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Thursday, 16 April 2009

पत्रकारिता की दुनिया में हैं कई और विसंगतियां

पत्रकारिता की दुनिया में कई और विसंगतियां हैं। मसलन अखबार निकालने और खबरों को संपादित करके एक बेहतर तेवर देने वाले संपादक भी पत्रकारिता के ही काम करतेहैं मगर उन्हें शासन की तरफ से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। उपसंपादक से लेकर संपादक तक का पूरा कुनबा इस लिहाज से मान्यता प्राप्त दर्जे का पत्रकार नहीं होता। जबकि सिर्फ खबर लिखनेवाला इस लिहाज से मान्यता प्राप्त पत्रकार कादर्जा पाने की काबिलियत वाला माना जाता है। ऐसा क्यों? क्या संपादन पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं आता है। खबरों का नियोजन भी संपादक ही करता है। इतना ही नहीं कोलकाता प्रेस क्लब समेत देश के तमाम प्रेस क्लबों में संपादकों को दोयम दर्जे की सदस्यता दी जाती है। यानी वे सदस्य बनाए जाते हैं मगर उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता। यह इस तर्क पर कि संपादक मान्यता प्राप्त पत्रकार नहीं होते। यह दोहरा मानदंड उसी तरह का है जैसे यशवंत ने भड़ास४मीडिया में हिंदी पत्रकारों की उपेक्षा पर सवाल उठाया है।
मान्यता प्राप्त पत्रकार अगर संपादक भी हों तो ऐसे किस कानून का उल्लंघन होता है या फिर संवाददाताओँ और शासन पर कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। फिलहाल तो यह समझ से परे है। क्या यशवंतजी इस दोहरे मानदंड पर भी सवाल उठाने की कृपा करेंगे। पत्रकारों को बांटने की इस कुटिल चाल का भी पर्दाफास अवश्य किया जाना चाहिए।
इस लिंक पर यशवंत ने भड़ास4मीडिया में उठाये हैं सवाल कि हिंदी अखबारों के पत्रकार अवार्ड के लायक नहीं होते .

हिंदी अखबारों के पत्रकार एवार्ड लायक नहीं होते?


रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म एवार्ड 2007-08 की किसी कैटगरी में हिंदी प्रिंट का काई भी पत्रकार विजेता नहीं रहा। जिन लोगों को एवार्ड दिया गया है, उनमें ज्यादातर टीवी और अंग्रेजी अखबारों के पत्रकार हैं। प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक हिंदुस्तान, नई दुनिया, नवभारत टाइम्स समेत दर्जनों हिंदी अखबारों और सैकड़ों हिंदी पत्रिकाओं के हजारों पत्रकारों में से कोई भी इस लायक नहीं था कि उसे पुरस्कार के लिए चुना जाए। भड़ास4मीडिया के पास कई हिंदी प्रिंट पत्रकारों के फोन आए और सभी ने पुरस्कार दिए जाने के पैमाने पर सवाल उठाया। ज्यादातर लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर किन पैमानों पर ये पुरस्कार दिए जाते हैं और उन पैमानों पर क्या हिंदी हर्टलैंड के किसी भी पत्रकार की रिपोर्ट खरी नहीं उतरी। कहीं ऐसा तो नहीं कि दिल्ली में रहने वाले पत्रकारों को ही पुरस्कार देने के लिए सर्वथा उपयुक्त माना जाता है?

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हिंदी अखबारों के दूर-दराज के रिपोर्टर जिन खबरों को भेजते हैं और वे अखबारों में प्रकाशित होती हैं, उन्हीं खबरों को कई महीने बाद अंग्रेजी अखबारों के रिपोर्टर उठाते हैं और खबर ब्रेक करने का श्रेय भी ले जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अंग्रेजी अखबारों और टीवी के पत्रकार अपने व्यक्तित्व और काम की 'मार्केटिंग' अच्छी तरह से कर ले जाते हैं, इसीलिए उन्हें पुरस्कार मिल जाता है जबकि हिंदी का भदेस, मेहनती और जुझारू पत्रकार सब कुछ करने के बाद भी सिर्फ अपने किए को ठीक से 'मार्केट' न कर पाने की वजह से पिछड़ा रह जाता है। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि पुरस्कार देने वाली संस्थाओं को एवार्ड के लिए आवेदन आमंत्रित किए जाने की जानकारी सभी पत्रकारों तक पहुंचाने की गारंटी करनी चाहिए। होता यह भी है कि एवार्ड के लिए आवेदन मांगे जाने की जानकारी सिर्फ अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित करा दी जाती है। इससे यह सूचना दूर-दराज के इलाकों को तो छोड़ दीजिए, प्रदेश की राजधानियों के पत्रकारों तक भी नहीं पहुंच पाती।

रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस एवार्ड 2007-08 के नामिनी में हिंदी अखबारों के कुछ पत्रकारों के नाम हैं लेकिन इन्हें विजेता घोषित नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म एवार्ड हिंदी प्रिंट कैटगरी में अमर उजाला के प्रताप सोमवंशी और दैनिक भास्कर के मनोज सिंह पमार के नाम हैं। इस कैटगरी में एवार्ड के विजेता रहे पुण्य प्रसून वाजपेयी। पुण्य को प्रिंट कैटगरी का पुरस्कार इसलिए दिया गया क्योंकि उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर जो रिपोर्टें लिखीं, उन्हें हिंदी मैग्जीन प्रथम प्रवक्ता में प्रकाशित किया गया। देखा जाए तो यह एवार्ड भी किसी हिंदी प्रिंट वाले को नहीं मिला बल्कि टीवी जर्नलिस्ट को दिया गया। यहां मकसद किसी के काम को कमतर आंकना नहीं है बल्कि पुरस्कार के पैमानों पर बात करना है। हिंदी भाषी इस देश में अगर पत्रकारिता के दो दर्जन से ज्यादा पुरस्कारों में हिंदी के टाप टेन अखबारों के एक भी पत्रकार नहीं आ पाते तो क्या इसे यूं ही संयोग मानकर छोड़ देना चाहिए या फिर इस पर बहस होनी चाहिए?

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