Sunday, 25 December 2011

बौखलाहट में अन्ना पर शाब्दिक हमले फिर खोखले साबित हुए


अन्ना भी नाना के साथ तो दिग्गी भी नाना के साथ, तो बूझो कौन है आरएसएस ?
  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर से भ्रष्टाचार विरोधी गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे पर हमला किया और कहा कि कभी वह आरएसएस नेता नानाजी देशमुख के साथ सचिव के रूप में काम करते थे। सिंह ने आज ट्विटर पर लिखा 'अन्ना हजारे ने आरएसएस नेता नानाजी देशमुख के साथ सचिव के रूप में काम किया और वर्ष 1983 में गोंडा में प्रशिक्षण लिया (संघ की गतिविधियों) । आज दिल्ली में 'नई दुनिया' समाचार पत्र का पहला पन्ना देखिये।'
   इस बार टीम अन्ना ने उन्हें ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। दिग्विजय ने एक अखबार के हवाले से कहा कि अन्ना हजारे आरएसएस नेता नानाजी देशमुख के सेक्रेटरी थे। इसके जवाब में टीम अन्ना की सदस्य किरन बेदी ने दिग्विजय की एक ऐसी फोटो जारी कर दी, जिसमें वह खुद नानाजी देखमुख के साथ बैठे नजर आ रहे हैं।
दिग्विजय ने रविवार सुबह ट्वीट किया, 'अन्ना हजारे आरएसएस लीडर नानाजी देशमुख के सेक्रेटरी रहे थे। उन्हें 1983 में गोंडा में ट्रेनिंग मिली थी। आज एक हिंदी अखबार के फ्रंट पेज में इस बारे में बताया गया है। लेकिन, अन्ना आरएसएस से अपने संबंधों की बात से इनकार करते हैं। अब हम किस पर यकीन करें? तस्वीरों के साथ जो फैक्ट हैं या फिर अन्ना और आरएसएस के दावों पर? मैं एक बार फिर सही साबित हुआ हूं। ' दिग्विजय ने टीम अन्ना को क्रिसमस की बधाई भी दी, लेकिन एक ताने के साथ। दिग्विजय ने लिखा, 'टीम अन्ना को मेरी क्रिसमस और मुंबई में फंड जुटाने के लिए शुभकामनाएं। दिल्ली से मुंबई वह सिर्फ ज्यादा फंड जुटाने के लिए गए हैं।'
इस बार किरन बेदी ने इस फोटो के जरिए गेंद दिग्विजय सिंह की पाली में डाल दी है। दिग्विजय को या तो इस तस्वीर को फर्जी साबित करना होगा, या उन्हें यह मानना होगा कि तस्वीर में साथ दिख जाने से वह आरएसएस के वैचारिक मित्र या उसके एजेंट नहीं हो जाते। और अगर वह नहीं होते, तो जाहिर अन्ना पर भी यह आरोप नहीं लगा सकते। साभार-एनबीटी

Friday, 2 December 2011

आखिर है क्या कोलावेरी..

