हर की पौड़ीः अपनी जिम्मेदारी भी समझें श्रद्धालु

>> Friday, January 1, 2010


सभी ब्लागर साथियों व पाठकों को नए साल २०१० की शुभकामनाएं।    नया साल शुरू होने से कुछ पहले ही मैंने हरिद्वार हर की पौड़ी, और वहीं ऊंचे पहाड़ पर अवस्थित मां मनसा देवी के मंदिर की यात्रा की थी। यात्रा तो इसके बाद देहरादून की भी की थी मगर फोटो सिर्फ हरिद्वार की ही खींच पाया। नए साल में शुभकामनाओं के साथ नया यही है कि हरिद्वार की कुछ फोटो भी देख लें।
अपनी जिम्मेदारी भी समझें श्रद्धालु
  हम जब पहुंचे थे तो हरिद्वार में कुंभ की तैयारियां चरम पर थीं। शायद इसी लिए हम अपने मन में जिस सुंदर हरिद्वार व हर की पौड़ी की छवि लेकर गए थे उससे कम ही देखने को मिला। शायद तैयारियों के भी कारण ऐसा हमें दिखा होगा। मसलन हर की पौड़ी पर कई जगह तोड़फोड़ कर दी गई थी। तेजधार से बहता गंगाजल निर्मल नहीं बल्कि गंदा दिखा। पानी में नजदीक से झांककर देखा तो तमाम फूल, पत्तियों समेत लोगों के कपड़े वगैरह पानी में बहते दिखे। अगर आप एक अंजलि जल उठा लें तो उसमें तमाम फूल पत्तियों के टुकड़े मिल जाएंगे। बाहर की तरफ से हर की पौड़ी तक पहुंचने के लिए बने खूबसूरत पुलों से टकराते हुए गंगाजल में पुल के नीचे तमाम कपड़ों के टुकड़ों को फंसे देखा। जिस गंगाजल को सिर माथे पर लेकर पुण्य की कामना करने वालों को पता नहीं यह क्यों नहीं समझ में नहीं आता की अपने वस्त्र वगैरह गंगा में बहाकर आखिर गंगा को गंदा करने का पाप क्यों बटोरते हैं। हर की पौड़ी जो कि महान धार्मिक स्थल के साथ पर्यटकों के लिए एक अच्छी जगह है मगर वहां यत्र-तत्र खाकर फेंके गए दोने वगारह गंदगी में इजाफा करते कहते हैं। ये वे दोने वगैरह होते हैं जिसमें लोगों गरीबों को भोजन दान करते हैं। और वे लोग इसे वहीं खाकर फेंक देते हैं। यह गंदगी देखकर तो यही लगता है कि हर की पौड़ी पर सिर्फ नहाने के अलावा बाकी कर्म पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। भिखारियों व अनावश्यक दुकानें लगाकर भीड़ करने वालों को वहां दूर ऐसी जगह पर बैठने की ईजाजत दी जानी चाहिए जहां से स्नान वगैरह के बाद श्रद्धालु गुदरें और दानपुण्य करते हुए बाहर चले जाएं। अर्थात दान कर्म वहां से बाहर निकलकर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। अगर तीर्थस्थलों को बचाना है तो गंदगी रोकने व निगरानी के इंतजाम सरकार को फौरन करने चाहिए। धर्म स्थल साफ सुथरे,पंडों की अराजकता व भिखारियों के तांडव से मुक्त हों तो मन में श्रद्धा और जगती है। अन्यथा मेरी तरह मन में एक पीड़ा लेकर लौटता है श्रद्धालु और पर्यटक।

कुंभ मेला -पौराणिक कथाएँ

कुंभ के मेले में भिखारी बनेंगे मुसीबत

महाकुंभ की तैयारियों में लगे मेला प्रशासन के लिए भिखारी मुसीबत बने हुए है। पुलिस प्रशासन जहां महाकुंभ क्षेत्र को भिखारी मुक्त करने योजना बना रहा है वही सेक्टर व जोन में बंटने वाले इस क्षेत्र की तर्ज पर भिखारी भी व्यवस्थित होने की तैयारी में हैं। इनमें बाग्लादेश भिखारी भी प्रशासन के लिए चिंता का सबब बने हुए है। इन भिखारियों में किसी के हिस्से में हरकी पै़डी है, तो कोई पंतद्वीप, मंसा देवी, चंडी देवी मंदिरों के बाहर कटोरे पकडे हुए है। मेला क्षेत्र के लिए भिखारियों की भी व्यवस्थाओं मे बडे बदलाव होने तय है। दिल्ली, यूपी, बिहार, प.बंगाल व उडीसा से इन दिनों पहुंचे भिखारी इसके लिए बाकयदा कार्ययोजना तैयार कर रहे हैँ। महाकुंभ शुरू होने से कुछ दिन पहले इनके कुनबे व संगी साथी भी यहां पहुंचेंगे। वे अपने-अपने इलाकों में बंट जाएंगे। भिखारियों के इन जत्थों में पांच वर्ष के बच्चों से लेकर 70 साल के बूढ़े तक शामिल रहते है। ये सभी अपनी उम्र व शारीरिक बनावट आदि के अनुसार भीख मांगने के तरीके अपनाते है। पिछली बार अर्द्धकुंभ में भी भिखारियों को मेला क्षेत्र से हटाने की योजना धरी की धरी रह गई थी। श्रद्धालुओं को डरा धमकाकर दान पुण्य करने को मजबूर करना भी भीख मांगने का एक तरीका है। जानकारी के अनुसार कुंभ मेला एक जनवरी, 2010 से भिखारियों को मेला क्षेत्र से हटाकर रोशनाबाद भिक्षुकगृह में रखा जाएगा

कुंभ मेला शहर से बाहर


कुंभ मेले में पाँच करोड़ लोगों के हरिद्वार पहुँचने के दावों के बीच कुंभ मेला प्रशासन ने मेले को पूरी तरह शहर से बाहर कर दिया है। कुंभ मेले में लगने वाली प्रदर्शनीयों का आनंद उठाने के इच्छुक लोगों को दस किलोमीटर सफर कर कठिन रास्तों से गौरीशंकर नगर पहुँचना होगा। कुंभ से जुडे समाचारों को पलक झपकते ही देश-विदेश तक पहुँचाने वाले पत्रकारों के लिए प्रेस शिविर भी गौरीशंकर नगर में ही बनाया जाएगा। बड़े कथा वाचकों के पंडाल भी गौरी शंकर नगर में ही बनेंगे। हरिद्वार शहरी क्षेत्र में जिन अखाड़ों के भवन बने है, उन्हें छोड़कर तमाम अखाड़े और खालसे मंडलेश्वर नगर में अपना डेरा डालेंगे।

महाकुंभ की धर्मध्वजा बडकोट के पेडों से सजेगी

देहरादून। सदी के सबसे बडे धार्मिक मेले :महाकुंभ: में विभिन्न अखाडों की धर्मध्वजा के लिए उत्तरकाशी जिले के बडकोट के जंगलों से पेडो को काटकर लाया जायेगा और उसी के माध्यम से कुल 13 अखाडों के लिए अलग अलग धर्मध्वजा लगायी जायेगी।

महाकुंभ में अधिकृत तौर पर 13 अखाडों के लिए अलग अलग स्थानों पर नगर बसाये जाते है और उनमें परंमरा के अनुसार 52 हाथ ऊंची धर्मध्वजा लगायी जाती है। इस ध्वजा के लगने के बाद ही महाकुंभ की औपचारिक रूप से शुरूआत मानी जाती है। देश के चार स्थानों नासिक, उज्जैन, इलाहाबाद और हरिद्वार में प्रत्येक बारह वर्ष पर लगने वाले महाकुंभ का मेला मुख्य रूप से देश भर के साधु संतों के लिए गठित अखाडो के स्नान के लिए ही आयोजित किया जाता है।

देश में कुल 13 अखाडों को ही आधिकारिक रूप से मान्यता मिली हुई है और सभी अखाडे अखिर भारतीय अखाडा परिषद के सदस्य के तौर पर विभिन्न क्रियाकलापों में हिस्सा लेते है। महांकुभ से जुडे प्रशासनिक सूत्रों ने बताया कि अखाडों के परिसर में धर्मध्वजा के पूरे विधि विधान के साथ स्थापित हो जाने के बाद ही महाकुंभ का औपचारिक रूप से आगाज होता है। इसी के तहत इन ध्वजाओं के लिए 52 हाथ ऊंचे अखंड पेड या बांस की जरूरत होती है।

इस लिंक से देखिए हरिद्वार में हर की पौड़ी व अन्य दृश्य---------।


अमेरिका का कुंभ
मारीशस की शिवरात्रि, थाईलैंड की रामायण, सूरीनाम की रामकथा, इंग्लैंड की बैसाखी, अफ्रीका का आर्य समाज का जलसा और अमेरिका का कुंभ मेला। है न आश्चर्यजनक, क्योंकि ये उत्सव तो भारत की धरोहर हैं, लेकिन जब से भारत के लोग दूर-दराज देशों में अपना बसेरा बना रहे है वे भारत की अनमोल धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषा की धरोहर के कुछ बीज अपने साथ ले जा रही हैं। यह सिलसिला कई शताब्दी पूर्व आरंभ हुआ था। रामायण काल से ही यूरोप, अफ्रीका, अरब देशों एवं पूर्वी एशिया में भारतीय संस्कृति किसी न किसी रूप में पहुंचाई गई। भारतीयों का दूसरे देशों में स्थाई रूप से बसने का क्रम 150 वर्ष पुराना है। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं मॉरीशस में भारतीय 19वीं सदी के अंतराल में पहुंचे। इंग्लैंड में भारतीयों का आगमन 70 वर्ष पुराना है तो अमेरिका में भारतीयों का आवास 50 वर्ष से ही होना आरंभ हुआ है। इन सब देशों के आर्थिक, बौद्धिक एवं सामाजिक परिवेश भिन्न हैं पर एक बात समान है और वह है भारतीयों की अपने धर्म-संस्कृति एवं भाषा के जुडे़ रहने की अदम्य लालसा। अमेरिका के प्रत्येक नगर में लघु भारत बसा हुआ मिल जाएगा। अमेरिका में भारतीयों की संख्या दो करोड़ के लगभग है। यह अमेरिका की कुल जनसंख्या का दो प्रतिशत भी नहीं है,पर भारतीयों की मुखरता, समाज एवं व्यवसाय में बढ़ता प्रभाव एवं विश्वविद्यालयों में बहुलता सर्वत्र दिखाई देती है। ऐसी ही बहुलता की एक झलक हाल में यहां आयोजित कुंभ मेले में दिखाई धी।

