Saturday, 21 November 2009

अन्नदाता का संकट कब समझेगी सरकार ?



   किसानों की परेशानियों-दुखों के प्रति कभी सचेत नहीं रही है सरकार। लगभग हर अनाज को किसानों को औने-पौने भाव में बेचना मजबूरी है। अपना अनाज तो उसे सस्ता बेचना पड़ता है मगर बाजार में वहीं अनाज का भाव आसमान छूने लगता है। यह लाभ किसान ले सके, इसकी कभी किसी सरकार को चिंता नहीं रहती। अनाज व्यापारी तो मालामाल हो जाता है और किसान के किस्मत में बस रोना ही रह जाता है। वैसे तो तमाम मंडियों व विपणन के आंकड़े सरकार के पास हैं मगर ये सिर्फ दिखावे के हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़ीशा समेत तमाम राज्यों के किसान आत्महत्या क्यों करने पर मजबूर हो रहे हैं? गन्ना पैदा करने वाले किसान को मंहगी चीनी खरीदनी पड़ती है और गेहूं पैदा करने वाले किसान को मंहगा आंटा खरीदना पड़ता है। आखिर कृषि विपणन व अनाजों के समर्थन मूल्य की ऐसी कोई व्यस्था लाने के प्रति सरकारें क्यों नहीं ईमानदार दिखातीं, जिसमें किसानों को भी उसकी उपज का पर्याप्त लाभ मिले। यह अन्याय आखिर कबतक किसान झेलेगा कि सभी की भलाई की खातिर किसानों को बेमौत मरने को छोड़ दें। किसान के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी, अनाज का सरकारी दाम तो सरकारें तय करने में इतनी रुचि दिखाती हैं मगर बाजार की आसमान छूती कीमतों के लिए जिम्मेदार व्पापारियों को अपने सामान न्यूनतम मूल्य पर बेचने पर कभी मजबूर नहीं कर पाती। नियत्रण का आखिर यह कौन सा तरीका है जिसमें अंततः किसान को ही पिसना पड़ता है। अन्नदाता किसान आखिर क्यों बेहाली का जीवन जीने को मजबूर रहे ? यह कड़वा सच सभी को मालूम है कि कृषि प्रधान देश कृषि में सबसे पिछड़ा हुआ है। मुफलिसी की त्रासद जिंदगी से परेशान किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। गन्ना किसानों को आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ा। देश में तमाम वेतन आयोग गठित करके नौकरीपेशा लोगों को तो बेहतर जिंदगी प्रदान करने को अगर आवश्यक माना गया है तो किसानों की बेहतरी के ऐसे उपाय व मानक क्यों नहीं तय कर पाती हैं सरकारें? अन्नदाता के साथ यह बेईमानी कब करती रहेंगी सरकारें ?



अब जैसे ही गन्ना किसान सड़क पर उतरे सभी राजनैतिक दलों के कान खड़े हो गए। राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए इनके हमदर्द बन गए। आखिर इन सभी दलों के बाकायदा संगठन काम करते हैं मगर कभी भी इनके एजंडे में किसानों का सुखदुख नहीं रहा। चुनावी लाभ की खातिर तो ये कुछ भी करते हैं मगर हकीकत में किसानों के हित में कोई आंदोलन नहीं खड़ा किया। तेलंगाना आंदोलन से लेकर शेतकारी संगठन तक सभी वोटबैंक की राजनीति की भेंट चढ़ गए। संभव है कि गन्ना किसानों का आंदोलन भी थोड़ी सुविधाएं देकर दरकिनार करदिया जाए। जबकि होना यह चाहिए कि किसानों की हर परेशानियों को समझनेऔर उसके हल की कोशिश की जानी चाहिए।


   एक सवाल यह भी है कि आखिर सिर्फ गन्ना के लिए ही आंदोलन क्यों ? क्या किसानों की खेती की जमीन का अधिग्रहण, किसानों के लिए अनिवार्य बिजली, बाकी अनाजों या कृषि उत्पादों के सरकारी समर्थन मूल्य का संकट समस्या नहीं है? इसकी एक वजह बड़े किसान हो सकते हैं जिनके ये समर्थन मूल्य ज्यादा प्रभावित करते हैं। हालांकि मध्यम या लघु किसान भी इससे प्रभावित होता है मगर ये गन्ना की पेराई करके गुड़ वगैरह बनाकर खुद को बचा पाते हैं मगर बड़े किसान ऐसा चाहकर भी नहीं कर सकते हैं। उन्हे हर हाल में खेत में खड़ा गन्ना चीनी मिलों पर भेजना ही होगा। अगर उसके सही दाम नहीं मिले तो इनके आय में भारी कमी आ जाएगी। राजनैतिक दलों पर दबदबा भी इन्हीं किसानों का है। इसी लिए बड़े किसानों के इस आंदोलन ने संसद में तूफान खड़ा कर दिया। लगातार दूसरे दिन संसद में हंगामा हुआ। सरकार झुक गई और अब गन्ने का समर्थन मूल्य बदलने के लिए नया अध्यादेश लाएगी सरकार। हालांकि इसका फायदा छोटे गन्ना किसानों को भी मिल पाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे ही किसानें की समस्याए खत्म हो गईं। शायद नहीं। यह अलबत्ता है कि सरकार के सिर से फिलहाल यह बला टल गई। तब आखिर कैसे बदलेगी भारत के किसानों की तकदीर? कैसे मिलेगा किसानों की उपज का वाजिब दाम ? क्या हर फसल की कटाई के वक्त किसानों को दिल्ली में धरना देना होगा ? बाजार और समर्थन मूल्य में तालमेल की जबतक ठोस नीति सरकार अख्तियार नहीं करेगी तब तक किसान बदहाल ही रहेगा।

