पत्रकार बनने के लिए
न्यूनतम योग्यता तय नहीं होने के कारण देश में रिपोर्टिग के स्तर पर असर पड़
रहा है। इसको देखते हुए भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने
पत्रकारिता की न्यूनतम योग्यता तय करने के लिए एक समिति का गठन किया है।
समिति में जागरण प्रकाशन समूह के अखबार 'नई दुनिया' के संपादक व पीसीआइ
सदस्य श्रवण गर्ग, राजीव साब्दे और पुणे विश्वविद्यालय के संचार व
पत्रकारिता विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उज्ज्वल बारवे शामिल हैं।
काटजू ने कहा कि वकालत के लिए एलएलबी की डिग्री के साथ बार काउंसिल में
पंजीकरण जरूरी है। चिकित्सा क्षेत्र के लिए एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल
काउंसिल में पंजीकरण जरूरी है, जबकि पत्रकारिता में शुरुआत करने के लिए कोई
न्यूनतम योग्यता तय नहीं है। कुछ लोग पत्रकारिता के मामूली या अधूरे
प्रशिक्षण के साथ इस पेशे में आ रहे हैं। इससे बुरा असर पड़ रहा है। ऐसे
गैरप्रशिक्षित लोग पत्रकारिता के उच्च मूल्यों को बरकरार नहीं रख पाते। कुछ
समय से पत्रकारिता में शुरुआत करने के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने की
जरूरत महसूस की जा रही है। समिति की रिपोर्ट पूर्ण प्रेस काउंसिल के सामने
रखी जाएगी। इसके बाद इसे कानून बनाने के लिए सरकार के समक्ष पेश किया
जाएगा।
(साभार-http://www.jagran.com/news/national-minimum-qualification-for-journos-needed-katju-10209646.html)
Tuesday, 12 March 2013
Wednesday, 27 February 2013
सचमुच अद्भुत है सूरजकुंड मेला






ठंड को अपनी आदत बनाने की कोशिश के साथ अपने काम में लग गया था तभी मेले के समापन के दिन यानी १५ फरवरी बसंतपंचमी को अचानक मैं , सुरेंद्र व बहन कुसुम और भांजी पम्मी के साथ सूरजकुंड मेला पहुंच गया। इसके ठीक एक दिन पहले बनारस से दिल्ली पहुंचे मेरे भांजे डा. विजयकुमार सिंह ने मेले से ही मुझे फोन किया कि वे मेला में आए हुए हैं। फोन पर मेले का विवरण भी दिया। अब तक तो मेला जाने की सोचा भी नहीं था। शायद मैं वक्त निकाल भी नहीं पाता अगर मेरा मित्र सुरेंद्र कुछ युक्ति नहीं लगाता। दरअसल मेरी बेटी अरुणा अपोलो के हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन कांटैक्ट प्रोग्राम के सिलसिले में मेरे साथ दिल्ली आई थी और रोज सुबह मैं उसे लेकर अपोलो चला जाता था। ऐसे में मैं सोच भी नहीं पा रहा था कि मैं मेला ही क्या, दिल्ली में किसी से मिलने भी जा पाता। इसके पीछे दिल्ली में लड़कियों व महिलाओं पर हो रहे हमले का खौफ था। मेरी बेटी किसी भी तरह से अकेले जाने को तैयार नहीं थी मगर सुरेंद्र ने उसे समझाया और अकेले अपोलो जाने की उसमें हिम्मत पैदा कर दी। सुरेंद्र की यही युक्ति उस दिन काम आयी। मेले जाने की ईच्छा डा. विजय कुमार ने जगाई और इसे अंजाम दिया मेरे मित्र सुरेंद्र ने। जब मुझे फोन किया था तब डां. विजय कुमार सिंह मेले में अपनी पत्नी डा. शीला सिंह, साली मुन्नी व उनके परिवार के साथ थे। कभी मैं, सुरेंद्र, डा. विजय कुमार और डा. शीला सिंह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षा के क्रम में साथ ही थे। अब हम अलग-अलग शहरों में अपनी आजाविका से जुड़े हैं। मैं कोलकाता इंडियन एक्सप्रेस में तो सुरेंद्र दिल्ली में दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो में और डा. शीला सिंह व डा. विजय कुमार सिंह बनारस में हैं। प्रसंगवश यह विवरण इसलिए भी दे रहा था क्यों कि मेले ने हमें इस प्रसंग से जोड़ा है।