भारत में कुंभ मेले का इतिहास अति प्राचीन है। कहते हैं कि समुद्र मंथन का महा अभियान ब्रह्मा जी के बारह दिन में पूरा हुआ था। कुंभ मेले का आरंभ कब से हुआ यह तो निश्चित करना मुश्किल है। चंद्र गुप्त मौर्य के काल में यूनानी लेखकों ने कुंभ मेले का मेले का उल्लेख किया है, राजा हर्ष वर्धन के समय तो कुंभ मेला अपने पूर्ण गौरव पर था। जहां एक ओर महात्मा गांधी ने कुंभ मेले में गरीबी, गंदगी और अंधविश्वास का अनुभव किया वहीं अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने कुंभ मेले में संगम के तट पर खड़े होकर भारत के आध्यात्मिक पुंज का साक्षात्कार किया था। उन्होंने भारत को अध्यात्मिक गुरू कहा। विदेशों में भारत की बढ़ती आध्यात्मिक छवि का ही परिणाम है कि हाल के प्रयाग कुंभ मेले में तीन हजार से भी अधिक विदेशी भक्त भाग लेने गए। अप्रत्याशित वर्षा के बावजूद उन्हे व्यवस्था एवं स्वयं सेवकों का उत्साह और सेवा भाव आदरणीय लगा। चूंकि प्रत्येक भारतीय कुंभ मेले में नहीं जा सकता है अत: अब कुंभ मेले भारत से बाहर जाने लगे हैं। जो पंचतत्व ब्रह्माण्ड में होते है वही पंचतत्व कुंभ में भी होते है। जिस प्रकार जीव में ब्रह्म का अंश है, जो कि पूर्णता का द्योतक है। वर्ष 2006 के अगस्त माह में कैलिफोर्निया में हिंदू-संगम का आयोजन हुआ था, जिसमें अनेक संगठनों ने भाग लिया और पांच हजार से भी अधिक हिंदुओं ने भाग लिया। इस वर्ष नौ सितंबर रविवार को कैलिफोर्निया के लॉस-एजंलस नगर के निकट यह पर्व कुंभ मेले के नाम से संपन्न हुआ। सनातन मंदिर मंदिर में आयोजित एक दिन का यह कुंभ मेला प्रात: 10 बजे से लेकर रात 10 बजे तक चला। इस आधुनिक, अपारंपरिक एवं अनूठे कुंभ मेले में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। भक्तों में भारतीयों के साथ विश्व के विभिन्न देशों के मूल निवासी भी थे।

अमेरिका में दो लाख से अधिक अमेरिका के निवासी हिंदू जीवन शैली, दर्शन एवं योग का पालन करते हैं। इन्हें (प्रैक्टिसिंग हिंदू) कहा जाता है। जिस तरह भारत का कुंभ मेला हिंदू धर्म की सार्वभौमिकता का प्रतीक है उसी तरह कैलिफोर्निया का कुंभ मेला हिंदू एकता का ध्वज है। इसी ध्वज की छाया में चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, वेदांत सोसाइटी, साईबाबा संगठन, स्वामीनारायण संस्था, मां अमृतानंदमयी सिद्धयोग, हंसा योग, हिंदू स्वयं सेवक संघ आदि 20 से भी अधिक संगठन कुंभ मेले में सम्मिलित हुए। कुंभ मेले का आरंभ आधा मील लंबे जुलूस से हुआ, जिसमें विभिन्न संगठनों की झांकियां दृश्यमान थीं। पूजा अर्चना के बादं विग्रहों का भारत की 21 पवित्र नदियों से लाए गए जल में विसर्जन किया गया। कुंभ मेले का उद्देश्य जगत में सहृदयता प्रेम एवं शांति के लिए प्रार्थना करना था। इस कुंभ मेले में न गंगा थी न त्रिवेणी, न शाही स्नान और न ही अखाड़े और न ही करोड़ों भक्तों की भीड़, परंतु स्वधर्म में अटूट आस्था, उत्साह और विदेश में बसे भारतीयों के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत अवश्य था। उम्मीद है ऐसे मेले अमेरिका के अन्य स्थानों पर भी आयोजित होंगे। (लेखिका रेणु राजवंशी गुप्ता )

हरिद्वार में १४ जनवरी से लगने वाले कुंभ मेले की तैयारियों पर कुछ खबरें जनसत्ता में २९ दिसंबर को छपी हैं। जनसत्ता से ये खबरें साभार ली गई हैं। आप भी इनका अवलोकन करें। इनमें से एक खबर है--कुंभ मेला के सभी कार्य सही समय पर पूरे हो रहे हैं-निशंक और दूसरी है-रमता पंच पहुंचे पांडेवाला।------------।




कुंभ मेला के सभी कार्य सही समय पर पूरे हो रहे हैं-निशंक


सुनील दत्त पांडेय


हरिद्वार 28 दिसंबर। हरिद्वार में अगले साल 14 जनवरी से लगने वाले कुंभ मेला की तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई है। पहली बार कुंभ मेला के लिए सत्तर फीसद काम स्थायी रूप से करवाए जा रहे हैं। जिसका पूरा फायदा हरिद्वार के वासियों को मिलेगा। कुंभ मेले के लिए इस बार 450 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। यह बात मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने बताई। उन्होंने कहा कि कुंभ मेला हमारे लिए एक अवसर और चुनौती दोनों ही है। हमने कुंभ मेला कार्यों की गुणवत्ता के लिए थर्ड पार्र्टी सिस्टम बनाया है, जिसके लिए आला दर्जे की कंपनियों को हर काम पर जांच के लिए लगाया गया है। कुंभ मेला के कार्यों की गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता उनकी सरकार नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रियों की सहूलियत के लिए गंगा तट पर कई नए घाटों का निर्माण किया गया है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं।


मुख्यमंत्री ने बताया कि साधु-संतों की सुविधाओं के लिए सभी इंतजाम किए गए हैं। उन्होंने कहा कि कुंभ मेला में जो भी तीर्थयात्री हरिद्वार आए, वह सुखद अनुभूति व मीठी यादें लेकर लेकर जाए, यह हमारा प्रयास होगा। उन्होंने कहा कि इस बार कुंभ मेला 70 फीसद कार्य स्थाई प्रवृति के कराए गए हैं, जिनका लाभ क्षेत्र के लोगों को कुंभ के बाद भी मिलेगा। डॉ निशंक ने बताया कि कुंभ मेला के लिए राज्य सरकार ने 293 योजनाओं की मंजूरी दी है। शासन ने इनके लिए साढ़े चार सौ करोड़ रुपए की धनराशि मंजूर कर दी है और साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए अब तक मुक्तकर दिए हैं। कुंभ के साढ़े चार सौ करोड़ रुपयों में से 70 फीसद रुपए यानी सवा तीन सौ करोड़ रुपए के कार्य स्थाई प्रवृति के कराए गए हैं। अस्थाई कार्यों के लिए 11776.58 लाख रुपए आबंटित किए गए हैं।


मुख्यमंत्री ने बताया कि कुंभ मेला कार्यों में सिंचाई विभाग सहित उत्तराखंड गंगा नहर रुड़की, पेयजल निगम, जल संस्थान, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई, पावर कारपोरेशन, लोक निर्माण विभाग, राजाजी राष्ट्रीय पार्क देहरादून, पेयजल विभाग, शक्ति नहर खंड हरिद्वार, हरिद्वार विकास प्राधिकरण, राजकीय निर्माण निगम, उत्तर प्रदेश, नगर पालिका हरिद्वार ऋषिकेश, नगर पंचायत, वन विभाग, उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम, वन विभाग हरिद्वार, परिवहन निगम, ग्रामीण अभियंत्रगण सेवा, स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग, मेलाधिष्ठान, पर्यटन विभाग, हौम्योपैथिक चिकित्सा विभाग जुटे हंै। हर विभाग का एक नोेडल अफसर बनाया गया है, जो मेलाधिष्ठान से हर विभाग से तालमेल बिठाने का काम करता है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि कुंभ मेला कार्यों में ढिलाई व भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कुंभ मेला में गंगाघाटों के निर्माण के साथ गंगा नहर पर दो स्थाई पुलों, सड़कों, रेलवे लाई ओवर ब्रिज का निर्माण किया गया है। कुंभ मेले में उनकी सरकार धन की कमी नहीं होने देगी।


डॉ निशंक ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही कुंभ कार्यों का स्थलीय निरीक्षण किया और लोकनिर्माण विभाग, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई नगर पालिका समेत कई विभागों के अफसरों को निलंबित किया, जिससे कुंभ कार्यों में लगे अफसरों में खौफ छा गया और कुंभ कामों में भ्रष्टाचार पर काफी हद तक पर रोक लगी है। और बेकाबू हुए कुंभ अधिकारियों पर अंकुश लगा है। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के जमाने में तो कुंभ मेला से जुड़े अफसर बेकाबू व निरंकुश बने हुए थे। खंडूड़ी के जमाने में एक कांग्रेसी नेता और एक व्यापारी की जमीन मेला भूमि से मुक्त कर दी गई थी, जिससे खंडूड़ी सरकार की खासी फजीहत हुई थी।


डॉ निशंक ने पद संभालते ही सबसे पहले कुंभ कार्यों की समीक्षा की और कुंभ मेला भूमि के कम होने पर चिंता जताते हुए कुंभ भूमि को संरक्षित करने के कड़े निर्देश दिए। खंडूड़ी अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार दूर करने के डंके तो बहुत बजाते थे, लेकिन उनके सचिव पीके सारंगी के कारनामों ने खंडूड़ी सरकार के भ्रष्टाचार दिनों की कारनामों की पोल खोल दी थी। बताते हैं कि जिन दो व्यापारियों की जमीन कुंभ मेला भूमि से मुक्त की गई थी। उसमें सारंगी की अहम भूमिका थी। कुंभ मेलाधिष्ठान के अफसरों ने सांरगी के ही दबाव में कुंभ मेला भूमि की मुक्त करने की कार्यवाही की थी। खंडूड़ी ने अपने कायर्काल में एक दिन भी कुंभ कार्यों का निरीक्षण नहीं किया। जबकि इसके उलट निशंक ने छह से अधिक बार कुंभ कार्यों का गहन निरीक्षण किया, जिससे कुंभ कार्यों में तेजी आई और सभी काम सही समय पर पूरे होते जा रहे हैं। इस बार खास बात यह है कि मुख्यमंत्री डॉ निशंक के दबाव और पहल के बाद केंद्र सरकार ने पहली बार हरिद्वार कुंभ मेला के लिए 400 करोड़ रुपए दिए हैं और कुंभ मेला कार्यों की समीक्षा हर सप्ताह उच्च स्तर पर हो रही है। पहली बार कुंभ मेला पर निगरानी रखने के लिए मुख्यमंत्री के दफ्तर में एक विशेष सेल बनाया गया है, जिसके प्रभारी मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुभाष कुमार है।


रमता पंच पहुंचे पांडेवाला


जनसत्ता संवाददाता

हरिद्वार, 28 दिसंबर। हरिद्वार में धार्मिक हिसाब से कुंभ की हलचल रविवार से शुरू हो गई। दशनामी संन्यासी परंपरा के सबसे बड़े पंचदश जूना अखाड़ा के रमता पंच अपने देवता निशान चंद्र प्रकाश जी के साथ अपने ढाई हजार साल पुराने ठिकाने पांडेवाला ज्वालापुर में पहुंचे। जहां उनका गर्मजोशी के साथ तीर्थ पुरोहित समाज के लोगों और श्रीगंगा सभा के सभापति कृष्ण कुमार ठेकेदार, महामंत्री वीरेंद्र श्रीकुंज पंडित रमेश सिखोला आदि ने फूल मालाओं से स्वागत किया।


