Thursday, 21 October 2010

बिहार को तलाश है एक और सम्राट अशोक की

    बिहार में वोट पड़ने शुरू हो गए हैं। पहले चरण में तीन बजे तक ५५ फीसद वोट पड़े। यह आंकड़ा  किसी परिवर्तन या वर्तमान नीतीश सरकार की फिर वापसी का संकेत है कि नहीं मगर इस चुनाव ने यह बहस जरूर चला दी है कि बिहार कितना बदला ? प्राचीन भारत में सुशासन और मजबूत सत्ता का पर्याय था बिहार। अजातशत्रु, बिम्बिसार, सम्राट अशोक का पाटलिपुत्र इतिहास के  अनेक दौर से होकर लालू और नीतीश तक पहुंचा है। आम लोगों से जानने की कोशिश करिए तो एक बात पर सहमति दिखती है कि बिहार अब बदलाव के रास्ते पर है। यह बदलाव क्या सिर्फ राजनीतिक बदलाव है या बिहार फिर शक्तिशाली और सुविकसित मगध बनने की ओर है। इसका आकलन तो वह जनता ही कर पाएगी जो वोट दे रही है मगर यह तय है कि अगर नीतीश के कार्यकाल में लोगों को विकास व बदलाव भाया है तो नतीजे भी वैसे ही आएंगे। जो भी हो मगर बदलते बिहार को फिर तलाश है एक सम्राट अशोक की।

आज यक़ीन करना मुश्किल लगता है कि 1952 तक बिहार देश का सबसे सुशासित राज्य था और इसी बिहार में, जो 270 ईसा पूर्व में मगध था, सम्राट अशोक ने प्रशासन प्रणाली एक ढाँचा विकसित किया था. आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस चल रही है कि क्या सम्राट अशोक ने ही आधुनिक खुली अर्थव्यवस्था की नींव रखी थी. लेकिन यह विडंबना है कि समकालीन राजनीति में उसी बिहार का उल्लेख सबसे अराजक राज्य के रुप में होता है. इसी बिहार ने आज़ादी के बाद का देश का अकेला जनआंदोलन खड़ा किया लेकिन यही बिहार ग़रीबी और कुपोषण से लेकर राजनीति के अपराधीकरण तक के लिए बदनाम भी सबसे अधिक हुआ. हाल के दिनों में आंकड़ो ने बिहार के बदलने के संकेत दिए हैं लेकिन ज़मीनी स्थिति कितनी बदली है यह अभी अस्पष्ट है.

कांग्रेस का दबदबा

बिहार विधानसभा ने लगातार अस्थिर सरकारों का दौर भी देखा है. अन्य उत्तर भारतीय राज्यों की तरह ही बिहार भी लंबे समय तक कांग्रेस के प्रभाव में रहा है. वर्ष 1946 में श्रीकृष्ण सिन्हा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला तो वे वर्ष 1961 तक लगातार इस पद पर बने रहे. चार छोटे ग़ैर कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल को छोड़ दें तो 1946 से वर्ष 1990 तक राज्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही सत्तारुढ़ रही. पहली बार पाँच मार्च 1967 से लेकर 28 जनवरी 1968 तक महामाया प्रसाद सिन्हा के मुख्यमंत्रित्व काल में जनक्रांति दल का शासन रहा. इसके बाद 22 जून 1969 से लेकर चार जुलाई 1969 तक कांग्रेस के ही एक धड़े कांग्रेस (ओ) का शासन रहा और भोला पासवान शास्त्री ने मुख्यमंत्री का पद संभाला.

22 दिसंबर 1970 से दो जून 1971 तक सोशलिस्ट पार्टी के लिए कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री रहे और फिर 24 जून 1977 से 17 फ़रवरी 1980 तक कर्पूरी ठाकुर और रामसुंदर दास के मुख्यमंत्रित्व काल में जनता पार्टी का शासन रहा. बिहार को राजनीतिक रुप से काफ़ी जागरुक माना जाता है, लेकिन यह राजनीतिक रुप से सबसे अस्थिर राज्यों में से भी रहा है.

