Tuesday, 19 May 2009

प्रभाकरण - तमिलों का मसीहा और श्रीलंका का विद्रोही





प्रभाकरण के मारे जाने की खबर ने श्रीलंका सरकार को काफी राहत पहुंचाई है मगर उसके चाहने वाले दुखी भी हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कश्मीर में मारे गए उग्रवादी भारतीयों के लिए तो उग्रवादी ही होते हैं मगर जिहादियों के लिे शहीद होते हैं। देश, राष्ट्र और विश्व शांति के लिहाज से देखें तो जिहादी सिर्फ जिहादी ही होते हैं और उनके कृत्य को समर्थन नहीं दिया जाना चाहिए। श्रीलंका में सेना ने ठान लिया था कि लिट्टे का सफाया ही कर देंगे तो कर ही दिया। बेशक इस लड़ाई में लाखों लोग बेघर हो गए या काफी तादाद में श्रीलंका के लोग मारे गए मगर एक राष्ट्र के लिए सिरदर्द बने प्रभाकरण के अंत को ठीक ही माना जाना चाहिए। पूरी दुनिया से आतंकवाद का खात्मा भी तभी होगा जब ऐसे लोग हथियार डालकर मुख्यधारा में आएं या फिर उनका सफाया कर दिया जाए।
मैंने बीबीसी और गूगल में जारी प्रभाकरण की खबरों को संदर्भ के लिए इस पोस्ट में साभार के साथ ज्यों का त्यों डाल दिया है ताकि मुख्य खबर से भी आप वाकिफ हो सकें।

श्रीलंका के पूर्वोत्तर इलाक़े में एक छोटे से क़स्बे में वेलुपिल्लई प्रभाकरण का उदय हुआ और तमिलों के लिए अलग 'होमलैंड' की माँग को पूरा करने के लिए उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) का गठन किया. उनकी पहचान एक निर्भीक छापामार लड़ाके के रुप में थी. ख़ुद एलटीटीई की वर्दी में असलहों से लैस रहने वाले प्रभाकरण तमिल विद्रोहियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए. अपने साथी लड़ाकों के बीच वह इस क़दर लोकप्रिय और सर्वमान्य थे कि उनके एक इशारे पर कोई भी विद्रोही अपनी जान गँवा कर भी हमला करने के लिए तैयार रहता था. पिछले तीन दशकों से एलटीटीई हमेशा श्रीलंका सेना के लिए ख़तरा बना रहा और पूर्वेत्तर इलाक़े के एक बड़े भू-भाग पर उसका नियंत्रण था. लेकिन पिछले एक वर्षों के दौरान सेना ने उस पर शिकंजा कसा और तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के विपरीत सेना की कार्रवाई जारी रही. सेना ने वर्ष 2007 में ही विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले पूर्वी द्वीप पर नियंत्रण बना लिया और इस वर्ष के शुरू में एलटीटीई के गढ़ किलिनोच्ची और मुलाईतिवू पर भी सेना का क़ब्ज़ा हो गया. इसके बाद तमिल छापामार एक छोटे से इलाक़े में फँस गए थे।

प्रभाकरण के साथ-साथ लगभग सभी तमिल विद्रोही अपने साथ जानलेवा साइनाइड कैप्सूल रखते थे. सेना के साथ लड़ते-लड़ते अगर हार का मुँह देखना पड़े तो उन्हें ये कैप्सूल निगल लेने का निर्देश रहता है. प्रभाकरण की अगुआई में जो विद्रोही लड़ाके थे उनमें बच्चों से लेकर महिलाओं की भारी तादाद थी. प्रभाकरण ख़ुद वार्ता की मेज़ पर बात करने की बज़ाए युद्धक्षेत्र में होना पसंद करते थे. शायद इसीलिए जब नॉर्वे की मध्यस्थता में वर्ष 2002 में संघर्ष विराम हुआ तो इसका उपयोग प्रभाकरण ने अपनी सेना को फिर संगठित करने के लिए किया. लेकिन ये संघर्ष विराम टिकाऊ साबित नहीं हुआ और वर्ष 2003 से वर्ष 2008 के बीच प्रभाकरण को कई झटके लगे. वर्ष 2004 में कभी प्रभाकरण का दाहिना हाथ माने जाने वाले कर्नल करुणा उनसे अलग हो गए. दो साल बाद एलटीटीई की राजनीतिक शाखा के प्रमुख एंटन बालासिंघम की लंदन में मृत्यु हो गई. वो कैंसर से पीड़ित थे. नवंबर 2007 में सेना की बमबारी में वरिष्ठ तमिल विद्रोही नेता एसपी तमिलचेल्वम मारे गए.