तीर्थ पुरोहितों के धड़ा पंचायत फिराहैडियान, पांडेवाला ज्वालापुर के अध्यक्ष पंडित राधेश्याम प्रधान, महामंत्री सरदार पंडित श्रवण कुमार, योगेश, शशिकांत वशिष्ठ, कमलकांत, रमेश शुक्ल, राधेश्याम कुएंवाले, जागेश्वर वशिष्ठ , लक्ष्मीराणा, अरविंद राणा, प्रेम पंचभैया आदि ने पांडेवाला के द्वारा पर रमता पंचों के श्रीमंहतों, जूना अखाड़ों के निशान देवता श्री चंद्रप्रकाश जी का रोली चंदन, अक्षत, पुष्प, नवैद्य से पूजन किया। हर-हर महादेव, गंगा मैया की जय, वीर बजरंग बली के नारों से पूरा पांडेवाला गंूज उठा। वैदिक विधि विधान के साथ निशान देवता श्री चंद्रप्रकाश जी की स्थापना रघुनाथ मंदिर और गुघाल देवता के प्रांगण में बड़े पुजारी दिगंबर बाबा ओमगिरी और दिगंबर बाबा दीपक पुरी और थानापति कल्याणपुरी ने की। इस अवसर पर तंबू गाड़कर निशान देवता का अस्थायी मंदिर बनाया गया। इस तरह बारह साल बाद फिर से पांडेवाला ज्वालापुर में जुना अखाड़ के रमता पंचों की रौनक लौट आई है। उनके डेरे लग गए। कुंभ मेला प्रशासन ने पांडेवाला में सड़कों का निर्माण करवाया और बिजली का पुख्ता इंतजाम किया। रमता पंचों के पांडेवाला में आते ही इस क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां बढ़ गई हैं।


पांडेवाला में जूना अखाड़े के नागा संन्यासियों का डेरा 29 जनवरी तक रहेगा। जो 30 जनवरी को पेशवाई के रूप में नगर भ्रमण करते हुए हरिद्वार स्थित मायादेवी के प्रांगण में प्रवेश करेंगे। जहां 14 अपै्रल को कुंभ के मुख्य स्नान के बाद अपने-अपने स्थानों पर लौट जाएंगे। जूना अखाड़े का रमता पंच सन 2007 में हनुमान घाट बनारस से हरिद्वार के लिए चला था। दो साल में लंबा सफर तय करते के बाद रमता पंच हरिद्वार पहुंचे हैं। एक हफ्ते पहले रमता पंच हरिद्वार से पूर्व दिशा में स्थित कांगड़ी गांव में आए। वहां से वे कनखल स्थित भैरव मंदिर आशा रोड़ी पहुंचे। पंचक होने के कारण जहां उन्होंने छह दिन तक विश्राम किया। इसके बाद रविवार सुबह ठीक साढ़े नौ बजे वे भैरव मंदिर कनखल से पांडेवाला ज्वालापुर के लिए निकले। हनुमान गढ़ी, प्रेमनगर चैक, चंद्राचार्य चौक, भगत सिंह चौक, बीएचईएल फांउड्री तिराह होते हुए पांडेवाला के ऐतिहासिक मैदान में सुबह सवा ग्यारह बजे पहुंचे।


कनखल के हनुमान गढ़ी में निर्मल पंचायती अखाड़ा के मंहत और निर्मल संतपुरा के परमाध्यक्ष महंत महेंद्र सिंह ने अपने साथियों के साथ जूना अखाड़े के रमता पंचों का फूल मालाओं से स्वागत किया। ज्वालापुर-भेल मोड़ पर कांग्रेस नेता पूनम भगत ने रमता पंचों का स्वागत किया। ढोल, नगाड़े, नागफनी, तुरई, और शंखनाद के साथ घोड़े पर विराजमान निशान देवता को पांडेवाला लाया गया। निशांन देवता के साथ नागा संयासियों के परंपरागत हथियार भाले फरसे, चल रहें थे। निशान देवता को घोड़े पर सवार दिगंबर बाबा घनश्याम गिरी ने संभाल रखा था।


जूना अखाड़े के सभापति मंहत उमाशंकर भारती ने पांडेवाला पहुंचने पर कहा कि ढाई हजार साल पुराने स्थान पर पहुंच कर हम संतगण गद्-गद् हैं। तीर्थ पुरोहितों ने अपने पूर्वजों की वर्षों पुरानी परंपरा को जिस तरह निभाया है उससे संत समाज अभिभूत है। मंहत कणर्पुरी ने कहाकि 12 साल बाद फिर से पांडेवाला के ऐतिहासिक मैदान में संतों और तीर्थ पुरोहितों का मिलन हुआ है। यहां आज भक्ति भाव की गंगा फिर से प्रवाहित हुई है। पांडेवाला में जूना अखाड़े के साधुओं के काफिले में सभापति श्रीमहंत उमाशंकर भारती, रमता पंच के श्रीमंहत देवेंद्र गिरी, मंहत वेदव्यास पुरी, मंहत विजय गिरी, श्रीमहंत नटराज गिरी, मंहत शंभुगिरी, जूना अखाड़े के सचिव श्रीमंहत हरिगिरी, महंत प्रेमपुरी, मंहत कर्ण पुरी, मंहत प्रेम गिरी, मंहत रमण पुरी, मंहत विद्यानंद सरस्वती, थानापति कल्याण पुरी, अग्नि आखाड़ा के श्री मंहत आनंद चैतन्य, श्री मंहत अच्युतानंद ब्रह्मचारी समेत कई संत महंत उपस्थित थे। मेला अधिष्ठान की ओर से उपकुंभ मेला अधिकारी सरदार हरदेव सिंह और स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर अनिल त्यागी ने फूल-मालाओं से रमता पंचों का स्वागत किया।

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लोकतात्रिक सरकार का जनविरोधी राजशाही चरित्र

>> Wednesday, December 23, 2009

  अगर इतिहास की बात करें तो भारत के विभिन्न भूभागों में शासन कर रहे कई राजाओं को इतिहास के वर्तमान मूल्यांकन में जनविरोधी, आततायी इसी लिए कहा गया क्यों कि उन्होंने बेरहमी से जनता से जाजिया, जकात जैसे कर वसूले और उसे अपनी जरूरतों और विलासिता पर खर्च किया। इनमें सल्तनत काल के बलवन और मुगल बादशाह औरंगजेब का नाम कुख्यात है। आज वे भी जिंदा होते तो कर वसूलने की तमाम वजहें गिनाते और उसे जायज करार देते। मगर यह सच है की बेवश तत्कालीन जनता ने इसे सही नहीं माना। आज उसी जनता की दुख की कहानी इतिहास में दर्ज होकर उन बादशाहों की क्रूरता की मिशाल बन चुकी हैं। वह तो राजशाही का युग था मगर क्या हमारी आज की लोकतांत्रिक सरकार अपनी जनता के साथ क्या कर रही है? अगर आप आम नागरिक हैं तो इस सवाल पर गंभीरता से सोचिए। यकीन दिलाता हूं कि जिस दिन आप अपनी सरकारों के कामकाज का खुद मूल्यांकन करने लगेंगे आपका इस लोकतांत्रिक व्यवस्था और अपने रहनुमाओं पर से भरोसा उठ जाएगा। क्या आप कभी सोचते हैं जिन आलीशान भवनों में आपके रहनुमा रहते हैं और शाही जिंदगी जीते हैं वह सब आपकी कमाई से खर्च होता है। अपनी सारी जरूरतें के लिए बेहिसाब खर्च तो इनको वाजिब लगता है मगर जनता की सुविधाओं को यह कहकर छीनते हैं कि देश के खजाने में पैसा नहीं है।


अपनी इसी मनोवृत्ति ( मध्यकालीन क्रूर बादशाहों की मानसिकता ) के तहत वेतनभोगी भारतीयों को यह सरकार नया साल आने से पहले ही ऐसा तोहफा देने की शुरुआत कर दी है जिसके बोझ तले वेतनभोगियों व उसके परिवार के अरमान कुचल दिए जाएंगे। एक अप्रैल २००९ से ही एक अधिसूचना जारी कर आवास व यात्रा समेत कई मिलने वाले भत्तों को कर के दायरे में डाल दिया गया है। बजट से पहले ऐसा जानबूझकर किया गया है ताकि बजट के इससे अलग रखकर साफ सुथरा दिखाया जा सके। आपको याद होगा कि आम आदमी के सवाल पर सरकार के खजाने में पैसा नहीं होने का रोना रोया जाता है और दूसरी तरफ अपने वेतन भत्ते व सुविधाएं वगैरह बेहयाई से संसद में पास करा ली जाती है। अगर आप भूल रहे हों तो याद दिला दें कि भविष्य निधि की ब्याज दरों के साथ कैसा खिलवाड़ किया गया। यह बताने की जरूरत नहीं है कि भविष्यनिधि सचमुच में कर्मचारियों का भविष्य ही संवारती है मगर उस पर चोट करने से नही चूकती है हमारी जनहितकारी सरकार। १४ प्रतिशत से ८.५ प्रतिशत पर तो ला पटका और एहसान भी जताया कि हम आपके हिमायती हैं।


अपने दिमाग पर जोर डालिए तो ऐसे तमाम इनके कृत्य आपको भी दिखाई देने लगेंगे ।अभी ताजा उदाहरण तो यही है कि मंदी और खर्चों पर रोक के सरकारी नाटक के बावजूद मंत्रियों के हवाई यात्रा संबंधी विधेयक को मंजूरी २१ दिसंबर को दे दी गई। जबकि इसके ठाक पहले वेतनभोगियों की कमाई पर कर के ग्रहण की अधिसूचना जारी कर दी गई। पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि मंत्रियों को क्या दिया गया।

 जनसत्ता में २२ दिसंबर २००९ के अंक में छपी खबर देखिए----------।



मंत्रियों के हवाई यात्रा संबंधी विधेयक को मंजूरी

नई दिल्ली, 22 दिसंबर। मंत्रियों के हवाई यात्रा भाड़े संबंधी प्रावधान वाले एक विधेयक को संसद ने मंगलवार को मंजूरी दे दी। राज्यसभा ने इस संशोधन विधेयक को चर्चा के बिना ही ध्वनिमत से पारित कर दिया। लोकसभा ने इसे पहले ही अपनी मंजूरी दे दी थी। राज्यसभा में विधेयक को गृहराज्यमंत्री अजय माकन ने पेश किया था।

विधेयक के प्रावधान के हिसाब से किसी भी मंत्री, उसकी पत्नी और उसके आश्रितों को साल में एक बार देश के भीतर की जाने वाली हवाई यात्रा के भाड़े की राशि का भुगतान उसी तरह किया जाएगा जैसे उसे सरकारी यात्राओं के लिए किया जाता है। (जनसत्ता ब्यूरो )
 

भरपाई सिर्फ जनता से ही क्यों ?