शायद यही वजह है कि वर्ष 1961 में श्रीकृष्ण सिन्हा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद 1990 तक क़रीब तीस सालों में 23 बार मुख्यमंत्री बदले और पाँच बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा. संगठन के स्तर पर कांग्रेस पार्टी राज्य स्तर पर कमज़ोर होती रही और केंद्रीय नेतृत्व हावी होता चला गया. लेकिन साफ़ दिखता है कि बिहार की राजनीतिक लगाम उसके हाथों से भी फिसलती रही. जिन तीस सालों में 23 मुख्यमंत्री बदले उनमें से 17 कांग्रेस के थे.

संपूर्ण क्रांति आंदोलन
1973 में गुजरात में मेस के बिल को लेकर शुरु हुआ छात्रों का आंदोलन जब 1974 में बिहार पहुँचा तो वह नागरिक समस्याओं का आंदोलन था. लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरुप व्यापक हो गया. शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के मुद्दों पर शुरु हुआ यह आंदोलन सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नतृत्व में एक देशव्यापी आंदोलन बन गया.
चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन और रामकृष्ण हेगड़े जैसे दिग्गज नेता कांग्रेस से अलग होकर जेपी के साथ आ गए. इस आंदोलन का असर इतना गहरा था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इससे ख़तरा महसूस होने लगा और कहा जाता है कि 26 जून, 1975 को जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की तो उसके पीछे संपूर्ण क्रांति आंदोलन एक बड़ा कारण था. इसके बाद जनता पार्टी की सरकार आई लेकिन वह अपने ही अंतर्विरोधों की वजह से जल्दी ही गिर गई. बिहार में भी उसका यही हश्र हुआ.

लालू से नीतीश तक

लालू और नीतीश कुमार की राजनीतिक बुनियाद एक ही है. जेपी के आंदोलन ने बिहार में एक नए नेतृत्व को जन्म दिया. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार उसी की उपज थे. ये नई पीढ़ी राममनोहर लोहिया और जेपी के प्रभाव में जाति तोड़ो आंदोलन की हामी थी. अस्सी के दशक के अंत आते-आते तक उनकी विचारधारा बदलने लगी थी.
वर्ष 1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में जनता दल सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया तो बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान उसके सबसे बड़े समर्थकों में से थे. इसके बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ. वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की वजह से बिहार में जनता दल को जीत मिली और लालू प्रसाद यादव 10 मार्च 1990 को मुख्यमंत्री बने. लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से 25 जुलाई 1997 को उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा.
इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री के पद पर बिठा दिया जो छह मार्च 2005 तक लगातार मुख्यमंत्री बनी रहीं. इस बीच राज्य में कांग्रेस एक तरह से हाशिए पर ही चली गई और भाजपा कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं आ सकी कि वह अपने बलबूते पर सरकार का गठन कर सके. लालू-राबड़ी के तीन कार्यकालों के बाद बिहार में एक परिवर्तन आया और राष्ट्रीय जनता दल को हार का सामना करना पड़ा.
त्रिशंकु विधानसभा उभरी. लालू प्रसाद के पुराने गुरु जॉर्ज फ़र्नांडिस के साथ उनके पुराने साथी नीतीश कुमार ने जनता दल (यूनाइटेड) बनाकर सत्ता परिवर्तन किया. हालांकि नीतीश को सरकार बनाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी. सात मार्च से 24 नवंबर, 2005 तक राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा फिर नीतीश कुमार ने 24 नवंबर, 2005 को भाजपा के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभाला. उन्होंने बिहार को राजनीति के अपराधीकरण से मुक्ति दिलाने और विकास के रास्ते पर चलाने का वादा किया. और अब २०१० के बिहार विधानसभा चुनाव में वोट भी उसी वादे को पूरा करने के एवज में मांग रहे हैं।

