Wednesday, 19 May 2010

किस जमीन की तलाश है समाजवादियों को !

    लोहिया से मुलायम तक समाजवादियों का सफर निरंतर बिखराव का ही रहा है। लोहिया से जयप्रकाश तक तो विचारधारा की लौ टिमटिमाती रही। आगे के सफर में यह मशाल अब नए दौर के समाजवादी नेता मुलायम सिंह के हाथों में है। उनकी समाजवादी पार्टीं तो है, मगर समाजवादी विचारधारा के लोग एकजुट नहीं है। अगर इसे आरोप न समझा जाए तो मुलायम सिंह समाजवादी कम मगर यादवों के नेता ज्यादा समझे जाते हैं। ऐसा होने की की मजबूरियां भी हो सकती हैं। समाजवादी चिंतक इसके कई कारण मानते हैं। पहली बात तो यह हैं कि भारत में किसी नेता की पहचान उसकी जमात से ज्यादा है। उसके लोग कितना तादाद में हैं। आजादी के बाद से भारत में धर्म, क्षेत्र और जाति ने नेता और दलों की पहचान तय करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। दरअसल लोगों को लुभाने के समाजवादी आर्थिक सिद्धांत कारगर नहीं रहे। समाजवादी नेता अब लोगों को महज विचारधारा से प्रभावित करने में असफल होने लगे। यह बात काफी हद तक वामपंथियों पर भी लागू होती है। लिहाजा संकीर्ण निजी हितों को हथियार बनाना इन नेताओं की मजबूरी हो गई। शायद इसी वजह से मुलायम समाजवादी से ज्यादा पिछड़े तबके ( मूलत: यादवों) के नेता बनकर उभरे। यह उनकी अलग सामाजिक पहचान बनी है जहां समाजवाद दम तोड़ता नजर आता है। भारतीय राजनाति में टिके रहने का यह अलग कारगर राजनीतिक हथियार है जिसे अन्य नेता मसलन मायावती, लालू यादव, रामविलास पासवान वगैरह आजमा रहे हैं। इस नई विधा ने समाजवादियों की लोहिया की उस आर्थिक नीति को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसने कभी किसानों, मजदूरों व समाज के अन्य दबे-कुचले व पिछड़े तबके को सर्वाधिक आकर्षित किया था। दरअसल तब समाजवाद उस सामूहिकता का प्रतीक था जो अन्याय के खिलाफ लड़ता था।

धर्म और जाति की अवधारणा पर खड़े दल संकीर्ण विचारधारा को जन्म देते हैं। ये उस समाजवाद के विरोध में खड़े होते हैं, जो आपसी सामाजिक सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। नतीजा यह कि समाजवादियों को भी जनप्रिय बनने के हथकंडे अपनाने पड़े। जनप्रिय होने का यह रास्ता समाजवादियों को उस संप्रदायवाद के नजदीक ले जाता जो समाजवाद के लिए वर्ज्य है। सामाजिक न्याय की लड़ाई एक पंथ या समुदाय के हित के रास्ते पर चलकर लड़ी नही जा सकती। मतलब समाजवाद और लोकप्रियता दोनों को साथ लेकर चलने से गरीबों में भ्रम व विभाजन की स्थिति पैदा होती है। यही वह दो बुराईयां हैं जो एक दूसरे का विरोध करतीं हैं। अब गरीबी निवारण की नई अवधारणा जन्म लेती है। इसके तहत अमीर पगार बढ़ाकर सामाजिक अन्याय या गरीबी को कम कर सकते हैं। समाजवादियों के यह मान लेने से कि आय बढ़ने और धन वितरण से गरीबी कम की जा सकती है, समाजवादी उस सिद्धांत को नकार देते हैं जिसमें कहा गया है कि गरीबी आदमी की ही गलतियों का नतीजा है। और गरीबी तब बढ़ती है जब धीमी आर्थिक वृद्धि व पूंजी की अपर्याप्त उपलब्धता हो। लोहिया से चलकर मुलायम तक पहुंचे समाजवाद का यह वह नया चेहरा है जिसे अभी भी उस जमीन की तलाश है जिसमें समाजवाद भी जिंदा रह सकें। मगर वजूद की इस लड़ाई में समाजवादी अभी भी बिखराव ही झेल रहे हैं।