   चुनाव जीतने के लिए पहले वेतन में बेतहासा वृद्धि की। इसके बाद बाकी खर्चे रोककर उसकी भरपाई करने की जगह आम वेतनभोगी की सुविधाओं को छीनने में जुट गए हैं। सभी जानते हैं कि सांसद निधि का क्या होता है? इसे खत्म करने की मांग खुद लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी कर चुके हैं। बार बार इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाया जा चुका है । इसपर रोक लगाने की बजाए इसे २ करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ करने की मांग की जा रही। जबकि समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने इसे खत्म करने की मांग फिर राज्यसभा में २१ दिसंबर को उठाई। खजाना भरने का तो यह भी तरीका ठीक ही था कि सासद निधि रोक दी जाए। या फिर देश किसी को कहीं से भी मिल रही सुविधाओं पर कर लगा दिया जाए। मगर ऐसा नहीं करेंगे। खुद पर आंच नहीं आने देंगे जनता के ये प्रतिनिधि मगर जनता को तकलीफ में डालने के हर बिल पास करा देंगे। अब उस खबर को देखिए जो इससे दो दिन पहले सभी अखबारों व समाचार एजंसियों ने प्रकाशित किए हैं। जिसमें वेतनभोगियों की कमाई छीनकर अपनी फिजूलखरची की भरपाई करने में लगी है हमारी सरकार। -----।



कर्मचारियों के भत्तों पर भी लग सकता है कर

नई दिल्ली, 19 दिसंबर (भाषा)। सरकार अब कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों (पर्क्स) मसलन आवास और यातायात भत्ते पर भी इसी वित्त साल से कर लगाने पर विचार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक वेतनभोगी वर्ग को अब उन्हें मिलने वाली सुविधाओं या लाभ पर भी कर का बोझ झेलना पड़ सकता है। सूत्रों ने बताया कि पर्क्स पर यह कर इसी साल एक अप्रैल से लगाया जा सकता है। समझा जाता है कि सरकार जल्द ही आवास किराया भत्ते और यातायात भत्ते पर कर के आकलन के लिए अधिसूचना जारी कर सकती है। बजट 2009-10 में फ्रिंज बेनिफिट टैक्स को खत्म कर दिया गया था। एफबीटी के खत्म होने के बाद अब सरकार की निगाह वेतनभोगी वर्ग को मिलने वाले लाभों पर कर लगाने की है। एफबीटी में कर का बोझ नियोक्ता पर पड़ता था। लेकिन इस कर का बोझ कर्मचारियों को उठाना पड़ेगा।

भत्तों पर इसी साल लग सकता है टैक्स

नई दिल्ली। सरकार ने वेतनभोगी कर्मचारियों के विभिन्न अनुलाभ भत्तों पर कर लगाने के नए कानून को अंतिम रूप दे दिया है। इससे उन्हें मकान और वाहन भत्ते के रूप में मिलने वाले पैसे पर टैक्स भरना जरूरी हो जाएगा। नया कानून फ्रिज बेनिफिट टैक्स (एफबीटी) की जगह लेगा। यह व्यवस्था चालू वित्त वर्ष से भी लागू हो सकती है। इससे महंगाई की मार झेर रहे कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ बढेगा।

सूत्रों के अनुसार नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारी के परिवार को दिए जाने वाले आवास भत्ते, यात्रा भत्ते तथा अन्य अनुलाभा को शीघ्र ही आयकर काटने के उद्देश्य से वेतन में शामिल किया जा सकता है। सरकार इन भतों की गणना आदि की अधिसूचना जल्द जारी कर सकती है। उल्लेखनीय है कि अब तक वेतनभोगी कर्मचारी के इन भतों पर कर नियोक्ता कंपनी को कानून एफबीटी जमा कराना पडता था।

वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने एफबीटी को 2009-10 के बजट में समाप्त कर एक नई व्यवस्था का प्रस्ताव किया था जो एक अप्रैल 2010 से लागू होनी थी। जिन लाभो को कर योग्य वेतन में शामिल किया जाएगा उसमें नियोक्ता द्वारा देय आवास सुविधा, आधिकारिक तथा व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए वाहन पर खर्च, चालक का वेतन, नियोक्ता द्वारा दिए जाने पर माली और सफाई कर्मचारी का वेतन तथा कर्मचारी के बच्चों को देय रियायती शिक्षा शामिल है। अर्नेस्ट एंड यंग कर सहयोगी अभिताब सिंह ने नए आयकर आकलन नियमों के बार में पूछने पर कहा, एफबीटी प्रणाली के तहत अनुलाभ का कर बोझ नियोक्ता पर रहता था लेकिन अब यह कर्मचारी पर होगा।

वित्त मंत्रालय आकलन नियमों की घोष्ाणा अभी करेंगा। इनके इस साल एक अप्रैल की पूर्व तिथि से लागू होने संभावना है। इससे कर्मचारियों मुश्किलें बढता तय है।

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अलाउंस पर टैक्स अप्रैल 2009 से लगेगा


पिछली तारीख से देना पड़ सकता है भत्तों पर कर




उपर्युक्त उदाहरणों के बाद अगर कुछ समझ में नहीं आ रहा हो तो हिंदी इकोनामिक टाइम्स में २५ अगस्त को डायरेक्ट टैक्स पर छपे इस लेख को पढ़िए। ------------।

नए डायरेक्ट टैक्स कोड से आम लोगों पर पड़ेगी मार

आम करदाता, छोटे निवेशक और इंडिया इंक सबकी जेब पर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का प्रस्तावित टैक्स कोड भारी पडे़गा। नए कोड से सब पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा, ईटीआईजी का मानना है कि ऐसे में यह कोड अपने मकसद में शायद कामयाब न हो पाए। आइए जानें क्या हैं वे वजहें कि यह आम लोगों के लिए चाबुक का काम करेगा। जानकारों की राय में तो यह भारत के हक में है ही नहीं। यूपीए सरकार दावा करती आई है कि उसकी नीतियों के केंद्र में देश का आम आदमी है। क्या सरकार का यह दावा खोखला है? नए डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) से तो यही लगता है कि आम आदमी के हितों का यूपीए सरकार का दावा हवाई है। यह कोड मध्यवर्ग के खिलाफ है। इस कोड का मकसद ज्यादातर करदाताओं पर टैक्स का बोझ बढ़ाना है। यही नहीं डीटीसी कम आय वर्ग वाले लोगों के लिए ज्यादा बुरा है।

इससे उन पर टैक्स का बोझ और बढ़ेगा वहीं इससे ज्यादा कमाने वाले लोगों के हाथों में टैक्स चुकाने के बाद ज्यादा पैसा आएगा। नए कोड की सबसे ज्यादा मार 5-6 लाख रुपए सालाना आमदनी वाले वर्ग पर पडे़गी। कर चुकाने वालों में सबसे ज्यादा संख्या ऐसे ही लोगों की है। नए कोड के लागू होने का बचत पर क्या असर पड़ेगा, ईटी ने इसका पता लगाने की कोशिश की है। टैक्स लायक आमदनी तय करने के लिए स्लैब दरों में बड़ा बदलाव किया गया है। नए कोड के मुताबिक भी 1.6 लाख रुपए की आमदनी पर कोई कर नहीं चुकाना होगा। अभी तक 5 लाख रुपए से ज्यादा की आमदनी पर 30 फीसदी कर लगता था, इस स्लैब को बढ़ाकर 25 लाख रुपए करने का प्रस्ताव है।

सबसे ज्यादा चर्चा इसी की हो रही है। नए कोड में सरचार्ज और सेस को खत्म करने की भी बात कही गई है। लेकिन नए कोड का दूसरा पहलू आम करदाताओं के हक में नहीं है। अभी टैक्स छूट के दायरे में शामिल होम लोन पर चुकाए गए ब्याज, हाउस रेंट अलाउंस, लीव ट्रैवल अलाउंस, मेडिकल रिम्बर्समेंट को इससे बाहर कर दिया जाएगा या इन्हें टैक्स लायक आमदनी माना जाएगा। यहां हम 3 सैलरी लेवल के लिए नए टैक्स कोड का मतलब समझने की कोशिश कर रहे हैं। इन सभी के लिए हमने यह माना है कि तनख्वाह की 10 फीसदी से ज्यादा रकम पर उन्हें आयकर छूट नहीं मिलेगी। बेसिक सैलरी हमने कुल सैलरी का 40 फीसदी तय किया है। हमने बेसिक सैलरी का 50 फीसदी एचआरए के मद में रखा है। 4 बडे़ मेट्रो में आयकर कानून के मुताबिक बेसिक सैलरी का 50 फीसदी एचआरए तय किया जाता है। होम लोन के लिए हमने 1.5 लाख रुपए और आयकर छूट के तहत 1.6 लाख रुपए की मान्य सीमा को शामिल किया है।

आयकर कानून की धारा 80सी के तहत कर छूट योग्य आमदनी, जो फिलहाल 1 लाख रुपए है, वह प्रस्तावित कोड के मुताबिक 3 लाख रुपए हो जाएगी। लेकिन पेंच यह है कि जिस आदमी की तनख्वाह 5 लाख रुपए सालाना है, अगर वह टैक्स छूट के लिए 3 लाख रुपए निवेश करता है तो उसके हाथ में कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसे में हमने कर छूट के लिए निवेश को यहां 1.5 लाख रुपए माना है। आंकड़े बताते हैं कि इस आधार पर 5-6 लाख रुपए की सालाना आमदनी वाले लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। हालांकि, 10 लाख रुपए से ज्यादा तनख्वाह वाले लोगों पर टैक्स का बोझ नए कोड के मुताबिक कम हो सकता है।

नए टैक्स कोड से माइक्रो लेवल पर यह लगता है कि इससे लोगों के हाथ में खर्च करने लायक ज्यादा रकम बचेगी। नए कोड के तहत इफेक्टिव टैक्स रेट आम करदाताओं के लिए 5-6 फीसदी होगा। हालांकि नए कोड का सबसे ज्यादा फायदा ऊपरी स्लैब में शामिल लोगों को मिलेगा। ऐसे में इसका लाभ ऊपरी मध्यवर्ग लोगों की जरूरतें पूरी करने वाली कंपनियों को मिल सकता है। इनमें एफएमसीजी, एंटरटेनमेंट, रीटेल, वित्तीय सेवाओं और दूसरे लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों को शामिल किया जा सकता है। वहीं, इससे रियल्टी और एनबीएफसी को नुकसान होगा। हालांकि, यहां यह भी याद रखने की जरूरत है कि नया डायरेक्टर टैक्स कोड 1 अप्रैल 2011 से लागू होगा। उससे पहले इस पर संसद की मुहर लगनी जरूरी है। अगले दो साल में इस टैक्स कोड में काफी बदलाव भी आ सकता है।

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जल्द अमीर बनने का ख्वाब भी टूटा !