मैं भी किसान हूं
मैं भी किसान हूं और हमारे खेतों में भी सबसे ज्यादा गन्ने की फसल लहलहाती थी। मगर अब सिर्फ जरूरत भर को गन्ना बोया जाता है। मिल पर गन्ना भेजने से मेरे इलाके के जादातर किसानों ने तौबा कर ली है। मैं उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले का रहने वाला हूं। सैदपुर के पास सिहोरी में अत्याधुनिक गन्नामिल खोली गई। कुछ साल चलने के बाद बंद भी हो गई। जानना चाहते हैं क्यों ? जब मिल खुली तो बड़ा उत्साह था जंगीपुर से लेकर बहरियाबाद तक के किसानों में। यह उत्साह दो-एक साल में ही ठंडा पड़ गया। हुआ यह कि गन्ना किसानों को भुगतान मिल ने समय पर नहीं दिया। बकाया लेने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ कि सभी को गन्ने की जगह दूसरी फसल बोना ज्यादा फायदेमंद दिखा। देखते-देखते इलाके के प्रायः सभी मझोले व छोटे किसान हताश हो गए। मिल पर स्थानीय गन्ना आना कम होगया। इसके बादजूद गन्ना किसानों को प्रोत्साहित करने की कोई कोशिश नही की गई। उल्टे बाहर से गन्नामंगाना शुरू किया गया जिसने अंततः मिल को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया। हमारे इलाके की नंदगंज सिहोरी सुगर मिल उत्तर प्रदेश की सुगर मिलों की सूची में तो है मगर अब यह रायबरेली के दरियापुर में है। मालूम हो कि देशभर में सबसे ज्यादा चीनी मिलें उत्तरप्रदेश में ही हैं। मगर बदहाल भी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के ही गन्ना किसान हैं।

     इस इलाके में आलू की खेती का भी यही हाल हुआ। हताशगन्ना किसान आलू की बड़ पैमाने पर खेती करने लगे। कोल्ड स्टोरेज में रखना और अच्छे मूल्य पाकर बेचना फायदेमंद साबित हुआ मगर किसानों की यह कोशिश भी सरकार की अव्यवस्था की भेट चढ़ गई। आलू के अधिक उत्पादन और विपणन की सरकारी संरक्षण में उचित व्यवस्था के अभाव में आलू इतने गिरे भाव में बिके कि किसानों की लागत भी निकलनी मुश्किल हो गई। उपर से बिजली की कमी से आलू भारी तादाद में सड़ गए। इतना घाटा होने लगा कि इस इलाके के किसान आलू की खेती से पीछे हटे और हताश हो गए। किसानों के इन हालात की जानकारी सरकार और सरकार चलाने वाले दलों को भी थी मगर इसकी फिक्र किसी को नही हुई। अगर एकजुट होकर यही किसान आंदोलन करते , दलों के वोंट बैंक पर इससे आंच आती तो संभव था कि सिहोरी सुगर मिल भी बंद नहीं होती और आलू किसान भी तबाह नहीं होते। मगर किसानों ने चुपचाप सबकुछ सह लिया और हर चुनाव में वोट देने भी जाते हैं। ये छोटे और मझोले किसानों की प्रवृत्ति होती है कि जल्दी वे आंदोलन की राह नहीं पकड़ते। इसी लिए सियासत की रोटियां सेंकने वाले दलों को इनसे भय नहीं लगता है।वे बड़े किसानों पर आश्रित हैं कि आंदोलन वे ही करेंगे और लाभ तो उनको भी मिल ही जाएगा। यह भ्रम आखिर कब टूटेगा ? क्या सिहोरी खुलवाने कोई बड़ा किसान आया ? यह जरूरी है कि छोटे किसान भी जागें और सरकार की तंद्रा तोड़ें। अपने हक के लिए आवाज उठाएं ताकि संसद में उनकी भी गूंज उठे। अब देश के किसानों के खुद ही अपनी क्रांति की मशाल उठानी होगी। तभी बदलेगी भारत की तकदीर ।

( इस लेख के आखिर में मौजूदा गन्ना किसान आंदोलन परपिछले दिनों छपे कुछ समाचार और सरकार की लागत मूल्य की पूर्व कहानी भी दे रखी है। आप चाहें तो अवलोकन कर लें।)

भण्‍डारण, विपणन एवं मूल्‍य निर्धारण
कृषि जिन्‍सों का भण्‍डारण, मूल्‍य निर्धारण एवं विपणन उत्‍पादन की प्रक्रिया की तरह उच्‍च लाभों के लिए महत्‍वपूर्ण है। यही वजह है कि सरकार ने 1951 से विभिन्‍न पंच वर्षीय योजनाओं के माध्‍यम से भौतिक व्‍यापार खेतों पर तथा खेतों से बाहर भण्‍डारण, मूल संरचना, मानकीकरण एवं स्‍तरीकरण के लिए सुविधाओं, पैकेजिंग और पविहन के विकास पर जोर दिया हैं। उपयुक्‍त भण्‍डारण सुविधाओं के अभाव के कारण कीटों एवं अन्‍य जीवों द्वारा आक्रमण किया गया हैं। ऐसी जन्‍तु बाधा से हुई क्षति के कारण क्षति की सीमा के अधीन बाजार मूल्‍य में कमी आती है। कुछ मामलों में उत्‍पाद को उपयोग हेतु अनुपयुक्‍त घोषित कर दिया जाता है एवं उसे नष्‍ट करना पडता हैं। इसके फलस्‍वरूप किसानों को भारी क्षति उठानी पडती है। समझदार किसान अपने कृषि उत्‍पादों को सावधानी पूर्वक भण्‍डारण करने के लिए उपाय करने चाहिए ताकि बाजार में अधिकतम कीमत प्राप्‍त की जा सकें।
अधिकतर कृषि जिन्‍स बाजार नियमित मांग एवं आपूर्ति की नियमित ताकतों के अधीन कार्य करती हैं। सरकार कुछ फसलों के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य अथवा संबंधित मूल्‍य भी निर्धारित करती है ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके तथा उत्‍पादन बढाने के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित किया जा सकें। यदि इन जिन्‍सों की कीमत समर्थन सीमा से नीचे गिरती है तो सरकार राज्‍य खाते में इन फसलों को खरीदने की व्‍यवस्‍था करती हैं।

सरकार भारत में एक विनियमित बाजार प्रणाली के माध्‍यम से कृषि उत्‍पादों के सुंसगठित विपणन का समर्थन करती है। इन भौतिक बाजारों का आशय यह सुनिश्चित करने से है कि किसान ईमानदारी का माहौल बना करके उचित लाभ प्राप्‍त कर सकें। यह ईमानदारी मांग तथा आपूर्ति की ताकतों, बाजार व्‍यवहारों के विनियमन तथा लेन-देन में पारदर्शिता से संबंधति होता हैं। यहां स्‍थानीय भण्‍डारण भण्‍डागारों, विपणन नेटवर्कों तथा सामग्री कीमतों के बारे में कुछ सूचना है जिससे आपके कृषि उत्‍पाद के लिए अच्‍छे मूल्‍य प्राप्‍त करने में मदद मिलेगी।