हत्या के आरोप
तमिलों का एक बड़ा तबका प्रभाकरण को स्वतंत्रता सेनानी मानता था जो बहुसंख्यक सिंहला शासन के 'अत्याचारों' के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा था. दूसरी ओर श्रीलंका सरकार और सेना उन्हें एक क्रूर हत्यारा मानती थी, जिसके लिए मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं था. प्रभाकरण शायद ही कभी सार्वजनिक जगहों पर देखे गए. घने जंगलों के बीच आशियाना बदलते रहने वाले तमिल नेता पर कई बार जानलेवा हमले हुए लेकिन वो बचते रहे.
शुरुआती जीवन
प्रभाकरण का जन्म 26 नवंबर 1954 को समुद्रतटीय शहर वेलवेत्तिथुरई में हुआ था. वो अपने माता पिता की चौथी और सबसे छोटी संतान थे .पढ़ाई में उन्हें औसत दर्जे का माना जाता था. बचपन में उनका स्वभाव शर्मीला और किताबों से चिपके रहने वाले बच्चे के रुप में था. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि नेपोलियन और एलेक्ज़ेंडर महान का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा. साथ ही वो सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह से भी प्रभावित थे. ये दोनों भारतीय नेता ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ हिंसक संघर्ष में विश्वास रखते थे. राजनीति, रोज़गार और शिक्षा में तमिलों के साथ भेद-भाव से आहत प्रभाकरण ने राजनीतिक बैठकों में हिस्सा लेना शुरु किया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण प्राप्त किया. वर्ष 1975 में उन पर जाफ़ना के मेयर की हत्या का आरोप लगा. तमिल विद्रोहियों की ओर से ये पहली बड़ी कार्रवाई थी'

तमिल विद्रोही नेता प्रभाकरण का शव बरामद'
श्रीलंका सेना का कहना है कि तमिल विद्रोही नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण का शव बरामद कर लिया गया है और उनकी पहचान सुनिश्चित कर ली गई है. सेना के एक वरिष्ठ कमांडर ब्रिगेडियर शवेंद्र सिल्वा ने बीबीसी को बताया कि प्रभाकरण का शव संघर्ष वाले क्षेत्र से उनके कई अन्य सहयोगियों के साथ बरामद किया गया. श्रीलंका के सरकारी टीवी पर उनकी तस्वीरें दिखाई गईं जिनमें चेहरा स्पष्ट नज़र आ रहा था. श्रीलंका सेना का कहना है कि जब संघर्षवाले क्षेत्र से प्रभाकरण एक एंबुलेंस में भागने की कोशिश कर रहे थे, उस दौरान वो मारे गए. इसके पहले उनके मारे जाने को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया था क्योंकि विद्रोहियों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रमुख ने तमिल विद्रोहियों से सहानुभूति रखनेवाली वेबसाइट में कहा था कि प्रभाकरण जीवित और सुरक्षित हैं. इसके पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने संसद को संबोधन में तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ जीत का ऐलान किया. लेकिन उन्होंने तमिल विद्रोही नेता प्रभाकरण की मौत के बारे में कुछ नहीं कहा था. राष्ट्रपति राजपक्षे ने अपने संबोधन में कहा,''श्रीलंका को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) के आतंकवाद से मुक्त करा लिया गया है.'' उन्होंने कहा कि ये संघर्ष एलटीटीई के ख़िलाफ़ था न कि तमिल लोगों के. श्रीलंका को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम के आतंकवाद से मुक्त करा लिया गया है
