Wednesday, 18 August 2010

यह विरोध का नाटक कहीं जनता को निराश न कर दे ?

   ठोस विरोध या तकनीकी तौरपर किसी जनहित के मुद्दे पर तार्किकता के अभाव में परमाणु दायित्व विधेयक अमलीजामा पहनाने की यूपीए सरकार की रणनीति सफल हो गई है। अब भाजपा समेत तमाम दलों के तैयार हो जाने से इस विधेयक के पास हो जाने का रास्ता साफ हो गया है। यह वहीं विधेयक है जिसके मुद्दे पर वामपंथी दलों ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। आज भी लालू, मुलायम समेत वामपंथी दलों के सांसद हंगामा किए और संसद नहीं चलने दी। क्या इसे विरोध का सिर्फ नाटक समझा जाना चाहिए ? जनता को समझने लायक तर्क चाहिए। इसी तर्क के अभाव में पश्चिम बंगाल में जनता को वाममोर्चा यह समझा नहीं पाई कि इस परमाणु विधेयक से जनता को क्या नुकसान हैं ? नतीजा यह कि बंगाल की जनता के बीच यह चुनावी मुद्दा तक नहीं बन सका और संसदीय चुनावों में वाममोर्चा को करारा झटका लगा।
    पहले संसद में महिला विधेयक पर कुतर्क का हंगामा और इसके बाद बुधवार ( 18 अगस्त ) को परमाणु विधेयक पर जनता के समझ में आने लायक किसी ठोस दलील के अभाव में विरोध की सारी रणनीति के फेल हो जाने को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए ? इसमें किसी दल को राजनीतिक फायदा हुआ तो किसी को नुकसान मगर देश की जनता सिर्फ गुमराह होती रही। बिहार और बंगाल को विधानसभा चुनाव सामने हैं। अगर ऐसे मौकों पर जनता को उसके हक की बात बतानें में विरोध कर रहे लोग नाकाम रहे तो इसके मतलब भी साफ हैं। या तो यह विरोध का नाटक है और देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है या फिर यह विरोध के लायक कारगर व जनता के समझ में आने लायक मुद्दा ही नहीं ढूंढ पाए विरोध करने वाले। इसमें मुझे नाटक वाली बात ज्यादा सही लगती है। नेता या राजनैतिक दल भले कुछ कहें पर इस पूरे नाटक को टीवी और समाचार माध्यमों से अवगत होने वाली जनता भी अपने हित खोजती है। और वह जब निराश होती है तो बड़ी से बड़ी सत्ता को भी बिखरने में देर नहीं लगती। देखिए कहीं यह परमाणु विधेयक के विरोध का नाटक भी जनता को निराश न कर दे। अगर ऐसा होगा तो इस निराश जनता से क्या कहकर वोट मांगने जाएंगे ? और यह भी सच है कि विरोध में आपकी हार उस जनता को निराश तो करेगी ही जो आपसे बड़ी उम्मीद लगाए बैठी है। संभल जाइए, क्यों कि सामने अब किसानों का भी मुद्दा है। अपने वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर जो एकजुटता संसद में दिखा रहे हैं वही देशहित में भी दिखाइए। आइए अब समझने की कोशिश करते हैं कि परमाणु दायित्व विधेयक क्या है ? और विरोध के मुद्दे क्या हैं ?

परमाणु दायित्व विधेयक -2010

परमाणु दायित्व विधेयक -2010 ऐसा क़ानून बनाने का रास्ता है जिससे किसी भी असैन्य परमाणु संयंत्र में दुर्घटना होने की स्थिति में संयंत्र के संचालक का उत्तरदायित्व तय किया जा सके. इस क़ानून के ज़रिए दुर्घटना से प्रभावित लोगों को क्षतिपूर्ति या मुआवज़ा मिल सकेगा। अमरीका और भारत के बीच अक्तूबर 2008 में असैन्य परमाणु समझौता पूरा हुआ। इस समझौते को ऐतिहासिक कहा गया था क्योंकि इससे परमाणु तकनीक के आदान-प्रदान में भारत का तीन दशक से चला आ रहा कूटनीतिक वनवास ख़त्म होना था। इस समझौते के बाद अमरीका और अन्य परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों से भारत को तकनीक और परमाणु सामग्री की आपूर्ति तब शुरु हो सकेगी जब वह परमाणु दायित्व विधेयक के ज़रिए एक क़ानून बना लेगा। इस विधेयक के आरंभिक प्रारुप में प्रावधान किया गया है कि क्षतिपूर्ति या मुआवज़े के दावों के भुगतान के लिए परमाणु क्षति दावा आयोग का गठन किया जाएगा। विशेष क्षेत्रों के लिए एक या अधिक दावा आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकती है। इन दावा आयुक्तों के पास दीवानी अदालतों के अधिकार होंगे।

क्या है विवाद?

