 20 ऐतिहासिक स्थल दौड़ में शामिल हैं। इनमें से सात स्थलों का चुनाव होना है। इसमें दुनियाभर के लोग अपना मतदान कर रहे हैं। अब तक पांच करोड़ लोगों ने मतदान किया है। जिस एतिहासिक स्थल को अधिक वोट मिलेंगे वे सात आश्चर्यो की सूची में फिर से शामिल होंगे। इन बीस एतिहासिक स्थलों में चीन की लंबी दीवार, एफिल टावर, माच्चू मिच्चू का शिखर, अंगकोटरवाट, क्रेमलिन तथा स्टेचू आफ लिबर्टी, सिडनी का ओपेरा हाउस आदि शामिल हैं। अगर आपने ताजमहल के पक्ष में मतदान नहीं किया तो आप यह ऐतिहासिक अवसर गवां देंगे। इसलिए न केवल आप वोट करें, बल्कि अपने घर के सदस्यों, पड़ोसियों और मुहल्ले तथा दफ्तर के लोगों को भी वोट डालने को प्रेरित करें। आपका वोट ताजमहल की रक्षा करेगा और तब आप फº से कह सकेंगे, दुनिया से सात अजूबों में ताजमहल भी हैं। दुनिया में मोहब्बत का पैगाम देने वाले खूबसूरत स्मारक ताजमहल को विश्व के सात अजूबों में शामिल करने के अभियान की आज उलटी गिनती शुरू हो गई है। अगर आप ताजमहल की खूबसूरती से मुतासिर हैं, तो आप अपने मोबाइल पर ताज टाइप कर 4567 पर एसएमएस करें। आपका बेशकीमती वोट ताज को बचाएगा और वह दुनिया के सात अजूबों में शामिल होकर भारत का नाम रोशन करेगा। आपके पास अब सिर्फ 28 दिन बचे हैं। सात जुलाई को ताजमहल की तकदीर का फैसला होने वाला है। आप अपने टेलीफोन से ताज के लिए फोन भी कर सकते हैं। ताज का टेलीफोन कोड-20 है और अंतरराष्ट्रीय नम्बर 423663900299 और 448700623748 है। आप चाहें तो इंटरनेट पर www.new7wonders.com टाइप कर अपना नाम पंजीकृत करा सकते हैं और सात विकल्पों में से ताज के पक्ष में वोट कर सकते हैं। सात अजूबों की सूची में स्थान पाने की होड़ में अब 20 ऐतिहासिक स्थल शामिल है। ताज अभी 10 ऐतिहासिक स्थलों में सूची में पहुँच गया है। अजूबों की दौड़ में अब भी है ताज ताज महल के नामांकन के समय ऐश्वर्या राय प्रचार के लिए पहुँची थीं लगता है कि ताज महल दुनिया के सात आश्चर्यों की नई सूची में भी अपनी जगह क़ायम रखने में कामयाब हो जाएगा. अब तक वह पहले सात में जगह बनाए हुए है. दुनिया के सात आश्चर्यों की नई सूची बनाने के लिए दुनिया भर के लोग वोट दे रहे हैं. 31 जनवरी तक मिले वोटों के मुताबिक़ पहले 21 स्मारकों में से ताज पहले सात में है. इस समय अंतिम सात में जिन स्मारकों के नाम हैं उनमें ताज महल के अलावा इटली का कोलोसियम, ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना, माचु पिच्चु, पेट्रा, गीज़ा के पिरामिड और इस्टर्न आइलैंड की मूर्तियाँ शामिल हैं. नए आश्चर्यो के अंतिम नतीजे आएँगे सात जुलाई 2007 को होना है यानी 07.07.07 को. ताज महल का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में 17वीं शताब्दी में करवाया था. सफ़ेद संगमरमर से बने इस स्मारक को दुनिया भर में प्रेम के प्रतीक के रुप में देखा जाता है. प्रतियोगिता यह प्रतियोगिता करवा रही है न्यू सेवन वंडर्स डॉट कॉम नाम की वेबसाइट. इसके लिए आयोजकों ने बाक़ायदा एक सूची तैयार की थी. इस सूची में शुरु में 77 नाम थे जो दुनिया भर के लोगों के मतों के आधार पर 21 स्मारकों तक आ गए. 31 जनवरी तक मिले मतों के आधार पर एक सूची वेबसाइट पर प्रकाशित की गई है. वेबसाइट के मुताबिक़ अगली सूची सात मार्च को प्रकाशित की जाएगी. इस बीच आयोजकों का एक एयरशिप प्रचार भी कर रहा है. जिसकी शुरुआत ग्रीस से हुई थी और यह एयरशिप ताजमहल के ऊपर से पाँच दिसंबर को गुज़रा था. वैसे जब इस प्रतियोगिता के लिए ताज महल का नामांकन किया गया था तो बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय इसके प्रचार के लिए वहाँ पहुँचीं थीं. ताज पर वक्फ़ का दावा ख़ारिज ताज महल पिछले दिनों बड़े विवाद में रहा है भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश के सुन्नी मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के उस दावे को ख़ारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि ताजमहल को उसकी संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया जाए. भारत के क़ानून मंत्री एचआर भारद्वाज ने बोर्ड के इस दावे को निराधार बताते हुए कहा कि ताजमहल भारत की राष्ट्रीय संपदा है. वक्फ़ बोर्ड ने कहा था कि चूँकि प्रदेश में तमाम क़ब्रों की देखरेख की ज़िम्मेदारी उसी की है इसलिए ताजमहल को भी उसे ही सौंप दिया जाना चाहिए. ग़ौरतलब है कि ताजमहल शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया था जहाँ उन दोनों को साथ-साथ दफ़नाया भी गया है. ताजमहल की ज़िम्मेदारी 1920 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास है और तभी से विभाग इसकी पूरी देखरेख करता आया है. विधि मंत्री भारद्वाज ने कहा, "किसी और संस्था को ताजमहल की देखरेख करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इसकी अच्छी तरह देखभाल कर रहा है." शाहजहाँ ने जब ताजमहल बनवाया था तो सरकारी दस्तावेज़ों में इसके बारे में एक बादशाहनामा दर्ज किया गया था. उसने आगरा के आसपास के 80 गाँवों का एक वक्फ़ यानी ट्रस्ट बनाया था. इन गाँवों से लगान आदि के रुप में होने वाली आय से ताजमहल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे. उस समय की व्यवस्था के अनुसार ताजमहल का मुतवल्ली यानी मैनेजर मुग़ल बादशाह को नियुक्त किया गया था. वक्फ़ बोर्ड ने ताजमहल को अपनी संपत्ति बताया इस लिहाज़ से देखें तो इस पर दो दृष्टिकोण हो सकते हैं. एक तो ये कि ताजमहल उसी के अधिकार में रहेगा जिसकी हुकूमत होगी, और दूसरा ये कि इसे किसी सरकारी वक्फ़ बोर्ड को दे दिया जाए. क़ानून लेकिन इसके लिए कोई भी क़दम प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम के तहत उठाना ज़्यादा अच्छा होगा. यह अधिनियम पहले 1904 में बना था और 1958 में इसमें संशोधन किया गया. इस क़ानून के अनुसार जिन स्मारकों का उस समय सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था वही स्थिति अब भी जारी रहनी चाहिए. और जहाँ तक ऐतिहासिक स्मारकों का सवाल है तो वहाँ धर्म का सवाल ही नहीं है. क़ानून में कहा गया है कि जिन स्मारकों में पूजा पाठ नहीं होता उसे इसके लिए नहीं खोला जा सकता. ये और बात है कि सरकार ने ख़ुद इस क़ानून को तोड़ा और 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया. जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने इस पर अपना दावा जताया था तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को इसे हाईकोर्ट में चुनौती देनी चाहिए थी. और यदि शिया-सुन्नी का सवाल आएगा तो यह भी तो पूछा जाएगा कि मुमताज महल शिया थीं या सुन्नी. दुनिया के सात नए अजूबे कौन से? दुनिया भर से लोग ताजमहल देखने आते हैं दुनिया के सात अजूबे हर किसी के लिए हमेशा ही दिलचस्पी का केंद्र रहते हैं और सात अजूबों को अपनी राय के ज़रिए चुनने के लिए इस बार लोगों मौक़ा भी मिल रहा है. स्विटज़रलैंड के एक निजी संगठन - द न्यू 7 वंडर्स फ़ाउंडेशन यानी नए सात आश्चर्य संस्थान ने दुनिया भर से 21 अजूबों को चुना है जिनमें से लोगों को मतदान के ज़रिए सात अजूबों को चुनने का मौक़ा दिया जा रहा है. 21 अजूबों की सूची में भारत से सिर्फ़ ताजमहल ने जगह पाई है. इस संस्थान के सदस्यों में यूनेस्को के पूर्व अध्यक्ष भी शामिल हैं. साल 2005 में दुनिया भर के अजूबों के बारे में लोगों की राय मांगी गई थी जिनमें से विशेषज्ञों ने 21 को चुना और उनमें से अंतिम रूप से सात को चुना जाएगा और इसके लिए साल 2006 में लोगों की राय ली जाएगी. 21 अजूबों की सूची में ताजमहल, चीन की महान दीवार वग़ैरा शामिल हैं. लोगों की राय के आधार पर ही दुनिया के सात अजूबों को एक जनवरी 2007 को घोषित किया जाएगा. संस्थान टेलीफ़ोन के ज़रिए लोगों से अजूबों की पसंद बताने के लिए अनुरोध कर रहा है और इस बारे में विस्तृत जानकारी उनकी वेबसाइट पर दी गई है. इससे जो धन इकट्ठा होगा उसमें से आधी रक़म संस्थान के विरासत को सहेजकर रखने के प्रयासों पर ख़र्च की जाएगी. आधुनिक अजूबे इस सूची में आधुनिक काल के भी अनेक अजूबों ने जगह पाई है, मसलन, पेरिस का एफ़िल टॉवर, न्यूयॉर्क की स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी और सिडनी का ओपेरा हाउस वग़ैरा. प्राचीन दुनिया के सात अजूबों का चयन एक ग्रीक दार्शनिक फ़िलों ने क़रीब दो हज़ार साल पहले किया था. उन्होंने जिन अजूबों को चुना था वे सभी भूमध्य क्षेत्र में स्थित थे. नई सूची में जगह पाने के लिए किसी भी अजूबे का मानव निर्मित होना आवश्यक है और वह धरोहर की 'स्वीकार्य' स्थिति में होना चाहिए. न्यू सेवन वंडर्स फ़ाउंडेशन का कहना है कि वह इस अभियान को लोगों में सांस्कृतिक धरोहर के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए चला रहा है.