 पूरे भारत में धूम मचाने के बाद लोगों का एक ही सवाल है कि आखिर कोलावेरी डी है क्या। दरअसल तमिल भाषा में "कोलावेरी डी" का मतलब होता है जानलेवा गुस्सा। इसमें टिंग्लिश के शब्द हैं यानी तमिल और तमिल लहजे की अंग्रेजी। इस गाने के बोलों के अलावा इसमें सबसे बड़ी खूबी है कि साउथ फिल्मों के दो दिग्गज सितारे रजनी और कमल हासन के दामाद और पुत्री इसमें नजर आएंगे।
इसे रचा है सुपरस्टार रजनीकांत के दामाद हैं धनुष ने, उन्होंने ही ये गीत लिखा है और इसकी धुन भी बनाई है। यह गाना उनकी आने वाली फिल्म "थ्री" में होगा। इस फिल्म की डायरेक्टर हैं धनुष की पत्नी और रजनीकांत की बेटी ऐश्वर्या। इसमें धनुष के अपोजिट हैं श्रुति हसन।
  धनुष का कहना है कि अगर शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो इस शब्द का कोई खास मतलब नहीं है, यह तो सिर्फ धुन बनाते हुए इस्तेमाल किया गया है। धनुष बेहद खुश है कि यह लोगों को इतना पसंद आ रहा है। इसकी सफलता का राज बताते हुए वे कहते हैं कि शायद इसकी मधुर धुन ने ही इसे इतना लोकप्रिय बना दिया।
खबर तो यह भी है कि रजनी को यह गाना इतना पसंद आया है कि वह अपनी बेटी की फिल्म में छोटी सी भूमिका भी करना चाहते हैं। कहा जा रहा है कि इस गीत को मात्र 20 मिनट में तैयार किया गया है।
  धनुष कहते हैं, ईमानदारी से बताऊं तो मैंने सोचा भी नहीं था कियह गाना इतना बड़ा हिट साबित होगा। साधारण संगीत और बोल ही इस गाने की खासियत हैं। क्या है कोलावेरी का मतलब? तमिल शब्द कोलावेरी का आशय प्रेमिका द्वारा ठुकराए जाने पर पैदा होने वाली खीझ और गुस्से से है। इसमें प्रेमी पूछ रहा है आखिर उसने उसके साथ ऐसा क्यों किया? गाने में वह खुद को कोसता है और अपने गम को भुलाना चाहता है।
फिल्म से जुड़ी टीम चाहती थी कि धनुष इस फिल्म के लिए गीत लिखें। धनुष ने ऐसे ही इंग्लिश मिली तमिल में कुछ लिखा। घर पर वे पत्नी से इसकी चर्चा कर रहे थे और अचानक गुनगुनाने लगे। उनकी बीवी को उनका यह गुनगुनाना बहुत पसंद आया और यही इस गीत की धुन भी बन गया। (साभार- वेबदुनिया, जागरण)

Wednesday, 16 November 2011

माया की बंटवारे की गणित

  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मुख्‍यमंत्री मायावती ने जो सियासी कार्ड खेला है, फिलहाल उसपर अमल हो ना हो मगर राजनीतिक गलियारे में सरगर्मी तेज हो गई है। राज्‍य स्‍तरीय दलों सहित केंद्र में राज कर रही कांग्रेस और मुख्‍य विपक्षी दल भाजपा भी मजबूरी में माया के इस प्रस्‍ताव के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने मायावती के राज्य के बंटवारे का विरोध करना तय किया है। मुलायम सिंह ने कहा है कि वे किसी भी हालत में राज्य का बंटवारा नहीं होने देंगे। मायावती ने यूपी को बांट कर चार राज्‍यों पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश बनाने की वकालत की है।
मायावती के इस एलान के समय प्रस्‍तावित राज्यों में विभिन्‍न राजनीतिक दलों का राजनीतिक समीकरण कुछ ऐसा है-
१- पूर्वांचल ( कुल सीटें-187)। इनमें बसपा (102), कांग्रेस(12),भाजपा (20), सपा (47),अन्‍य (06)।
२- अवध प्रदेश ( कुल सीटें हैं-79)। इनमें बसपा (43), कांग्रेस (03), भाजपा ( 09), सपा (23), अन्‍य (01)।
३- बुंदेलखंड ( कुल सीटें हैं-21)। बसपा (15) ,कांग्रेस ( 02), भाजपा (00), सपा( 04), अन्‍य (00)।
४- पश्चिम प्रदेश ( कुल सीटें हैं-116)। बसपा (61), कांग्रेस ( 03), भाजपा (19), सपा (14), अन्‍य (19)।

 
अब अगर यूपी को विभाजित कर बनने वाले चार नये राज्‍यों के राजनीतिक समीकरण पर चर्चा करें तो जो भी नये राज्‍य होंगे उनमें बसपा की सीटें अन्‍य पार्टियों से कहीं ज्‍यादा हैं। अलग होने के बाद उन चार राज्‍यों में चुनाव होने पर बसपा बढ़त में रहेगी। यानी चारों नये राज्‍यों की सत्‍ता पर बसपा काबिज हो सकती है। ऐसे में एक और संभावना है कि माया इन राज्‍यों में अपने नुमाइंदों को बैठाकर खुद 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये सीढ़ी तैयार कर रही हों।