स्वतंत्रता के बाद जिसे समाजवादी आंदोलन के नाम से जाना गया, उसका सबसे ज्यादा श्रेय राममनोहर लोहिया को जाता है। लोहिया कभी भी मार्क्सवादी नहीं रहे। मार्क्स से वे प्रभावित जरूर थे। जो समाजवादी मूलतः मार्क्सवादी थे, उन्होंने स्वतंत्रता के बाद मार्क्सवाद का परित्याग कर दिया। कोई धर्म की तरफ चला गया, किसी ने विनोबा की शरण ली और जो बचे रह गए, वे क्रमशः लुंज-पुंज होते गए और अंततः किसी काम के नहीं रहे। लोहिया ने समाजवाद के चिराग को रोशन रखा और उसमें नए-नए आयाम जोड़ने का काम किया। लोहिया के निधन के बाद जयप्रकाश ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। गैरकांग्रेसवाद को उस अंजाम तक पहुंचाया जहां लोहिया भी समाजवादियों को नहीं ले जा पाए थे। जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति का ही नतीजा था कि आपातकाल में सभी गैरकांग्रेसी एकजुट हुए और १९७७ में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में जनता पार्टी की गैर कांग्रेसी सरकार बनी। यहीं से समाजवादियों के उस पतन का इतिहास भी शुरू होता है जो आज तक जारी है। जनता पार्टीं टूटी तो समाजवादी भी बिखर गए। बाद के समय में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन को कर लिया मगर समाजवादी विचारधारा को छिन्न-भिन्न होने से नहीं बचा पाए। फिलहाल मौजूदा दौर के समाजवादी नेता मुलायम सिंह ही हैं।

कोलकाता में समाजवादी

कोलकाता में २१ मई से समाजवादियों का एक जमावड़ा होने जा रहा है। पहले राजबब्बर फिर अमरसिंह प्रकरण के बाद बिखराव झेल चुके मुलायम अब कोलकाता में समाजवादी पार्टी का आधार तलाशने आ रहे हैं। अमरसिंह प्रकरण का कोलकाता पर भी असर पड़ा । कोलकाता में विजय उपाध्याय सपा छोड़कर तृणमूल चले गए हैं। मुलायम सिंह ने अब पश्चिम बंगाल सोशलिस्ट पार्टीं के अध्यक्ष किरणमय नंद को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया है। किरणमय नंद पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार में मत्स्य पाल मंत्री हैं। विजय उपाध्याय के समय से पश्चिम बंगाल के समाजवादियों में जो असंतोष है, उसे क्या कोलकाता में हो रहा सम्मेलन खत्म कर पाएगा। श्यामधर पांडेय जैसे तमाम ऐसे समाजवादी हैं जो लंबे अरसे से पार्टीं से जुड़े हैं मगर हमेशा उनको नजरअंदाज किया गया है। कहा यह जा रहा है कि अगर किरणमय नंद सूझबूझ से काम नहीं लेगें तो कोलकाता में भी समाजवादी और बिखर जाएंगे। आखिर कब और कौन रोकेगा समाजवादियों का बिखराव ? यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि मुलायम सिंह यादव किस बात को तरजीह देते हैं। अगर उनके लिए सिर्फ कुछ व्यक्ति ही महत्वपूर्ण होंगे तो उनकी मनमानी से कोलकाता में समाजवादी पार्टीं की जमीन भी खिसकनी भी तय है। जैसा कि पहले भी हुआ है। सभी को साथ न लेकर का नतीजा यह थी कि तमाम पुराने समाजवादी भी कोलकाता में निष्क्रिय व उदासीन थे। अब उनमें भी आस जगी है। समाजवाद की मशाल तभी जलती रहेगी जब कारवां भी साथ होगा। बिखरना तो इतिहास रहा है समाजवादियों का।

रुका नहीं समाजवादियों का बिखराव

दरअसल पहला आम चुनाव लड़ने वाली देश की जितनी भी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां थीं, उन सभी का आजादी के बाद विभाजन हुआ और समाजवादियों में बिखराव सबसे ज्यादा हुआ। 1967 के बाद सत्ता से स्वभाव बदला। नीति, नैतिकता, मान्य मूल्य प्रभावित हुए। 1977 के बाद समाजवादियों में और बिखराव हुआ और इसके नेताओं ने सुविधा एवं सहूलियत के अनुसार नीति स्वीकार करने का काम किया। आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस के भीतर रह कर काम करने वाली सोशलिस्ट पार्टी पहली बार 1955 में टूटी जब राम मनोहर लोहिया ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई। दोनों पार्टियों ने 1957 और 1962 का चुनाव अलग अलग लड़ा। फिर 1965 में मिल गईं और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी जो उसी साल फिर टूट गई। 67 का चुनाव इन्होंने अलग अलग लड़ा। सोशलिस्ट फिर 1971 में एकजुट हुए लेकिन कुछ राज्यों में इनके छोटे छोटे गुट रह गए। इन सभी ने 1977 में जनता सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं समाजवादियों की जड़ से मौजूदा समाजवादी पार्टी, जनता दल सेक्युलर, जद यू निकली हैं। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में व्यक्तिगत खुन्नस, आकांक्षा और एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह टूटन का कारण बना। उन्होंने कहा कि सोशलिस्ट पार्टियों के नेता समय के अनुसार बदले नहीं और वे दूसरी पार्टियों में जाते रहे।