फसल वार, बाजार वार तथा न्‍यूनतम मूल्‍य


कृषि जिन्‍सों के क्रय एवं विक्रय की एक कारगर प्रणाली प्राप्‍त करने के लिए अधिकतर राज्‍य सरकारों एवं संघ शासित क्षेत्रों ने कृषि उत्‍पाद बाजारों के विनियमन के लिए व्‍यवस्‍था करने हेतु कृषि उत्‍पाद विपणन समिति जैसे विधानों को अधिनियमित किया है। इन विनियमित भौतिक बाजारों की स्‍थापना इसलिए की गई है। ताकि कृषकों को अपनी फसलों एवं अन्‍य कृषि उत्‍पादों के लिए लाभ की मुनासिव राशि सुनिश्चिम की जा सकें।

आजादी के समय भारत में लगभग 286 विनियमित बाजार थे। इस समय, देश में 7500 से अधिक ऐसे बाजार हैं। इनमें से अधिकतर विनियमित बाजार थोक़ बाजार हैं। इन बाजारों के अलावा, लगभग 30000 ग्रामीण आवधिक बाजार हैं जिनमें से 15 प्रतिशत विनियमन की परिधि के अंतर्गत काम करते हैं। वर्तमान में एकल विनियमित बाजार की औसत पहुंच 459 वर्ग कि.मी हैं। इसका अर्थ यह है कि किसानों को यह सुविधा प्राप्‍त करने के लिए काफी लम्‍बी दूरी तय करनी पडती है।
80 प्रतिशत से अधिक बाजारों में आंतरिक सडकों, चार दीवारी विद्युत प्रकाश, चढाने एवं उतारने की सुविधा तथा माप-तोल उपस्‍कर जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। किसानों के विश्राम गृह आधे से अधिक विनियमित बाजारों में हैं। सरकार जिन मूलभूत ढांचे को सभी विनियमित बाजारों तक पहुंचाना चाहती है वे है, नीलामी मंच, शोषक प्रांगण एवं शीत भण्‍डार इकाइयां हैं।( स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल )


जब किसानों ने संसद घेरा


   गन्ने के समर्थन मूल्य को लेकर संसद में विपक्ष और दिल्ली की सड़कों पर किसानों के तेवर देखने के बाद केंद्र सरकार नरम पड़ती दिख रही है। सरकार ने इस मसले पर सोमवार को सभी पार्टियों की बैठक बुलाई है। कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि सरकार किसानों की मांग के देखते हुए गन्ना अध्यादेश पर विचार करने के लिए तैयार है। इसके बाद किसानों ने अपना प्रदर्शन बंद कर दिया है।
इससे पहले संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में एनडीए, आरजेडी और समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने गन्ने के मूल्य के सवाल को लेकर भारी हंगामा किया। इसके बाद सदन की बैठक एक बार के स्थगित करने के बाद दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। संसद के बाद दिल्ली की सड़कों पर भी गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने को लेकर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत और राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजीत सिंह के अगुआई में हजारों किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पश्चिमी यूपी से हजारों की संख्या में गन्ना किसान सुबह से ही दिल्ली पहुंचने लगे थे। इसकी वजह से कई इलाकों में सड़कों पर ट्रैफिक जाम हो गया। भारी विरोध प्रदर्शन को देखने के बाद सरकार तुरंत हरकत में आई। प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कृषि मंत्री शरद पवार के साथ चर्चा की । इसमें गन्ना के समर्थन मूल्य पर फिर से विचार करने का फैसला किया गया। बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर गतिरोध दूर करने के लिए राज्य सरकार और गन्ना मिल के मालिकों से भी बात करने का फैसला किया है। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने मीटिंग में लिए फैसले की तो कोई जानकरी नहीं दे लेकिन बताया कि जो भी फैसला लिया गया है उसे आज शाम होने वाली कैबिनेट की मीटिंग में रखा जाएगा। कैबिनेट की मीटिंग से पहले शरद पवार मंत्रालय के अधिकारियों के साथ भी इस पर चर्चा करेंगे।
गन्ने के मूल्य को तय करने के लिए केंद्र सरकार का एक अध्यादेश लाई है जिसमें गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) वर्ष 2009-10 के लिए 129.85 रुपये प्रति क्विंटल रखा गया है। साथ ही केंद्र सरकार का कहना है कि अगर राज्य सरकार एफआरपी से अधिक मूल्य तय करती है तो उसकी भरपाई भई राज्य सरकार को ही करनी होगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) 165 रुपये से 170 रुपये निर्धारित किया है। किसानों की मांग है कि उन्हें गन्ने की कीमत ढाई सौ रुपये से अधिक प्रति क्विंटल दी जाए।

गन्ना मूल्य के सवाल पर लोस में हंगामा,कार्यवाई स्थगित
नयी दिल्ली। संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में आज विपक्षी राजग के साथ साथ समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के सदस्यों ने गन्ने के मूल्य के सवाल को लेकर भारी हंगामा किया जिसके चलते सदन की बैठक एक बार के स्थगन के बाद कल सुबह तक के लिए स्थगित कर दी गयी।
अध्यक्ष ने जैसे ही प्रश्नकाल शुरू करने की घोषणा की कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और रालोद प्रमुख अजित सिंह की अगुवाई में पार्टी सदस्य आसन के समक्ष आकर गन्ने के मूल्य के सवालों को लेकर नारेबाजी करने लगे।
यह सदस्य गन्ना किसानों की लूट बंद करो’’ के नारे लगा रहे थे। उधर भाजपा सहित राजग सदस्य भी अपने स्थानों पर खड़े होकर कुछ बोल रहे थे लेकिन शोर के कारण उनकी बात सुनी नहीं जा सकी। कई अन्य विपक्षी दलों के सदस्य भी अपने स्थानों पर खड़े हुए थे।
अध्यक्ष ने सदस्यों को शांत कराने का प्रयास करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर बाद में पूरी चर्चा करायी जा सकती है लेकिन अभी प्रश्नकाल चलने दें। हंगामा थमते न न देख अध्यक्ष ने बैठक आधे घंटे बाद दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।
सदन की बैठक दोबारा शुरू होने पर भी यही नजारा था। सपा और रालोद के सदस्यों के साथ साथ राजग के भी अनेक सदस्य अपने स्थानों से उठकर आसन के समक्ष आ गए।
अध्यक्ष ने शोरशराबे के बीच ही जरूरी दस्तावेज सदन के पटल पर रखवाए और स्थिति शांत होते न न देख बैठक दिनभर के लिए स्थगित कर दी। इससे पूर्व आज सुबह सदन की बैठक शुरू होने पर फिरोजाबाद से कांग्रेस टिकट पर चुन कर आए राज बब्बर तथा दो मनोनीत एंग्लो इंडियन सदस्यों चार्ल्स डायस तथा इंग्रीद मैक्लेयोड ने सदन की सदस्यता की शपथ ली। अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन के नौ पूर्व सदस्यों के निधन का उल्लेख किया और सदन ने दिवंगत नेताओं को कुछ क्षण का मौन रखते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