राष्ट्रपति पद की चुनावी होड़

राष्ट्रपति चुनाव : आँकड़े संप्रग के पक्ष मे
हाल ही में अस्तित्व में आए कुछ क्षेत्रीय दलों के तीसरे मोर्चे का राष्ट्रपति पद के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग उम्मीदवार पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। यदि निर्वाचक मंडल पर नजर डाली जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है। ताज कॉ‍रीडोर मामले में हाल ही के घटनाक्रम को देखते हुए 10 लाख 98 हजार 882 के निर्वाचक मंडल में बसपा के हिस्से के 58 हजार 300 मतों को मिलाकर संप्रग समर्थित उम्मीदवार आसानी से पाँच लाख 70 हजार मत हासिल कर सकता है। दूसरी ओर भाजपा और इसके सहयोगी दलों के मतों को मिलाकर राजग समर्थित उम्मीदवार को तीन लाख 54 हजार 689 मत मिलने की उम्मीद है। हाल ही में तीसरा मोर्चा बनाने वाली अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी, रालोद, टीडीपी, एमडीएमके और एजीपी के मतों की कुल संख्या एक लाख छह हजार 281 है। यदि तीसरे मोर्चे के मतों को राजग के साथ मिला दिया जाए तो यह संख्या चार लाख 60 हजार 970 तक पहुँच जाएगी लेकिन तब भी संप्रग के मुकाबले यह लगभग एक लाख 10 हजार कम रहेगी। ऐसी स्थिति में आँकड़ों का खेल संप्रग के साथ नजर आता है। आठ दलों के तीसरे मोर्चे को अभी यह फैसला लेना है कि वह निर्दलीय उम्मीदवार भैरों सिंह शेखावत का समर्थन करें या फिर संप्रग उम्मीदवार का। राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर संदेह बरकरार राष्ट्रपति पद के लिए संप्रग उम्मीदवार को लेकर संदेह अभी भी बरकरार है। गृहमंत्री शिवराज पाटिल के नाम पर राकांपा ने शुक्रवार को एक तरह से असहमति जताई। दूसरी ओर राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल पाटिल के कैबिनेट सहयोगी प्रणब मुखर्जी ने सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवार के नाम को अंतिम रूप देने के लिए सहयोगी दलों के साथ बातचीत शुरू की। बहरहाल राजग की ओर से 84 वर्षीय उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत को राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर उतारे जाने के संकेत के बाद शीर्ष पद के लिए टक्कर होना लगभग तय है। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने राकांपा प्रमुख शरद पवार के साथ बैठक की। बैठक के समय वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, आस्कर फर्नांडीस और जनार्दन द्विवेदी भी मौजूद थे। यह बैठक उस रिपोर्ट के बाद हुई है जिसमें कहा गया है कि पार्टी हाईकमान ने संप्रग उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाने के लिए मुखर्जी को प्राधिकृत किया है। फर्नांडीस ने कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की यह केवल तैयारी है। उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा। कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर इस समय भारत के राजनीतिक गलियारों में सौ टके का एक सवाल है - 'कौन बनेगा राष्ट्रपति.' वीवी गिरी और संजीवा रेड्ड़ी के बीच 1969 की राष्ट्रपति पद की चुनावी होड़ के बाद शायद अब पहली बार ये चुनाव चर्चा का विषय बना है. राजनीतिक विश्लेषक महेश रंगराजन कहते हैं, "इस बार केंद्र की यूपीए सरकार के पास पचास फ़ीसदी से कम मत हैं. अगर किसी वजह से यूपीए, वामपंथियों और बसपा में समझौता नहीं हो पाता है तो यूपीए को चुनाव जीतने में मुश्किल हो सकती है. और मुझे लगता है कि हमारे पिछले दो राष्ट्रपतियों केआर नारायणन और और अब्दुल क़लाम ने लोगों के मन में पद की गरिमा को बहुत बढ़ाया है." हालत ये है कि अगर आप किसी बाज़ार या नुक्कड़ में आम जनता के बीच भी ये सवाल पूछें तो सभी राष्ट्रपति कैसा हो इस पर अपनी राय व्यक्त करते नज़र आते हैं. शायद जनता के राष्ट्रपति या पीपुल्स प्रेसीडेंट के नाम से पहचाने जाने वाले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल क़लाम, राष्ट्रपति के पद को छोटे-बड़े सभी के मानस पटल तक पहुँचाने में सफल हुए हैं. बहस मीडिया ने राष्ट्रपति पद को लेकर कई सर्वेक्षण करवा कर इस बहस को जीवित कर रखा है. चर्चा इस पर भी ज़ोरों पर है कि राष्ट्रपति एक राजनीतिक पृष्ठभूमि का हो या कोई बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता जो देश की शान बढ़ा सके? इस बार केंद्र की यूपीए सरकार के पास पचास फ़ीसदी से कम मत हैं. अगर किसी वजह से यूपीए, वामपंथियों और बसपा में समझौता नहीं हो पाता है तो यूपीए को चुनाव जीतने में मुश्किल हो सकती है. और मुझे लगता है कि हमारे पिछले दो राष्ट्रपतियों केआर नारायणन और और अब्दुल क़लाम ने लोगों के मन में पद की गरिमा को बहुत बढ़ाया है अंग्रेज़ी दैनिक 'पाइनियर' के संपादक चंदन मित्रा का मानना है कि राजनीतिक परिपक्वता वाला व्यक्ति ही गठबंधन राजनीति के इस दौर में सही रहेगा. चंदन मित्रा कहते हैं, "राजनीति और संविधान का कोई जानकार ही देश का राष्ट्रपति होना चाहिए. अगर देश के सामने कोई जटिल विषय आए तो वो इन मुद्दों को सुलझा सके." पत्रकार नीरजा चौधरी तो राष्ट्रपति के राजनीति से जुड़े होने या न होने की पूरी बहस को ही बेमानी मानती है. उनका कहना है, "ये एक नकली बहस है. उम्मीदवार राजनीतिक हो या न हो. इससे अधिक ज़रूरी ये देखना है कि उम्मीदवार कैसा है." ये एक नकली बहस है. उम्मीदवार राजनीतिक हो या न हो. इससे अधिक ज़रूरी ये देखना है कि उम्मीदवार कैसा है राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए जो ज़ैल सिंह की तरह अपने प्रधानमंत्री के कहने पर झाड़ू उठा कर सफाई करने को तैयार न हो. पर कुछ हद तक केआर नारायणन की तरह हो जो कांग्रेस से जुड़े रहे हों लेकिन पद पर रहने के दौरान वो अपने व्यवहार और कार्यशैली से किसी भी पार्टी से जुड़े नज़र नहीं आए. राष्ट्रपति का कद ऐसा हो कि जो रोज़मर्रा के झगड़ों के ऊपर रहे. राष्ट्रपति अब्दुल क़लाम कुछ हद तक एपीजे अब्दुल क़लाम को सफल राष्ट्रपति माना जा सकता है. पर महेश रंगराजन इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं कि हाल के उनके कुछ बयान दिखाते हैं कि क़लाम जैसे राष्ट्रपति की दिक्कतें क्या हैं. रंगराजन बताते हैं,"अभी दो हफ़्ते पहले राष्ट्रपति ने कह दिया कि देश में दो दलीय व्यवस्था हो. ये एक कठिन सवाल है. इस पर तय करने वाले मतदाता हैं और देश के राजनीतिक दल हैं. उन्होंने नदियों के जोड़े जाने पर भी परियोजना बनाने के वकालत की है. ये सब विवादास्पद मामले हैं. इस तरह मुद्दों पर वो न बोलें तो ही अच्छा है." नज़रें कुछ हद तक बहुजन सामज पार्टी नेता मायावती पर हैं कि वे किस उम्मीदवार पर अपनी मुहर लगाती हैं. उम्मीदवारों के नाम लगातार आ रहे हैं और बदल रहे हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वाम नेताओं से हुई बातचीत में प्रणव मुखर्ज़ी, सुशील कुमार शिंदे और कर्ण सिंह के नामों की चर्चा हुई थी. फिर जब सोनिया गांधी डीएमके नेता करुणानिधि से मिलीं तो करण सिंह का नाम सूची से बाहर हुआ और शिवराज पाटिल और अर्जुन