Wednesday, 8 September 2010

निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु अब ६० वर्ष होगी

न्यूनतम पेंशन भी ३५० रूपए से बढ़ाकर १००० करने का सुझाव

    पेशन में सुधार के लिए बनी समिति ने निजी क्षेत्र के लिए सेवानिवृत्ति की आयु ६० वर्ष करने के साथ रिटायर होने के बाद के अन्य लाभ भी बेहतर करने की सिफारिश की है । यानी रिटायरमेंट पेंशन न्यूनतम ३५०- ४०० की जगह १००० रूपए और ईपीएस की वेज सीलिंग भी न्यनतम ६५०० से बढ़ाकर १०००० करने की सिफारिश की गई है। समीति की सिफारिश का यह लाभ ईपीएस के दायरे वाले कर्मचारियों को मिलेगा। इसके अलावा सरकार ईपीएस की जगह नई पीएफ-पेशन एन्यूटी योजना ला सकती है या फिर इसी में संशोधन कर सकती है। नई योजना के तहत प्रत्येक कर्मचारी का पीएफ व पेंशन का अलग-अलग खाता होगा। समिति की सिफारिश के मुताबिक ६० साल की उम्र में २३४६७ के वेतन पर रिटायर होने वाले कर्मचारी की मासिक एन्यूटी १९००० से २६००० के बीच होगी। इस वृद्धि के कारण कर्मचारी के पेंशन में योगदान में वृद्धि हो जाएगी। यह ९.४ प्रतिशत से बढ़कर १३.५ प्रतिशत हो जाएगी। ( साभार- टाइम्स आफ इंडिया )

इस खबर को विस्तार से यहां पढ़ें। इस लिंक पर क्लिक करें --- http://epaper.timesofindia.com/Daily/skins/TOINEW/navigator.asp?Daily=TOIKM&showST=true&login=default&pub=TOI&AW=1283936223609

Sunday, 5 September 2010

प्रेमानन्द घोष फिर चुने गए कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष

 
कोलकाता प्रेस क्लब के अभी ४ सितंबर को संपन्न हुए चुनाव में पिछले साल के अध्यक्ष रहे वर्तमान बांग्ला दैनिक के पत्रकार प्रेमानन्द घोष ने अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी है। उनकी कार्यकारिणी के ज्यादातर पत्रकार चुनाव जीत गए हैं। इस बार बांग्ला दैनिक वर्तमान के प्रेमानन्द घोष ( अध्यक्ष ), आकाशवाणी के अशोक तरु चक्रवर्ती और स्वतंत्र पत्रकार स्यामल राय ( दोनों उपाध्यक्ष ), बांग्ला दैनिक आनन्दबाजार के काजी गुलाम सिद्दिकी ( सचिव ), आनन्द बाजार समूह के अंग्रेजी दैनिक टेलीग्रीफ के देवाशीष चट्टोपाध्याय ( सहसचिव ), कोलकाता के स्थानीय टीवी सीटीवीएन के काजी फजले इलाही ( कोषाध्यक्ष ) जीते हैं। यह प्रेमानन्द की पिछले साल की ही कार्यकारिणी है सिर्फ उपाध्यक्ष पद पर बदलाव हुए हैं।