>> Wednesday, December 2, 2009

 


       दावे चाहे जितना करें मगर यह कड़वा सच है कि दुबई में छोटी-मोटी नौकरियों के सहारे गुजर-बसर कररहे भारतीय परिवारों पर तो संकट के बादल मंडराने लगे हैं। किसी बड़े आंकड़े के चक्कर में न पड़कर सिर्फ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सामान्य लोग इससे कितने प्रभावित हो रहे हैं या होंगे । मेरी जानकारी में मेरे गांव के करीब दर्जनों ऐसे बेरोजगार लड़के कंप्यूटर की डिप्लोमा सिर्फ इसलिए ले रहे हैं कि उन्हें दुबई में रह रहे लोगों ने साथ ले जाने और नौकरी दिलाने को कहा है। अभी वे घोर निराशा में जी रहे हैं। जो नौकरियां दिलाने की बात कर रहे थे, अब वे ही मुश्किल में यातो फंस गए हैं या फिर फंसने वाले हैं। कम से कम निर्माणकार्य में लगे हजारों मजदूरों को तो बेहद धक्का पहुंचा है।


     मेरठ के एक नौकरीपेशा भारतीय की नौकरीदुबई से एसएमएस भेजकर नौकरी खत्म किए जाने की कहानी तो सभी अखबारों में छप चुकी है।कुल मिलाकर दुबई संकट ने तमाम बरोजगारों के सपने भी तोड़ दिए हैं। एक तो बड़ी मुश्किल से दुबई जाने का मौका हाथ लगता है वह भी इस दुबई संकट ने छीन लिया। थोड़े दिनों में अमीर बन जाने का इनका भी सपना चनाचूर हो गया है। क्यों कि दुबई का आकर्षण शाहरूख खान से लेकर मामूली मजदूर तक को खांचकर यहां लाता है।


       दुबई आज दुनिया की सर्वाधिक आकर्षक जगहों में से एक है। यह सारा श्रेय दुबई वर्ल्ड को जाता है। यानी दुबई में तेज़ी से हुई विकास के पीछे बहुत हद तक दुबई वर्ल्ड का ही हाथ है। अब विश्व की आर्थिक मंदी का ग्रहण इसपर भी लग गया है। संयुक्त अरब अमीरात में सात स्वयं-शासित अमीरात या राज्य हैं और दुबई उनमें से एक है। इसी दुबई की मुख्य निवेश कंपनी दुबई वर्ल्ड संकट में है। यह दुनिया को इस संकट का तब पता चला जब दुबई की यह सरकारी कंपनी दुबई वर्ल्ड ने अनुरोध किया कि जिन कंपनियों ने उसे कर्ज़ दिया है वो उसे छह महीने की अवधि और दें ताकि वो ऋण चुका सके। कंपनी को पांच करोड़ नब्बे लाख डॉलर का कर्ज़ चुकता करना है। दरअसल छह साल से तेज़ गति से विकास के बाद 2008 से वहाँ अर्थव्यवस्था डगमगाई है. इस कारण प्रॉपर्टी मार्केट में दाम गिरे हैं। विदेशी पैसे और बड़ी योजनाओं पर आधारित आर्थिक मॉडल अपनाने का खामियाज़ा दुबई को भुगतना पड़ रहा है।
 
    दुबई वर्ल्ड के कर्ज़ अदायगी से संबंधित संकट के सार्वजनिक होने के बाद भारत समेत दुनिया भर के शेयर बाज़ार गिरे हैं। अनेक भारतीय जो दुबई में दशकों से काम करते रहे हैं, उनकी नौकरियाँ ख़तरे में आ गई हैं क्योंकि निवेश कंपनी दुबई वर्ल्ड कोई एक प्रतिष्ठान नहीं बल्कि पूँजी निवेश के हिसाब से उसका अनेक कंपनियों और प्रतिष्ठानों में दख़ल है।
दुबई संकट की मार वहां काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों पर पड़ने लगी है। दुबई से ईद की छुट्टी पर मेरठ और कोच्चि आए हुए साठ से ज्यादा लोगों को एसएमएस के जरिए बताया गया है कि वो काम पर वापस न लौटें। इनमें से ज्यादातर लोग दुबई के ढ़ांचा निर्माण क्षेत्र की अलग-अलग कंपनियों में टाइल बनाने वाली इकाई में काम करते थे। प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री व्यालार रवि ने भी भरोसा दिलाया है कि दुबई वित्तीय संकट से ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि इसमें नया कुछ नहीं है। मंदी की शुरूआत के समय से ही स्थिति खराब थी। उस वक्त करीब 1 लाख लोग देश वापस लौटे थे। लेकिन उनमें से ज्यादातर लोग वापस दुबई में काम के लिए चले गए हैं।

संकट और गहराएगा ?

   भारत के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने भरोसा दिलाया है कि भारत पर दुबई संकट का कोई असर नहीं पड़ेगा। संभव है ऐसा हो मगर दुबई सरकार के दुबई वर्ल्ड के कर्ज की गारंटी लेने से मना कर देने के बाद दुबई का संकट अब और गहराता नजर आ रहा है। दुबई सरकार ने कहा है कि वह दुबई वर्ल्ड को सशर्त मदद देगी। साथ ही उसने कर्जदाताओं से री-स्ट्रक्चरिंग के जरिए मसला सुलझाने को कहा है। सरकार इस कंपनी की मालिक है। लेकिन सरकार ने कंपनी की कोई गारंटी नहीं ली है। दुबई वर्ल्ड द्वारा लिए गए कर्ज की भी सरकार गारंटी नहीं ले रही है।
 
 दुबई वल्र्ड के 80 अरब डॉलर के कर्ज में ज्यादातर गल्फ बैंकों की हिस्सेदारी है। इससे इन बैंकों के सामने भी समस्या खड़ी होने की बात से भी मना नहीं किया जा सकता। हालांकि यूएई के सेंट्रल बैंक ने भरोसा जताया है कि इन बैंकों पर आंच नहीं आने दी जाएगी। हालांकि सेंट्रल बैंक का यह बयान भी बाजार के दबाव को कम करने में असफल रहा।जिन कंपनियों के 26 अरब डॉलर की कर्ज़ अदायगी के बारे में बात हो रही है वे हैं - लिमिट्लेस और नाखील. इसमें छह अरब डॉलर के इस्लामी बॉंड भी हैं जिन पर इस्लामी क़ानून के हिसाब से ब्याज नहीं दिया जाता। फिलहाल दुबई वर्ल्ड ने अपना कर्ज़ नए सिरे दिए जाने की व्यवस्था करने पर बैंकों से बातचीत शुरु की है।यह घोषणा तब हुई है जब दुबई की सरकार ने स्पष्ट तौर पर दुबई वर्ल्ड के कर्ज़ की गारंटी लेने से इनकार कर दिया है.

दुबई को लेकर बॉलीवुड भी हुआ चिंतित
दुबई ऋण संकट ने बॉलीवुड निर्माताओं और वितरकों को भी चिंता में डाल दिया है। हिंदी फिल्मों के लिए पश्चिम एशिया बाजार में दुबई की अहम भूमिका रहती है।
बॉलीवुड की आगामी फिल्म 'पा', जिसमें अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन दिखाई देंगे, ने पहले ही अपने दुबई प्रीमियर को टाल दिया है, हालांकि फिल्म के सह-निर्माता, रिलायंस बिग पिक्चर्स ने इसके लिए साजो-सामान की किल्लत को जिम्मेवार बताया है।
फिल्म उद्योग के विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी बाजार कई बॉलीवुड की नई रिलीज होने वाली फिल्मों, दे दना दन, रेडियो, रॉकेट सिंग, पा और 3 इडियट्स के कारोबार के लिए अहम है। विदेशी बाजारों में भी खाड़ी क्षेत्र हिंदी फिल्मों के लिए अहम बाजार बनता जा रहा है।
मुंबई के एक उद्योग विशेषज्ञ का कहना है, 'लगभग 50 करोड़ रुपये इन फिल्मों में विदेशी बाजारों से हासिल होने की उम्मीद है, क्योंकि अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इन फिल्मों की कलेक्शन का कम से कम 25 से 30 फीसदी हिस्सा यही से मिलेगा। निर्माताओं को लगभग विदेशी बाजारों से 50 करोड़ रुपये कमा पाने की उम्मीद है।'
हिंदी फिल्मों के वितरकों के मुताबिक दुबई के बाजार से बॉलीवुड फिल्मों के कुल विदेशी क्लेक्शन का लगभग 40 से 45 फीसदी हासिल होता है। किसी भी प्रमुख बॉलीवुड अभिनेता जैसे शाह रुख खान, आमिर खान, अमिताभ बच्चन या अक्षय कुमारकी कोई भी फिल्म विदेशी बाजारों में लगभग 35 से 40 फीसदी क्लेक्शन कर पाती है।
फिल्म निर्माता और वितरक कंपनी शेमारू फिल्म के निदेशक हीरेन गाडा का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र, अमेरिका और ब्रिटेन से कुल मिलाकर किसी भी बॉलीवुड की फिल्म के लिए विदेशी कलेक्शन का 70 से 75 फीसदी हिस्सा हासिल होता है, जिसमें से पश्चिम एशिया हमेशा शीर्ष दो विदेशी बाजारों में शामिल होता है।
डागा बताते हैं, 'बॉलीवुड फिल्में दुबई की 40 से 50 स्क्रीनों पर काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। अक्षय कुमार की एक्शन फिल्म ब्लू हाल में ही खाड़ी बाजारों में बढ़िया कारोबार कर पाई है।' शेमारू के पास 'ब्लू' के अंतरराष्ट्रीय वितरण अधिकार हैं।
दुबई बाजार में बॉलीवुड फिल्मों के वितरक और एक फिल्म वितरक कंपनी अल-मनसूर की प्रवर्तक खुशी खटवानी का कहना है, 'रियल एस्टेट के लिए में कोई विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन दुबई में बॉलीवुड बाजार पर क्या असर होगा, यह कह पाना जल्दबाजी होगा।' दुबई में फिल्म एवं वीडियो वितरण एजेंसी के साथ काम करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि दुबई की विशेष जनसंख में लगभग 40 फीसदी भारतीय हैं।
रिलायंस बिग पिक्चर्स के अंतरराष्ट्रीय वितरण के प्रमुख जवाहर शर्मा मानते हैं, 'पिछले साल वित्तीय संकट के बावजूद अमेरिका में बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को देखते हुए कह सकते हैं कि मंदी में भी लोग फिल्म पर खर्च कर रहे थे। लेकिन थिएटरों में फिल्म देखने जाने वालों की रफ्तार में कमी आई थी।'

दुबई वर्ल्ड में निवेश का ब्योरा दें बैंक : आरबीआई

     भारतीय रिजर्व बैंक दुबई वर्ल्ड में भारतीय बैंकों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष निवेश की विस्तृत जानकारी मांगेगा।  उल्लेखनीय है कि दुबई सरकार के स्वामित्व वाली संकटग्रस्त होल्डिंग कंपनी दुबई वर्ल्ड ने अपना कर्ज चुकाने के लिए ऋणदाताओं से और अधिक समय देने की गुजारिश की है। आरबीआई ने हालांकि इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं दी लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दुबई वर्ल्ड में इसका निवेश तकरीबन 928 करोड़ रुपये का है।
बैंक के एक अधिकारी ने कहा, 'इस राशि का भुगतान साल 2012 के बाद किया जाना है। कंपनी ब्याज का भुगतान कर रही है और कोई बकाया नहीं है। इसलिए हमें तात्कालिक तौर पर कोई चिंता नहीं है।' अधिकारी ने कहा कि यूनाइटेड अरब अमीरात में बैंक का कुल निवेश अनुमानत: 10,000 करोड रुपये का है जिसमें दुबई की हिस्सेदारी लगभग 4,000 करोड रुपये की है।
यद्यपि यूएई की रियल एस्टेट कंपनियों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निवेश लगभग 600 करोड़ रुपये का है लेकिन अधिकारी ने बताया कि इस ऋणदाता ने दुबई वर्ल्ड की रियल एस्टेट इकाई नखील को किसी प्रकार का कर्ज नहीं दिया है।
उल्लेखनीय है कि रियल एस्टेट की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक की गिरावट आने से नखील को सर्वाधिक नुकसान उठाना पड रहा है। दुबई वर्ल्ड में बैंक ऑफ बड़ौदा के निवेश की खबरों से निवेशकों की धारणाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ा और बैंक के शेयर की कीमतों में बंबई स्टॉक एक्सचेंज पर 4.64 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके शेयर 521.40 रुपये पर बंद हुए।
  