सिंह का नाम जुड़ गया. आगे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे मोती लाल बोरा का नाम भी उछला. कांग्रेस में उम्मीदवार का अपनी नेता के प्रति आस्था होना उम्मीदवार बनने का सबसे बड़ा मापदंड हैं. जहाँ तक यूपीए सरकार का सवाल है तो उसके लिए कई मंत्रिमंडलीय समूहों की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी संभाल रहे प्रणव मुखर्ज़ी को सरकार से हटाना मुश्किल नज़र आ रहा है. मेरा मानना है कि मायावती किसी भी उम्मीदवार पर नहीं अटकेगीं. उनका ताज़ कॉरिडोर का मामला सुलझ गया है. अपने राज्य के लिए उन्होंने बड़ा आर्थिक पैकेज़ मांगा है. फिर भी वो किसी दलित नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने की बात उठा सकती हैं. मायावती नहीं चाहेंगी कि कोई अन्य नेता दलित राजनीति का केंद्र बनकर उभरे बीएसपी नेता मायावती की पसंद पर नीरजा चौधरी का कहना है,"मेरा मानना है कि वो किसी उम्मीदवार पर तो नहीं अटकेगीं. उनका ताज़ कॉरिडोर का मामला सुलझ गया है. अपने राज्य के लिए उन्होंने बड़ा आर्थिक पैकेज़ मांगा है. फिर भी वो किसी दलित नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने की बात उठा सकती हैं. मायावती नहीं चाहेंगी कि कोई अन्य नेता दलित राजनीति का केंद्र बनकर उभरे." शेखावत की उम्मीदवारी मौज़ूदा उपराष्ट्रपति भैरोसिंग शेखावत भी राष्ट्रपति के उम्मीदवार हैं. अगर वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ते हैं तो भी उनेक लिए जीत हासिल करना आसान नहीं नज़र आता. यूपीए और वाम दलों के पास 5.2 लाख मत हैं, एनडीए के पास 3.5 लाख और अन्य क्षेत्रीय दलों के पास 1.2 लाख मत हैं. अगर एनडीए और अन्य दल साथ भी हो जाते हैं तो भी वो यूपीए और बसपा के साथ होने की स्थिति में इस दौड़ में ख़ासे पीछे रह जाएंगे. कुल मिलाकर अब 10 जनपथ की पसंद और मायावती की उस पर मुहर ही तय करेगी कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा.
आंकड़ों का खेल ही है राष्ट्रपति का निर्वाचन : प्रणव मुख़र्जी
उन्हे संप्रग सरकार में 'मिस्टर डिपेंडेबल' यूं ही नहीं कहते। टेढ़े संवैधानिक मसले हों या पेचीदा राजनीतिक संकट, हर मामले में कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक उनकी सलाह लेते है। जीवन के 70 से अधिक बसंत देख चुके विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी को लोग सरकार की धुरी कहते हैं। विदेशी मंत्री होने के साथ वह दर्जनों समितियों के मुखिया भी हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रणव राष्ट्रपति पद के लिए गैर-राजनीतिक उम्मीदवार की बहस को पूरी तरह खारिज करते है। उनकी राय में यह पूरी तरह आंकड़ों का खेल है। यह टिप्पणी तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जबकि उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए संभावित उम्मीदवारों में गिना जा रहा है। पेश है विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर प्रणव मुखर्जी से दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता प्रणय उपाध्याय की बातचीत के अंश-
प्र: आपको इस सरकार में मिस्टर डिपेंडेबल कहा जाता है। क्या कभी लगता है कि आप पर काम का बोझ काफी ज्यादा है?
उ: यह सच है कि मैंने लगभग 50 मंत्रिसमूहों की अध्यक्षता की है, जो जरूरत पड़ने पर सरकार की तरफ से फैसले लेते हैं, लेकिन सारे 'ग्रुप आफ मिनिस्टर' एक साथ काम नहीं करते है। इस समय करीब 12 मंत्री समूह मेरे पास हैं। अपने पूरे कैरियर में मंत्री के रूप में मैंने एक-साथ कई जिम्मेदारियां निभाई है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं होगा कि मैं काम के बोझ से लदा हूं।
प्र: एक सामान्य धारणा है कि प्रणव मुखर्जी को अपनी क्षमता के मुकाबले कम मिला है।
उ: नहीं, मैं ऐसा नहीं कहूंगा। अपने पूरे कैरियर में मैंने वो भूमिकाएं निभाई है जो पार्टी ने मुझे सौंपी। पार्टी नेतृत्व हमेशा उदार रहा है, जिसने न केवल मुझे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं, बल्कि उन्हें निभाने में मदद भी की। हमारे यहां जिस तरह की प्रशासन व्यवस्था है उसमें सभी को योगदान देना पड़ता है। यह एक आदमी का शो नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी की व्यवस्था है।
प्र: केंद्र में गठबंधन सरकार बनाने का कांग्रेस का यह पहला प्रयोग अपने तीन साल पूरे करने जा रहा है। कौन सी गलतियां है जिन्हें कांग्रेस भविष्य की गठबंधन सरकारों में दोहराना नहीं चाहेगी?
उ: सब जानते है इससे पहले हमने कभी गठबंधन सरकार नहीं बनाई। कुछ गठबंधनों को बाहर से समर्थन जरूर दिया, जो अपने निहित अंतर्विरोधों के कारण ज्यादा समय चल नहीं पाए। 1996 के पहले तक कांग्रेस ने जिन गठबंधनों को समर्थन दिया वे कहीं न कहीं आम चुनावों में कांग्रेस की हार का भी कारण थे, लेकिन संप्रग सरकार चुनाव पूर्व और चुनाव के बाद हुए गठजोड़ का प्रतिफल है। अत: यदि हम इसे जारी रख सकें तो यह अधिक स्थायी हो सकता है।
प्र: क्या आपको लगता है वामदल गठबंधन धर्म का पालन कर रहे है?
उ: लंबे समय तक विपक्ष में रहने के कारण वाम विचारधारा में कांग्रेस के प्रति एक निहित विरोध का विकास हो चुका है। अत: कुछ अंतर्विरोध जरूर है, लेकिन इतने नहीं कि सरकार गिर जाए। यह कहना ठीक नहीं होगा कि वामदल गठबंधन का खेल खराब करने वाले घटक है। साझा न्यूनतम कार्यक्रम और समन्वय के सहारे हम वैचारिक मतभेद को यथासंभव दूर करने की कोशिश करते रहते है।
प्र: क्या भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर आगामी जी-8 शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली बुश-मनमोहन मुलाकात में अंतिम मुहर लग पाएगी या अभी लंबा इंतजार करना होगा?
उ: अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुदं्दे पर बातचीत चल रही है और कुछ प्रगति भी हुई। जी-8 सम्मेलन के दौरान जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बुश मिलेंगे तो इस बारे में बात होगी। हम कोशिश कर रहे है कि इस मामले को जल्द से जल्द अपने अंजाम तक पहुंचाया जा सके, लेकिन कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती।
प्र: परमाणु समझौते राज्यसभा में दिया प्रधानमंत्री का बयान भारतीय वार्ताकारों के लिए बंधन बन रहा है। क्या इससे बचना उचित होता?
उ: वह एक जरूरत थी। अंतराष्ट्रीय समझौता करना तकनीकी तौर पर कार्यपालिका का विशेषाधिकार हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में बड़े नीतिगत विषय पर हम संसद के प्रति जवाबदेह है। संसद में प्रधानमंत्री के सामने कुछ सवाल उठाए गए थे जिनका जवाब देना उनकी जिम्मेदारी थी। राष्ट्रहित की रक्षा हर दृष्टि से करने की जरूरत है। हमें अपने सार्वभौमिक हितों को भी बचाए रखना है इसलिए जो भी समझौता हो उसमें इन दोनों पहलुओं का ध्यान रखने की जरूरत है।
प्र: कूटनीति लेन-देन के आधार पर चलती है। अत: परमाणु परीक्षण के अधिकार, प्रयुक्त ईधन के पुन: इस्तेमाल और तकनीक लौटाने जैसे मुदं्दों पर भारत कहां तक लचीलापन दिखाने को तैयार है?