उन्होंने तमिल लोगों को आश्वासन दिया कि सभी लोगों रक्षा की जाएगी और सभी को समान अधिकार हासिल होंगे और लोग बिना किसी भय के रह सकेंगे. उनके इस संबोधन को श्रीलंका में टीवी पर लाइव दिखाया गया .महिंदा राजपक्षे ने कहा कि इसके पहले श्रीलंका के एक तिहाई हिस्से पर श्रीलंकाई पार्लियामेंट के क़ानून नहीं चलते थे लेकिन अब देश के सभी हिस्सों पर ये क़ानून लागू होंगे. साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि अब तमिल विद्रोहियों को फिर से पैर जमाने नहीं दिया जाएगा. भारत की प्रतिक्रिया इधर अमरीकी सरकार ने कहा है कि श्रीलंका सरकार को तमिल और अन्य गुटों के साथ बातचीत कर ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें सभी नागरिकों के हितों की रक्षा की जा सके. भारत ने भी कहा है कि प्रभाकरण के मारे जाने के साथ ही श्रीलंका में लड़ाई ख़त्म हो गई है और अब वहां की सरकार को तमिलों की समस्याएँ हल करनी चाहिए.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कहा,''अब श्रीलंका में लड़ाई ख़त्म हो गई है, इसलिए वहां की सरकार को संविधान में सत्ता के विकेंद्रीकरण पर ध्यान देना चाहिए ताकि तमिलों समेत सभी समुदाय अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें.'' भारत ने जल्दी ही श्रीलंका के युद्ध प्रभावित इलाक़े में चिकित्सा दल और दवाइयाँ भेजने का फ़ैसला किया है इस ख़बर के आने के बाद श्रीलंका के कई हिस्सों में लोगों के जश्न मनाने की ख़बरें हैं.
कोलंबो में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सेना प्रमुख जनरल फोनसेंका की ''सैन्य अभियान ख़त्म होने'' की घोषणा के बाद लोगों ने सड़कों पर आकर जश्न मनाया. इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि 40 से 60 हज़ार तमिल लोग राहत शिविरों का रुख़ कर रहे हैं जबकि शिविरों में पहले से ही बहुत भीड़ है. संयुक्त राष्ट्र आपात राहत के समन्वयक जॉन होम्स ने कहा कि पहले से ही लगभग सवा दो लाख लोग राहत शिविरों में हैं और वे मानवीय त्रासदी से जूझ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव के सैन्य प्रतिनिधि विजय नांबियार श्रीलंका पहुँच गए हैं और वे सरकारी अधिकारियों से मुलाक़ात कर रहे हैं. वो मंगलवार को एक शिविर की स्थिति देखने भी जाएंगे.
श्रीलंका पर नियंत्रण
पिछले कुछ हफ्तों में श्रीलंका की सेना ने विद्रोहियों को उनके लगभग सभी इलाक़ों से खदेड़ दिया है. सोमवार को जनरल फोनसेका ने कहा, ''हमें राष्ट्रपति ने जो काम दिया था, वो हमने पूरा कर दिया है और देश को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के चंगुल से निकाल लिया है. '' सैन्य अधिकारियों का कहना है कि प्रभाकरण अपने खुफिया विभाग के प्रमुख पोट्टू अमान और नौसेना के प्रमुख सुसै के साथ मारे गए हैं. सेना के प्रवक्ता ने एक प्रसारण में कहा कि 26 वर्षों के बाद श्रीलंका की पूरी ज़मीन एक बार फिर सेना के नियंत्रण में है. इससे पहले प्रभाकरण के बेटे चार्ल्स एंथनी के अलावा एलटीटीई के तीन अन्य प्रमुख नेता भी मारे गए थे.

एलटीटीईः अस्तित्व से अंत तक
एलटीटीई के उदय की पृष्ठभूमि में सिंहली और तमिलों के बीच का जातीय संघर्ष है. इसकी कहानी शुरू होती है 1971 के पास. आइए, एलटीटीई के उदय से अबतक के सफ़र पर एक सरसरी नज़र डालें–सीलोन (आज के श्रीलंका) में सिंहली मार्क्सवादी विद्रोह हुआ जिसमें छात्रों और वामपंथी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.