फेरबदल ज्यादा कार्यकारी सदस्यों के चयन में हुआ है। इस बार कोलकाता के प्रमुख हिंदी अखबारों में से वह कोई भी हिंदी पत्रकार अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया है जो पिछली बार जीता था। कहा जा रहा है कि इस बार इनमें से कुछ एक को अपनी हार का आभास पहले ही हो गया था। इस लिए इस बार चुनाव मैदान को उन्होंने पहले ही पीठ दिखा दी। पिछली बार के कार्यकारी सदस्य रहे दैनिक जागरण के अरविंद दूबे इस बार उपाध्यक्ष के लिए पर्चा भरे थे मगर जीत हासिल नहीं हो पाई। राजस्थान पत्रिका के कृष्णदास पार्थ कोषाध्यक्ष पद के लिए खड़े थे मगर नतीजे में उन्हें भी हार का ही मुंह देखना पड़ा। ताजा खबर टीवी चैनल से जुड़े पवन बजाज तो कार्यकारी सदस्यता भी हासिल नहीं कर पाए। कुल मिलाकर प्रेस क्लब में निरंतर सक्रिय दिखने वाले प्रमुख स्थानीय हिंदी अखबारों प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, सन्मार्ग, विश्वमित्र, छपते-छपते, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, भारत मित्र, जनसत्ता के पत्रकार अपनी वह उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए, जिसकी कि इनसे उम्मीद थी।

ऐसा क्यों हुआ ? इस सवाल का सीधा जवाब किसी के पास नहीं है। दबी जुबान से सभी कह रहे हैं कि हिंदी के पत्रकार कोलकाता प्रेस क्लब में बेहतर सामंजस्य नहीं बना पाए। अगल-थलग पड़ गए। जिसका असर वोट पर पड़ा। यह सही भी है कि चुनाव लड़ने के लिए पहले स्तरीय होना आवश्यक होता है। बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू प्रेस के बीच समरसता बनाकर ही चुनाव जीता जा सकता है। इस समरसता का कोलकाता प्रेस क्लब में सबसे बड़ा उदाहरण एक ही दिखता है। वह हैं- राज मिठोलिया। हिंदुस्तान दैनिक से जुडे़ रहे राज मिठोलिया ने २००४-०५ में कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष पद पर आसीन होकर यह साबित कर दिया कि सभी प्रेस के साथ समरसता बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है। राज मिठोलिया इस मायने में इतिहास रच चुके हैं। हिंदी प्रेस का कोई पत्रकार पहली बार कोलकाता प्रेस क्लब का अध्यक्ष बना। उनके बाद से शायद यह समरसता की कड़ी कहीं से बिखरने लगी है। और यह कोलकाता के हिंदी प्रेस के लिए चिंता और आत्ममूल्यांकन का विषय बनना चाहिए।

एक और बात यहां गौर फरमाने लायक है कि रात दस बजे घोषित हुए नतीजे की ज्यादातर हिंदी अखबारों ने खबर भी नहीं छापी। जबकि प्रेस क्लब से संबंधित खबरें इन अखबारों में छपती रहती हैं। यह अलग बात है कि कोलकाता के हिंदी पत्रकारों में मायूसी छाई हुई है। हालांकि अपुष्ट खबरों के मुताबिक हिंदी के कुछ पत्रकार इस बार चुनाव लड़ रहे लोगों की हार से खुश हैं और आरोप लगा रहे हैं कि काम नहीं करने वाले तो हारेंगे ही।

६० साल पहले जब कोलकाता प्रेस क्लब की नींव पड़ी थी तो इसका एक मकसद पत्रकारों के बीच सामाजिक संपर्क बढ़ाना भी था। पेशागत समस्याओं का मिलजुलकर निवारण और भाईचारा भी मकसद था। इसका निर्वाह भी बखूबी हो रहा है। फिर हिंदी प्रेस अचानक अलग-थलग कैसे पड़ गया ? निश्चित तौर पर हिंदी प्रेस की यह अपनी कमियां हैं और आने वाले समय में इस पर गौर फरमाना जरूरी होगा।

इस बार के चुने गए कार्यकारी सदस्य हैं - आजतक हिंदी टीवी के अंशु चक्रवर्ती, बांग्ला दैनिक गणशक्ति के प्रसन्न भट्टाचार्य, एनई बांग्ला टीवी के देवाशीष सेनगुप्त, अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स के मनोतोष चक्रवर्ती, हिंदी दैनिक दैनिक जागरण के प्रदीप पाल, साकाल बेला से सुगता बनर्जी, बांग्ला दैनिक प्रतिदिन के सुप्रीमो बंद्योपाध्याय, बांग्ला न्यूज चैनल २४ घंटा के तन्मय प्रमाणिक और आकाश बांग्ला टीवी के त्रिदीव चटर्जी ।

Tuesday, 24 August 2010

कलाई पर राखी के बदले मौत मिली इस बदनसीब भाई को !