उ: यह सही है कि कूटनीति में लेन-देन होता है, लेकिन मोटे तौर पर इस बात को समझिए कि मूलभूत क्षेत्रों में कोई समझौता नहीं होता। अमेरिकी एक जुमले का प्रयोग हमेशा करते है 'सर्वोच्च राष्ट्रहित'। देश हित के आड़े कोई चीज आएगी तो अमेरिका समझौता नहीं करेगा। इसी तरह यदि कोई बात हमारे सार्वभौमिक अधिकार और राष्ट्रहित के विपरीत जाएगी तो हम समझौता नहीं करेगे।
प्र: पाकिस्तान के साथ बने आतंकवाद निरोधी तंत्र के संदर्भ में अब धारणा बन रही है कि यह ठीक से काम नहीं कर रहा है।
उ: हम कुछ आगे बढ़े है, लेकिन यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि रातों-रात हालात में बदलाव आ जाएगा। हमने जो कुछ पाया है उसे भी कमतर नहीं कहा जा सकता। पिछले साल नवंबर में बने आतंकवाद निरोधी साझा तंत्र को भी हमें अभी कुछ समय देने की जरूरत है।
प्र: इन दिनों एक बहस चल रही है कि भारत में राष्ट्रपति राजनीतिक होना चाहिए या गैर-राजनीतिक। इस बारे में आपका क्या कहना है?
उ: राष्ट्रपति चुनाव के मामले में मुझे जो कहना था मैं अपने बयान में कह चुका हूं। डा. कलाम देश के 11वें राष्ट्रपति है। एस. राधाकृष्णन तथा जाकिर हुसैन ख्यात शिक्षाविदं् थे वहीं के. आर. नारायणन सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ एक प्रख्यात बुद्धिजीवी तथा राजनेता भी थे। राष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है और इसका चुनाव इलेक्टोरल कालेज के जरिए होता है। दरअसल एकमात्र योग्यता यही है कि जिसे इलेक्टोरल कालेज का विश्वास हासिल है और उसे ही राष्ट्रपति बनना चाहिए। अत: यह सब बौद्धिक बहस है और मैं इसे कोई गंभीर विषय नहीं मानता।

Wednesday, 6 June 2007

अक्षरग्राम


मैं हिंदी पत्रकार हूँ । खबरों की दुनिया में तो रहता ही हूँ इसी लिए अब अपने विचारों को लेकर अक्षरग्राम के चिट्ठाकारों से भी जुडना चाहता हूँ। खबर उनकी भी लेनी है जिन्होंने अपने विचारों से अक्षरग्राम में धूम मचा रखी है। मैं काशी का रहने वाला हूँ। और अब कोलकाता में पत्रकारिता कर रहा हूँ। हिंदी पत्रकार हूँ इस लिए हिंदी जगत से जुडना मेरी हाबी है। आपलोगों का सानिध्य पाकर मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।
धन्यवाद
डा.मान्धाता सिंह
कोलकाता

Monday, 4 June 2007

हिंदी पत्रकारिता : फैलता साम्राज्य, गिरता स्तर

'खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो'। ये पंक्तियां आज भले ही बेमानी प्रतीत होती हों पर एक समय था जब यह पत्रकारिता की बाइबिल समझी जाती थीं। तब पत्रकारिता को एक प्रोफ़ेशन नहीं मिशन समझा जाता था और जिसके उद्वेग से उद्वेलित हो संपूर्ण देश व समाज एक दिशा में बहता चला जाता था। जैसे-जैसे तकनीकी विकास होते गए, नित्य नए आयाम बनते-बिगड़ते रहे और धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप परिवर्तित होता चला गया। आज हम सूचना क्रांति के दौर से गुज़र रहे हैं. एक ऐसे वैश्विक समाज में अपना अस्तित्व गढ़ने और तराशने का मिथक प्रयास कर रहे हैं जहां सूचना ही शक्ति है. बल्कि यूं कहें कि जो सूचना का जल्दी-से-जल्दी अधिकारी होता है वही सही मायने में शक्ति संपन्न है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. पीठिका प्रारंभ में पत्रकारिता के रूप में केवल और केवल लेखन माध्यम का वर्चस्व था, फिर श्रव्य माध्यम और दृश्य-श्रव्य माध्यमों का आगमन हुआ और उसके बाद तकनीकी विकास के सापेक्ष इंटरनेट पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित होती हुई सफलता के सोपान चढ़ती चली गई. पत्रकारिता का प्रकाशन के साथ शुरू हुआ सफ़र, प्रसारण के चरम पर पहुंचा. आज 'ब्रॉडकास्टिंग' की दुनिया 'वेबकास्टिंग' के दौर में पहुंच गई है. यह सारी उपलब्धियां नई तकनीकों के आविष्कार और उनके अनुप्रयोगों का परिणाम ही तो हैं. नई तकनीक के विकास और विस्तार ने पत्रकारिता के क्षेत्र में जहां एक ओर कई सहज व सुलभ साधन उपलब्ध कराए, जिनसे ख़बरों के द्रुतगामी एवं विश्वसनीय प्रकाशन-प्रसारण का मार्ग प्रशस्त हुआ, वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के समक्ष कई नई चुनौतियों को भी खड़ा कर दिया. तकनीकी क्षमता के सापेक्ष ख़बरों को सटीक रूप से समग्रता के साथ पाठकों-दर्शकों अथवा श्रोताओं के समक्ष रख पाना आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाचार पत्र हों या समाचार चैनल या कोई अन्य माध्यम, सभी अपने पाठकों तक एक नई और एक्सक्लूसिव ख़बर के साथ अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं और यही कारण है कि आज की पत्रकारिता सनसनीखेज पत्रकारिता का पर्याय बनकर रह गई है. समाचार माध्यम ऊल-जलूल ख़बरें परोस रहे हैं. एक ही ख़बर को बार-बार प्रसारित करना समाचार चैनलों की मजबूरी बन चुकी है. समाचार पत्रों की प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए और चैनलों की टीआरपी रेटिंग में बढ़ोत्तरी के लिए स्टिंग ऑपरेशन जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं. वर्तमान में पत्रकारिता की चुनौतियां उसकी स्वयं की समस्याएं बन चुकी हैं जिसका निदान यदि जल्द ही न किया गया तो पत्रकारिता एक ऐसी व्यूह रचना में उलझ कर रह जाएगी जिसे भेद पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव होगा. इससे पहले कि तकनीकी दक्षता के बल पर सफलता के मिथ्या अभिमान से ग्रसित पत्रकारिता, व्यावसायिक व्योम में कहीं खो जाए, आवश्यकता है एक ऐसे तारे की जो इस तिमिर में उसे उचित मार्ग का ज्ञान करा पाए. इन दिनों भारत में 1857 के गदर की 150वीं सालगिरह मनाई जा रही है. संयोग है इसी मौक़े पर एक किताब आई जो उसी क्रांति के इलाके में एक और क्राँति की आहट सुना रही है. इस इलाक़े को हिंदी में गंगा घाटी और अंग्रेज़ी में काउबेल्ट या हिंदी हार्टलैंड कहा जाता है. नक्शे पर हम इसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान मान सकते हैं. ‘हेडलाइंस फ्राम हिंदी हार्टलैंड’ नाम की इस किताब की लेखिका शैवंती नाइनन ने पाँच साल तक खोजबीन करके इस क्राँति के बीजों को चुना है. पिछले दिनों दिल्ली के हैबीटाट सेंटर में नेताओं और पत्रकारों ने इन किताब पर चर्चा की. जाने-माने चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने संचालक की भूमिका में क्राँति के कारणों और परिणामों को रेखांकित किया. उन्होंने किताब और अपने हवाले से बताया कि हिंदी भाषी राज्यों में पिछले 10 वर्षों में हिंदी अख़बारों का वर्चस्व कायम हो गया है. देश के पहले पाँच अख़बारों में हर साल 2-3 अख़बार हिंदी के होते हैं. इनमें दैनिक भास्कर, जागरण, अमर उजाला और पंजाब केसरी का नाम लिया जा सकता है. इन अख़बारों ने दिल्ली से निकलने वाले तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्रों को उन्हीं के किले में ध्वस्त कर दिया है. यह काम सीधे हमले से नहीं सेंध लगाकर किया गया है. यह सेंध मध्य युगीन इतिहास की तर्ज़ पर राजधानी को चारों तरफ से घेरकर कमजोर चौकियों को भेदकर किया गया है. 