गन्ना किसानों के लिए एफआरपी तय करना प्रदेश सरकार का अधिकार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि केन्द्र सरकार का एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) जो भी हो राज्य में गन्ना किसानों को चीनी मिलों से सामान्य प्रजाति के लिए प्रति कुंतल 165 रुपये और अगैती प्रजाति के लिए प्रति कुंतल 170 रुपये का राज्य परामर्शित मूल्य सुनिश्चित करायेगा। प्रदेश के मंत्रिमंडलीय सचिव शशांक शेखर सिंह ने आज यहां संवाददाताओं से बातचीत में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि गन्ना किसानों के लिए राज्य परामर्शित मूल्य निर्धारित करना प्रदेश सरकार का अधिकार है और प्रदेश के गन्ना किसानों को वह मूल्य सुनिश्चित किया जायेगा।
सिंह ने बताया कि राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों एवं आयुक्तों को निर्देश दिये हैं कि वे अपने क्षेत्रों में चीनी मिलों में पेराई शुरू कराएं और गन्ना किसानों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। केन्द्र सरकार द्वारा एफआरपी की नयी नीति के तहत गन्ने का दाम प्रति कुंतल 129.84 रुपये तय किये जाने पर शेखर सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री मायावती ने पूर्व मे लागू नीति ही जारी रखने का आग्रह करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा है। उन्होंने बताया कि हालांकि केन्द्र सरकार से इस संबंध में कोई उत्तर नही मिला है मगर राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में दिये आदेश के अनुसार राज्य परामर्शित मूल्य निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है और राज्य सरकार ने पेराई वर्ष 2009-10 के लिए पिछले वर्ष के मुकाबले पहले ही प्रति कुंतल 25 रुपये की बढोत्तरी कर दी है।

गन्ना मूल्य विवाद से चीनी उद्योग को भी लगेगा झटका

सरकार द्वारा लागू की गई गन्ना मूल्य की नई व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि चीनी उद्योग के लिए भी संकट का सबब बन सकती है। यह विवाद देश के चीनी उद्योग के लिए दीर्घकालिक रूप से घातक साबित हो सकता है। खासतौर से पिछले कुछ बरसों में उत्तर भारत में चीनी उत्पादन की क्षमता में निवेश करने वाली कंपनियां इसकी चपेट में आ सकती हैं। इसकी वजह पिछले करीब चार साल में इन राज्यों में चीनी कंपनियों द्वारा बढ़ाई गई क्षमता के बेकार हो जाने की आशंका है। अभी भी कई समूह अपनी पेराई क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रहे हैं। इसका कारण पिछले दो साल में गन्ना किसानों द्वारा क्षेत्रफल में लगातार कमी किया जाना रहा है।
यही वजह है कि केंद्र सरकार द्वारा लागू एफआरपी व्यवस्था को लेकर चीनी उद्योग भी बंट गया है। इसने उत्तर भारत के राज्यों में निजी चीनी उद्योग की चिंता काफी बढ़ी है। भले ही एक वर्ग एफआरपी को उद्योग की सेहत के लिए फायदेमंद मान रहा है, लेकिन पूरा उद्योग इसके पक्ष में नहीं है। उनको यह समझ में आ गया है कि 129.84 रुपये प्रति क्विंटल के एफआरपी पर उनको गन्ना मिलने वाला नहीं है। यही वजह है कि मंगलवार को दिल्ली में गन्ना मूल्य पर कृषि मंत्री शरद पवार की बैठक के नाकामयाब होने के बाद वह किसी नए मध्यस्थ की तलाश में जुट गए हैं। इस मुद्दे पर खुलकर बात करने से भी निजी चीनी कंपनियों के मालिक कतरा रहे हैं। त्नबिजनेस भास्करत्न के साथ बातचीत में उत्तर प्रदेश के एक बड़े चीनी समूह के प्रबंध निदेशक ने कहा कि हमारे पास सालाना पांच लाख टन चीनी बनाने की क्षमता है, लेकिन हम पिछले साल दो लाख टन चीनी भी नहीं बना सके। इसकी वजह गन्ने का न मिलना है। चालू साल में विवाद के चलते किसानों ने गन्ने की प्लांटिंग रोक दी है जो हमारे लिए घातक हो सकती है। ऐसे में हमारे निवेश पर रिटर्न कैसे मिलेगा, जबकि हम चीनी उद्योग पर अपने समूह का सबसे अधिक फोकस कर रहे हैं।

वहीं, उद्योग सूत्रों का कहना है कि चीनी मिलों को धीरे-धीरे बात समझ में आ रही है। यही वजह है कि गन्ना मूल्य के झंझट को लेकर वह राज्य सरकार का दरवाजा खटखटाने जा रही हैं। बुधवार को निजी चीनी मिलों की उत्तर प्रदेश सरकार के साथ इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठक हो रही है। देश की कुल चीनी उत्पादन क्षमता करीब 290 लाख टन है। इसमें से करीब 75 लाख टन क्षमता उत्तर प्रदेश में है और इससे कुछ कम करीब 72 लाख टन की क्षमता महाराष्ट्र में है। बाकी राज्यों में कर्नाटक की क्षमता करीब 20 लाख टन, तमिलनाडु की क्षमता लगभग 18 लाख टन और आंध्र प्रदेश की क्षमता करीब दस लाख टन है। वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार द्वारा लाई गई प्रोत्साहन नीति के बाद राज्य में करीब 10,000 करोड़ रुपये का निवेश चीनी उत्पादन क्षमता स्थापित करने में हुआ था।
इस मुद्दे पर कर्नाटक के एक बड़े चीनी उद्योग समूह के पदाधिकारी का कहना है कि अगर गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर लेते हैं तो इस निवेश का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। वहीं, उद्योग से लंबे समय तक जुड़े रहने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि बजाज हिंदुस्थान और बलरामपुर चीनी मिल के बीच सौदेबाजी टूटने में एक बड़ा कारण आने वाले दिनों में गन्ना उपलब्धता को लेकर खड़ी हो रही अनिश्चितता भी रही है। इसके साथ ही उनका कहना है कि किसानों को दूसरी फसलों में बेहतर आय के विकल्प हासिल हो गए हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि वह गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते इसकी फसल को प्राथमिकता दें। उत्तर प्रदेश के अलावा पिछले कुछ वषरें में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी चीनी मिलों की नई क्षमता स्थापित करने में निवेश हुआ है।