आखिर क्‍या वजह है कि माया के एक वार से ही सभी राजनीतिक दल बैकफुट पर आ गये। दरअसल यह प्रस्‍ताव माया का नहीं बल्कि जनता की मांग है। मायावती इस प्रस्‍ताव को साढ़े चार सालों से रोक कर चुनाव से ठीक पहले पेश करने की जुगत में थी। तमाम स्‍थानीय दल जैसे कि अजीत सिंह की रालोद और कल्‍याण की जनक्रांति सहित तमाम पार्टियां बंटवारे के इस प्रस्‍ताव पर ही राजनीति कर रही थी। अब ये पार्टियां माया के इस प्रस्‍ताव का विरोध करने के बजाये सीधे उनका दामन थाम लिया है।

यूपी में सत्‍ता में वापसी की छटपटाहट में बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा जनता की भावनाओं को भांपते हुए माया के समर्थन में आ खड़े हुए हैं। माया के इस प्रस्‍ताव का समर्थन करना भाजपा की मजबूरी बन गई है। भाजपा ने इससे पहले यूपी से तोड़कर उत्‍तराचंल को अलग किया था, जो बाद में उत्‍तराखंड बना। बीजेपी ने उस समय भी राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से ही यूपी से निकाल नया राज्‍य बनाया था जहां आज भी वहीं काबिज है। दूसरी तरफ कांग्रेस तेलंगाना को भले ही अलग राज्‍य बनाने की मंजूरी ना दे रही हो, लेकिन यूपी में वह माया से सहमत नजर आ रही है।

  कांग्रेस को भी पता है कि वह इतने बड़े राज्‍य में वापसी नहीं कर पायेगी, जिसका इंतजार उसे पिछले 22 साल से है। चाह कर भी कांग्रेस माया के दलित वोट बैंक पर डाका नहीं डाल पाई है। अब बंटवारे के बाद भौगोलिक स्‍तर पर हुए बदलाव का फायदा मिलने की उम्‍मीद कांग्रेस भी इस प्रस्‍ताव से लगाए बैठी होगी। इतना ही नहीं कांग्रेस हमेशा से कहती रही है कि अगर राज्‍य सरकार से यूपी को बांटने का प्रस्‍ताव आता है तो वह उसका समर्थन करेगी। अब चुनावों से ठीक पहले वह अपने वायदे से मुकर जनता का विरोध नहीं झेलना चाहती।

चुनावी स्टंट
  समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस प्रस्ताव का विरोध करने का एलान किया है तो कांग्रेस ने राज्य के प्रस्तावित विभाजन को एक संवेदनशील मुद्दा बताया और कहा कि इस पर निर्णय केवल विस्तृत चर्चा के बाद ही लिया जा सकता है.समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी पार्टी राज्य के विभाजन का विरोध करेगी.उन्होंने कहा कि मायावती चुनावों में हार की डर से इस तरह की घोषणाएं कर रही हैं.
मुलायम ने कहा कि मायावती भ्रष्टाचार एवं अपनी असफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही हैं. मुलायम सिंह यादव ने कहा कि राज्य की मुख्यमंत्री मायावती का यह कदम जनता को बेवकूफ बनाने वाला चुनावी स्टंट और राजनीतिक साजिश है.
  सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव ने कुशीनगर में कहा कि राज्य के विभाजन से विकास सम्बंधी किसी भी उद्देश्य का समाधान नहीं होगा.

कांग्रेस के वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि मायावती ने जो कुछ भी किया है वह केवल राजनीतिक है और उनका केवल एक ही एजेंडा है और यह उत्तरप्रदेश का 2012 का विधानसभा चुनाव है.द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर वकालत करते हुए सिंह ने कहा कि राज्यों का बंटवारा काफी जटिल मुद्दा है. कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने नई दिल्ली में कहा कि पार्टी सिर्फ चुनावी लाभ को देखकर लिए गए निर्णय को स्वीकार नहीं करेगी.

केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने भी विभाजन को चुनावी हथकंडा बताया और कहा कि राज्य को विभाजित करने जैसा बड़ा निर्णय कोई एक राजनीतिक दल नहीं कर सकता. इसके लिए राजनीतिक सहमति एवं संसद की अनुमति चाहिए.

   भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि अपनी सरकार के साढ़े चार वर्ष बीतने के बाद मायावती को राज्य को विभाजित करने की बात याद कैसे आ गई?  मायावती पर आरोप लगाते हुए हुसैन ने कहा कि चुनाव आ गए हैं और साढ़े चार वर्ष बीतने के बाद मायावती को अगड़ी जातियों की याद आ गई. उन्हें राज्य के विभाजन की भी बात याद आ गई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कहा कि यह घोषणा सिर्फ 'चुनाव के समय लोगों को मूर्ख बनाने' के लिए है. भाजपा नेता उमा भारती ने कहा कि मायावती ने घोषण चुनाव से ठीक पहले की है और इसमें स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखा है.
    सपा के पूर्व नेता एवं राष्ट्रीय लोक मंच के प्रमुख अमर सिंह ने कहा कि वह समझ नहीं पा रहे हैं कि सपा विभाजन का विरोध क्यों कर रही है.
साभार- http://hindi.oneindia.in/news/2011/11/16/mayawati-making-ladder-centre-dividing-uttar-pradesh-aid0129.html
http://www.samaylive.com/nation-news-in-hindi/133693/uttar-pradesh-division-mayawati-government-proposal-state-politi.html

Friday, 4 November 2011

सावधान ! आपकी निगरानी कर रहा है कोई.....

   अगर आप अविष्कारों के दुरुपयोग से वाकिफ नहीं होंगे तो समझ लीजिए कि आप के साथ कुछ भी हो सकता है और आप को भनक तक नहीं लगेगी। आजकल ज्यादातर जगहों पर सुरक्षा कारणों से क्लोज सर्किट टीवी ( जिसे सीसीटीवी कहते हैं ) और गुप्त कैमरे लगाए जा चुके हैं। किसी बड़े परिसर या शापिंग की जगह में अब यह सब सुविधा का होना जरुरी भी हो गया है। किसी ट्रायल रूम में लगे गुप्त कैमरे और शीशे से आपकी हर गतिविधि बाहर नियंत्रण कक्ष में बैठा शख्स देखता रहता है। महिला ट्रायल रूम में भी ऐसे शीशे और कैमरे लगे रहते हैं। इन सुरक्षा उपायों पर रोक नहीं लगायी जा सकती क्यों कि ऐसी जगहों का इस्तेमाल आतंकवादी भी बम वगैरह छिपाने में करते हैं। इन कैमरों व शीशों को अगर आप पहचान लें तो शायद सावधान होकर रह सकते हैं। आइए जानते हैं कि कैसे इनके बारे में जाना जा सकता है।
  गुप्त कैमरे को कैसे जानें ?
 पहले आप ट्रायल रूम के सामने ( बाहर ही ) जाएं और अपनी मोबाइल से फोन करके देख लें कि आपका
फोन पूरा काम कर रहा है और कहीं फोन करने पर फोन जा भी रहा है। अब आप ट्रायल रूम में अंदर जाएं और अपनी मोबाइल फोन से फोन करें। अगर आपकी फोन काल जा रही है तो आप निश्चिंत रहें कि ट्रायल रूम में कोई गुप्त कैमरा नहीं लगा है। इसके ठीक उलट अगर आपकी फोन काल नहीं जा रही है तो सावधान हो जाएं। इसका मतलब कि ट्रायल रूम में गुप्त कैमरा है और आपकी निगरानी की जा रही है। कैमरा होने पर फोन काल इस लिए नहीं जाती है क्यों कि उसके लिए बिछाई गई फाइबर आप्टिक केबिल व्यवधान पैदा करती है।
  यह आशंका भी कई बार जताई जाती है कि बड़े व अत्याधुनिक शापिंग वाले परिसर के कपड़े बदलने वाले महिलाओं के कमरे में लगे पिनहोल कैमरे से वस्त्र बदलने वाली महिलाओं या लड़कियों के एमएमएस बना लिए जाते हैं। या फिर उनकी कहीं और देखी जाती है। आप ऐसी जगहों पर सावधान होकर रहें।