'प्रेस और नोट' बताया गया कि दैनिक भास्कर ने बिना दिल्ली में संस्करण निकाले हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के चुनींदा ज़िलों से कुल मिलाकर 37 संस्करणों के ज़रिए इस काम को सरअंजाम दिया है. अख़बार के समूह संपादक श्रवण गर्ग के मुताबिक इन संस्करणों की कुल दैनिक बिक्री 40 लाख प्रतियाँ और जिनके तीन करोड़ पाठक हैं. इससे मिलते जुलते दावे अन्य दैनिकों के भी हैं. अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है दिग्विजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री इसी मंच पर बैठे दो नेता सचिन पायलट और दिग्विजय सिंह इन आंकड़ों से प्रभावित नहीं थे. उनका कहना था कि एक ही ज़िले से निकलने वाले तीन समाचार पत्र एक ही ज़िले की तीन भिन्न तस्वीरें पेश करते हैं. इससे नेता और प्रशासन भ्रमित हो जाता है. दिग्विजय सिंह ने शिकायत की, "अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है." नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी जवाब में भास्कर के श्रवण गर्ग बोले, "नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी." दिग्विजय सिंह ने हाल के उत्तरप्रदेश चुनाव अभियान के अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि अब ख़बरें पत्रकारों की जेब गर्म करके छपती हैं. सचिन पायलट ने हामी भरी कि स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की छपास इतनी बढ़ गई है कि उसने अख़बार वालों की भूख बढ़ा दी है. संचालक योगेंद्र यादव भी उससे सहमत थे कि अब प्रेस नोट का अर्थ प्रेस और साथ में नोट हो गया है. हिंदी ऑनलुकर की भाषा सिंह ने दर्शकों के बीच से पूछा कि स्ट्रिंगर के नोट देखने वालों को अख़बार मालिकों के सौदों के नोट दिखाई नहीं देते? शैवंती नाइनन ने अपनी किताब में इन सब बातों को विस्तार से खोला है. उनका कहना है कि हिंदी अख़बारों ने राष्ट्रीय मिथक को तोड़कर समाचारों को बेहद स्थानीय बना दिया है. इसके चलते आंचलिकता बाईपास हो गई है. योगेंद्र यादव ने समापन करते हुए कहा कि यही तो क्राँति है जिसे सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 1995 में हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल कहा था. हालाँकि जनसत्ता के सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी इसे लुगदी पत्रकारिता कहते हैं. चिंता कुछ भी कहिए बुद्धिजीवियों की चिंता स्वाभाविक है. आज मीडिया की भाषा हिंदी हो गई है. अंग्रेज़ी के शीर्ष दैनिक अपने शीर्षक में हिंदी का छौंक लगाते हैं. विज्ञापनों की भाषा हिंदी है. अंग्रेज़ी टीवी चैनलों के मुकाबले हिंदी चैनलों के दर्शक कई गुना ज़्यादा है. जनसंपर्क एजेंसियों को अपनी विज्ञप्ति हिंदी में देनी पड़ रही है. हिंदी का अख़बार भास्कर हिंदी के चैनल ज़ी के साथ मिलकर मुंबई से अंग्रेज़ी दैनिक डीएनए निकाल कर टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स को चुनौती दे रहा है. बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ अपने उपभोक्ता उत्पादों को लेकर छह लाख 78 हज़ार गाँवों को अपना निशाना बना रही है. ऐसे में अख़बार को गाँव तक पहुँचने से कौन रोक सकता है. और वह अख़बार अंग्रेज़ी का अख़बार नहीं हो सकता. रही बात विश्वसनीयता और भ्रष्टाचार की. पत्रकार समाज का उतना ही हिस्सा है जितना कि डॉक्टर, वकील या इंजिनियर. वह उतना ही ईमानदार या भ्रष्ट है जितना कोई और वर्ग. उसे भी जीवन में वही सब चाहिए जो किसी और पेशेवर को. यदि देश का सबसे बड़ा अख़बार अपने को उत्पाद और अपने पाठक को उपभोक्ता घोषित करता है तो बेचारा पत्रकार भी तो उसी बाजार समीकरण का हिस्सा हुआ ना. पत्रकारिता की कालजयी परंपरा हिंदी की समाचार पत्रकारिता का शुभारंभ 19वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में माना जाता है जब आज के कोलकाता और तबके कलकत्ता नगर से ‘उदंत मार्तण्ड’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला गया था. इस पत्र के शीर्षक का ही अर्थ था-चढ़ता हुआ सूर्य! लेकिन इसके प्रकाशन से पत्रकारिता की परंपरा की विधिवत शुरूआत नहीं हो सकी. यह हिंदी भाषा के निर्माण और संक्रमण का काल था. वाक्य विन्यास में क्रिया पदों के इस्तेमाल का स्थान तो तब तक तय हो चुका था पर भाषा का स्वरूप सुनिश्चित नहीं हुआ था. उत्तर भारत में तब मूल रूप से चार बोलियाँ जिन्हें मातृभाषा कहना चाहिए, प्रचलित थीं. वे थीं, हरियाणी, राजस्थानी, कौरवी (खड़ी बोली का क्षेत्र) और ब्रज (और सेनी का क्षेत्र). भाषा का स्वरूप सुनिश्चित तो कभी नहीं हो पाता पर जन समागम और स्थानीय काम धंधों तथा क्षेत्रीय व्यापार के साथ ही उसके शब्दों का स्थिरीकरण होने लगता है. भरतेंदु युग हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की गौरवपूर्ण अध्याय है. इसकी पीठिका में ही हिंदी पत्रकारिता के प्राणतत्व को पहचाना जा सकता है. भाषा की इसी स्थिति के कारण लेखन और पत्रकारिता की विधाएँ प्रतीक्षारत रहती हैं. यही हिंदी पत्रकारिता के साथ भी हुआ. पर यह पत्रकारिता का शून्य काल नहीं है. सन् 1880 से लेकर, सदी के अंत तक लखनऊ, प्रयाग, मिर्जापुर, वृंदावन, मुंबई, कोलकाता जैसे दूरदराज क्षेत्रों से पत्र निकलते रहे. भारतेंदु युग 19वीं सदी के उत्तरकाल में इतिहास प्रसिद्ध भारतेंदु युग का समारंभ हुआ. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का शुभारंभ ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’ और ‘कवि वचन सुधा’ से किया. यह हमारी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की गौरवपूर्ण अध्याय है. इसकी पीठिका में ही हिंदी पत्रकारिता के प्राणतत्व को पहचाना जा सकता है. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में हुई क्रांति की दृष्टि से यदि देखा जाए तो वर्ष 1900 सबसे महत्वपूर्ण वर्ष है. 20वीं सदी का आगाज़ ही पत्रकारिता से होता है. यह हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम युग का उद्घाटन वर्ष है. सन्1900 में इंडियन प्रेस इलाहाबाद से ‘सरस्वती’ का और उसी वर्ष छत्तीसगढ़ प्रदेश के बिलासपुर-रायपुर से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन शुरू होता है. ‘सरस्वती’ के ख्यात संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के संपादक पंडित माधवराव सप्रे थे. कभी-कभी प्रवृति की विशिष्टता के कारण इस नए दौर को मात्र साहित्यिक पत्रकारिता पर केंद्रित मान लिया जाता है, पर सच्चाई यह है कि बहुमुखी सांस्कृतिक नवजागरण का यह समुन्नत काल है. इसमें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक लेखन की परंपरा का श्रीगणेश होता है. इस दौर में साहित्यिक लेखन और पत्रकारिता के सरोकारों को अलगाया नहीं जा सकता. अंग़्रेजों की दासता में बरबादी और अपमान झेलते भारत की दुर्दशा के कारणों की पहचान भारतेंदु काल से ही शुरू हो गई थी, इसे राजनीतिक और सांस्कृतिक सरोकारों से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गहराई से जोड़ दिया. भूमिगत पत्रकारिता सांस्कृतिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक सरोकार और दमन का प्रतिकार इन चार पहियों के रथ पर हिंदी पत्रकारिता अग्रसर हुईं. माधवराव सप्रे ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को ‘हिंद केसरी’ के रूप में छापना शुरू किया. अंग़्रेजों की दासता में बरबादी और अपमान झेलते भारत की दुर्दशा के कारणों की पहचान भारतेंदु काल से ही शुरू हो गई थी, इसे राजनीतिक और सांस्कृतिक सरोकारों से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गहराई से जोड़ दिया. यहां बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारियों के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी पत्रकारिता का रूप अख़बारों या पत्रिका का नहीं था. वे भूमिगत रहकर पर्चे, पैंफलेट और पत्रक निकालते थे. दिल्ली असेंबली में गिरफ्तार होने से पहले अमर शहीद भगत सिंह ने जो पर्चा फेंका था, वह किस अख़बार से कम था! भूमिगत पत्रकारिता की इस अनियतकालीन परंपरा को इतिहास में शामिल किया जाना ज़रूरी है. भूमिगत परंपरा के क्रम में भूमिपर पत्रकारिता के सबसे सशक्त उदाहरण के रूप में मध्यप्रदेश क्षेत्र से ‘कर्मवीर’ सामने आया. इसके यशस्वी संपादक थे स्वतंतत्रता सेनानी और हिंदी के राष्ट्र कवि माखनलाल चतुर्वेदी. भूमिपर जो पत्रकारिता शुरू हुई उसे दमन, तथाकथित क़ानून, मुचलकों, जब्ती, जमानतों का सामना करना पड़ा. गाँधी जी की राजनीतिक प्रणाली ने कुछ भी भूमिगत नहीं रहने दिया. पत्रकारिता ने इस साहस को अपने प्राणतत्व के रूप में मंजूर किया. इसका ज्वलंत उदाहरण बना गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’अख़बार. यह कानपुर से छपता था. इसी परंपरा में वाराणसी से बाबूराव विष्णु पराड़कर ने ‘दैनिक आज’ निकाला और आगरा से पालीवाल जी ने ‘सैनिक’. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रेमचंद, निराला, बनारसीदास चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शिवपूजन सहाय आदि की उपस्थिति ‘जागरण’, ‘हंस’, ‘माधुरी’, ‘अभ्युदय’, ‘मतवाला’, ‘विशाल भारत’ आदि के रूप में दर्ज है. और फिर है ‘चाँद’ की पत्रकारिता और उसका फाँसी अंक, जो सन् 1947 की आज़ादी के साथ संबद्ध है. 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होते ही पूरे भारत की सोच का पूरा परिदृश्य ही बदल गया, जो होना ही था. आज़ादी के समाप्त हुए संघर्ष ने नव-जागरण और नव-निर्माण की दिशा पकड़ी. ज़ाहिर है कि पत्रकारिता को ही यह चुनौती स्वीकार करनी थी. हिंदी पत्रकारिता ने इस दायित्व को बखूबी संभाला और स्वतंत्रता संग्राम के समय जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि तमाम सवाल उठे थे, उन्हें अपनी सभ्यता, परंपरा और आधुनिकता के परिप्रेक्ष में चिंतन का केंद्र बनाया. दैनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में तो क्रांति हुई. सदियों पहले मनु का वर्णवादी संविधान सामने आया था. स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने भारतीय सभ्यता के इतिहास में जो दूसरा संविधान बनाया और जो विधिवत रूप से सन् 1951 में पारित हुआ, वह हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला बना. विभिन्न प्रदेशों से निकले अख़बार छोटे और व्यक्तिगत प्रयासों से लेकर बड़े संस्थागत और संस्थान केंद्रित अख़बारों ने जन्म लिया. सबके नाम गिनाने की जगह तो यहाँ नहीं है पर भारतीय भाषाओं के साथ ही हिंदी में भारत, अमृत पत्रिका, आज, अभ्युदय, चेतना, जनसत्ता, भास्कर, जागरण, हिंदुस्तान, नवजीवन, नवभारत टाइम्स, लोकसत्ता, प्रहरी, जनचेतना आदि-आदि लगभग 50 महत्वपूर्ण दैनिक पत्र हिंदी के विभिन्न प्रदेशों से निकलने लगे. इनके अलावा साप्ताहिक और पाक्षिक टेबलॉइड समाचारपत्रों ने भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की. भारतीय गणतंत्र ने जो मूल्य और आदर्श अपने लिए अंगीकार किए थे, पत्रकारिता ने उन्हें ही उठाया और प्रस्थापित किया. हिंदी पत्रकारिता के एक सबसे उज्ज्वल पक्ष का आकलन अभी तक नहीं हुआ है. वह है भारत के 556 स्वतंत्र सामंती राज्यों और रियासतों के भारतीय गणतंत्र में विलीन होने का प्रकरण. इनमें से अधिकांश रियासतें उत्तर भारत में थीं. आज़ादी के तत्काल बाद उनके विलीनीकरण का जो जनसंघर्ष चला था. उस संघर्षशील हिंदी पत्रकारिता के अध्याय की अवधि चाहे कितनी ही कम क्यों न हो पर पत्रकारिता के इतिहास में जनाकांक्षी लोकतांत्रिक दायित्व को निभाने की ऐसी ज्वलंत मिसाल और किसी भाषा में कम ही मिलेगी. भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों, पद्धति और प्रणाली को पुख्ता करने में प्रजामंडलों की प्रारंभिक दौर की पत्रकारिता ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. सांस्कृतिक पत्रकारिता साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता का एक बिल्कुल नया युग आज़ादी के बाद ही शुरू हुआ. अब परतंत्रता के दौर की बाधाएं नहीं थीं और इस तरह की पत्रकारिता की पुष्ट परंपरा मौजूद थी ही पर वह विरलता अब समाप्त हुई थी. ‘दिनमान’ जैसी समाचार-संस्कृति की सप्ताहिकी ने तो नया इतिहास ही रच दिया. इसके यशस्वी संपादक हिंदी साहित्य के पुरोधा अज्ञेय जी थे और यह आकास्मिक नहीं था कि इसमें श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, मनोहरश्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नंदन आदि जैसे साहित्यकार शामिल थे. उधर जोशी बंधुओं के बाद डॉ धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’, मनोहर श्याम जोशी और हिमांशु जोशी ने बाँकेबिहारी भटनागर के बाद ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के ज़रिए पत्रकारिता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए थे. प्रेमचंद्र के पुत्र श्रीपतराय ने ‘कहानी’ और छोटे पुत्र अमृतराय ने ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशनन शुरू किया और दक्षिण भारत के हैदराबाद से बद्री विशाल पित्ती ने ‘कल्पना’ निकाली. कोलकाता से भारतीय ज्ञानपीठ के लक्ष्मीचंद्र जैन, शरद देवड़ा का ‘ज्ञानोदय’ आया. पटना के ‘पाटल’ और उदयराज सिंह-रामवृक्ष बेनीपुरी की ‘नई धारा’ निकली. मध्य प्रदेश जबलपुर से हरिशंकर परसाई ने ‘वसुधा’ का और राजस्थान अजमेर से प्रकाश जैन और मनमोहिनी ने ‘लहर’ का प्रकाशन शुरू किया. ‘नई कहानियाँ’ और ‘सारिका’, ‘सर्वोत्तम’, ‘नवयुग’, ‘हिंदी ब्लिट्ज’ और डॉ महावीर अधिकारी के ‘करंट साप्ताहिक’ जैसे पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित हुए. पूरा हिंदी प्रदेश पत्रकारिता की प्रयोगशीलता का पर्याय बन गया. पत्रकारिता की नई पीढ़ी इसी का नतीजा था कि हिंदी पत्रकारिता की एकदम नई पीढ़ी के सुरेंद्र प्रताप सिंह, सुदीप, उदयन शर्मा जैसे युवा पत्रकारों ने कोलकाता से ‘रविवार’जैसे प्रखर समाचार साप्ताहिक की शुरुआत की थी. और आगे चलकर इन्हीं युवाओं में से सुरेंद्र प्रताप सिंह ने चैनल पत्रकारिता ‘आज तक’ की कंप्यूटरीकृत नींव रखी थी. सरकारी संस्थानों की पत्रिकाओं ने विशेषतः अपने-अपने वैज्ञानिक विषयों को अपना लक्ष्य बनाया. चंदामामा जैसी प्रख्यात बाल पत्रिका का संपादन बालशौरि रेड्डी ने चेन्नई से शुरू किया और सिनेमा पर केंद्रित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ आ गई. लघु पत्रिकाओं का तो आंदोलन ही चल पडा. इनके बिना वैचारिक और परिवर्तनकामी पत्रकारिता की कल्पना ही नहीं की जा सकती. ज्ञान रंजन की ‘पहल’ पत्रिका इसमें अग्रणी है और सार्थक वैचारिक जनवादी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘तदभव’, ‘उदभावना’, ‘अभिनव कदम’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘शेष’ जैसी 300 पत्रिकाएं मौजूद हैं और फिर कंप्यूटरीकृत तकनीकों से लैस ‘इंडिया टुडे’ और ‘आउटलुक’ जैसे समाचार साप्ताहिक तो हैं ही. और फिर राजेंद्र यादव के ‘हंस’ के अलावा ‘कथादेश’, वागार्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’ आदि ने वैचारिक लोकतंत्र के उन्नायक और संरक्षण की शर्ते पूरी की हैं. समाचारों का फ़ुटपाथीकरण भारत में पिछले एक वर्ष में समाचार चैनलों ने समाचार का रंग ही बदल दिया है जब हिंदी में पत्रिकाएँ खत्म हो रही थीं, तब अचानक ऐसी पत्रिकाओं की बाढ़ आई जिनकी शुरूआत 'मनोहर कहानियाँ' ने की थी.'