वर्ष 1972 -सीलोन ने अपना नाम बदलकर श्रीलंका किया और बौद्ध धर्म को देश में प्रमुख स्थान मिला. इससे तमिल संप्रदाय की नाराज़गी बढ़ी.
वर्ष 1976 - श्रीलंका का उत्तर और पूर्वी हिस्सा तमिल बाहुल्य. वहाँ तनाव बढ़ता गया. इसी तनाव और विरोध की पृष्ठभूमि में तमिलों के विद्रोही संगठन, लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) का गठन हुआ.
वर्ष 1977 - पृथकतावादी तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (टीयूएलएफ़) ने तमिल बाहुल्य क्षेत्रों में सभी सीटें जीतीं. </p><p वर्ष 1983 - एलटीटीई के घात लगाकर किए गए हमले में 13 सैनिक मारे गए. इसके बाद तमिल विरोधी दंगे भड़क उठे जिनमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई. श्रीलंका के उत्तरी क्षेत्र में तमिलों और सरकारी सेना के बीच लड़ाई तेज़ हो गई. गृहयुद्ध की गंभीरता
वर्ष 1985- सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच शांति वार्ता की पहली कोशिश नाकाम हो गई.
वर्ष 1987 - सरकारी सेनाओं ने उत्तरी शहर जाफ़ना में तमिल विद्रोहियों को और पीछे हटा दिया. सरकार ने एक ऐसे समझौते पर दस्तख़त किए जिनके तहत तमिल बाहुल्य इलाक़ों में नई परिषदों का गठन किया जाना था. भारत के साथ भी समझौता हुआ जिसके तहत वहाँ भारत की शांति सेना की तैनाती हुई.
वर्ष 1988 - वामपंथी धड़े और सिंहलों की राष्ट्रवादी पार्टी, जनता विमुक्ति पैरामुना (जेवीपी) ने भारत-श्रीलंका समझौते के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया.
वर्ष 1990 - उत्तरी क्षेत्र में काफ़ी लड़ाई को देखते हुए भारतीय सेना ने देश छोड़ दिया. श्रीलंका की सेना और पृथकतावादी तमिल विद्रोहियों के बीच हिंसा और बढ़ गई.
राजीव गांधी की हत्या
वर्ष 1991 - भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तमिलनाडु राज्य में एक आत्मघाती हमले में मौत हो जाती है जिसके लिए तमिल विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया.
वर्ष 1993 - राष्ट्रपति प्रेमदासा एक बम हमले में मारे गए जिसके बारे में कहा गया कि यह तमिल विद्रोहियों ने किया.
वर्ष 1994 - राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा युद्ध समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में आती हैं. तमिल विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता शुरू होती है.
वर्ष 1995 - शांति वार्ता नाकाम हो गई और तमिल विद्रोहियों ने बम हमले शुरू कर दिए. श्रीलंका सेना ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक बड़ा अभियान चलाते हुए उन्हें जाफ़ना से बाहर निकाल दिया.
वर्ष 1996 - आपातकाल पूरे देश तक बढ़ा दिया गया. उधर तमिल विद्रोहियों ने राजधानी कोलंबो में भी बम हमले किए. वर्ष 1997 - सरकार ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक और बड़ा अभियान शुरू किया.
वर्ष 1998 - तमिल विद्रोहियों ने श्रीलंका के सबसे पवित्र बौद्ध स्थल को निशाना बनाया. भीषण लड़ाई के बाद तमिल विद्रोहियों ने उत्तरी क्षेत्र में कुछ प्रमुख शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया.
वर्ष 1999 - राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा एक चुनावी रैली में हुए बम धमाके में घायल हो गईं. वे फिर से राष्ट्रपति चुनी गईं. शांति के अंतरराष्ट्रीय प्रयास
वर्ष 2000 - फ़रवरी में नॉर्वे ने कहा कि वह श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाना चाहता है. इसी वर्ष अप्रैल में तमिल विद्रोहियों ने उत्तरी द्वीप में सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण एलीफ़ेंट पास पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसी वर्ष अक्टूबर में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के पीपुल्स अलायंस ने आम चुनावों में जीत हासिल की
वर्ष 2001 - फ़रवरी में ब्रिटेन ने नए आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई को 'आतंकवादी संगठन' घोषित किया.