गन्ना मूल्य पर पहली बार सख्त हुए पवार

गन्ना मूल्य पर आंदोलित किसानों के बढ़ते दबाव और संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे के उछलने की आशंका से परेशान केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने निजी चीनी मिलों को साफ कर दिया है कि अगर अगले कुछ दिनों में वे किसानों को ऊंचा दाम देने की घोषणा नहीं करती हैं तो वह खुद गन्ना मूल्य की सार्वजनिक घोषणा कर देंगे। गुरुवार को आयातित चीनी के मुद्दे पर बुलाई गई उद्योग की एक बैठक में पवार का यह लहजा दिखा। उन्होंने चीनी मिलों को लगभग धमकी देते हुए कहा कि अगर वे अगले दो-तीन दिन के भीतर किसानों के साथ गन्ना मूल्य पर समझौता नहीं करती हैं तो वह खुद गन्ने के वाजिब दाम की घोषणा कर देंगे। यह दाम 200 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा हो सकता है।
बैठक में मौजूद एक सूत्र के मुताबिक पवार ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा की निजी चीनी मिलों के मालिकों से साफ कहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी मिलें किसानों के साथ चीनी की ऊंची कीमतों का 90 फीसदी तक बंटवारा कर रही हैं। लेकिन आप लोग किसानों के साथ इस ऊंची कमाई को बांटना नहीं चाहते हैं। अगर इस मामले पर कोई रास्ता जल्दी नहीं निकलता है तो मुझे मजबूर होकर ऊंची कीमत की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ेगी। खासतौर से उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों से उन्होंने कहा कि दो दिन पहले आप लोग इस मुद्दे पर मुझसे बात करके गये थे। उसके बाद अभी तक किसानों के साथ कीमत का कोई समझौता नहीं हो सका है। इस अनिश्चितता को तुरंत समाप्त करना जरूरी है।
बैठक में मौजूद एक अन्य सूत्र के मुताबिक पवार का कहना था कि मौजूदा 129.84 रुपये प्रति क्विंटल के फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) पर गन्ना खरीदने की स्थिति में चीनी मिलों को 100 रुपये प्रति क्विंटल तक मुनाफा हो रहा है। इस मुनाफे को उन्हें किसानों के साथ बांटने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उत्तरी राज्यों में गन्ने का एसएपी 162.50 रुपये से 185 रुपये प्रति क्विंटल तक घोषित किया गया है। लेकिन नई व्यवस्था में एसएपी को परोक्ष रूप से समाप्त कर दिया गया है। जबकि महाराष्ट्र में चीनी मिलों ने किसानों को 210 रुपये प्रति क्विंटल तक का पहला एडवांस दिया है। इस बैठक में चीनी मिलों ने कहा कि आयातित चीनी पर न तो स्टॉक लिमिट लागू है और न ही लेवी। इसके अलावा इसका कोई रिलीज मैकेनिज्म भी नहीं है। यह घरेलू उद्योग के लिए ठीक नहीं है।

धान पर 50 रुपये बोनस व गन्ने का एफआरपी तय
केंद्र सरकार ने चालू विपणन सीजन में धान की सरकारी खरीद पर 50 रुपये का बोनस देने का फैसला किया है। चालू सीजन के लिए सरकार ने धान की सामान्य किस्म का न्यू्नतम समर्थन मूल्य 950 रुपये और ग्रेड ए के लिए 980 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। किसानों को 50 रुपये का बोनस एमएसपी के ऊपर मिलेगा। पहली अक्टूबर से शुरू हुए खरीद सीजन में बोनस के बाद किसानों को ग्रेड ए धान का भाव 1,030 रुपये और सामान्य धान का 1,000 रुपये प्रति क्विंटल मिलेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई आर्थिक मामलों की मंत्रीमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में यह फैसला लिया गया।सीसीईए ने गन्ने के वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) की जगह अध्यादेश के जरिये आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर लागू की गई गन्ने के फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) की भी घोषणा कर दी। चालू पेराई सीजन (2009-10) के लिए गन्ने का एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
फैसले की जानकारी देते हुए गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि गन्ने के वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) की जगह अब उचित और लाभकारी मूल्य, एफआरपी तय किया गया है। वर्ष 2009-10 के गन्ना पेराई सीजन (अक्टूबर से सितंबर) के लिए चीनी मिलें किसानों को गन्ने का एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल (9.5 रिकवरी) के आधार पर भुगतान करेंगी। धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद पहली अक्टूबर से शुरू हो चुकी है लेकिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के कारण बोनस की घोषणा में देरी हुई। चालू खरीफ सीजन में प्रतिकूल मौसम से देश में चावल की पैदावार में लगभग 160 लाख टन की कमी आने की आशंका है। पिछले खरीफ सीजन में देश में 845 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ था।

रुक नहीं रहीं किसानों की आत्महत्याएँ
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज़ में डूबे चार और किसानों ने आत्महत्या कर ली है और इसी के साथ इस क्षेत्र में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 1000 हो गई है.
आत्महत्याओं का यह ताज़ा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पूरा देश दिवाली का पर्व मना रहा है.एक अनुमान के मुताबिक पिछले वर्ष जून से लेकर अभी तक 1000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने की एक वजह यह भी है कि राज्य सरकार इन किसानों से कपास खरीदने में देर कर रही है. उधर किसानों ने भी माँग की है कि सरकार को उनसे जल्द ही फसल ख़रीद लेनी चाहिए और उसके बदले में उन्हें उचित दाम दिया जाना चाहिए.किसानों का कहना है कि अगर सरकार उनसे तुरंत कपास नहीं ख़रीदती है तो स्थितियाँ और भी बदतर हो सकती हैं.
ग़ौरतलब है कि यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर कपास की खेती के लिए जाना जाता है पर पिछले 16 महीनों से यहाँ किसानों की आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं.