मनोहर कहानियाँ', 'सच्ची कहानियाँ' जैसी पत्रिकाओ से फुटपाथ अटे पड़े रहते थे, अभी भी शायद यह थोड़ा बहुत चल रहा है. लेकिन ऐसा लग रहा है कि उन्हें निकालने वाले बेरोज़गार नहीं हुए, वे सारे टीवी समाचार चैनलों में चले गए, या यह कहें कि वह जज़्बा ख़त्म नहीं हुआ, वह फ़ुटपाथ से उठकर तमाम अपने भोंडे रंगो, बदबू आदि के साथ टीवी समाचार चैनलों में चला गया. अब अगर हम कोई भी टीवी समाचार चैनल खोले तो ऐसा लगता है जैसे 'मनोहर कहानियाँ' और 'सच्ची कहानियाँ' खोल कर बैठे हैं. अपराध और सेक्स की सनसनीखेज़ दस्तावेज सारे समाचार चैनल 'एफ़आईआर', 'क्राइम फाइल',' क्राइम रिपोर्टर' और न जाने क्या-क्या नामों के कार्यक्रम पेश करते हैं. ये सभी अपनी भाषा और प्रस्तुति में फ़ुटपाथी साहित्य को मात करते हैं, बल्कि सुना जा रहा है कि इस सफलता से खुश होकर एक दृश्य मीडिया समूह अपराध समाचारों का एक पूरा अलग चैनल ही शुरू करने जा रही है. प्रिंट मीडिया एक बुढ़ाते बड़े भाई की तरह पीछे-पीछे घिसट रहा है. मीडिया और अपराध अगर अपराध न हों तो मीडिया वाले ऐसा शून्य महसूस करेंगे जैसा पहली प्रेमिका के जाने के बाद होता है हम लोग राजनीति, फ़िल्म, व्यापार आदि से अपराध के संबंधों पर बड़ी चर्चा करते रहते हैं लेकिन मीडिया और अपराध के हम-संबंध पर चर्चा नहीं होती. अगर अपराध न हों तो मीडिया वाले ऐसा शून्य महसूस करेंगे जैसा पहली प्रेमिका के जाने के बाद होता है और अगर सेक्स परोसने पर पाबंदी लग जाए तो कई चैनलों और पत्र पत्रिकाओं को उस तरह कोरे पन्ने छोड़ने पड़ेंगे जैसे आपातकाल में सेंसरशिप के ख़िलाफ़ कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने किया था. अपराध और सैक्स परोसने के कई फायदे हैं. एक तो ख़ुद को भी मजा आता है सनसनी और गुदगुदाहट से. हमारे मार्केटिंग वाले भी खुश रहते हैं क्योंकि आपराधिक मार्केंटिंग वालों का विश्वास है कि जितना घटिया माल, उतना बेचना आसान. मार्केटिंग वालों की खुशी में पत्रकारों की खुशी हैं क्योंकि आजकल वे ही माई बाप है. आसानी सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अपराध और सेक्स परोसने में अक़्ल का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना पड़ता है और सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अपराध और सेक्स परोसने में अक़्ल का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना पड़ता है, जिसकी बेहद कमी मीडिया में खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है. सुना है कि कई चैनल 30-40 आई क्यू से ज़्यादा वाले लोगों को नौकरी नहीं देते. अपराध और सेक्स बेचने पर जब कोई आ जाए तो इसका मतलब है कि उसका दिमाग़ दिवालिया हो का है, उसके पास सोचने को कुछ नहीं बचा है, इसीलिए वह सबसे आसान विकल्प पर आ चुका है. फिर सेक्स और अपराध बेचकर नैतिक दिखा जा सकता है, क्योंकि बेचने का एंगल तो वहीं होता है -छी-छी देखिए कितना गंदा है. फ़िलहाल मामला फुटपाथ के स्तर पर चल रहा है. और ज़ीने पर जाएगा तब क्या होगा पता नहीं, लेकिन वहाँ भी कुछ तो भाई लोग तलाश ही लेंगे. क्या टीवी से सुकून आया? समाचार और मनोरंजन का यह माध्यम अब स्थाई रूप से हमारी ज़िंदगी में आ चुका है. टीवी पर आई बड़ी से बड़ी ख़बर भी वैसी सूचना नहीं दे पाती, जो अख़बारों के ज़रिए मिलती है अब इसे अपने जीवन से निकालना और हटाना तो दूर की बात, इसे कुछ घंटों तक 'ऑफ़' रखना भी असंभव होता जा रहा है. टीवी पर चलती-फिरती तस्वीरों का नशा ऐसा चढ़ता है कि इसके 'ऑफ़' होते ही कुछ छूट जाने का ख़तरा होता है. दुनिया भर की अच्छी-बुरी ख़बरें बस एक बटन दबाते ही हमारी आँखों के सामने नाचने लगती हैं. लेकिन क्या इससे हमारी ज़िंदगी में सुकून आया है? मेरा जवाब होगा – नहीं आया है. टीवी देखते हुए हम उत्तेजित और प्रभावित होते हैं. इस उत्तेजना और प्रभाव की अप्रत्यक्ष मानसिक प्रतिक्रिया को हम समझ नहीं पाते. धीरे-धीरे हम टीवी से चिपक जाते हैं. मनोरंजन, समाचार और ज्ञान देने में टीवी की भूमिका फ़िल्म, अख़बार और पुस्तकों से कम है. सतही समाचार यह एक ऐसा माध्यम है, जिसे पलटकर या दोबारा नहीं देखा जा सकता. इसमें आँखों के सामने से जो एक बार निकल गया, वह कुछ बिंबों में थोड़ी देर के लिए दिमाग़ में टिकता हैं. जैसे ही दूसेर दृश्य आँखों के सामने से गुज़रते हैं, वैसे ही पुराने बिंब धूमिल हो जाते हैं. यही कारण है कि टीवी पर आई बड़ी से बड़ी ख़बर भी वैसी सूचना नहीं दे पाती, जो अख़बारों के ज़रिए मिलती है. मुझे लगता है कि टीवी पर तात्कालिकता अधिक महत्वपूर्ण होती है. सबसे पहले और तुरंत आने की होड़ में ख़बरों की सतह पर ही टीवी के कैमरे पैन होते हैं और टीवी रिपोर्टर समाचार की सतह ही दिखाते और बताते रहते हैं. न तो ख़बरों की गहराई में वे हमें ले जाते हैं और न उसके आगे-पीछे के कारण और प्रभाव के बारे में बताते हैं. छोटी ख़बरों तक में 'लाइव' या आँखों देखा हाल की सनसनी तो रहती है, पर अगले दिन तक उसका असर ग़ायब हो जाता है. कहते हैं कि भरोसे पर ही दुनिया टिकी है और समाचार माध्यम भी. दरअसल पाठकगण, श्रोतागण, दर्शकगण किसी सूचना या समाचार के लिए समाचार माध्यम की ओर लपकते हैं. लाजिमी है कि वे भरोसे का समाचार या सूचना चाहते हैं. ज़्यादा दिन नहीं हुए जब भारत के राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन की मौत की ख़बर को टीवी चैनलों ने उनके देहावसान के पूर्व ही प्रसारित कर दिया. ऐसी घटनाओं से इन समाचार माध्यमों के प्रति लोगों का भरोसा डिगता है. आज की दुनिया ग्लोबल हो चुकी है. किसी भी सूचना या समाचार को ज़्यादा देर तक लोगों के सामने आने से रोका नहीं जा सकता और ग़लत समाचार तो प्रसारित किया ही नहीं जा सकता. अगर करते हैं तो उसकी पोल-पट्टी तुरंत खुल जाएगी. इराक युद्ध के समय यह कहा गया था कि वहां ऐसा हो रहा है, वैसा हो रहा है पर बाद में ये समाचार आए कि वो सच नहीं था. इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मीडिया लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकता. ग़लतियां स्टोरी प्लांट करना भी ख़तरे से खाली नहीं होता. आपको याद होगा कि अरसे पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में सैकड़ों लोगों(एक समुदाय विशेष के) के मारे जाने की ख़बर कुछेक अख़बारों ने प्रमुखता से लगा दी थी पर ख़बर सही नहीं थी. इस ख़बर ने कुछ ऐसा असर किया कि अलीगढ़ से रांची तक दसियों जगह दंगे भड़क उठे. दरअसल, मीडिया से दर्शकों-पाठकों-श्रोताओं की पहली अपेक्षा सूचना पाने की होती है, सनसनी पाने की नहीं. सिनेमा आदि के कुछेक हवा-हवाई गॉसिप को वह भले पचा लें पर गंभीरता और विश्वसनीयता के दायरे से बाहर जाने वाली सूचनाओं को वह समझ लेता है. ऐसे में मीडिया की विश्वसनीयता गिरती है. गुजरात दंगों के समय भी कुछेक अख़बारों की भूमिका ने पाठकों और लाखों लोगों के भरोसे और विश्वास का कत्ल किया था. भरोसा सवाल सिर्फ़ एक या दो अख़बारों या चैनलों द्वारा ऐसा किये जाने का नहीं है, सवाल है समूचे मीडिया की विश्वसनीयता का. आज लोगों को आप बेवकूफ़ न तो समझ सकते हैं और न ही बना सकते हैं. टीआरपी या व्यवसायिकता चाहे जो नाच नचावे पर अपनी विश्वसनीयता का ख़्याल रखना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने भरोसा नहीं दिया या दिखाया है. हालिया चर्चित जेसिका लाल का प्रसंग लें. मीडिया ने जिस तरह की एक्टिविज़्म इस मामले में दिखाई और जनता ने भी जितनी सक्रियता दिखाई, उससे लगता है कि भरोसे नाम की कोई चीज़ भी होती है और मीडिया इसे स्थापित करने में लगा हुआ है.