सुना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का होता है सूरजकुंड का हस्तशिल्प मेला। मगर जब मेला परिसर में दाखिल हुआ तो दुनिया के सबसे बड़े सूरजकुंड मेले को उम्मीद से कहीं अधिक पाया। हरियाणा के फरीदाबाद जिले में १९८१ से शुरू हुआ इस बार का यह 27वां आयोजन था। हरियाणा पर्यटन विभाग की ओर से आयोजित एक फरवरी को शुरू हुए 15 दिवसीय इस मेले का विषय कर्नाटक राज्य था। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस मेले का उदघाटन 2 फरवरी 2013 को किया। इस मेले में भारत की समृद्ध कला और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत नजारा था। सूरजकुंड मेला के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि इसमें सभी सार्क देशो ने हिस्सा लिया।
दिल्ली-फरीदाबाद मार्ग स्थित सूरजकुंड में प्रतिवर्ष लगने वाले हस्तशिल्प मेले में समापन के दिन तक इसबार लगभग ११ लाख दर्शक पहुंचे। मेला क्षेत्र 40 एकड़ में फैला हुआ है। अरावली पर्वतमाला की तराई में विशाल तालाब सूरजकुंड का निर्माण 10वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा सूरजपाल ने करवाया था। तालाब के चारों ओर ईंट से बनी पक्की सीढ़ियां हैं। इसी तालाब के समीप विस्तृत मैदान में अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले का आयोजन होता है। लोगों की मान्यता है कि इस तालाब में नहाने से रोगों से छुटकारा मिलता है मगर मुझे मेले में ऐसा कुछ देखने-सुनने को नहीं मिला।
पश्चिम बंगाल और असम के बांस और बेंत की वस्तुएं, पूर्वोत्तर राज्यों के वस्त्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश से लोहे व अन्य धातु की वस्तुएं, उड़ीसा एवं तमिलनाडु के अनोखे हस्तशिल्प, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब और कश्मीर के आकर्षक परिधान और शिल्प, सिक्किम की थंका चित्रकला, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन और शो पीस, दक्षिण भारत के रोजवुड और चंदन की लकड़ी के हस्तशिल्प भी यहां प्रदर्शित थे।
श्रीलंका के बने मुखौटे का जादू पर्यटकों के सिर चढ़कर बोला। शेखावटी गेट से नीचे उतरते ही वहा लगे सार्क देशों के स्टॉलों पर भीड़ ज्यादा थी। कलाकृतियों को देखते ही खुद-ब-खुद पांव ठहर जाते हैं। श्रीलंका में हर घर के बाहर मुखौटे लगाने का दस्तूर है। भारत में गांव व शहरों में भी घर के बाहर विभिन्न तरह के मुखौटे देख सकते हैं। श्रीलंका के शिल्पकारों का दावा कि मुखौटे सुख-समृद्धि के वाहक हैं। बुरी नजर से भी बचाता है यह मुखौटा। दावा है कि इससे कई बीमारियां नहीं होती हैं। जिस घर में लगा होता है। वहां सुख व समृद्धि का वास होता है। मुखौटों को ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। यह मुखौटे श्रीलंका की संस्कृति की पहचान बने हैं। इसे न केवल श्रीलंका बल्कि विदेशों में भी पहचान मिली है। मुखौटों को ईश्वर का ही अवतार माना जाता है। ये मुखौटे 150 रुपए से 10 हजार रुपए तक के थे
यहां अनेक राज्यों के खास व्यंजनों के साथ ही विदेशी खानपान का स्वाद भी उपलब्ध था। मेला परिसर में चौपाल और नाट्यशाला नामक खुले मंच पर सारे दिन विभिन्न राज्यों के लोक कलाकार अपनी अनूठी प्रस्तुतियों से समा बांधते हैं। मेले में रोज शाम के समय विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। दर्शक भगोरिया डांस, बीन डांस, बिहू, भांगड़ा, चरकुला डांस, कालबेलिया नृत्य, पंथी नृत्य, संबलपुरी नृत्य और सिद्घी गोमा नृत्य आदि का आनंद लेते हैं। विदेशों की सांस्कृतिक मंडलियां भी प्रस्तुति देती हैं।
इस वर्ष मेले में 9 अफ्रीकी देश, तीन यूरेशियाई देश व 6 सार्क देशों के अलावा थाइलैंड व पेरू ने भी अपने शिल्प उत्पादों और कलाकृतियों के साथ अपने देश की संस्कृति का प्रदर्शन किया। 1200 से अधिक शिल्पकारों व 600 से अधिक कलाकारों ने भाग लिया। गुजरात ,असम, हरियाणा के कलाकारों ने मन मोहा। गिनी के कलाकारों ने भी मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें मृदंग और बांसुरी वादन का समावेश था। कांगो के कलाकारों ने गांगुलीस नृत्य की प्रस्तुति की। कर्नाटक के कलाकारों ने अपने नृत्य से ऐसा समां बांधा कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। समापन के दिन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडा व अन्य अतिथियों की मौजूदगी में होटल राजहंस में इन सभी कलाकारों की प्रस्तुति दर्शनीय थी।
