Monday, 20 June 2011

आखिर कब तक टोटकों से होते रहेंगे लोगों के इलाज ?

चिकित्सा विग्यान के इतनी प्रगति के बावजूद भारत में अंधविश्वास से रोगों का इलाज बदस्तूर जारी है। कहीं झाड़फूंक तो कहीं टोनेटोटके लोगों के लिए दवाओं से ज्यादा कारगर लगते हैं। यह शायद इसलिए भी क्यों कि मंहगी चिकित्सा व उपयुक्त डाक्टर आम लोगों को अभी भी इस देश के लोगों को उपलब्ध नहीं हैं। देश के अनेक हिस्से में दैविक इलाज को आज भी रामबाण मानने को लोग मजबूर हैं। पश्चिम बंगाल में कई महिलाओं को डायन बताकर मारा जा चुका है। इन डायन के बारें में भ्रांति है कि इसके जादू टोने से की लोग अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। पूरे भारत खास तौर से उत्तर भारत में भूतप्रेत भगाने वाले ओझे कुख्यात हैं। धार्मिक इलाज व चमत्कार के धनी साईं बाबा को तो सभी जानते हैं। बीरभूम के बेली का धर्मराज मंदिर भी इसी तरह का स्थल है जहां की रोगों के इलाज के लिए श्रद्धालु जुटते हैं। चित्र में देखिए इलाज के लिए जुटे लोगों की भीड़।


  

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में १९ जून रविवार को अषाढ़ के पहले दिन बारिश और कीचड़ में एक बीमार को इसलिए लाया गया है क्यों कि ऐसी मान्यता है कि इस धार्मिक उपचार से लोगों के असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। नीचे के चित्र में एक शख्श को उसकी पत्नी व मां कीचड़ पोत रही है। ऐसा बीरभूम जिले के बेलिया के धर्मराज मंदिर में सार्वजनिक तौर पर किया जाता है। दूसरे चित्र में महिलाएं इसी मंदिर में कीचड़ का उपयोग जोड़ों व हड्डी के दर्द से निवारण के लिए के लिए कर रही हैं। संभव है इस टोटके से इनको कुछ राहत मिलती हो मगर क्या इन रोगों का इलाज दवाओं से संभव नहीं ? संभव है और यह इन्हें भी पता है मगर बिना खर्च के इस इलाज को अपनाने में ये लोग कोई हर्ज नहीं समझते। जागरूकता की कमी और मंहगे होते डाक्टर व इलाज भी शायद इसके लिए दोषी है।

7 comments:

डॉ० डंडा लखनवी said...

रहा अंधविशवास का, विज्ञानों से बैर।
ज्ञान बढ़ाता कदम तो, ढ़ोंग खींचते पैर॥
++++++++++++++++++++++++++
डेमोक्रेसी में बन गई, दे माँ कुर्सी जाप।
जटिल रोग हैं साथियो, साधू झोला छाप॥

प्रवीण पाण्डेय said...

इन रूढ़ियों से बहुत ऊपर उठना होगा।

Rahul Singh said...

पारंपरिक मृदा लेप तो नहीं यह.

Voice of youths said...

अंधविश्वास ने इस समाज को काफी क्षति पहुंचाई है, हालाँकि यह इतनी गहरी जड़ें जमा चूका है कि तत्काल कोई समाधान नजर नही आता| बाबा , मुल्ला,कठमुल्ला ज्यादा जिम्मेदार हैं|इनके प्रभाव से मुक्त होना होगा|

Hemant Sagar said...

विश्वास और अन्धविश्वास में कैसे फर्क करोगे. अगर भारत की एक करोड़ हिन्दू जनता मंदिर जाती है तो क्या अन्धविश्वास है. क्या आपके अनुसार इश्वर का अस्तित्व नहीं है. क्या आपके अनुसार हमें ईश्वर को मानने के लिए मेडिकल साइंस की अनुमति लेनी पड़ेगी. आज देश में ऐसे हजारों मंदिर हैं जहाँ दुखी और अस्वस्थ लोग जाकर स्वस्थ लाभ लेकर आते हैं वो भी तब जब डॉक्टर्स के पास उनका इलाज नहीं होता. जहाँ कोई ओझा या जादू टोना नहीं केवल आस्था के बल पर व्यक्ति स्वस्थ होता है. क्या आप के हिसाब से इश्वर के चमत्कार का कोई अस्तित्व नहीं है और जो करोड़ों कोग वहां जाते हैं वह मुर्ख हैं जो अपना हानि लाभ नहीं पहचानते.

Hemant Sagar said...

विश्वास और अन्धविश्वास में कैसे फर्क करोगे. अगर भारत की एक करोड़ हिन्दू जनता मंदिर जाती है तो क्या अन्धविश्वास है. क्या आपके अनुसार इश्वर का अस्तित्व नहीं है. क्या आपके अनुसार हमें ईश्वर को मानने के लिए मेडिकल साइंस की अनुमति लेनी पड़ेगी. आज देश में ऐसे हजारों मंदिर हैं जहाँ दुखी और अस्वस्थ लोग जाकर स्वस्थ लाभ लेकर आते हैं वो भी तब जब डॉक्टर्स के पास उनका इलाज नहीं होता. जहाँ कोई ओझा या जादू टोना नहीं केवल आस्था के बल पर व्यक्ति स्वस्थ होता है. क्या आप के हिसाब से इश्वर के चमत्कार का कोई अस्तित्व नहीं है और जो करोड़ों कोग वहां जाते हैं वह मुर्ख हैं जो अपना हानि लाभ नहीं पहचानते.

Hemant Sagar said...

विश्वास और अन्धविश्वास में कैसे फर्क करोगे. अगर भारत की एक करोड़ हिन्दू जनता मंदिर जाती है तो क्या अन्धविश्वास है. क्या आपके अनुसार इश्वर का अस्तित्व नहीं है. क्या आपके अनुसार हमें ईश्वर को मानने के लिए मेडिकल साइंस की अनुमति लेनी पड़ेगी. आज देश में ऐसे हजारों मंदिर हैं जहाँ दुखी और अस्वस्थ लोग जाकर स्वस्थ लाभ लेकर आते हैं वो भी तब जब डॉक्टर्स के पास उनका इलाज नहीं होता. जहाँ कोई ओझा या जादू टोना नहीं केवल आस्था के बल पर व्यक्ति स्वस्थ होता है. क्या आप के हिसाब से इश्वर के चमत्कार का कोई अस्तित्व नहीं है और जो करोड़ों कोग वहां जाते हैं वह मुर्ख हैं जो अपना हानि लाभ नहीं पहचानते.

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