Sunday, 3 June 2007

धर्मांतरण

छठीं शताब्दी में जब हिन्दू धर्मं का घोर पतन हो चुका था तब बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने जो सामाजिक और धार्मिक क्रान्ति का दौर शुरू किया था उसमें हिन्दू धर्मावलंबियों ने बड़ी तेजी से अपनी आस्था बदल ली थी। फलतः सनातन हिन्दू धर्म के आडम्बर और कर्मकांड से ऊबे लोगों ने अपेक्षाकृत प्रगतिशील बौद्ध धर्म को अपनाया। शंकराचार्य के प्रादुर्भाव तक हालत यह हो गयी थी कि अपने आडम्बर में डूबे हिन्दू धर्माचार्य किकर्तव्य विमूढ़ होकर सनातन हिन्दू समाज कि दुर्गति देखते रहे। आख़िर ऐसा क्यों हुआ ? क्यों हिन्दू समाज अपनी आस्था बदलने को मजबूर हुआ ? इन दोनों सवालों और वर्त्तमान भारत में दलितों के धर्मान्तरण पर उठे सवालों का शायद एक ही जवाब है।छठीं शताब्दी में हिदू समाज घोर कर्मकांड ,जातिवाद और उंच-नींच का भेदभाव ,धार्मिक अनुष्ठानों में अकारण बलि जैसे कर्मकांड से ऊब चुका था। ऐसे में बौद्ध धर्म के तर्कों ने उन्हें काफी प्रभावित किया। सदाचार अपनाकर और जति भेदभाव व कर्मकांड से दूर रहकर एक ऐसे मार्ग पर चलने का बौद्ध धर्म के प्रणेता गौतमबुद्ध ने उपदेश दिया। ही नहीं गौतमबुद्ध ने किसी पूजा व कर्मकांड को अपने धर्म में कोई जगह नही दीं । मगर आज का बौद्ध धर्म वैसा नहीं है। यह भी कर्मकांड से युक्त है। पतन इसका भी हुआ है।अब भी यह जति-पात से दूर सवर्ण अधिकारो से वंचित दलितों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। tab to jagatguru shankaracharya ne hindu samaj ko ubara tha. hindu samaj ka dharmantaran roka tha. us samaya bhi jagrook lagon ne bauddh dharm apnaya tha. itana hee nahee bauddh dharm ko rajkiya sanrakshan mila tha to aaj dharmantaran ko rajnaitik sanrakshan mila huaa hai. aaiye aaj ke dharmantaran ke karno ke awalokan karate hain. vartamaan aadhunik bharat mein bhee धर्मांतरण सबसे ज़्यादा वो जातियाँ कर रही हैं, जो जागरूक हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से कुछ तरक्की कर गईं हैं. मेरा मानना है कि दलितों का बौद्ध के रूप में धर्मांतरण उन्हें बरगलाकर या जबरन नहीं होता है. अधिकांश दलित सामाजिक और राजनीतिक वजहों से बौद्ध धर्म अपनाते हैं.
धर्मांतरण की ये प्रक्रिया राजनीतिक है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसकी अहम वजहें सामाजिक ही होती हैं. वर्ण या जाति व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रही. अन्य जातियों में भी वर्ण व्यवस्था में बदलाव का असर साफ़ देखा जा सकता है. दलितों की बात आती है तो कई स्थानों पर अस्पृश्यता का असर अब भी देखा जा सकता है. मुझे लगता है कि यही वजह है कि समाज में बेहतर स्थिति के लिए दलित धर्मांतरण का रुख़ करते हैं.
हालाँकि प्रत्येक राज्य में दलितों की स्थिति अलग-अलग है. मसलन दक्षिण भारत की स्थिति उत्तर से एकदम भिन्न है. दक्षिण के दलित जहाँ भूमिहीन रहे हैं, वहीं उत्तर भारत में दलितों के पास थोड़ी बहुत ज़मीन रही है.
भारत में कई राज्यों में दलितों की सामूहिक हत्या की घटनाएँ भी होती रहती हैं
यह बात सही है कि दलितों की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन कुछेक राज्यों मसलन बिहार और गुजरात में अब भी कई गाँव ऐसे हैं जहाँ आज भी दलितों का बहिष्कार होता है.
ये कहा जा सकता है कि जब तक गैरदलित, दलितों पर अत्याचार करते रहेंगे, तब तक धर्मांतरण जैसी चहल-पहल भी होती रहेगी.
जहाँ तक मुझे सूचना है महाराष्ट्र में महार और माला जाति अधिक धर्मांतरण कर रही है यानी जो दलित जातियाँ समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ी हैं, धर्मांतरण का प्रतिशत उनमें अधिक है.
हालाँकि उत्तर प्रदेश में जाटव इसका अपवाद हैं. ये आर्थिक रूप से मजबूत और जागरूक होने के बावजूद धर्मांतरण नहीं कर रहे हैं.
होता ये है कि जब दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देने, बाजा नहीं बजाने देने जैसी घटनाएँ होती हैं तो दलितों में ये संदेश जाता है कि जब तक वे हिंदु व्यवस्था में बने रहेंगे, तब तक अस्पृश्यता से उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी.
जहाँ तक आदिवासियों के धर्मांतरण का सवाल है तो यह दलित धर्मांतरण से एकदम अलग है.
आदिवासी
आदिवासियों की अपनी अलग व्यवस्था और पहचान होती है. आदिवासियों का धर्मांतरण ईसाई धर्म में अधिक हो रहा है.
इसकी वजह ये भी है कि ऐसा प्रचार किया जाता है कि ईसाई बनने से उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएँ मिलेंगी.
हालाँकि धर्मांतरण की यह प्रक्रिया दोतरफा है. यानी कुछ आदिवासी ईसाई धर्म अपना रहा हैं तो कुछ लोग शुद्धिकरण के नाम पर ईसाई बने आदिवासियों को वापस हिंदु धर्म में ला रहे हैं.
छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, गुजरात में आदिवासियों के धर्मांतरण से सामाजिक टकराव भी बढ़ रहा है और कभी-कभी तो यह हिंसक रूप भी ले लेता है.
आदिवासियों की धर्मांतरण प्रक्रिया दलितों से भिन्न है.
जहाँ दलित सामूहिक तौर पर धर्मांतरण कर रहे हैं, वहीं आदिवासियों में ऐसा नहीं है।



मुंबई में huye धर्मांतरण कार्यक्रम में कई हज़ार दलितों और आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इसमें लगभग 35 हज़ार लोग शामिल हुए.
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने 50 वर्ष पहले बौद्ध धर्म अपनाया था और इसी के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम में सबसे ज़्यादा लोग महाराष्ट्र के थे और इनमें वंजारा समुदाय के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी.
इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है
आयोजकों ने पाँच लाख लोगों के पहुँचने का दावा किया था लेकिन भीड़ सिर्फ़ 30 से 35 हज़ार लोगों की थी जिनमें से कुछ हज़ार लोगों ने धर्मांतरण कराया.
हालाँकि मुख्य आयोजकों में से एक राहुल बोधी का दावा है कि एक लाख लोग धर्मांतरित हुए हैं.
इस कार्यक्रम में बौद्ध आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भी आने वाले थे लेकिन अस्वस्थ होने के कारण नहीं पहुँच सके.
राजनीति और समाज पर गहरी नज़र रखने वाले योगेंद्र यादव कहते हैं कि यह रस्मी घटना बन गई है. उनका कहना है, "इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है."
वे कहते हैं, "यह बाबा साहेब अंबेडकर की शुरू की हुई परंपरा है जिसे हिंदू वर्ण व्यवस्था के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए दलित प्रतीकात्मक तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन बहुजन समाज पार्टी जैसे दलित नेतृत्व ने अब इसे तिलांजलि दे दी है क्योंकि उन्हें इसका बहुत लाभ नहीं दिखता."
दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं
जस्टिस पार्टी के प्रमुख उदित राज धर्मांतरण को जायज ठहराते हुए कहते हैं, "दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं."
कुछ दक्षिणपंथी हिंदू संगठन इस तरह के धर्मांतरणों का विरोध करते रहे हैं.
धर्मांतरण करने वालों को उम्मीद है कि इसके ज़रिए वे उस जातिप्रथा से बाहर निकल सकेंगे जिसमें उन्हें सबसे निचले तबके का माना जाता है.
हालांकि सरकार ने दलितों और आदिवासियों को आरक्षण देने की व्यवस्था की है लेकिन इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है.
वैसे भारत में धर्मांतरण एक विवादित विषय रहा है. विशेषकर अगर वह हिंदू से इस्लाम या ईसाइयत में धर्मांतरण हो.
हालांकि हिंदुओं के बौद्ध हो जाने का अब तक ख़ास विरोध नहीं हुआ है क्योंकि बौद्ध धर्म को एक तरह से हिंदू धर्म का ही विस्तार माना जाता है.

aaj fir hindu amaj ko ek aur shankaraacharya kee jaroorat hai. halaki aaj bhee shankaracharya hain magar ve aksham hokar rajneeti mein ulajh gaye hain. bahratvasee ko dharmantaran se ubarane vaale he aadi shankaracharya kahaan ho. ab to aa jaao aur dharmantaran se dukhee bharat ko is rajneetik sankat se ubaaro.

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