  दुबई और यूएई में परिचालन कर रही कंपनियों में ऐक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंकों (आईओबी) का भी निवेश है। भारतीय रियल एस्टेट डेवलपर्स की दुबई इकाई में निवेश के बारे में आईओबी ने बताया कि इसका निवेश तकरीबन 70 करोड़ रुपये का है जबकि ऐक्सिस बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इसका निवेश लगभग 46 करोड रुपये का है।
बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी ने कहा कि पश्चिम एशिया में बैंक की कोई शाखा नहीं है और इस क्षेत्र की रियल एस्टेट कंपनियों में इइसका कोई प्रत्यक्ष निवेश नहीं है। अधिकारी के अनुसार, इन कंपनियों में कुल निवेश लगभग 100 करोड रुपये का है, हालांकि उन्होंने कंपनियों के नाम नहीं बताए। उन्होंने कहा, 'ये सब निष्पादित परिसंपत्तियां हैं और हमें नहीं लगता कि पुनर्भुगतान में अधिक परेशानी होगी।'

रेमिटेंस नहीं होगा प्रभावित: चावला
वित्त मंत्रालय ने कहा कि रियल एस्टेट बाजार में आई मंदी से पैदा हुए वित्तीय संकट के चलते खाड़ी देश में भारतीयों द्वारा स्वदेश भेजा जाने वाला धन :रेमिटेंस: प्रभावित होने की संभावना नहीं है। वित्त सचिव अशोक चावला ने बताया, '' जब बड़ा संकट था उस दौरान भारतीयों द्वारा स्वदेश धन भेजने के रुख में कमी नहीं आई। इसलिए इस संकट का रोजगार, वेतन और रेमिटेंस पर असर पड़ने की संभावना नहीं है।''

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दुबई की मार भारतीयों पर  video

ब्रिटेन में भारतीय छात्रों को पड़े खाने के लाले

घर लौटे कर्ज़ का बोझ लेकर

दुबई की मार भारतीयों पर

Pranab plays down impact

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अन्नदाता का संकट कब समझेगी सरकार ?

>> Friday, November 20, 2009



   किसानों की परेशानियों-दुखों के प्रति कभी सचेत नहीं रही है सरकार। लगभग हर अनाज को किसानों को औने-पौने भाव में बेचना मजबूरी है। अपना अनाज तो उसे सस्ता बेचना पड़ता है मगर बाजार में वहीं अनाज का भाव आसमान छूने लगता है। यह लाभ किसान ले सके, इसकी कभी किसी सरकार को चिंता नहीं रहती। अनाज व्यापारी तो मालामाल हो जाता है और किसान के किस्मत में बस रोना ही रह जाता है। वैसे तो तमाम मंडियों व विपणन के आंकड़े सरकार के पास हैं मगर ये सिर्फ दिखावे के हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़ीशा समेत तमाम राज्यों के किसान आत्महत्या क्यों करने पर मजबूर हो रहे हैं? गन्ना पैदा करने वाले किसान को मंहगी चीनी खरीदनी पड़ती है और गेहूं पैदा करने वाले किसान को मंहगा आंटा खरीदना पड़ता है। आखिर कृषि विपणन व अनाजों के समर्थन मूल्य की ऐसी कोई व्यस्था लाने के प्रति सरकारें क्यों नहीं ईमानदार दिखातीं, जिसमें किसानों को भी उसकी उपज का पर्याप्त लाभ मिले। यह अन्याय आखिर कबतक किसान झेलेगा कि सभी की भलाई की खातिर किसानों को बेमौत मरने को छोड़ दें। किसान के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी, अनाज का सरकारी दाम तो सरकारें तय करने में इतनी रुचि दिखाती हैं मगर बाजार की आसमान छूती कीमतों के लिए जिम्मेदार व्पापारियों को अपने सामान न्यूनतम मूल्य पर बेचने पर कभी मजबूर नहीं कर पाती। नियत्रण का आखिर यह कौन सा तरीका है जिसमें अंततः किसान को ही पिसना पड़ता है। अन्नदाता किसान आखिर क्यों बेहाली का जीवन जीने को मजबूर रहे ? यह कड़वा सच सभी को मालूम है कि कृषि प्रधान देश कृषि में सबसे पिछड़ा हुआ है। मुफलिसी की त्रासद जिंदगी से परेशान किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। गन्ना किसानों को आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ा। देश में तमाम वेतन आयोग गठित करके नौकरीपेशा लोगों को तो बेहतर जिंदगी प्रदान करने को अगर आवश्यक माना गया है तो किसानों की बेहतरी के ऐसे उपाय व मानक क्यों नहीं तय कर पाती हैं सरकारें? अन्नदाता के साथ यह बेईमानी कब करती रहेंगी सरकारें ?



अब जैसे ही गन्ना किसान सड़क पर उतरे सभी राजनैतिक दलों के कान खड़े हो गए। राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए इनके हमदर्द बन गए। आखिर इन सभी दलों के बाकायदा संगठन काम करते हैं मगर कभी भी इनके एजंडे में किसानों का सुखदुख नहीं रहा। चुनावी लाभ की खातिर तो ये कुछ भी करते हैं मगर हकीकत में किसानों के हित में कोई आंदोलन नहीं खड़ा किया। तेलंगाना आंदोलन से लेकर शेतकारी संगठन तक सभी वोटबैंक की राजनीति की भेंट चढ़ गए। संभव है कि गन्ना किसानों का आंदोलन भी थोड़ी सुविधाएं देकर दरकिनार करदिया जाए। जबकि होना यह चाहिए कि किसानों की हर परेशानियों को समझनेऔर उसके हल की कोशिश की जानी चाहिए।


   एक सवाल यह भी है कि आखिर सिर्फ गन्ना के लिए ही आंदोलन क्यों ? क्या किसानों की खेती की जमीन का अधिग्रहण, किसानों के लिए अनिवार्य बिजली, बाकी अनाजों या कृषि उत्पादों के सरकारी समर्थन मूल्य का संकट समस्या नहीं है? इसकी एक वजह बड़े किसान हो सकते हैं जिनके ये समर्थन मूल्य ज्यादा प्रभावित करते हैं। हालांकि मध्यम या लघु किसान भी इससे प्रभावित होता है मगर ये गन्ना की पेराई करके गुड़ वगैरह बनाकर खुद को बचा पाते हैं मगर बड़े किसान ऐसा चाहकर भी नहीं कर सकते हैं। उन्हे हर हाल में खेत में खड़ा गन्ना चीनी मिलों पर भेजना ही होगा। अगर उसके सही दाम नहीं मिले तो इनके आय में भारी कमी आ जाएगी। राजनैतिक दलों पर दबदबा भी इन्हीं किसानों का है। इसी लिए बड़े किसानों के इस आंदोलन ने संसद में तूफान खड़ा कर दिया। लगातार दूसरे दिन संसद में हंगामा हुआ। सरकार झुक गई और अब गन्ने का समर्थन मूल्य बदलने के लिए नया अध्यादेश लाएगी सरकार। हालांकि इसका फायदा छोटे गन्ना किसानों को भी मिल पाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे ही किसानें की समस्याए खत्म हो गईं। शायद नहीं। यह अलबत्ता है कि सरकार के सिर से फिलहाल यह बला टल गई। तब आखिर कैसे बदलेगी भारत के किसानों की तकदीर? कैसे मिलेगा किसानों की उपज का वाजिब दाम ? क्या हर फसल की कटाई के वक्त किसानों को दिल्ली में धरना देना होगा ? बाजार और समर्थन मूल्य में तालमेल की जबतक ठोस नीति सरकार अख्तियार नहीं करेगी तब तक किसान बदहाल ही रहेगा।

मैं भी किसान हूं
मैं भी किसान हूं और हमारे खेतों में भी सबसे ज्यादा गन्ने की फसल लहलहाती थी। मगर अब सिर्फ जरूरत भर को गन्ना बोया जाता है। मिल पर गन्ना भेजने से मेरे इलाके के जादातर किसानों ने तौबा कर ली है। मैं उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले का रहने वाला हूं। सैदपुर के पास सिहोरी में अत्याधुनिक गन्नामिल खोली गई। कुछ साल चलने के बाद बंद भी हो गई। जानना चाहते हैं क्यों ? जब मिल खुली तो बड़ा उत्साह था जंगीपुर से लेकर बहरियाबाद तक के किसानों में। यह उत्साह दो-एक साल में ही ठंडा पड़ गया। हुआ यह कि गन्ना किसानों को भुगतान मिल ने समय पर नहीं दिया। बकाया लेने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ कि सभी को गन्ने की जगह दूसरी फसल बोना ज्यादा फायदेमंद दिखा। देखते-देखते इलाके के प्रायः सभी मझोले व छोटे किसान हताश हो गए। मिल पर स्थानीय गन्ना आना कम होगया। इसके बादजूद गन्ना किसानों को प्रोत्साहित करने की कोई कोशिश नही की गई। उल्टे बाहर से गन्नामंगाना शुरू किया गया जिसने अंततः मिल को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया। हमारे इलाके की नंदगंज सिहोरी सुगर मिल उत्तर प्रदेश की सुगर मिलों की सूची में तो है मगर अब यह रायबरेली के दरियापुर में है। मालूम हो कि देशभर में सबसे ज्यादा चीनी मिलें उत्तरप्रदेश में ही हैं। मगर बदहाल भी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के ही गन्ना किसान हैं।

     इस इलाके में आलू की खेती का भी यही हाल हुआ। हताशगन्ना किसान आलू की बड़ पैमाने पर खेती करने लगे। कोल्ड स्टोरेज में रखना और अच्छे मूल्य पाकर बेचना फायदेमंद साबित हुआ मगर किसानों की यह कोशिश भी सरकार की अव्यवस्था की भेट चढ़ गई। आलू के अधिक उत्पादन और विपणन की सरकारी संरक्षण में उचित व्यवस्था के अभाव में आलू इतने गिरे भाव में बिके कि किसानों की लागत भी निकलनी मुश्किल हो गई। उपर से बिजली की कमी से आलू भारी तादाद में सड़ गए। इतना घाटा होने लगा कि इस इलाके के किसान आलू की खेती से पीछे हटे और हताश हो गए। किसानों के इन हालात की जानकारी सरकार और सरकार चलाने वाले दलों को भी थी मगर इसकी फिक्र किसी को नही हुई। अगर एकजुट होकर यही किसान आंदोलन करते , दलों के वोंट बैंक पर इससे आंच आती तो संभव था कि सिहोरी सुगर मिल भी बंद नहीं होती और आलू किसान भी तबाह नहीं होते। मगर किसानों ने चुपचाप सबकुछ सह लिया और हर चुनाव में वोट देने भी जाते हैं। ये छोटे और मझोले किसानों की प्रवृत्ति होती है कि जल्दी वे आंदोलन की राह नहीं पकड़ते। इसी लिए सियासत की रोटियां सेंकने वाले दलों को इनसे भय नहीं लगता है।वे बड़े किसानों पर आश्रित हैं कि आंदोलन वे ही करेंगे और लाभ तो उनको भी मिल ही जाएगा। यह भ्रम आखिर कब टूटेगा ? क्या सिहोरी खुलवाने कोई बड़ा किसान आया ? यह जरूरी है कि छोटे किसान भी जागें और सरकार की तंद्रा तोड़ें। अपने हक के लिए आवाज उठाएं ताकि संसद में उनकी भी गूंज उठे। अब देश के किसानों के खुद ही अपनी क्रांति की मशाल उठानी होगी। तभी बदलेगी भारत की तकदीर ।