विशेष सुरक्षा इंतजाम
इस अंतरराष्ट्रीय मेले की सुरक्षा व्यवस्था व्यवस्था काफी बेहतर दिखी। मेले की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस बार मेला परिसर को सात भागों में विभाजित किया गया । मेला परिसर में 150 नाइट विजन कैमरे लगे थे। बेहतर नियंत्रण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेला परिसर में सुरक्षा ड्यूटी पर करीब 1200 पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी तैनात थे। परिसर में 8 पिकेट्स और 8 बुलेट प्रूफ मचान बनाए गए थे। साथ ही करीब 150 सीसी टीवी कैमरे लगाए गए हैं। पांच प्रवेश द्वार बनाए गए थे। इस बार अलग-अलग करीब 14 पार्किंग स्थल थे।
बारिश व ओलावृष्टि ने डाला खलल
चार फरवरी सोमवार की रात हुई मूसलाधार बारिश व ओलावृष्टि ने शिल्पकारों और पर्यटन निगम पर वज्रपात किया। हालत ऐसी कि मेला परिसर में जगह-जगह कीचड़ और पानी भर गया। भारी बारिश के चलते 27वां अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेला दो दिन तक बुरी तरह प्रभावित हुआ। चौपालों पर एक भी कार्यक्रम नहीं हो सका। कई देशों से आए शिल्पकारों का सामान भी बारिश की भेंट चढ़ गया। करीब पांच करोड़ रुपए के सामान का नुकसान होने का अनुमान है। खराब मौसम के चलते फीडर ब्रेकडाउन होने से 12 घंटे तक बिजली गुल रही। पूरे दिन सफाई कर्मचारी मेला परिसर से पानी निकालने की कवायद में लगे रहे। सोमवार की रात शिल्पकारों ने जागकर काटी। मगर इसके बाद काफी अच्छा मौसम रहा। मेला समापन के दो दिन बाद ही फिर बारिश हुई। बहरहाल मेरे लिए मेला घूमना अविस्मरणीय रहा।
Wednesday, 10 October 2012
वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर किसी प्रकार का स्थगनादेश नहीं - सुप्रीम कोर्ट
समाचार पत्रों के प्रबंधकों ने अतिरिक्त भुगतान के सवाल पर विचार करने से मना किया, सुप्रीम कोर्ट का भी कोई अंतरिम व्यवस्था करने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए न्यायमूर्ति मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ दायर याचिकाएं लंबित होने की अवधि के दौरान कोई अंतरिम व्यवस्था करने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह साफ किया कि वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर किसी प्रकार का स्थगनादेश नहीं है।
न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने सोमवार को इस मामले में कोई भी अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। इससे पहले, समाचार पत्रों के प्रबंधकों ने अपने कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान के सवाल पर विचार करने से इनकार कर दिया। लेकिन जब विभिन्न ट्रेड यूनियनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसालविज ने न्यायालय से यह साफ करने का अनुरोध किया कि वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर किसी प्रकार की रोक तो नहीं है, इस पर न्यायाधीशों ने सकारात्मक जवाब दिया।
इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही न्यायाधीशों ने अंतरिम व्यवस्था के बारे में समाचार पत्र संगठनों से पूछा। न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान 21 सितंबर को इस संबंध में विचार का सुझाव दिया था। इस पर एक समाचार पत्र समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा,‘मैं विनम्रता से इसे अस्वीकार करता हूं।’ उन्होंने कहा कि पिछले 13 सालों में कर्मचारियों के वेतन में दो से तीन सौ फीसद तक की वृद्धि दी गई है। उन्होंने यूनियनों के इस आरोप को गलत बताया कि पिछले वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बाद उन्हें कुछ नहीं मिला है।