   राखी का पर्व हर भाई-बहने के लिए अहम होता है। बहने उम्मीद करती हैं कि उसका भाई कम से कम राखी बंधवाने तो जरूर ही आएगा। मगर यह नसीब की ही बात है कि किसी को यह पर्व तमाम खुशियां लेकर आता है तो किसी भाई-बहन को यह खुशी नसीब तो होती नहीं उल्टे नियति उन्हें गम के अंधेरे में धकेल देती है। आप राखी की खुशिया मना रहे हैं तो एक कष्ट और करिए। एक उस भाई के लिए अपनी आंखों में दो बूंद आंसू भर लीजिए जिसे अपनी कलाई पर राखी तो नसीब नहीं हुई, बदले में मौत मिली। वह सिर्फ इस कारण कि वह अपनी राखी बंधवाने कोलकाता से अपने गांव बिहार जाना चाहता था मगर उसके दुकान मालिक ने पीटकर मार डाला।


राखी उत्सव के मौके पर बहन से राखी बंधवाने के लिए एक पान की दुकान में काम करने वाला विक्रम घर जाना चाहता था। दुकान का मालिक उसके छुट्टी देने के लिए तैयार नहीं था। उसने छुट्टी की बात सुन कर किशोर को जमकर पीटा। इससे चौदह वर्षीय किशोर की मौत हो गई। पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्टेशन के पास गोलाबाड़ी थाना इलाके में 56 नंबर बस स्टैंड के नजदीक यह घटना हुई। यहां बबलू चौरसिया की पान की दुकान में विक्रम राम (14) काम करता था। उसने बिहार स्थित अपने गांव जाने के लिए छुट्टी मांगी थी। बीते तीन महीनों से विक्रम को छुट्टी नहीं दी गई थी। रविवार की रात से ही वह राखी के लिए गांव जाने की जिद कर रहा था। मकान मालिक ने उसकी लाख मिन्नतों के बादजूद छुट्टी देने से साफ मना कर दिया। पुलिस व स्थानीय लोगों की मानें तो विक्रम ने यह तय कर लिया था कि मालिक उसे छुट्टी नहीं देगा तो वह बहन से राखी बंधवाने के लिए नौकरी छोड़ देगा। एक मामूली नौकर यह इस हिमाकत बबलू चौरसिया से बर्दाश्त नहीं हुई। नौकरी छोड़कर घर जाने की खबर मिलते ही चौरसिया ने उसे जमकर पीटना शुरू कर दिया। मार खाकर किशोर बेहोश होकर वहीं गिर गया।


स्थानीय लोगों ने देखा कि विक्रम खून से लथपथ है और उलटी कर रहा है। वह एक दुकान के सामने पड़ा था। इसके कुछ ही देर बाद वह बेहोश हो गया। बेहोशी की हालत में उसे स्थानीय लोग हावड़ा के सदर अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। तीन महीने से वह पान की दुकान पर काम करता था। पुलिस ने बबलू को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि चौरसिया दुकान पर काम करने वाले बच्चों को पीटता रहता था। हावड़ा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एसके जैन ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद मौत का कारण पता चल सकेगा। गिरफ्तारी के बाद दुकान के मालिक ने पुलिस को बताया कि उसने पिटाई नहीं की। किशोर बीमार था, हालत बिगड़ने के बाद उसे अस्पताल में भर्ती किया गया था। और वहीं उसकी मौत हो गई।