इस विधेयक पर विपक्षी दलों ने कई आपत्तियाँ दर्ज की थीं जिसके बाद इसे सरकार ने टाल दिया था और इसे संसद की स्थाई समिति को भेज दिया गया था. अब स्थाई समिति ने अपनी सिफ़ारिशें संसद को दे दी हैं। एक विवाद मुआवज़े की राशि को लेकर था. पहले इसके लिए विधेयक में संचालक को अधिकतम 500 करोड़ रुपयों का मुआवज़ा देने का प्रावधान था लेकिन भारतीय जनता पार्टी की आपत्ति के बाद सरकार ने इसे तीन गुना करके 1500 करोड़ रुपए करने को मंज़ूरी दे दी है। कहा गया है कि सरकार ने कहा है कि वह समय समय पर इस राशि की समीक्षा करेगी और इस तरह से मुआवज़े की कोई अधिकतम सीमा स्थाई रुप से तय नहीं होगी. दूसरा विवाद मुआवज़े के लिए दावा करने की समय सीमा को लेकर था. अब सरकार ने दावा करने की समय सीमा को 10 वर्षों से बढ़ाकर 20 वर्ष करने का निर्णय लिया है। तीसरा विवाद असैन्य परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों को प्रवेश देने को लेकर था. कहा जा रहा है कि सरकार ने अब यह मान लिया है कि फ़िलहाल असैन्य परमाणु क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए नहीं खोला जाएगा और सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ही इस क्षेत्र में कार्य करेंगे। विवाद का चौथा विषय परमाणु आपूर्तिकर्ताओं को परिवहन के दौरान या इसके बाद होने वाली दुर्घटनाओं को लिए जवाबदेह ठहराने को लेकर है। विधेयक का जो प्रारूप है वह आपूर्तिकर्ताओं को जवाबदेह नहीं ठहराता. आख़िरी विवाद का विषय अंतरराष्ट्रीय संधि, कन्वेंशन फॉर सप्लीमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) पर हस्ताक्षर करने को लेकर है. यूपीए सरकार ने अमरीका को पहले ही यह आश्वासन दे दिया है कि वह इस संधि पर हस्ताक्षर करेगा लेकिन वामपंथी दल इसका विरोध कर रहे हैं।

क्या है सीएमसी पर हस्ताक्षर करने का मतलब

सीएमसी एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिस पर हस्ताक्षर करने का मतलब यह होगा कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में दावाकर्ता सिर्फ़ अपने देश में मुआवज़े का मुक़दमा कर सकेगा। यानी किसी दुर्घटना की स्थिति में दावाकर्ता को किसी अन्य देश की अदालत में जाने का अधिकार नहीं होगा. वैसे यह संधि थोड़ी विवादास्पद है, क्योंकि इसमें जो प्रावधान हैं, उसकी कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है. उल्लेखनीय है कि सीएसई पर वर्ष 1997 में हस्ताक्षर हुए हैं लेकिन दस साल से भी अधिक समय बीत जाने के बाद इस पर अब तक अमल नहीं हो पाया है।

क्या इसकी कोई समय सीमा है?

  यह भारत का अंदरूनी मामला है कि वह परमाणु दायित्व विधेयक को कब संसद से पारित करता है और कब इसे क़ानून का रुप दिया जा सकेगा। लेकिन यह तय है कि असैन्य परमाणु समझौते के तहत परमाणु तकनीक और सामग्री मिलना तभी शुरु हो सकेगा जब यह क़ानून लागू हो जाएगा। लेकिन ऐसा दिखता है कि भारत सरकार नवंबर से पहले इसे क़ानून का रुप देना चाहती ताकि जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के दौरे पर आएँ तो भारत पूरी तरह से तैयार रहे।