भारतीय राजनीति और समाजवादी

पहले सोशलिस्ट मूवमेंट और फिर जेपी आंदोलन ने इस देश में इतिहास रचा। इन्हीं मूवमेंट और आंदोलनों की उपज हैं लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव। शरद यादव सोशलिस्ट पार्टी में तो नहीं थे, लेकिन उन दिनों एक छात्र नेता के रूप में मध्यप्रदेश में समाजवाद की अलख जगाए हुए थे। लालू और मुलायम सोशलिस्ट मूवमेंट में रहे, लेकिन बाद में लालू प्रसाद जेपी आंदोलन में शरीक हो गए। राजनारायण के बारे में कहा जाता है संसद में मार्शल और राजनारायण एक-दूसरे के पूरक बन गए थे। वे इतनी हठधर्मिता और हंगामा खड़ा करते थे कि उन्हें मार्शल से टंगवाकर बाहर करा दिया जाता था। वह दौर इंदिरा गांधी का था। कांग्रेस सरकार के खिलाफ वर्ष 1973-74 में जेपी आंदोलन ने देश के युवाओं में नया जोश फूंका। 1974 में शरद यादव मध्य प्रदेश के एक संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। राजनारायण ने इमरजेंसी (1975) के बाद के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को रायबरेली में शिकस्त दी।

भारतीय राजनीति में समाजवादी विचारधारा का एक अहम रोल रहा है.1948 में कांग्रेस से अलग हुए समाजवादियों ने जिनमें आचार्य नरेन्द्र देव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ राम मनोहर लोहिया शामिल थे सोशलिस्ट पार्टी के नाम से एक दल का गठन किया था, बाद में आचार्य जे बी कृपलानी की किसान मज़दूर प्रजा पार्टी का इस दल में विलल हो जाने के बाद इस दल को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नाम दिया गया लेकिन इस दल के गठन के कुछ वर्षों बाद ही सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन की प्रकिया शुरु हो गई. जय प्रकाश नारायण क्षुब्ध होकर भूदान आंदोलन में शामिल हो गए. डॉ लोहिया ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नाम से अलग दल बना लिया और नरेंद्र देव के नेतृत्व में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का अलग अस्तित्व बना रहा.

ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति

1952, 57 और 1962 में हुए आम चुनावों में समाजवादी दल संख्या के लिहाज़ से तो ज़्यादा सीटें नहीं जीत सके लेकिन संसद में उन्होंने प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाई. 1963 में हुए संसदीय उप चुनावों में आचार्य कृपलानी और डॉ लोहिया के चुनाव जीतने से संसद में विपक्ष की भूमिका और मज़बूत हुई और पहली बार लोक सभा में नेहरु सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास का प्रस्ताव पेश किया गया. इसी साल कलकत्ता में हुए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के वार्षिक सम्मेलन में डॉ लोहिया ने ग़ैर कॉग्रेसवाद की रणनीति पेश की और सभी विपक्षी दलों से कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक साझा गठबंधन बनाने की अपील की.

डॉ. लोहिया की ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति का पहला प्रयोग 1967 के आम चुनावों में हुआ। इन चुनावों में ग़ैर कांग्रेसी दल यानि समाजवादी, वामपंथी, जनसंघी, स्वतंत्र और रिपब्लिकन पार्टियां कोई एक संयुक्त मोर्चा बनाकर तो चुनाव नहीं लड़ीं, लेकिन 9 राज्यों में इन दलों को भारी सफलता मिली और कांग्रेस से अलग हुए विधायकों को मिलाकर 9 राज्यों में संयुक्त विधायक दल यानि एस.वी.डी. का गठन हुआ और ग़ैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। उत्तर प्रदेश में चैधरी चरण सिंह ऐसी ही पहली सरकार के मुख्यमंत्री बनाये गये।

1967 के आम चुनावों में ही डॉ लोहिया के साथ मधुलिमए और जॉर्ज फ़र्नानडीज़ जैसे तेज़ तर्रार समाजवादी लोक सभा में पहुँचे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ विपक्षी मुहिम को और तेज़ किया. मगर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे उत्तरी राज्यों में समाजवादी अपना जनाधार बनाने में सफ़ल रहे.