( इस लेख के आखिर में मौजूदा गन्ना किसान आंदोलन परपिछले दिनों छपे कुछ समाचार और सरकार की लागत मूल्य की पूर्व कहानी भी दे रखी है। आप चाहें तो अवलोकन कर लें।)

भण्‍डारण, विपणन एवं मूल्‍य निर्धारण
कृषि जिन्‍सों का भण्‍डारण, मूल्‍य निर्धारण एवं विपणन उत्‍पादन की प्रक्रिया की तरह उच्‍च लाभों के लिए महत्‍वपूर्ण है। यही वजह है कि सरकार ने 1951 से विभिन्‍न पंच वर्षीय योजनाओं के माध्‍यम से भौतिक व्‍यापार खेतों पर तथा खेतों से बाहर भण्‍डारण, मूल संरचना, मानकीकरण एवं स्‍तरीकरण के लिए सुविधाओं, पैकेजिंग और पविहन के विकास पर जोर दिया हैं। उपयुक्‍त भण्‍डारण सुविधाओं के अभाव के कारण कीटों एवं अन्‍य जीवों द्वारा आक्रमण किया गया हैं। ऐसी जन्‍तु बाधा से हुई क्षति के कारण क्षति की सीमा के अधीन बाजार मूल्‍य में कमी आती है। कुछ मामलों में उत्‍पाद को उपयोग हेतु अनुपयुक्‍त घोषित कर दिया जाता है एवं उसे नष्‍ट करना पडता हैं। इसके फलस्‍वरूप किसानों को भारी क्षति उठानी पडती है। समझदार किसान अपने कृषि उत्‍पादों को सावधानी पूर्वक भण्‍डारण करने के लिए उपाय करने चाहिए ताकि बाजार में अधिकतम कीमत प्राप्‍त की जा सकें।
अधिकतर कृषि जिन्‍स बाजार नियमित मांग एवं आपूर्ति की नियमित ताकतों के अधीन कार्य करती हैं। सरकार कुछ फसलों के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य अथवा संबंधित मूल्‍य भी निर्धारित करती है ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके तथा उत्‍पादन बढाने के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित किया जा सकें। यदि इन जिन्‍सों की कीमत समर्थन सीमा से नीचे गिरती है तो सरकार राज्‍य खाते में इन फसलों को खरीदने की व्‍यवस्‍था करती हैं।

सरकार भारत में एक विनियमित बाजार प्रणाली के माध्‍यम से कृषि उत्‍पादों के सुंसगठित विपणन का समर्थन करती है। इन भौतिक बाजारों का आशय यह सुनिश्चित करने से है कि किसान ईमानदारी का माहौल बना करके उचित लाभ प्राप्‍त कर सकें। यह ईमानदारी मांग तथा आपूर्ति की ताकतों, बाजार व्‍यवहारों के विनियमन तथा लेन-देन में पारदर्शिता से संबंधति होता हैं। यहां स्‍थानीय भण्‍डारण भण्‍डागारों, विपणन नेटवर्कों तथा सामग्री कीमतों के बारे में कुछ सूचना है जिससे आपके कृषि उत्‍पाद के लिए अच्‍छे मूल्‍य प्राप्‍त करने में मदद मिलेगी।


फसल वार, बाजार वार तथा न्‍यूनतम मूल्‍य


कृषि जिन्‍सों के क्रय एवं विक्रय की एक कारगर प्रणाली प्राप्‍त करने के लिए अधिकतर राज्‍य सरकारों एवं संघ शासित क्षेत्रों ने कृषि उत्‍पाद बाजारों के विनियमन के लिए व्‍यवस्‍था करने हेतु कृषि उत्‍पाद विपणन समिति जैसे विधानों को अधिनियमित किया है। इन विनियमित भौतिक बाजारों की स्‍थापना इसलिए की गई है। ताकि कृषकों को अपनी फसलों एवं अन्‍य कृषि उत्‍पादों के लिए लाभ की मुनासिव राशि सुनिश्चिम की जा सकें।

आजादी के समय भारत में लगभग 286 विनियमित बाजार थे। इस समय, देश में 7500 से अधिक ऐसे बाजार हैं। इनमें से अधिकतर विनियमित बाजार थोक़ बाजार हैं। इन बाजारों के अलावा, लगभग 30000 ग्रामीण आवधिक बाजार हैं जिनमें से 15 प्रतिशत विनियमन की परिधि के अंतर्गत काम करते हैं। वर्तमान में एकल विनियमित बाजार की औसत पहुंच 459 वर्ग कि.मी हैं। इसका अर्थ यह है कि किसानों को यह सुविधा प्राप्‍त करने के लिए काफी लम्‍बी दूरी तय करनी पडती है।
80 प्रतिशत से अधिक बाजारों में आंतरिक सडकों, चार दीवारी विद्युत प्रकाश, चढाने एवं उतारने की सुविधा तथा माप-तोल उपस्‍कर जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। किसानों के विश्राम गृह आधे से अधिक विनियमित बाजारों में हैं। सरकार जिन मूलभूत ढांचे को सभी विनियमित बाजारों तक पहुंचाना चाहती है वे है, नीलामी मंच, शोषक प्रांगण एवं शीत भण्‍डार इकाइयां हैं।( स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल )


जब किसानों ने संसद घेरा


   गन्ने के समर्थन मूल्य को लेकर संसद में विपक्ष और दिल्ली की सड़कों पर किसानों के तेवर देखने के बाद केंद्र सरकार नरम पड़ती दिख रही है। सरकार ने इस मसले पर सोमवार को सभी पार्टियों की बैठक बुलाई है। कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि सरकार किसानों की मांग के देखते हुए गन्ना अध्यादेश पर विचार करने के लिए तैयार है। इसके बाद किसानों ने अपना प्रदर्शन बंद कर दिया है।
इससे पहले संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में एनडीए, आरजेडी और समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने गन्ने के मूल्य के सवाल को लेकर भारी हंगामा किया। इसके बाद सदन की बैठक एक बार के स्थगित करने के बाद दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। संसद के बाद दिल्ली की सड़कों पर भी गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने को लेकर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत और राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजीत सिंह के अगुआई में हजारों किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पश्चिमी यूपी से हजारों की संख्या में गन्ना किसान सुबह से ही दिल्ली पहुंचने लगे थे। इसकी वजह से कई इलाकों में सड़कों पर ट्रैफिक जाम हो गया। भारी विरोध प्रदर्शन को देखने के बाद सरकार तुरंत हरकत में आई। प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कृषि मंत्री शरद पवार के साथ चर्चा की । इसमें गन्ना के समर्थन मूल्य पर फिर से विचार करने का फैसला किया गया। बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर गतिरोध दूर करने के लिए राज्य सरकार और गन्ना मिल के मालिकों से भी बात करने का फैसला किया है। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने मीटिंग में लिए फैसले की तो कोई जानकरी नहीं दे लेकिन बताया कि जो भी फैसला लिया गया है उसे आज शाम होने वाली कैबिनेट की मीटिंग में रखा जाएगा। कैबिनेट की मीटिंग से पहले शरद पवार मंत्रालय के अधिकारियों के साथ भी इस पर चर्चा करेंगे।
गन्ने के मूल्य को तय करने के लिए केंद्र सरकार का एक अध्यादेश लाई है जिसमें गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) वर्ष 2009-10 के लिए 129.85 रुपये प्रति क्विंटल रखा गया है। साथ ही केंद्र सरकार का कहना है कि अगर राज्य सरकार एफआरपी से अधिक मूल्य तय करती है तो उसकी भरपाई भई राज्य सरकार को ही करनी होगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) 165 रुपये से 170 रुपये निर्धारित किया है। किसानों की मांग है कि उन्हें गन्ने की कीमत ढाई सौ रुपये से अधिक प्रति क्विंटल दी जाए।

गन्ना मूल्य के सवाल पर लोस में हंगामा,कार्यवाई स्थगित
नयी दिल्ली। संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में आज विपक्षी राजग के साथ साथ समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के सदस्यों ने गन्ने के मूल्य के सवाल को लेकर भारी हंगामा किया जिसके चलते सदन की बैठक एक बार के स्थगन के बाद कल सुबह तक के लिए स्थगित कर दी गयी।
अध्यक्ष ने जैसे ही प्रश्नकाल शुरू करने की घोषणा की कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और रालोद प्रमुख अजित सिंह की अगुवाई में पार्टी सदस्य आसन के समक्ष आकर गन्ने के मूल्य के सवालों को लेकर नारेबाजी करने लगे।
यह सदस्य गन्ना किसानों की लूट बंद करो’’ के नारे लगा रहे थे। उधर भाजपा सहित राजग सदस्य भी अपने स्थानों पर खड़े होकर कुछ बोल रहे थे लेकिन शोर के कारण उनकी बात सुनी नहीं जा सकी। कई अन्य विपक्षी दलों के सदस्य भी अपने स्थानों पर खड़े हुए थे।
अध्यक्ष ने सदस्यों को शांत कराने का प्रयास करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर बाद में पूरी चर्चा करायी जा सकती है लेकिन अभी प्रश्नकाल चलने दें। हंगामा थमते न न देख अध्यक्ष ने बैठक आधे घंटे बाद दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।
सदन की बैठक दोबारा शुरू होने पर भी यही नजारा था। सपा और रालोद के सदस्यों के साथ साथ राजग के भी अनेक सदस्य अपने स्थानों से उठकर आसन के समक्ष आ गए।
अध्यक्ष ने शोरशराबे के बीच ही जरूरी दस्तावेज सदन के पटल पर रखवाए और स्थिति शांत होते न न देख बैठक दिनभर के लिए स्थगित कर दी। इससे पूर्व आज सुबह सदन की बैठक शुरू होने पर फिरोजाबाद से कांग्रेस टिकट पर चुन कर आए राज बब्बर तथा दो मनोनीत एंग्लो इंडियन सदस्यों चार्ल्स डायस तथा इंग्रीद मैक्लेयोड ने सदन की सदस्यता की शपथ ली। अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन के नौ पूर्व सदस्यों के निधन का उल्लेख किया और सदन ने दिवंगत नेताओं को कुछ क्षण का मौन रखते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

गन्ना किसानों के लिए एफआरपी तय करना प्रदेश सरकार का अधिकार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि केन्द्र सरकार का एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) जो भी हो राज्य में गन्ना किसानों को चीनी मिलों से सामान्य प्रजाति के लिए प्रति कुंतल 165 रुपये और अगैती प्रजाति के लिए प्रति कुंतल 170 रुपये का राज्य परामर्शित मूल्य सुनिश्चित करायेगा। प्रदेश के मंत्रिमंडलीय सचिव शशांक शेखर सिंह ने आज यहां संवाददाताओं से बातचीत में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि गन्ना किसानों के लिए राज्य परामर्शित मूल्य निर्धारित करना प्रदेश सरकार का अधिकार है और प्रदेश के गन्ना किसानों को वह मूल्य सुनिश्चित किया जायेगा।
सिंह ने बताया कि राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों एवं आयुक्तों को निर्देश दिये हैं कि वे अपने क्षेत्रों में चीनी मिलों में पेराई शुरू कराएं और गन्ना किसानों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। केन्द्र सरकार द्वारा एफआरपी की नयी नीति के तहत गन्ने का दाम प्रति कुंतल 129.84 रुपये तय किये जाने पर शेखर सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री मायावती ने पूर्व मे लागू नीति ही जारी रखने का आग्रह करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा है। उन्होंने बताया कि हालांकि केन्द्र सरकार से इस संबंध में कोई उत्तर नही मिला है मगर राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में दिये आदेश के अनुसार राज्य परामर्शित मूल्य निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है और राज्य सरकार ने पेराई वर्ष 2009-10 के लिए पिछले वर्ष के मुकाबले पहले ही प्रति कुंतल 25 रुपये की बढोत्तरी कर दी है।