परमाणु संयंत्रों से निजी कंपनियों को दूर रखने की सिफारिश

परमाणु दायित्व विधेयक पर संसद की स्थाई समिति ने दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की सीमा 500 करो़ड रूपये से बढ़ाकर 1,500 करो़ड रूपये करने और निजी कंपनियों को इस क्षेत्र से दूर रखने की सिफारिश की है। बुधवार को हंगामे के बीच दोनों सदनों में पेश की गई समिति की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार या सरकारी कंपनियां ही देश में परमाणु संयंत्रों का संचालन कर सकती हैं। समिति के सुझावों को स्वीकार किए जाने की स्थिति में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने संबंधित विधेयक का समर्थन करने की बात कही है। ऑपरेटर की परिभाषा में संशोधन कर किसी प्रायवेट ऑपरेटर के इसमें शामिल होने की बीजेपी की आशंका का भी समाधान किया गया है।

संसद में विरोध, हंगामा

रिपोर्ट पर बीजेपी के अलावा एसपी, जेडी (यू), आरजेडी, एमडीएमके, एनसीपी और एनसी ने अपनी सहमति व्यक्त की है, जबकि सीपीआई, मार्क्सवादी पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपनी असहमति दर्ज कराई है। वामपंथी दलों का आरोप है कि सरकार राष्ट्रपति ओबामा को तोहफ़ा देने के लिए हड़बड़ी कर रही है। लालू, मुलायम, पासवान और लेफ्ट के नेताओं ने आरोप लगाया कि विवादास्पद परमाणु दायित्व बिल पर समर्थन के एवज में मोदी को सोहराबुद्दीन मामले में क्लीन चिट देने की बीजेपी और कांग्रेस में सौदेबाजी हुई है। राज्यसभामें भी इन पार्टियों के सदस्यों ने परमाणु दायित्व विधेयक पर बीजेपी के समर्थन के बदले मोदी को कथित रूप से क्लीन चिट देने का मुद्दा उठाया।

विवादास्पद परमाणु दायित्व बिल को लेकर संसद में संसदीय समिति की रपट पेश किए जाने के बीच एसपी, आरजेडी, लेफ्ट और एलजेपी जैसे दलों ने बीजेपी-कांग्रेस में डील आरोप लगाते हुए संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही नहीं चलने दी। इन पार्टियों का आरोप है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड मामले में सीबीआई से क्लीन चिट दिलाने के एवज में बीजेपी ने कांग्रेस से सांठगांठ की है। राज्यसभा और लोकसभा दोनों की ही बैठक दो बार के स्थगन के बाद पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। विभिन्न देशों के साथ परमाणु समझौतों को अमली जामा पहनाने के लिए लाए जाने वाले इस बिल के बारे में समिति के अध्यक्ष टी. सुब्बीरामी रेडडी ने राज्यसभा में रपट पेश की, जबकि लोकसभा में समिति के सदस्य प्रदीप टम्टा ने यह रपट रखी।

Wednesday, 11 August 2010

बदल जाएगा मदरसों का मुगलिया पाठ्यक्रम !

    मदरसों को बदलने की कोशिश की जा रही है। मदरसे काफी पुराने पाठ्यक्रम और इस्लामी शिक्षा पद्धति पर ही चल रहे थे।पिछले कुछ समय से मदरसों की भूमिका को लेकर लगातार बहस होती रही है, मदरसों पर चरमपंथ को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। पाकिस्तान की लाल मस्जिद के मदरसे के छात्रों और सैनिकों के बीच टकराव के बाद यह बहस एक बार फिर तेज़ हुई। मालूम हो कि राजेंद्र सच्चर कमिटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुसलमान आधुनिक शिक्षा के अवसरों से वंचित हैं।

अब उत्तर प्रदेश सरकार ने जहां नया पाठ्यक्रम नए सत्र से लागू करने का फैसला किया है वहीं पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने मदरसों की पढ़ाई को आज की जरूरतों के हिसाब से बदलना तय किया है।और भी राज्यों के मदरसों में तकनीकी शिक्षा की पहल की जा रही है। भारत सरकार ने मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए एक क़ानून बनाने का प्रस्ताव रखा है जिसका उद्देश्य पाठ्यक्रम और पढ़ाई की व्यवस्था को बेहतर बनाना बताया जा रहा है। सरकार मदरसों को सीबीएसई की तरह केंद्रीय मदरसा बोर्ड के तहत लाने के लिए एक क़ानून पारित करना चाहती है। सरकार का कहना है कि इससे मदरसों की पढ़ाई को आधुनिक और उपयोगी बनाया जा सकेगा ।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित कई लोग इस नए क़ानून की पुरज़ोर हिमायत कर रहे हैं, वहीं इसका विरोध करने वाले भी हैं मगर कुछ मुसलमान धार्मिक नेताओं का कहना है कि धार्मिक अध्ययन के केंद्र मदरसों के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप अनुचित है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय

हाल ही में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की हुई बैठक में बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी ने कहा कि मदरसों में सरकारी हस्तेक्षेप कुबूल नहीं किया जाएगा। दरअसल मौलाना का ये रूख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्रीय सरकार मदरसों के लिए केंद्रीय मदरसा बोर्ड बनाने की तैयारी में है। मौलाना ने कहा कि केंद्रीय मदरसा बोर्ड के प्रस्ताव को हम दोनों शैक्षिक संस्थाओं के लिए हानिकारक मानते हैं। उन्होंने कहा कि मदरसों के जरिए इस्लाम की शिक्षा दी जाती है। इस वजह से उसमें हम किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहते। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल पर असहमति जताई है। बोर्ड के प्रवक्ता अब्र्दुरहीम कुरैशी ने कहा कि प्रस्तावित बिल में पीडित लोगों में पीडित लोगों के लिए राहत और फिर से बात नहीं की गई है। पुलिस अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाती है और ऐसे में दंगे के दौरान बेकसूर लोग फंसते है। उन्होंने ये भी कहा कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में तत्कालीन केंद्र सरकार के बारे में कुछ नहीं कहा गया है जिस पर बोर्ड को सख्त ऐतराज है। जिन लोगों को अयोध्या विध्वंस के लिए जिम्मेदार माना गया है उनके खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए।

उत्तरप्रदेश ने मदरसों के मुगलकालीन पाठ्यक्रम को अलविदा कहा

उत्तर प्रदेश के मदरसे अब कुरआन हदीस और दीगर इस्लामी शिक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे। उत्तर प्रदेश अरबी फारसी मदरसा बोर्ड ने दीनी मकतबों के पाठ्यक्रमों को पुनरीक्षण कर संशोधित पाठ्यक्रम लागू करने का फैसला किया है। नये मदरसों में अध्ययनरत छात्र माध्यमिक (आलिया) एवं उच्च शिक्षा (उच्चतर आलिया) स्तर पर सामान्य हिन्दी, अंग्रेजी, कम्प्यूटर, भूगोल, सामाजिक विज्ञान एवं टाइपिंग सहित आधुनिक विषयों का अनिवार्य रूप से अध्ययन करेंगे। शासन ने प्रदेश के लगभग तीन हजार से अधिक मदरसों के लिए संशोधित पाठ्यक्रमों की सूची जारी कर दी है।

मदरसा बोर्ड के रजिस्ट्रार असलम जावेद द्वारा 16 जून को अनुमोदित नये पाठ्यक्रम को अनुदानित एवं गैर अनुदानित मान्यता प्राप्त मदरसों में लागू करने का निर्देश दिया है। मदरसा बोर्ड ने बदले हुए पाठ्यक्रम की जानकारी प्रदेश के समस्त अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों को उपलब्ध करा दी है। इस नये फरमान से वर्ष 1917 में स्थापित मदरसों में अब मुगलिया पाठ्यक्रमों की विदाई तय है। मदरसा वसीयतुल उलूम के सचिव मौलाना अहमद मकीन का कहना है कि अधिकतर मदरसों में चल रहा पाठ्यक्रम मुगल शासन के मुल्ला निजामउद्दीन का बनाया हुआ है। इसे दर्स निजामी कहते हैं। अब तक चल रहा था मदरसों को यह मुगलकालीन पाठ्यक्रम।

उत्तर प्रदेश अरबी फारसी मदरसा बोर्ड ने सत्र 2010-11 से दीनी मकतबों में पढ़ाए जाने वाले निसाब में परिवर्तन की पहल तेज कर दी है। हालांकि दर्स आलिया के अंतर्गत मदरसों के पाठ्यक्रम में संशोधन करने की शुरुआत वर्ष 2001 में ही की गई थी। 16 जून को 2010 को संशोधित पाठ्यक्रम पर अंतिम मुहर लगाई गई। नये सत्र से मदरसा बोर्ड के मुंशी और मौलवी स्तर के पाठ्यक्रम एवं इनकी अवधि बदल जायेगी। ( इस खबर को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_6639172_1.html