कोलकाता के स्थानीय सांध्य बांग्ला अखबारों ने यह खबर छापी है। मामला पुलिस के हवाले है। हो सकता है दुकानदार दोषी पाया जाए और उसे हवालात की हवा खानी पड़े मगर इससे क्या उस बहन कोई दिलासा मिल पाएगी जिसका भाई अब कभी भी राखी बंधवाने नही आ सकेगा। क्या बीती होगी उस बहन और विक्रम के मां-बाप पर जब उन्हें इस मार्मिक हादसे की खबर मिली होगी । यह सिर्फ विक्रम की कहानी नहीं है। बिहार के गरीब घरों के लड़के पश्चिम बंगाल ही नहीं दिल्ली, मुंबई व पंजाब और गुजरात में काम पर जाते हैं और वहीं फंसकर रह जाते हैं। अधिकतर का जीवन तो नारकीय हो जाता है।


हमारे सांसद अपने वेतन पर तो इतना होहल्ला मचाते हैं। चार दिन तक कैबिनेट को इसे राष्ट्रीय संकट जैसे मसले की तरह हल करना पड़ा। क्या हमारे जनप्रतिनिधि देश की ऐसी तमाम समस्याओं से जूझ रही देश की मजबूर और गरीब जनता की खोजखबर लेकर उनके लिए होहल्ला मचाते हैं ? शायद कम ही। तब तो मेरा दावा है कि इस देश के गरीब ऐसे ही मुफलिसी और गुलामी में पिसते रहेंगे। जागो भारत, जागो।

Saturday, 21 August 2010

परमाणु दायित्व विधेयक विरोध के नाटक का पटाक्षेप कर अपने वेतन के लिए हंगामा करते रहे सांसद

  १८ अगस्त को मैंने इसी ब्लाग में लिखा था कि संसद में विरोध का नाटक हो रहा है। ( देखिए- कहीं यह विरोध का नाटक जनता को फिर निराश न कर दे ) उस नाटक का आज चरमोत्कर्ष संसद में दिखा। दरअसल आज संसद में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। एक तो सासंदों का वेतन बढ़ाया गया और दूसरी तरफ परमाणु दायित्व विधेयक में संशोधन को हरी झंडी दिखाई गई। अब परमाणु दायित्व विधेयक के कानून बन जाने की बाधा भी खत्म हो गई है।इस बार संसद को ठप कर देने वाला हंगामा सांसदों के वेतन के मुद्दे पर हुआ। मगर परमाणु दायित्व विधेयक पर विरोध एक उपबंध में एंड शब्द के हटाने तक सीमित रहा। वह विरोध भी सिर्फ वामपंथी व भाजपा सासंदों ने किया। यानी कल तक मोदी को क्लीनचिट देने का आरोप लगाकर इस बिल के मसौदे को पारित कराने में भाजपा और कांग्रेस की सौदेबाजी बताने वाले सांसद ( लालू, मुलायम वगैरह ) आज संसद में सिर्फ अपने वेतन पर ही चिंतित दिखे।
१८ अगस्त को मैंने इसी ब्लाग में विरोध का नाटक लेख में यह बात कहकर यह स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि इन दलों ने परमाणु दायित्व विधेयक को गलत तो बताया मगर देश के सामने वह ठोस तर्क नहीं रखे जिसके कारण जनता को समझ में आए कि यह देश के लिए खतरनाक विधेयक है। फिर भी संसद को १८ अगस्त को तीव्र विरोध करके चलने नहीं दिया। आज जब उसमें संशोधन को मंजूरी दी गई तो इन सांसदों को देश और खुद के हित में से अपना हित जरूरी लगा। लगना भी चाहिए मगर जिस मुद्दे को देशहित का मानते हैं उस मुद्दे पर संसद और देश की जनता को गुमराह क्यों किया ? कायदे से आज जब संशोधन विधेयक को मंजूरी दी जा रही थी तब परमाणु दायित्व विधेयक का विरोध कर रहे दलों को फिर सदन नहीं चलने देना चाहिए था या फिर सदन से उठकर चले जाना चाहिए था। सरकार को यह जताना जरूरी था कि- जब आप विपक्ष की बात नहीं सुनेंगे तो हम सदन में बैठकर क्या करेंगे ? वैसे भी इन सांसदों ने और भी दूसरी नौटंकी की। समानांतर सरकार का स्वांग रचा। जब ऐसा कर रहे थे तब पत्रकारों को सदन से हटा दिया ।यानी जनप्रतिनिधि होने का दायित्व तो निभाया नहीं उल्टे जनता को गुमराह किया ? अब इनकी मंशा पर कौन सवाल उठाएगा। एक उदाहरण के तौर पर लें तो पत्रकारों के वेतन के लिए गठित वेतन आयोग तो वेतन में किसी सुधार की सिफारिश देने में वर्षों लगा देता है और उसको लागू होने तक इन सिफारिशों के कोई मायने नहीं रह जाते। यहां बिना किसा आयोग के सांसदों ने महज दो दिन में अपनी तनख्वाह बढ़वा ली। मीडिया का तो जानबूझकर उदाहरण दिया क्यों कि वेतन संस्तुति का यह भी एक मामला है। अगर वेतन का ही मामला संसद में मुद्दा बनता था तो सांसदों को अपने साथ उदाहरण में मीडिया समेत तमाम वेतनमानों की लटकी संस्तुतियों का मामला भी उठाना चाहिए था।