किसानों की आत्महत्या दुर्भाग्यपूर्ण-राष्‍ट्रपति

Wednesday, 18 November 2009

लालू की रेल पर ममता का श्वेतपत्र

भारतीय रेल पर बहुप्रतीक्षित श्वेत पत्र संसद के आगामी सत्र में पेश होने की संभावना है जिसमें रेलवे की वित्तीय स्थिति और लालू प्रसाद के रेलवे में आमूल परिवर्तन के दावे की असलियत दिख सकती है। रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा यह :श्वेत पत्र: लगभग तैयार है और इसे अंतिम स्वरूप दिया जा रहा है। उन्होंने बिना ब्यौरा दिए कहा इसमें रेलवे के परिचालन और वित्तीय स्थिति से जुड़े कुछ आधारभूत आंकड़े होंगे। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेल बजट में वायदा किया था कि वह पिछले पांच साल के प्रदर्शन के आधार पर रेल की सांगठनिक, परिचालन और वित्तीय स्थिति के संबंध में श्वेत पत्र लेकर आएंगी और विजन..2020 को दीर्घ और अल्पकालिक रणनीति और कार्य योजना के साथ विकसित करेंगी। लालू प्रसाद ने अपने कार्यकाल के दौरान रेलवे में कुल 90, 000 करोड़ रुपए का अधिशेष दिखाया था जबकि बनर्जी ने कहा था कि वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल करने के लिए पिछले साल 13, 600 करोड़ रुपए और इस साल 2, 600 करोड़ रुपए के व्यय के बाद केवल 8, 361 करोड़ रुपए का कोष ही बचा है।

बनर्जी ने कहा कि अधिशेष धन नहीं होने से भारतीय रेल टक्कर रोधी उपकरण के लिए रकम की व्यवस्था नहीं हो सकी है। रेलवे ने श्वेत पत्र तैयार करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति बनायी है। रेल मंत्री बनर्जी से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा,‘मैंने संसद से वायदा किया है और उसे वहीं प्रस्तुत किया जाएगा।

Monday, 19 October 2009

समुद्र में विलीन हो जाएंगे कई देश !

फिजी के एक वैज्ञानिक ने चेतावनी दी है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रशांत क्षेत्र के कई द्वीपों के जलमग्न होने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने सुझाव दिया कि कोपेनहेगन में होने जा रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में इन द्वीपों को पुनर्वास सहायता की मांग करनी चाहिए। फिजी में यूनिवर्सिटी आफ साउथ पैसिफिक में जलवायु परिवर्तन पर शोध कर रहे प्रोफेसर पैट्रिक नून ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि सन 2100 तक कितने द्वीपों पर आबादी सलामत रहेगी।

नून मार्शल द्वीप की राजधानी माजुरो में सोमवार को शुरू हुई पैसिफिक क्लाइमेट चेंज राउंडटेबल बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं। इस बैठक में प्रशांत क्षेत्र के चौदह देश दिसंबर में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक के लिए अपनी रणनीति पर विचार विमर्श करेंगे। नून ने कहा कि 2007 में जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की ओर से पेश की गई तस्वीर के मुकाबले समुद्र का जलस्तर बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। इस सदी के अंत तक समुद्र के जलस्तर में तीन फुट से ज्यादा की बढ़ोतरी होगी। नून ने कहा कि निचले स्तर पर बसे मार्शल आयलैंड, किरिबाती और तुवालू जैसे द्वीपीय देश नक्शे से गायब हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती नीति निर्धारकों को यह समझाने की है कि आज प्रशांत क्षेत्र के लोगों की पूरी जीवन शैली में व्यापक बदलाव की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि इस बहस में पुनर्वास का मुद्दा सबसे पेचीदा है। लोगों को यह समझाना मुश्किल है कि जहां वे सदियों से रहते आए हैं वहां रहना अब व्यावहारिक विकल्प नहीं रह गया है (एजंसियां)।

Thursday, 15 October 2009

अनाज कम पड़ जाएगा, लोग भूखे रह जाएंगे ?

 भारत एक विषम संकट में फंस सकता है अगर खेती की जमीन को उद्योग धंधों को खड़ा करने की मुहिम में अंधाधुंध इस्तेमाल में परहेज नहीं बरता गया। अभी कहा जा रहा है कि उद्योग धंधो के बिना पूरा विकास संभव नहीं है। इस उद्देश्य की पूर्ति में खेती की उपजाऊ जमान पर उद्योग लगाने की कोशिश हो रही है। इतना ही नहीं भविष्य के खाद्यान्न की जरूरत को दरकिनार कर बंजर पड़ी जमीनों को खेती योग्य बनाने की मुहिम भी लगभग ठंडी पड़ गई है। इसका खामियाजा यह भुगतना होगा कि आने वाले कुछ दशकों में दुनिया की जो आबादी बढ़ेगी उसके लिए पेट भर अनाज भी मयस्सर नहीं हो पाएगा। कम से कम भारत इस संकट में ज्यादा फंसता नजर आ रहा है। इसकी कई वजहें हैं। पहला यह कि खेती योग्य जमीन बढ़ाने की जगह उपजाऊ जमीन पर उद्योग लगाने की मुहिम चल रही है। दूसरा यह कि खेती और किसानों की हालत भारत में सोचनीय होती जा रही है। इसी कारण किसान अब पीढ़ी दर पीढ़ी किसान नहीं रहना चाहता। खेत मजदूरों का गांवों से भारी पैमाने पर पलायन हो रहा है। अगर खेती इतने फायदे का धंधा नही बन पाती जिससे किसान खुशहाल रह सके तो यह दशा किसा भी सरकार के लिए सोचनीय हो सकती है। मैं भी एक किसान का बेटा हूं मगर सपने में भी नहीं सोच पारहा हूं कि अच्छी तालीम पाने को बाद एपने बेटे को पुस्तैनी खेती के धंधे में लगा पाऊं। आखिर क्यों ? क्या कोई सरकार इस बात के लिए चिंतित है कि खेती को मूलभत ढांचा ध्वस्त न होने पाए। कोई ठोस प्रयास की जगह किसानों की भलाई के दिखावे भर किए जा रहे हैं जबकि किसान आत्महत्या करने तक को मजबूर हो रहे हैं। वह भी ऐसे समय जब संयुक्त राष्ट्रसंघ ने चेतावनी दे डाली है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में खाद्यान्न का भारी संकट पैदा हो सकता है। दुनिया भर में विश्व खाद्य दिवस मनाए जाने के इस मौके पर कम से कम भारत का हर नागरिक इन सवालों का जवाब ढूंढे कि आखिर क्यों उन्हें इस संकट में धकेल रही हैं हमारी सरकारें ? जाहिर है अनाज किसी मंत्री, उद्योगपति या उनके दलालों को कम नहीं पड़ेगा। भूख से मरेगा आम आदमी ही।  आप भी देखें इस रिपोर्ट में क्या है ?