वर्ष 2001 - जुलाई में तमिल विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमला किया. इसी वर्ष अक्टूबर में चंद्रिका कुमारतुंगा ने अपनी सरकार बचाने के लिए अविश्वास मत से कुछ ही घंटे पहले संसद को भंग कर दिया. उनकी सरकार को मार्क्सवादियों का समर्थन था. नए चुनाव पाँच दिसंबर को कराने की घोषणा की गई. इसी वर्ष दिसंबर में चुनावों के बाद प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी. उनकी यूनाइटेड नेशनल पार्टी ने मामूली बहुमत से संसदीय चुनाव जीता.
शांति वार्ता
वर्ष 2002 - सरकार और तमिल विद्रोहियों ने स्थाई युद्धविराम समझौते पर दस्तख़त किए जिससे इस लंबे हिसंक संघर्ष को समाप्त करने का कुछ रास्ता निकला. शांति वार्ता में मध्यस्थता नॉर्व ने शुरू की.
वर्ष 2002(मार्च-मई - हथियार छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई. जाफ़ना को श्रीलंका के बाक़ी हिस्से से जोड़ने वाली सड़क 12 वर्ष बाद खुली. जाफ़ना के लिए यात्री विमानों की उड़ान भी शुरू हुई.
वर्ष 2002 – सितंबर में सरकार ने तमिल विद्रोहियों पर से प्रतिबंध हटा लिया जो उनकी लंबे समय से माँग रही थी. पहले दौर की बातचीत थाईलैंड में शुरू हुई. दोनों पक्षों ने पहली बार युद्ध क़ैदियों की अदला-बदली की. तमिल विद्रोहियों ने अलग देश की माँग छोड़ दी.
वर्ष 2002 – दिसंबर में नॉर्व में हुई शांति वार्ता में दोनों पक्ष सत्ता बँटवारे पर सहमत हुए. इस समझौते के तहत अल्पसंख्यक तमिलों को मुख्य रूप से तमिलभाषी - पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्वायत्तता देने की बात हुई.
वर्ष 2003 - फ़रवरी में शांति वार्ता का अगला दौर बर्लिन में संपन्न हुआ.
वर्ष 2003 - अप्रैल में तमिल विद्रोहियों ने शांति वार्ता से यह कहते हुए हाथ खींच लिया कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.
राजनीतिक संकट
वर्ष 2003 - नवंबर में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने तीन मंत्रियों को बर्ख़ास्त किया और संसद स्थगित कर दी. शांति वार्ता को लेकर सरकार के साथ उनकी अनबन चल रही थी. एक पखवाड़े के बाद संसद बहाल कर दी गई लेकिन तमिल विद्रोहियों के साथ बातचीत स्थगित कर दी गई
वर्ष 2004 – मार्च में विद्रोही तमिल नेता करुणा ने अलग होकर अपना अलग धड़ा बना लिया और अपने समर्थकों के साथ भूमिगत हो गया.
वर्ष 2004 – अप्रैल में राजनीतिक खींचतान के बीच समय से पहले आम चुनाव कराए गए. कुमारतुंगा की पार्टी को 225 में 105 सीटें मिलीं जो सरकार बनाने के लिए काफ़ी नहीं थीं. महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई.
वर्ष 2004 - जुलाई - कोलंबो में एक आत्मघाती हमला हुआ जो 2001 के बाद से इस तरह का बड़ा हमला था. इससे शांति वार्ता के औचित्य पर सवाल खड़े हो गए.
वर्ष 2004 - दिसंबर में सुनामी के कहर ने 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान ले ली. लाखों लोग बेघर भी हो गए. श्रीलंका में राष्ट्रीय आपदा घोषित की गई.
वर्ष 2005 – जून में तमिल बाहुल्य इलाक़ों में भी सूनामी प्रभावितों तक सहायता पहुँचाने के लिए समझौता हुआ.
वर्ष 2005 – अगस्त में विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमर की हत्या के बाद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई.