सासंदजी अगर वेतन की गुहार लगाकर आप जनसेवक जनप्रतिनिधि कहला सकते हैं तो देश के बाकी वेतनभोगी क्यों नहीं ? जरूरतें बड़ी हों या छोटी, जरूरतें तो सभी को बेहाल कर रही हैं। क्या इस मुद्दे पर बाकी लोगों के लिए आप जनप्रतिनिधि नहीं हैं ? आपके संसद में कुछ भी कहने या करने की तार्किकता की कसौटी जो भी हो मगर सिर्फ स्वकेंद्रित तो नहीं ही होनी चाहिए।अगर इस वेतनमान को अमेरिकी सांसदों के वेतन की तुलना में नहीं के बराबर मानते हैं तो मीडिया समेत बाकी के बारे में भी तो सोचिए। बहरहाल कैबिनेट ने आप सांसदों की सैलरी में बढ़ोतरी को भी मंजूरी दे दी है। यह 300% की बढ़ोतरी हुई है। यानी सांसदों का वेतन 16 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दिया है फिर भी मांग है कि इसे 80 हजार किया जाए। अब आप ही अपने तार्किक विरोध को कितना तार्किक मान सकते हां जबकि आज ही कैबिनेट ने उस न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल को भी अपनी मंजूरी दे दी । जिसको आप बेहद खतरनाक बता रहे थे। बीजेपी की आपत्ति पर न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में कुछ संशोधन किया गया। कैबिनेट ने शुक्रवार को विवादास्पद परमाणु दायित्व विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी जिसमें विपक्षी दलों की चिंताओं को दूर करने वाले प्रावधानों को शामिल करने का प्रयास किया गया है। इससे अब संसद के मौजूदा सत्र में ही इस विधेयक के पारित हो जाने का रास्ता साफ हो गया है।