पश्चिम बंगाल में अब अंग्रेजी माध्यम मदरसे
http://thatshindi.oneindia.in/news/2009/10/16/bengalmadarsaadas.html
पश्चिम बंगाल के मदरसों में जल्द ही शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी कर दिया जाएगा। पश्चिम बंगाल सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री अब्दुस सत्तार ने कहा है कि इसी शैक्षिक सत्र ( सत्र २००९ ) में दस मदरसों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी कर दिया जाएगा. आने वाले कुछ वर्षों में बाकी के 566 मदरसों में इसे लागू किया जाएगा। इन मदरसों में 70 इसी वर्ष से शुरू किए गए हैं जिनमें 34 सिर्फ़ लड़कियों के लिए हैं। यह बात उन्होंने बीबीसी के संवाददाता सुबीर भौमिक से बातचीत में पिछले साल ( शुक्रवार, अक्तूबर 16, 2009 ) कही थी।

सत्तार, जो ख़ुद एक मदरसा में शिक्षक रह चुके हैं, का कहना था कि धार्मिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया कुछ महीनों से जारी है. पश्चिम बंगाल के मदरसों में आधुनिक विज्ञान और गणित की पढ़ाई पहले की शुरू की जा चुकी है। सत्तार का कहना था कि अमरीका और पाकिस्तान से विशेषज्ञों का दल मदरसों में आए इस बदलाव का अध्ययन कर चुके हैं। इस बदलाव को यहां का मदरसा बोर्ड मानने को तैयार है। पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन सोहराब हुसैन की माने तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई किए बिना हमारे बच्चों को बेहतरीन शिक्षा नहीं मिल सकती है। आठ करोड़ की जनसंख्या वाले पश्चिम बंगाल में 26 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है जिनमें ज्यादातर ग़रीब किसान या छोटे कारोबारी है जो अपने बच्चों को मदरसों में ही पढ़ने भेज सकते हैं।

मदरसे का इतिहास
http://dialogueindia.in/magazine/article/maradrson-ki-shiksha

मदरसा अरबी भाषा का शब्द है एवं इसका अर्थ है शिक्षा का स्थान। इस्लाम धर्म एवं दर्शन की उच्च शिक्षा देने वाली शिक्षण संस्थाएं भी मदरसा ही कहलाती है। वास्तव में मदरसों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा देने वाले मदरसों को मक़तब कहते है। यहाँ इस्लाम धर्म का प्रारंभिक ज्ञान कराया जाता है। मध्यम श्रेणी के मदरसों में अरबी भाषा में कुरान एवं इसकी व्याख्या, हदीस इत्यादि पढ़ाई जाती है। इससे भी आगे उच्च श्रेणी के मदरसे होते हैं जिन्हें मदरसा आलिया भी कहते हैं। इनके अध्ययन का स्तर बी.ए. तथा एम.ए. के स्तर का होता है। इनमें अरबी भाषा का साहित्य, इस्लामी दर्शन, यूनानी विज्ञान इत्यादि विषयों का अध्ययन होता है। इन उच्च शिक्षा संस्थानों का पाठ्यक्रम दार्से-निजामी कहलाता है। इसे मुल्ला निजामी नाम के विद्वान ने अठारहवीं शताब्दी में बनाया था एवं ये आज भी वैसा ही चल रहा है। उदारवादी एवं कट्टरपंथी मुसलमानों में इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है कि क्या इस पाठ्यक्रम को ज्यों का त्यों जारी रखा जाये या परिर्वितत कर दिया जाये।

शुरुआत हजरत मुहम्मद से

मदरसों की शुरुआत हजरत मुहम्मद से ही मानी जाती है। उन्होंने अपनी मस्जिद में मदरसों की स्थापना की थी एवं वे वहाँ इस्लाम के सिद्वांत एवं कुरान जिस रूप में वह उन पर आयद होती थी, पढ़ाया करते थे। विधिवत रूप से मदरसों की स्थापना ग्यारहवीं शताब्दी में बग़दाद में हुई। लगभग इसी समय इजिप्ट में अल-अजहर नामक मदरसा प्रारम्भ हुआ जो अब विश्व विख्यात इस्लामिक विश्वविद्यालय बन चुका है।