बिखर गईं कोशिशें
वर्ष 2005 – नवंबर में प्रधानमंत्री महिंद्रा राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद के लिए हुआ चुनाव जीता.
इस चुनाव में तमिल विद्रोहियों के नियंत्रण वाले बहुत से इलाक़ों में लोगों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया.
वर्ष 2006 – फ़रवरी में सरकार और तमिल विद्रोहियों ने जेनेवा में हुई शांति बातचीत में उस युद्धविराम समझौते के लिए अपना सम्मान फिर से व्यक्त किया जो 2002 में हुआ था.
वर्ष 2006 – अप्रैल में पूर्वोत्तर में तमिल बाहुल्य शहर ट्रिंकोमाली में विस्फोट हुए जिनके बाद दंगे भी फैले जिनमें 16 लोगों की मौत हो गई. पुलिस ने उन विस्फोटों के लिए तमिल विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया.
वर्ष 2007- श्रीलंका की पुलिस ने सैकड़ों की तादाद में तमिल नागरिकों को राजधानी कोलंबो से बाहर निकाल दिया. इसके पीछे सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया गया. हालांकि न्यायालय ने इसे ग़लत क़रार दिया.
अंत की शुरुआत
वर्ष 2008- श्रीलंका सरकार ने 2002 के शांति समझौते को बेमानी बताते हुए इससे अपने हाथ खींच लिए.
वर्ष 2008- मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से घिरी श्रीलंका सरकार. अंतरराष्ट्रीय पैनलों ने भी भर्त्सना की.
वर्ष 2008- जुलाई में सरकार ने दावा किया कि उन्होंने तमिल विद्रोहियों के देश के उत्तर में स्थित नौसेना बेस पर कब्ज़ा कर लिया है. इसी वर्ष अक्टूबर में हुए आत्मघाती हमलों में एक पूर्व जनरल समेत 27 लोग मारे गए. इसका भी आरोप एलटीटीई पर लगा. यहाँ से खुली लड़ाई की बात शुरू हो गई. श्रीलंका की सेना और एलटीटीई की ओर से एक दूसरे के लोगों को मारने की दावेदारियाँ शुरू हो गईं.
वर्ष 2009- जनवरी में 10 वर्षों से एलटीटीई के कब्ज़े में रहे किलिनोच्चि शहर पर अपना कब्ज़ा कर लिया. यह शहर एलटीटीई का प्रशासनिक मुख्यालय था. राष्ट्रपति ने तमिल विर्दोहियों से समर्पण करने को कहा.
वर्ष 2009- फ़रवरी में दुनियाभर से श्रीलंका में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की जाने लगी. युद्धक्षेत्र में फंसे हज़ारों-लाखों लोगों को लेकर विश्व समुदाय ने मांग की कि अल्पकालिक संघर्षविराम घोषित हो. श्रीलंका की सरकार ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया. तमिल विद्रोहियों को फिर से समर्पण करने को कहा. पर एलटीटीई ने कोलंबो पर हवाई हमले किए.
वर्ष 2009 मार्च- एलटीटीई से अलग हुए विद्रोही नेता करुणा को मंत्रिमंडल में जगह मिली. एलटीटीई के एक वरिष्ठ नेता थामिलेंथी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों की युद्ध अपराधों के लिए भर्त्सना की. अप्रैल और मई में सेना का अभियान अपने चरम पर पहुँच गया. एलटीटीई का दायरा लगातार घटता गया. एक छोटे से इलाके में सिमटे तमिल विद्रोहियों के बीच फंसे हज़ारों लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का मुद्दा उठता रहा. हज़ारों लोग खुद युद्ध क्षेत्र में भागकर बाहर आए. सैकड़ों मारे गए. तमिल विद्रोहियों ने दो बार संघर्ष विराम घोषित किया पर सेना का अभियान जारी रहा.
18 मई, 2009 को प्रभाकरन की मौत की ख़बर के साथ एलटीटीई के अस्तित्व का अंत मान लिया गया.

2 comments:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सटीक आलेख . हर देशो में इसे सम्बोधनों से इन्हें नवाजा जाता है सच है .

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत ही सटीक आलेख

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