सावधान रहें ट्रायल रूम के शीशे से भी .........
ट्रायल रूम में दो तरह के शीशे लगाए जाते हैं। एक साधारण किस्म का होता है और उससे डरने की जरूरत नहीं है। दूसरा वह होता है जो आपकी तस्वीर को ट्रायल रूम से बाहर किसी खास जगह पर भेजता है। इसे टू वे मिरर कहते हैं। इस शीशे से निगरानी करने वाला आपको देख सकता है मगर आप उसे नहीं देख सकते। आशंका जताई जाती है कि ये टू वे मिरर चेंजिंग रूम, बाथरूम या बेडरूम में लगाए जाते हैं। होटलों व भीड़ वाली शापिंग की जगहों में पूरी निगरानी के लिए ऐसा किया जाता है। ऐसे शीशों को साधारण तरीके से पहचानना बेहद मुश्किल होता है। आइए हम बताते हैं कि कैसे पहचानें इन शीशों को।
  पहचानने के लिए शीशे पर अपनी उंगली का नाखून रखिए। अगर आपकी उंगली के नाखून और उसी छवि ( इमेज) के बीच अंतराल ( गैप) हो तो यह शीशा साधारण ही होगा।
  अगर आपका नाखून और उसकी छवि के बीच अंतराल न हो यानी नाखून व उसकी छवि एक दूसरे को छू रही हो तो यह टू वे मिरर है। सावधान, कोई बाहर से आपको देख रहा है। आप ऐसी जगहों पर शीशे के इस नाखून टेस्ट को अवश्य करके शीशे की पहचान कर लीजिएगा। वरना........।
  दोनो शीशों में फर्क उसके निर्माण में प्रयुक्त सिलवर
अलग तरीके से प्रयोग के कारण होता है। साधारण शीशे में यह सिलवर शीशे के पीछे लगा होता है। जबकि टू वे मिरर में यह शीशे की सतह पर होता है। सिलवर के कारण ही शीशे में चमक होती है और आप अपनी छवि देख पाते हैं। तो शीशे की पहचान करना कभी न भूलिए।
संदर्भ- यह जानकारी पवन चौहान ने जीप्लस पर अंग्रेजी में जारी की है। यह उसका अनुवाद है। पवन ने गुजारिश की है कि इस जानकारी को ज्यादातर लोगों तक पहुंचाएं।





Sunday, 23 October 2011

पत्रकारों को दीपावली का तोहफा की तैयारी, मंगलवार को कैबिनेट बैठक में उठेगा वेतनबोर्ड मुद्दा


   केंद्रीय श्रम मंत्री मल्लिकार्जन खड़गे ने कहा कि पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का मुद्दा मंगलवार , 25 अक्तूबर को होने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में उठेगा। संभव है कि सरकार का पत्रकारों को दीपावली पर यह तोहफा हो। बुधवार को दीपावली से ठीक पहले कैबिनेट की इस बैठक पर पत्रकारों की भी उम्मीदभरी नजरें टिकी हुई हैं।

एक कार्यक्रम से इतर संवाददाताओं के साथ हुई बातचीत में यह ध्यान दिलाए जाने पर कि यह मुद्दा काफी समय से लंबित है, खड़गे ने कहा-हमें उम्मीद है कि अब यह सुलझ जाएगा। मालूम हो कि मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशें सरकार को पिछले साल दिसंबर में सौंप दी गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्तूबर को विभिन्न समाचारपत्रों के प्रबंधन के अनुरोध को खारिज करते हुए वेतनबोर्ड की सिफारिशों के बारे में केंद्र सरकार पर कोई भी फैसला करने से रोक लगाने से इनकार कर दिया था।( कन्नूर , 23 अक्तूबर (भाषा)।

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