न्यायाधीशों ने कहा कि सभी पक्षों को सुने बगैर कोई अंतरिम आदेश देना संभव नहीं है। अब वे इस मामले की आठ जनवरी से सुनवाई करेंगे। न्यायालय ने 21 सितंबर को सुनवाई के दौरान वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के निपटारे के लिए आठ जनवरी से सुनवाई करने का निश्चय करते हुए कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार का सुझाव प्रबंधकों को दिया था।
सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बारे में 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचना जारी की थी। कई समाचार पत्र समूहों ने वेतन बोर्ड की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है। इन सभी ने इस अधिसूचना पर रोक लगाने का भी अनुरोध किया है। साभार-नई दिल्ली, 8 अक्तूबर (भाषा)।
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए न्यायमूर्ति मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ दायर याचिकाएं लंबित होने की अवधि के दौरान कोई अंतरिम व्यवस्था करने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह साफ किया कि वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर किसी प्रकार का स्थगनादेश नहीं है।
न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने सोमवार को इस मामले में कोई भी अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। इससे पहले, समाचार पत्रों के प्रबंधकों ने अपने कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान के सवाल पर विचार करने से इनकार कर दिया। लेकिन जब विभिन्न ट्रेड यूनियनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसालविज ने न्यायालय से यह साफ करने का अनुरोध किया कि वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर किसी प्रकार की रोक तो नहीं है, इस पर न्यायाधीशों ने सकारात्मक जवाब दिया।
इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही न्यायाधीशों ने अंतरिम व्यवस्था के बारे में समाचार पत्र संगठनों से पूछा। न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान 21 सितंबर को इस संबंध में विचार का सुझाव दिया था। इस पर एक समाचार पत्र समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा,‘मैं विनम्रता से इसे अस्वीकार करता हूं।’ उन्होंने कहा कि पिछले 13 सालों में कर्मचारियों के वेतन में दो से तीन सौ फीसद तक की वृद्धि दी गई है। उन्होंने यूनियनों के इस आरोप को गलत बताया कि पिछले वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बाद उन्हें कुछ नहीं मिला है।
न्यायाधीशों ने कहा कि सभी पक्षों को सुने बगैर कोई अंतरिम आदेश देना संभव नहीं है। अब वे इस मामले की आठ जनवरी से सुनवाई करेंगे। न्यायालय ने 21 सितंबर को सुनवाई के दौरान वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के निपटारे के लिए आठ जनवरी से सुनवाई करने का निश्चय करते हुए कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार का सुझाव प्रबंधकों को दिया था।
सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बारे में 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचना जारी की थी। कई समाचार पत्र समूहों ने वेतन बोर्ड की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है। इन सभी ने इस अधिसूचना पर रोक लगाने का भी अनुरोध किया है। साभार-नई दिल्ली, 8 अक्तूबर (भाषा)।
Friday, 21 September 2012
मजीठिया वेतन बोर्ड की रिपोर्ट पर शुरू हुई सुनवाई
मजीठिया वेतन
बोर्ड की सिफारिशों से संबंधित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट अगले साल आठ
जनवरी से अंतिम सुनवाई करेगा। प्रिंट मीडिया और समाचार एजेंसियों के
पत्रकार व गैरपत्रकार कर्मचारियों के वेतन तय करने के लिए यह वेतन बोर्ड
केंद्र सरकार ने बनाया था। पर इसकी रिपोर्ट आने से पहले ही इसके गठन के