भारतवर्ष में मदरसों की शुरुआत

भारतवर्ष में मदरसों की शुरुआत मुस्लिम बादशाहों के समय से ही हो गई थी। सन् 1206 में जब दिल्ली मे मुस्लिम सुल्तानों के शासन की स्थापना हुई तभी मदरसे भी स्थापित किये गये। प्रारम्भ में इनकी शिक्षा का ढांचा इस प्रकार का रखा गया ताकि शासन के विभिन्न पदों के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति मिल सकें। धीरे-धीरे मुसलमान शासकों की अनुकम्पा से मदरसे सम्पूर्ण उत्तर भारत में स्थापित हो गये। अकबर के शासन काल में फतेहउल्ला नामक विद्वान मदरसों की शिक्षा का प्रमुख था एवं उसने पाठ्क्रम में भूगोल, ज्योतिष, भौतिक शास्त्र, दर्शन शास्त्र इत्यादि विषय शामिल कराये। किन्तु औरंगजेब के काल में यह सब बदल दिया गया। उसने इस्लामी विद्वानों की एक टीम बनाकर इस्लामी कानूनों का एक वृहद संग्रह तैयार कराया जिसे फतवा-ए-आलमगीरी कहा गया। लखनऊ में उसने मुल्ला निजामुद्दीन को एक बड़ी इमारत दान दे दी जिसमें एक मदरसा स्थापित किया गया जो फिरंगी महल नाम से आज भी प्रसिद्घ है।

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात् भारतवर्ष से मुस्लिम हुकुमत खत्म हो गई एवं उलेमाओं को यह डर सताने लगा कि अंग्रेजों के प्रभाव एवं नई शिक्षा प्रणाली के कारण साधारण मुसलमानों में इस्लाम का प्रभाव कम हो जायेगा। अत: उन्होंने 1866 में देवबंद में दारुल उलूम की नींव डाली। उसके पश्चात् लखनऊ में नदावत-अल-उलेमा नाम का एक और मदरसा प्रारंभ हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में देवबंद का दारुल उलूम एवं लखनऊ के फिरंगी महल तथा नदावत-उल-उलेमा इस्लामी शिक्षा एवं अरबी-फारसी परम्पराओं के प्रमुख केंद्र बन गये। ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अत्यंत वफादार एक अन्य मुस्लिम विद्वान सर सैयद अहमद खान ने 1873 में अलीगढ़ में मदसरातुल उलूम प्रारंभ किया जो बाद में मोहमडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज एवं तत्पश्चात् अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया। सर सैयद अहमद खान का मुसलमानों की शिक्षा के विषय में देवबंदियों से विपरीत विचार था। सर सैयद मुसलमानों की शिक्षा को केवल कुरान, हदीस एवं अरबी भाषा तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने अलीगढ़ विश्वद्यिालय के पाठ्यक्रम में समस्त आधुनिक पाठ्यक्रमों को सम्मिलित कराया किन्तु एक बिन्दु पर ये दोनों समान विचार रखते थे एवं वह है मुसलमानों की अलग पहचान। यह विचार ही आगे चलकर द्विराष्ट्र के सिद्घांत का जनक बना जिसकी परिणति देश के विभाजन के रूप में हुई।

आजाद भारत के मदरसे

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् बनाये गये संविधन में अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाओं को विशेष सुविधाएं दी गईं अत: मदरसों की संख्या में विस्तार हुआ। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता काजी मुहम्मद अब्दुल अब्बासी ने सन् 1959 उत्तर प्रदेश में दीनी तालिमी काउंसिल की स्थापना की जिसका उद्देश्य प्रत्येक मुसलमान बालक को प्राइमरी शिक्षा के स्तर पर इस्लाम की बुनियादी शिक्षा देना था। अब्बासी का विचार था कि सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा हिन्दू धर्म पर आधरित है एवं इस्लामी परम्पराओं के विरूद्घ है। काउंसिल मदरसों के लिए कोई सरकारी मदद लेने के भी खिलाफ थी।