गन्ना मूल्य विवाद से चीनी उद्योग को भी लगेगा झटका

सरकार द्वारा लागू की गई गन्ना मूल्य की नई व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि चीनी उद्योग के लिए भी संकट का सबब बन सकती है। यह विवाद देश के चीनी उद्योग के लिए दीर्घकालिक रूप से घातक साबित हो सकता है। खासतौर से पिछले कुछ बरसों में उत्तर भारत में चीनी उत्पादन की क्षमता में निवेश करने वाली कंपनियां इसकी चपेट में आ सकती हैं। इसकी वजह पिछले करीब चार साल में इन राज्यों में चीनी कंपनियों द्वारा बढ़ाई गई क्षमता के बेकार हो जाने की आशंका है। अभी भी कई समूह अपनी पेराई क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रहे हैं। इसका कारण पिछले दो साल में गन्ना किसानों द्वारा क्षेत्रफल में लगातार कमी किया जाना रहा है।
यही वजह है कि केंद्र सरकार द्वारा लागू एफआरपी व्यवस्था को लेकर चीनी उद्योग भी बंट गया है। इसने उत्तर भारत के राज्यों में निजी चीनी उद्योग की चिंता काफी बढ़ी है। भले ही एक वर्ग एफआरपी को उद्योग की सेहत के लिए फायदेमंद मान रहा है, लेकिन पूरा उद्योग इसके पक्ष में नहीं है। उनको यह समझ में आ गया है कि 129.84 रुपये प्रति क्विंटल के एफआरपी पर उनको गन्ना मिलने वाला नहीं है। यही वजह है कि मंगलवार को दिल्ली में गन्ना मूल्य पर कृषि मंत्री शरद पवार की बैठक के नाकामयाब होने के बाद वह किसी नए मध्यस्थ की तलाश में जुट गए हैं। इस मुद्दे पर खुलकर बात करने से भी निजी चीनी कंपनियों के मालिक कतरा रहे हैं। त्नबिजनेस भास्करत्न के साथ बातचीत में उत्तर प्रदेश के एक बड़े चीनी समूह के प्रबंध निदेशक ने कहा कि हमारे पास सालाना पांच लाख टन चीनी बनाने की क्षमता है, लेकिन हम पिछले साल दो लाख टन चीनी भी नहीं बना सके। इसकी वजह गन्ने का न मिलना है। चालू साल में विवाद के चलते किसानों ने गन्ने की प्लांटिंग रोक दी है जो हमारे लिए घातक हो सकती है। ऐसे में हमारे निवेश पर रिटर्न कैसे मिलेगा, जबकि हम चीनी उद्योग पर अपने समूह का सबसे अधिक फोकस कर रहे हैं।

वहीं, उद्योग सूत्रों का कहना है कि चीनी मिलों को धीरे-धीरे बात समझ में आ रही है। यही वजह है कि गन्ना मूल्य के झंझट को लेकर वह राज्य सरकार का दरवाजा खटखटाने जा रही हैं। बुधवार को निजी चीनी मिलों की उत्तर प्रदेश सरकार के साथ इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठक हो रही है। देश की कुल चीनी उत्पादन क्षमता करीब 290 लाख टन है। इसमें से करीब 75 लाख टन क्षमता उत्तर प्रदेश में है और इससे कुछ कम करीब 72 लाख टन की क्षमता महाराष्ट्र में है। बाकी राज्यों में कर्नाटक की क्षमता करीब 20 लाख टन, तमिलनाडु की क्षमता लगभग 18 लाख टन और आंध्र प्रदेश की क्षमता करीब दस लाख टन है। वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार द्वारा लाई गई प्रोत्साहन नीति के बाद राज्य में करीब 10,000 करोड़ रुपये का निवेश चीनी उत्पादन क्षमता स्थापित करने में हुआ था।
इस मुद्दे पर कर्नाटक के एक बड़े चीनी उद्योग समूह के पदाधिकारी का कहना है कि अगर गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर लेते हैं तो इस निवेश का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। वहीं, उद्योग से लंबे समय तक जुड़े रहने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि बजाज हिंदुस्थान और बलरामपुर चीनी मिल के बीच सौदेबाजी टूटने में एक बड़ा कारण आने वाले दिनों में गन्ना उपलब्धता को लेकर खड़ी हो रही अनिश्चितता भी रही है। इसके साथ ही उनका कहना है कि किसानों को दूसरी फसलों में बेहतर आय के विकल्प हासिल हो गए हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि वह गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते इसकी फसल को प्राथमिकता दें। उत्तर प्रदेश के अलावा पिछले कुछ वषरें में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी चीनी मिलों की नई क्षमता स्थापित करने में निवेश हुआ है।

गन्ना मूल्य पर पहली बार सख्त हुए पवार

गन्ना मूल्य पर आंदोलित किसानों के बढ़ते दबाव और संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे के उछलने की आशंका से परेशान केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने निजी चीनी मिलों को साफ कर दिया है कि अगर अगले कुछ दिनों में वे किसानों को ऊंचा दाम देने की घोषणा नहीं करती हैं तो वह खुद गन्ना मूल्य की सार्वजनिक घोषणा कर देंगे। गुरुवार को आयातित चीनी के मुद्दे पर बुलाई गई उद्योग की एक बैठक में पवार का यह लहजा दिखा। उन्होंने चीनी मिलों को लगभग धमकी देते हुए कहा कि अगर वे अगले दो-तीन दिन के भीतर किसानों के साथ गन्ना मूल्य पर समझौता नहीं करती हैं तो वह खुद गन्ने के वाजिब दाम की घोषणा कर देंगे। यह दाम 200 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा हो सकता है।
बैठक में मौजूद एक सूत्र के मुताबिक पवार ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा की निजी चीनी मिलों के मालिकों से साफ कहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी मिलें किसानों के साथ चीनी की ऊंची कीमतों का 90 फीसदी तक बंटवारा कर रही हैं। लेकिन आप लोग किसानों के साथ इस ऊंची कमाई को बांटना नहीं चाहते हैं। अगर इस मामले पर कोई रास्ता जल्दी नहीं निकलता है तो मुझे मजबूर होकर ऊंची कीमत की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ेगी। खासतौर से उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों से उन्होंने कहा कि दो दिन पहले आप लोग इस मुद्दे पर मुझसे बात करके गये थे। उसके बाद अभी तक किसानों के साथ कीमत का कोई समझौता नहीं हो सका है। इस अनिश्चितता को तुरंत समाप्त करना जरूरी है।
बैठक में मौजूद एक अन्य सूत्र के मुताबिक पवार का कहना था कि मौजूदा 129.84 रुपये प्रति क्विंटल के फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) पर गन्ना खरीदने की स्थिति में चीनी मिलों को 100 रुपये प्रति क्विंटल तक मुनाफा हो रहा है। इस मुनाफे को उन्हें किसानों के साथ बांटने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उत्तरी राज्यों में गन्ने का एसएपी 162.50 रुपये से 185 रुपये प्रति क्विंटल तक घोषित किया गया है। लेकिन नई व्यवस्था में एसएपी को परोक्ष रूप से समाप्त कर दिया गया है। जबकि महाराष्ट्र में चीनी मिलों ने किसानों को 210 रुपये प्रति क्विंटल तक का पहला एडवांस दिया है। इस बैठक में चीनी मिलों ने कहा कि आयातित चीनी पर न तो स्टॉक लिमिट लागू है और न ही लेवी। इसके अलावा इसका कोई रिलीज मैकेनिज्म भी नहीं है। यह घरेलू उद्योग के लिए ठीक नहीं है।

धान पर 50 रुपये बोनस व गन्ने का एफआरपी तय
केंद्र सरकार ने चालू विपणन सीजन में धान की सरकारी खरीद पर 50 रुपये का बोनस देने का फैसला किया है। चालू सीजन के लिए सरकार ने धान की सामान्य किस्म का न्यू्नतम समर्थन मूल्य 950 रुपये और ग्रेड ए के लिए 980 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। किसानों को 50 रुपये का बोनस एमएसपी के ऊपर मिलेगा। पहली अक्टूबर से शुरू हुए खरीद सीजन में बोनस के बाद किसानों को ग्रेड ए धान का भाव 1,030 रुपये और सामान्य धान का 1,000 रुपये प्रति क्विंटल मिलेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई आर्थिक मामलों की मंत्रीमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में यह फैसला लिया गया।सीसीईए ने गन्ने के वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) की जगह अध्यादेश के जरिये आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर लागू की गई गन्ने के फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) की भी घोषणा कर दी। चालू पेराई सीजन (2009-10) के लिए गन्ने का एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
फैसले की जानकारी देते हुए गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि गन्ने के वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) की जगह अब उचित और लाभकारी मूल्य, एफआरपी तय किया गया है। वर्ष 2009-10 के गन्ना पेराई सीजन (अक्टूबर से सितंबर) के लिए चीनी मिलें किसानों को गन्ने का एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल (9.5 रिकवरी) के आधार पर भुगतान करेंगी। धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद पहली अक्टूबर से शुरू हो चुकी है लेकिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के कारण बोनस की घोषणा में देरी हुई। चालू खरीफ सीजन में प्रतिकूल मौसम से देश में चावल की पैदावार में लगभग 160 लाख टन की कमी आने की आशंका है। पिछले खरीफ सीजन में देश में 845 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ था।

रुक नहीं रहीं किसानों की आत्महत्याएँ
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज़ में डूबे चार और किसानों ने आत्महत्या कर ली है और इसी के साथ इस क्षेत्र में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 1000 हो गई है.
आत्महत्याओं का यह ताज़ा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पूरा देश दिवाली का पर्व मना रहा है.एक अनुमान के मुताबिक पिछले वर्ष जून से लेकर अभी तक 1000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने की एक वजह यह भी है कि राज्य सरकार इन किसानों से कपास खरीदने में देर कर रही है. उधर किसानों ने भी माँग की है कि सरकार को उनसे जल्द ही फसल ख़रीद लेनी चाहिए और उसके बदले में उन्हें उचित दाम दिया जाना चाहिए.किसानों का कहना है कि अगर सरकार उनसे तुरंत कपास नहीं ख़रीदती है तो स्थितियाँ और भी बदतर हो सकती हैं.
ग़ौरतलब है कि यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर कपास की खेती के लिए जाना जाता है पर पिछले 16 महीनों से यहाँ किसानों की आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं.

किसानों की आत्महत्या दुर्भाग्यपूर्ण-राष्‍ट्रपति

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