 अगले 4 दशकों में 40 करोड़ लोग भूखे रह जाएंगे.

  संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर दुनिया में खेती योग्य अतिरिक्त ज़मीन का इंतजाम नहीं किया गया और खाद्यान्न की पैदावार 70 फ़ीसदी नहीं बढ़ी तो अगले 4 दशकों में 40 करोड़ लोग भूखे रह जाएंगे. रोम स्थित संयुक्त राष्ट्र खाद्यान्न और कृषि संस्था का कहना है कि दुनिया में अनाज और बाक़ी खाद्यान्न की उत्तरोत्तर कमी होती जा रही है. संस्था ने अपनी दो दिवसीय संगोष्ठी के बाद यह राय दी कि इस वक़्त दुनिया में कृषि योग्य जो ज़मीन उपलब्ध है वह विश्व की बढ़ती आबादी के लिए अनाज और खाद्यान्न पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

सन् 2050 तक खाद्यान्न के उत्पादन में कम से कम 70 फ़ीसदी की वृद्धि की आवश्यकता होगी क्योंकि अनुमान है कि अगले चार दशकों में दुनिया की आबादी बढ़कर नौ अरब हो जाएगी.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया की वर्तमान कृषि योग्य ज़मीन की पैदावार अगर बढ़ाई भी जाती है तो भी 2050 तक दुनिया में कम से कम 37 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे.

संस्था का यह भी कहना है कि कृषियोग्य ज़मीन की कमी के अलावा धरती के जलवायु में हो रहे परिवर्तन और खेतिहर मज़दूरों की घटती संख्या भी खाद्यान्न की कमी के कारण होंगे. इसलिए खाद्यान्न की पर्याप्त आपूर्ति के लिए अभी से उचित क़दम उठाने की ज़रुरत है.
 
'खाद्यान्न पर ख़र्च बढ़ाना होगा'


खाद्य पदार्थों की विकासशील देशों से माँग बढ़ रही है और लागत भी बढ़ रही है संयुक्त राष्ट्र  ने चेतावनी दी है कि दुनिया के खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए विकासशील देशों को कृषि क्षेत्र में 10 गुना अधिक राशि ख़र्च करनी होगी. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के प्रमुख ज़ाक डियूफ़ ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए 20 से 30 अरब डॉलर की ज़रूरत होगी. खाद्यान्न संकट के कारण दुनिया के कई देशों में गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई थी. इसको देखते हुए रोम में खाद्यान्न सुरक्षा सम्मेलन बुलाया गया है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून की ओर से इस सम्मेलन में दुनिया के नेताओं से खाद्यान्न की लगातार बढ़ रही कीमतों को काबू में करने के लिए प्रभावी प्रयास करने का प्रस्ताव आना है. इस मौके पर मून व्यापारिक रोक के रूप में कीमतों पर लगाम कसने के लिए कोई उपाय पेश कर सकते हैं.

खाद्य और कृषि संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर खाद्यान्न की पैदावार बढ़ाने और उन लोगों तक इसे पहुँचाने का इंतज़ाम नहीं किया गया तो हालात बद से बदतर हो सकते हैं. भुखमरी से 10 करोड़ से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए हैं

ऐसा माना जा रहा है कि इस खाद्यान्न संकट ने 10 करोड़ लोगों को भुखमरी की तरफ़ ढकेल दिया है.आंकड़ों के अनुसार इस साल ग़रीब देशों को खाद्यान्न आयात करने के लिए 40 प्रतिशत ज़्यादा खर्च करना पड़ा है.

खाद्य और कृषि संगठन ने दानकर्ता देशों से माँग की है कि वो विकासशील देशों की और अधिक मदद करें ताकि किसान बीज, खाद और किसानी से जुड़ी दूसरी चीज़ों को खरीद सकें. इस बैठक का एक बड़ा मुद्दा जैविक ईंधन भी होगा. पिछले कुछ सालों में मक्के का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया गया है. ऐसा माना जा रहा है कि बान की मून अमरीका से माँग कर सकते हैं कि वो जैविक ईंधन की पैदावार के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को वापस लें ताकि इसका इस्तेमाल खाद्यान्न के तौर पर किया जा सके.

बढ़ती लागत

इसके पहले संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि खाद्य पदार्थों की विकासशील देशों से माँग बढ़ रही है और उत्पादन की लागत भी बढ़ रही है.खाद्य संकट ने कई देशों में दंगे तक करा दिए हैं संयुक्त राष्ट्र संस्था खाद्य और कृषि संगठन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की जो क़ीमतें बढ़ी हैं वो पिछले सभी रिकॉर्ड से कहीं ज़्यादा है और उसकी कुछ वजह ये भी थी कि ख़राब मौसम की वजह से बहुत सी फ़सलें तबाह हो गई थीं.

विश्व खाद्य संगठन की वार्षिक अनुमान रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 तक गेहूँ की क़ीमतों में 60 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है और वनस्पति तेल उस समय तक लगभग 80 प्रतिशत महंगा हो सकता है. दुनिया भर में वर्ष 2005 और 2007 के बीच गेहूँ, मक्का और तिलहन फ़सलों के दाम लगभग दोगुने हो चुके हैं. संगठन ने हालाँकि इन चीज़ों क़ीमतों में कुछ कमी होने की संभावना जताई है लेकिन यह कमी हाल के समय में हुई महंगाई के मुक़ाबले बहुत धीमी होगी.
   