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार असम में 721 मदरसों में 120000, गुजरात में 1825 मदरसों में 120000 छात्र, कर्नाटक में 961 मदरसों में 84864, केरल में 9975 मदरसों में 738000, मध्य प्रदेश में 6000 मदरसों में 400000 एवं राजस्थान में 1780 मदरसों में 25800 छात्र शिक्षा पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 15000 मकतब एवं 18000 मदरसे तथा बिहार में 3500 मदरसे कार्य कर रहे हैं। अन्य राज्यों की स्थिति भी इसी प्रकार हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार कुल मुस्लिम बच्चों में से चार प्रतिशत ही मदरसों में जाते हैं जबकि कुछ अन्य अनुमानों के अनुसार यह संख्या पच्चीस से तीस प्रतिशत तक है।

सवालों के घेरे में मदरसों की पुरानी शिक्षा पद्धति

मदरसों में जो पाठ्यक्रम लागू किया जाता है वह सैकड़ों वर्ष पुराना है। उसका सम्बन्ध अरब एवं फारस में प्रचलित उस समय की शिक्षा प्रणाली से है। आज भी मदरसों में यही समझा जाता है कि संसार का समस्त ज्ञान अरबी, फारसी के साहित्य में सिमटा हुआ है एवं उससे बाहर निकल कर कुछ भी पढऩे या समझने की आवश्यकता नहीं हैं। इन मदरसों के चलाने वालों ने इस तरफ कभी भी ध्यान नहीं दिया कि शिक्षा का एक उद्देश्य तालिब इल्म को रोजगार मुहैया कराना भी है। प्रसिद्घ विद्वान वहीदुद्दीन खान ने एक स्थान पर लिखा है कि यद्यपि भारतवर्ष में लाखों मदरसे शिक्षा देने के काम में लगे है किन्तु उन्होंने मुस्लिम बच्चों में कभी भी एक विस्तृत दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयत्न नहीं किया। प्रसिद्घ लेखिका शीबा असलम फहमी ने मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा को मुसलमानों में गरीबी पनपाने वाली वजूहात में से एक वजह कहा है।

ईसाई समाज अपने स्कूल में ईसाई धर्म की शिक्षा के साथ गणित, साइंस, समाजयात, भाषाएं, कला, संगीत सभी कुछ पढ़ाता है और मिशनरी स्कूलों में अपने बच्चे भेजने के लिए हिन्दू- मुसलमान सभी लालायित रहते हैं। सिक्ख समाज ने भी इसी तरह के उम्दा, सापफ-सुथरे और आधुनिक स्कूल खोल कर अपने धर्म को तरक्की की राह का रोड़ा नहीं बनाया। यह सवाल उठाकर शीबा के कहना है कि हमारे आलिमों का क्या बिगड़ जाता अगर मुसलमान समाज भी अपने दीन की तालीम को तरक्क़ी से जोड़ कर एक ऐसा निजाम पैदा करता जो कि रोजगार और खुशहाली लाता? 21वीं सदी में भी भारतीय मुसलमान के सामने वह सामान्य लक्ष्य नहीं रहे जो उसे इस युग में जी रहे आम आदमी की पहचान दें। अगर बांग्लादेश जैसे छोटे और नये राष्ट्र में जीव-वैज्ञानिक, भूगर्भ-वैज्ञानिक, कृषि-वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, व्यवसायिक विशेषज्ञ, कानूनदां, इतिहासकार, गणितज्ञ आदि हर विशेषज्ञ मुसलमान ही होता है तो फिर भारत में क्यों नहीं हो सकता ? शीबा कहतीं हैं कि- '' विज्ञान-तकनीक से इन्सान को जो राहतें मिलती है उससे एक उपभोक्ता के तौर पर मौलाना परहेज नहीं करते। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, आधुनिक कृषि, मोटर-ट्रेन-हवाई जहाज, फोन, टी.वी. इन्टरनेट, कम्प्यूटर, फ्रिज, वाशिंग मशीन, ए.सी. या स्वचालित हथियार जैसे किसी भी आधुनिक यंत्र या सहूलत से दूरी न रखने वाले मौलाना, अपने युवाओं को इन नई खोजों, अविष्कारों में नहीं लगाते। इल्म से होने वाली इन तरक्किय़ों में मुस्लिम समाज का योगदान नहीं के बराबर है जबकि मुसलमान इन सहूलियत के दुनिया में दूसरे नम्बर के उपभोक्ता हैं।"

Monday, 9 August 2010

हिंसा व हत्याएं रोकें, बंगाल को शांति की राह दिखाने वाला बनने दीजिए - ममता की माओवादियों से अपील