औचित्य पर सवाल उठाते हुए कुछ मीडिया घरानों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
दी थी। हालांकि बाद में वेतन बोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार ने
अधिसूचना के जरिए लागू भी कर दिया। लेकिन मीडिया घरानों ने इन सिफारिशों पर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने अमल लटका रखा है।
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ के समक्ष इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई। जजों ने शुरुआत में ही मीडिया घरानों के प्रबंधकों से कहा है कि वे अपने कर्मचारियों को वेतन बोर्ड की सिफारिशों के हिसाब से अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार करें। गौरतलब है कि अनेक मीडिया संगठनों ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड की सिफारिशों को शीर्ष अदालत में चुनौती दे रखी है। इन सिफारिशों को सरकार ने 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित किया था। इन संगठनों ने इस अधिसूचना पर रोक लगाने का भी अदालत से अनुरोध किया है।
सुनवाई के दौरान जजों ने अखबार मालिकों को सुझाव दिया कि उन्हें ‘बड़ा दिल’ दिखाना चाहिए और अंतरिम भुगतान करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सुनवाई के दौरान कुछ मीडिया समूहों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील फली नरिमन से जजों ने कहा कि वे इन सुझावों पर विचार करें और प्रबंधकों के विचार मालूम कर आठ अक्तूबर को बताएं। उस दिन अदालत इस मामले में निर्देश देगी। उन्होंने नरिमन से साफ कहा- कोई आदेश दिए बगैर हम जानना चाहते हैं कि क्या आप कुछ कर सकते हैं।
नरिमन की दलीलों के बीच ही जजों ने उनसे कहा कि इस मामले में कोई आदेश दिए बगैर ही वे जानना चाहते हैं कि क्या इन याचिकाओं के लंबित होने के दौरान ही मीडिया समूह अपने कर्मचारियों के लिए कुछ कर सकते हैं। जजों ने कहा- हमने नरिमन को कुछ सुझाव दिए हैं। वे एक या दो हफ्ते के भीतर हमें बताएंगे।
जब नरिमन ने कर्मचारी यूनियनों और केंद्र सरकार के जवाबी हलफनामों का जवाब देने के लिए अधिक समय देने का अनुरोध किया तो कर्मचारी संगठनोंं की तरफ से वरिष्ठ वकील कोलिन गोन्साल्वेज ने कहा कि बगैर किसी विलंब के सुनवाई शुरू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत को वेतन बोर्ड की सिफारिशें पूरी तरह और तत्काल लागू करने की अनुमति देनी चाहिए। जो लंबित रिट याचिकाओं के नतीजे के दायरे में भी हो सकता है। वरिष्ठ वकील एमएन कृष्णामणि ने भी कहा कि इन कर्मचारियों के वेतन में पिछले 13 साल से कोई बदलाव नहीं हुआ है। लिहाजा अदालत को तत्काल कुछ व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। ( साभार- जनसत्ता ब्यूरो --नई दिल्ली, 21 सितंबर।)
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ के समक्ष इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई। जजों ने शुरुआत में ही मीडिया घरानों के प्रबंधकों से कहा है कि वे अपने कर्मचारियों को वेतन बोर्ड की सिफारिशों के हिसाब से अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार करें। गौरतलब है कि अनेक मीडिया संगठनों ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड की सिफारिशों को शीर्ष अदालत में चुनौती दे रखी है। इन सिफारिशों को सरकार ने 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित किया था। इन संगठनों ने इस अधिसूचना पर रोक लगाने का भी अदालत से अनुरोध किया है।
सुनवाई के दौरान जजों ने अखबार मालिकों को सुझाव दिया कि उन्हें ‘बड़ा दिल’ दिखाना चाहिए और अंतरिम भुगतान करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सुनवाई के दौरान कुछ मीडिया समूहों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील फली नरिमन से जजों ने कहा कि वे इन सुझावों पर विचार करें और प्रबंधकों के विचार मालूम कर आठ अक्तूबर को बताएं। उस दिन अदालत इस मामले में निर्देश देगी। उन्होंने नरिमन से साफ कहा- कोई आदेश दिए बगैर हम जानना चाहते हैं कि क्या आप कुछ कर सकते हैं।