     
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भारत पर खाद्य संकट का ख़तरा?

Tuesday, 13 October 2009

फिर भौंका चीन

   चीन ने अभी ३ अक्तूबर को प्रधानमंत्री के अरूणांचल दौरे पर भौंका और पिछले साल भी प्रधानमंत्री की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर विरोध जताया था। पिछले साल प्रधानमंत्री चीन से लौटने के बाद 31 जनवरी और 1 फरवरी को अरुणाचल के दौरे पर गए थे। चीन ने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की पिछले महीने की राज्य की यात्रा का भी विरोध किया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, 'चीन की चिंताओं को दरकिनार कर भारतीय नेता के विवादित क्षेत्र के दौरे से हम बहुत असंतुष्त हैं। हम चाहते हैं कि भारतीय पक्ष चीन की गंभीर चिंताओं का समाधान करे और विवादित क्षेत्र में गड़बड़ी पैदा न करे ताकि दोनों देशों के बीच संबंध स्वस्थ तरीके से विकसित होते रहें।'
मंत्रालय की वेबसाइट पर डाले गए बयान में प्रवक्ता ने कहा है कि चीन और भारत ने भी आधिकारिक रूप से अपनी सीमा को चिह्नित करने के मसले को सुलझाया नहीं है। बायन में यह भी कहा गया है कि भारत-चीन सीमा के पूर्वी हिस्से पर चीन का रुख स्थिर और साफ है।
चीन के इस रुख के बाद भारत में चीन के राजदूत चंग यान को विदेश मंत्रालय में तलब किया गया है। वह पूर्वी एशिया मामलों के प्रभारी संयुक्त सचिव विजय गोखले मिले हैं। चीन के विरोध को खारिज करते हुए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और प्रधानमंत्री देश के किसी भी हिस्से में जा सकते हैं। विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा ने भी कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अविभाज्य हिस्सा है।

भारत का कहना है कि चीन ने गैर-कानूनी रूप से जम्मू कश्मीर के 43, 180 वर्ग किलोमीटर भाग पर कब्जा जमा रखा है। दूसरी ओर, चीन भारत पर उसके करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा जमाने का आरोप लगाता है जिसका अधिकतर हिस्सा अरुणाचल प्रदेश में है।
भारत अरुणाचल को अपना अटूट अंग मानता है लेकिन चीन इसे विवादास्पद कहता है. भारत ने चीन की इस आपत्ति पर विरोध प्रकट किया है कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह को इस 'विवादित सीमाक्षेत्र' का दौरा नहीं करना चाहिए था. चीन की इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने मंगलवार को कहा, "अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अटूट हिस्सा है. अरूणाचल प्रदेश में रहने वाले लोग भारत के नागरिक हैं और वे भारतीय लोकतंत्र की मुख्य धारा में शामिल रहने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं. चीन सरकार भी भारत के इस स्पष्ट रुख़ से भली-भाँति परिचित है."

चीन ने भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर यह कहते हुए 'ज़ोरदार आपत्ति' जताई है कि वो एक ऐसा सीमावर्ती क्षेत्र है जिस पर विवाद चल रहा है. चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता मा झाओक्सू ने सरकारी ने समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने एक वक्तव्य जारी करके कहा है, "भारतीय नेता ने विवादित सीमावर्ती क्षेत्र का दौरा करके एक बार फिर चीन की गंभीर चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया है और इस यात्रा पर चीन प्रबल रूप से असंतुष्ट है." प्रवक्ता ने कहा कि चीन और भारत ने अपनी सीमा रेखा का कभी भी आधिकारिक रूप से रेखांकन नहीं किया है और चीन-भारत सीमा के पूर्वी हिस्से पर चीन का रुख़ बिल्कुल स्पष्ट है.

प्रवक्ता मा झाओक्सू का कहना था, "हम माँग करते हैं कि भारत सरकार चीन की गंभीर चिंताओं पर ध्यान दे और विवादित क्षेत्र में अशांति को ना भड़काए ताकि चीन और भारत संबंधों के सदभाव के साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सके. " भारतीय मीडिया संगठनों में छपी ख़बरों में कहा गया है कि प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने मंगलवार को अरूणाचल प्रदेश का दौरा किया और वहाँ एक चुनाव रैली को संबोधित किया.

भारतीय प्रवक्ता ने अपने बयान में यह भी कहा कि "भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक प्रचलित परंपरा है कि जब संसद या राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव होते हैं तो राजनीतिक नेता उन क्षेत्रों का दौरा करते हैं. भारत सरकार देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए कटिबद्ध है."

भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणचल प्रदेश यात्रा पर चीन की ओर जताए गए विरोध पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कड़ी आपत्ति जताई है। भाजपा ने सरकार से इसका कड़ा प्रतिवाद करने की मांग की। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा- ‘प्रधानमंत्री की अरुणाचल प्रदेश यात्रा के बारे में चीन ने अपना विरोध जताने के लिए जिस शब्‍दावली का प्रयोग किया है वह बेहद आपत्तिजनक और अस्‍वीकार्य है।‘

रूड़ी ने कहा कि विदेश मंत्रालय को चाहिए कि वह भारत स्थित चीन के राजदूत को बुला कर इस बारे में कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराए। भाजपा प्रवक्ता ने कहा- यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चीन की ओर से बार-बार किए जाने वाले सीमा उल्लंघनों और प्रधानमंत्री की अरुणाचल यात्राओं पर उसके विरोध का भारत की ओर से उचित जवाब नहीं दिया जाता है।'
भाजपा प्रवक्‍ता ने कहा कि हम चीनी हरकतों का जवाब देना तो दूर की बात है। सरकार इन उल्लंघनों को मीडिया की ओर से खड़ा किया गया हव्‍वा बताकर बता कर टालने की ही कोशिश करती है। उधर सरकार ने सिंह की अरुणाचल यात्रा पर चीन की आपत्ति को खारिज करते हुए आज दिए कड़े बयान में कहा कि यह प्रदेश भारत का एक अभिन्‍न अंग है। भारत ने चीन की इस टिप्‍पणी को निराशाजनक बताया है। इसके साथ ही भारत की ओर से यह भी कहा गया है कि इस तरह की टिप्‍पणियों से सीमा वार्ता की प्रक्रिया को मदद नहीं मिलेगी।

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