एंड शब्द का टोटका

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में दो उपबंधों को जोड़ने के लिए अंतिम समय में इस्तेमाल एंड शब्द को वाम दलों और भाजपा की आपत्ति के बाद निकाल दिया गया है। विधेयक पर आम सहमति निर्मित करने की संभावनाओं को तब झटका लगा जब वाम दलों ने 'एंड' का जिक्र होने के मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। वाम दलों का दावा है कि दो उपबंधों के बीच शब्द एंड का जिक्र होने से हादसा होने की स्थिति में परमाणु उपकरण के विदेशी आपूर्तिकर्ताओं का दायित्व कुछ कम हो जाता है। भाजपा ने भी वाम दलों की ही तरह यह मुद्दा सरकार के समक्ष उठाया। विपक्षी दलों को आशंका थी कि इस शब्द के इस्तेमाल से परमाणु उपकरण के विदेशी आपूर्तिकर्ताओं का दायित्व कुछ कम हो जाएगा।


बढ़ी सैलरी से नाखुश सांसदों का हंगामा.और ज्यादा वेतन की मांग

सांसदों की वेतन वृद्धि के मुद्दे पर जब सदन में "सांसदों का अपमान बंद करो" और "संसदीय समिति की रिपोर्ट को लागू करो" जैसे नारे गूंजने लगे तो स्पीकर मीरा कुमार को सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. समाजवादी पार्टी, बीएसपी, जेडी (यू), शिवसेना और अकाली दल के सदस्यों ने संसद में हंगामा किया। आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव समेत कई सदस्यों ने इस पर संसद में जमकर हंगामा किया। इससे लोकसभा की कार्यवाही दोपहर तक स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद लालू - मुलायम दोबारा सैलरी में बढ़ोतरी को लेकर संसद में धरने पर बैठ गए।

हंगामे के कारण पहली बार संसद को दोपहर तक के लिए स्थगित किया गया. प्रश्नकाल के दौरान सासंद अपनी सीटों से उठ कर कहने लगे कि सरकार ने सांसदों का अपमान किया है क्योंकि संसदीय समिति की रिपोर्ट में उनके वेतन को बढ़ाकर 80.001 रुपये प्रति महीने करने की सिफारिश है। यानी सरकारी अधिकारियों को मिलने वाले वेतन से एक रुपया ज्यादा. सांसद चाहते हैं कि सरकार इस रिपोर्ट की सिफारिश के आधार पर ही उनका वेतन बढ़ाए। इससे पहले शुक्रवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उस विधेयक को पारित कर दिया, जिसमें सांसदों के मूल भत्ते को 16 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये करने का प्रावधान है।

कई सरकारी अफसरों के वेतन के मुकाबले सांसदों को मिलने वाले 16 हजार रुपये काफी कम हैं। इससे भारत के विभिन्न राजकीय अंगों, मसलन पुलिस सेवा में वेतन की संरचना के सिलसिले में कई बुनियादी सवाल उभरते हैं। यह भी कि वेतन संरचना के साथ भ्रष्टाचार का क्या संबंध है. दूसरी ओर, एकबारगी 300 फीसदी की वृद्धि की आलोचना भी बेमानी नहीं है। कई हलकों में यह भी पूछा जा रहा है कि अन्य क्षेत्रों की तरह क्या सांसदों के भत्ते में भी नियमित वृद्धि नहीं हो सकती है।

   इस वृद्धि के लिए सरकार को 1 अरब 42 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे. बहरहाल, महंगाई भत्ता बढ़ाने और उनके लिए प्रति वर्ष मुफ़्त हवाई उड़ानों की संख्या 35 से बढ़ाकर 50 करने की मांग को ठुकरा दिया गया है। सांसदों के भत्ते के सवाल पर बने पैनल ने सांसदों के कार्यालय संबंधी खर्चों के लिए भत्ते को 14 हजार रुपये से बढ़ाकर 44 हजार करने का सुझाव दिया था। सरकार ने फिलहाल इसे 20 हजार करने का निर्णय लिया है। मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने इस विधेयक पर आपत्ति जताई थी। लोकसभा में राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी सहित विपक्ष के कुछ सदस्यों ने काफ़ी शोरगुल किया था। सिर्फ़ वामपंथी दल सांसदों के भत्ते में वृद्धि का विरोध कर रहे हैं।

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