नरिमन की दलीलों के बीच ही जजों ने उनसे कहा कि इस मामले में कोई आदेश दिए बगैर ही वे जानना चाहते हैं कि क्या इन याचिकाओं के लंबित होने के दौरान ही मीडिया समूह अपने कर्मचारियों के लिए कुछ कर सकते हैं। जजों ने कहा- हमने नरिमन को कुछ सुझाव दिए हैं। वे एक या दो हफ्ते के भीतर हमें बताएंगे।
जब नरिमन ने कर्मचारी यूनियनों और केंद्र सरकार के जवाबी हलफनामों का जवाब देने के लिए अधिक समय देने का अनुरोध किया तो कर्मचारी संगठनोंं की तरफ से वरिष्ठ वकील कोलिन गोन्साल्वेज ने कहा कि बगैर किसी विलंब के सुनवाई शुरू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत को वेतन बोर्ड की सिफारिशें पूरी तरह और तत्काल लागू करने की अनुमति देनी चाहिए। जो लंबित रिट याचिकाओं के नतीजे के दायरे में भी हो सकता है। वरिष्ठ वकील एमएन कृष्णामणि ने भी कहा कि इन कर्मचारियों के वेतन में पिछले 13 साल से कोई बदलाव नहीं हुआ है। लिहाजा अदालत को तत्काल कुछ व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। ( साभार- जनसत्ता ब्यूरो --नई दिल्ली, 21 सितंबर।)
एक से ज्यादा गैस कनेक्शन पर शिकंजा
पेट्रोलियम
मंत्रालय इस इसके लिए लेगा सॉफ्टवेयर की मददऑयल मार्केटिंग कंपनियां ग्राहकों से भरवाएंगी केवाईसी फॉर्म
नाम या पते में हेरफेर के जरिए नहीं ले सकेंगे ज्यादा कनेक्शन।
किसी व्यक्ति या एक ही परिवार में एक से ज्यादा गैस कनेक्शन को पकडऩे के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय अब सॉफ्टवेयर का सहारा लेगा। इसके लिए नेशनल इंफोर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) एक विशेष सॉफ्टवेयर विकसित कर चुका है।
अब इंतजार किया जा रहा है कि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) अपने रसोई गैस के ग्राहकों से नो योर कस्टमर (केवाईसी) फार्म भरवा ले। उसके बाद यह कार्रवाई शुरू होगी।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक किसी व्यक्ति के पास एक से अधिक गैस कनेक्शन कोई नई बात नहीं है। इस पर पहले भी कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन इस पर पूरी तरह से रोक नहीं लग पाई है।
उनके मुताबिक इस तरह का काम ज्यादातर पढ़े लिखे लोग करते हैं इसलिए कुछ इस तरह से नाम-पता लिख कर कनेक्शन लेते हैं कि उसे कंप्यूटर पकड़ नहीं पाता था। कुछ डीलरों को इस बात की जानकारी होती है, लेकिन वह भी इन्हीं उपभोक्ताओं के नाम पर साल में सैकड़ों सिलेंडर बुक कर ब्लैक में बेचता है इसलिए ऑयल मार्केटिंग कंपनी के साथ सहयोग नहीं करता है, इसलिए मंत्रालय ने एनआईसी से एक विशेष सॉफ्टवेयर बनवाया है।
अब इस सॉफ्टवेयर के जरिये फर्जीवाड़ा करने वाले ग्राहकों ढूंढा जाएगा। सरकारी तेल कंपनी में पदस्थापित एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक 'फर्जी लॉजिक' नाम के इस सॉफ्टवेयर में आईओसी, एचपीसीएल और बीपीसीएल के उपभोक्ताओं का डाटा बेस डाला जाएगा। फिर इलाके के हिसाब से ग्राहकों का डाटा बेस चेक किया जाएगा।
यदि कोई व्यक्ति अपने नाम में हेरफेर कर कई कनेक्शन ले रखा है या फिर अपने पते में हेर फेर कर भी कनेक्शन ले रखा है तो भी यह सॉफ्टवेयर यह फर्जीवाड़ा पकड़ लेगा। उसके बाद जिस कंपनी से भी कनेक्शन लिया गया होगा, वहां से अलग अलग नोटिस भेजा जाएगा। यदि उस पर भी उपभोक्ता अतिरिक्त कनेक्शन सरेंडर नहीं करता है तो फिर उनके यहां जिस भी कंपनी के जितने कनेक्शन होंगे, सभी को ब्लॉक कर दिया जाएगा।
( http://business.bhaskar.com/article/more-than-one-gas-connection-screws-3814958-NOR.html?PRVNX=)
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