वर्ष 1971 में इंदिरा गाँधी के आने के बाद समाजवादियों का एक तरह से सफ़ाया ही हो गया। इसी दौर में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का दबदबा बढ़ा और 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने और उसके बाद 1971 में हुए लोक सभा चुनावों में उन्हें जो भारी बहुमत मिला उसमें समाजवादी लगभग साफ़ हो गए. इंदिरागांधी ने ही १९७६ में संविधान में ४२वां संशोधन करके समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा। इतना ही नहीं उनहोंने जनप्रतिनिधित्व कानून में भी संशोधन करके सभी दलों की समाजवादी जिम्मेदारी भी तय की। संविधान में ये परिवर्कन और इंदिरागांधी के गरीबी हटाओ नारे ने समाजवादियों को ध्वस्त कर दिया।

समाजवादी खेमे को उम्मीद की किरण तब दिखी जब. समाजवादी नेता राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका दायर करके आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में अपने पद का दुरुपयोग किया और चुनाव जीतने के लिए सरकारी तंत्रमंत्र का इस्तेमाल किया.इसी समय गुजरात और बिहार में छात्रों का आंदोलन शुरु हुआ जिसमें दो दशक पहले राजनीति छोड़ चुके समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण शामिल हुए. उनकी अगुवाई में सभी विपक्षी दलों ने 6 मार्च 1975 को दिल्ली में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया जिससे इंदिरा गाँधी की सरकार हिल गई.घबराकर इंदिरा गांधी ने २५ जून १९७५ को देश में आपातकाल घोषित कर दिया।

आपातकाल और समाजवादी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को राजनारायण की याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए इंदिरा गाँधी को चुनावी धांधलियां करने का दोषी ठहराया और उनका चुनाव रद्द कर दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट का यही फ़ैसला इंदिरा गांधी के पतन का कारण बना और उन्होंने 25 जून को देश में आपातकाल लागू कर दिया. इसी के तहत देश के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं और कार्यक्रर्त्ताओं को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया जिनमें समाजवादी भी बड़ी तादाद में शामिल थे.

19 माह के आपातकाल के दौरान ही जेल में जनता पार्टी का गठन हुआ और इसमें भी समाजवादियों की भूमिका अहम रही. आपातकाल ख़त्म होने के बाद 1977 में जब लोक सभा के आम चुनाव हुए तो जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला। बड़ी तादाद में समाजवादी संसद में चुनकर आए और पहली बार मंत्री बने. इनमें राजनारायण, जॉर्ज फ़र्नांडीज़, रविराय, ब्रजलाल वर्मा, पुरुषोत्तम कौशिक, जनेश्वर मिश्र आदि शामिल थे. इसी वर्ष हुए विधान सभा चुनावों में समाजवादी आंदोलन से जुड़े कर्पूरी ठाकुर बिहार में, रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश में और गोलप बोरबोरा असम में मुख्यमंत्री बने.

1979 में जनता पार्टी में हुए विभाजन के बाद समाजवादी एक बार फिर छिन्न भिन्न हो गए और एक दशक तक सत्ता की राजनीति से दूर हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनमोर्चा बनाकर राजीव गांधी के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु किया तो समाजवादियों ने उसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और जनता दल बना कर एक बार फ़िर केंद्र में और कई राज्यों में सत्ता हासिल की.

सामाजिक न्याय की शुरुआत

वी पी सिंह सरकार में रहते हुए ही जार्ज फ़र्नांडीज़, शरद यादव, नीतिश कुमार और रामविलास पासवान ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करवाने का फ़ैसला करवाया जिससे भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई. इसी दौर में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव उत्तर प्रदेश और बिहार में मुख्यमंत्री बने. लेकिन एक साल में ही वी पी सिंह सरकार का पतन हो जाने के बाद समाजवादियों में जो विभाजन हुआ उससे यह आंदोलन लगातार कमज़ोर ही होता गया। पिछले आम चुनावों से समाजवादी विचारधारा सामूहिक रुप से अपनी कोई छाप या पहचान नहीं बना पा रही है।

समाजवाद की चर्चा के संदर्भ में लोहिया और जयप्रकाश जैसे महानायकों को याद करना उपयुक्त होगा। इससे संबंधित लेखों को पढ़ने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें...............।

भारतीय समाजवाद



सत्ता के लिए समाजवाद याद रहा, लोहिया को भूल गए

युवाओं के प्रेरणा श्रोत थे जेपी


राममनोहर लोहिया


"एक असमाप्त जीवनी" का प्रथम अध्याय


समाजवादी आंदोलन : पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में


आचार्य नरेन्द्रदेव : समाजवाद के माली


समाजवाद के प्रकार


समाजवादी विचारधारा आज कहाँ है ?


कुछ पार्टियां ऐसी जिन्हें ढूंढते रह जाओगे

3 comments:

anitakumar said...

बहुत ही विस्तृत समीक्षा की है आप ने समाजवादी पार्टी की और एकदम सटीक…आभार

Maria Mcclain said...

interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this website to increase visitor.Happy Blogging!!!

gopal ji rai said...

राजनारायन जी के ऊपर भी जरा अपनी कलम चलायीए

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