लालगढ़। पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में आयोजित रैली में रेल मंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार से माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान बंद करने और शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत करने को कहा है। बंगाल को पूरे देश के लिए एक राह दिखाने वाला बनने दीजिए। हिंसा और हत्याएं रोकिए।

   उनके बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि ममता बनर्जी केंद्र सरकार में मंत्री हैं और केंद्र सरकार ने हाल में माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा है.ममता बनर्जी ने कहा,''आज से ही शांति प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए. बंगाल इस संबंध में पूरे भारत को रास्ता दिखा सकता है. हिंसा और हत्याएँ बंद होनी चाहिए. यदि आपको मुझसे कोई समस्या है तो मेधा पाटकर और स्वामी अग्निवेश जैसे लोग पहल कर सकते हैं. लेकिन बातचीत शुरू होनी चाहिए.''

ममता ने कहा,''मैं वादा करती हूँ कि जंगलमहल के विकास के लिए जो भी आवश्यक होगा, वो मैं करूंगी. यदि ज़रूरी हुआ तो मैं यहाँ रेलवे फैक्ट्री स्थापित करने पर भी विचार किया जा सकता है.''आज से ही शांति प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए. बंगाल इस संबंध में पूरे भारत को रास्ता दिखा सकता है. हिंसा और हत्याएँ बंद होनी चाहिए. यदि आपको मुझसे कोई समस्या है तो मेधा पाटकर और स्वामी अग्निवेश जैसे लोग पहल कर सकते हैं. लेकिन बातचीत शुरू होनी चाहिए.ग़ौरतलब है कि इस रैली को माओवादियों का 'पूरा समर्थन' हासिल था.

ममता ने कहा कि माओवादी समस्या का हल बातचीत, शांति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से हो सकता है. उन्होंने कहा, ‘हमें बताइए कि कहां और कब आप बातचीत के लिए बैठना चाहते हैं. हमलोग शांति के लिए बातचीत करना चाहते हैं. हम लोकतंत्र की बहाली और आतंक मुक्त भारत चाहते हैं.’ माकपा पर आतंक से फायदा उठाने का आरोप लगते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं आपलोगों से हाथ जोड़कर कह रही हूं कि अब हत्याओं की राजनीति नहीं की जानी चाहिए. मैं मौत पर राजनीति नहीं चाहती हूं.’ ममता ने कहा, ‘अगर माकपा का आदमी मारा जाता है, वह एक परिवार से ताल्लुक रखता है. अगर एक माओवादी मरता है तो वह भी एक परिवार से संबंध रखता है और अगर तृणमूल का एक आदमी मरता है तो वह भी किसी परिवार का सदस्य होता है.’

माओवाद प्रभावित लालगढ़ में रेल मंत्री ने रैली को संबोधित करते हुए कहा, ‘अगर आप हिंसा और हत्याएं रोकने को तैयार हो जाते हैं तो बातचीत शुरू हो सकती है. संयुक्त अभियान भी वापस ले लेना चाहिए.’ उन्होंने माओवादियों से रेल सेवा बाधित नहीं करने का आग्रह किया और कहा, ‘अगर ट्रेन सेवाएं रोज बाधित की गईं तो मैं काम कैसे करूंगी? कभी कुछ लोग आपके नाम पर यह करते हैं तो कभी आप ऐसा करते हैं.’ इस साल जनवरी में झाड़ग्राम में आयोजित अपनी रैली का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने इलाके में दो ट्रेनें शुरू की हैं.



पीसीपीए नेताओं की गिरफ्तारी

पुलिस ने रैली स्थल के पास से पीसीपीए के चार नेताओं को गिरफ्तार किया। सुशील महतो को पुलिस ने दोबारा गिरफ्तार किया है। पहले वह पुलिस हिरासत से भाग निकला था। तीन दूसरे नेताओं को वसूली के आरोप में पकड़ा गया है। मगर बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली का कहना है कि पीपीसीए के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग रैली में आकर शामिल हुए लेकिन भारी पुलिस बल के बावजूद किसी भी नेता को गिरफ़्तार नहीं किया गया. अमिताभ भट्टासाली का कहना है कि वो लालगढ़ रैली में शामिल हुए लगभग 10 से 12 आदिवासियों के जत्थे के साथ काफ़ी दूर तक चले. इनका नेतृत्व पीसीपीए के सचिव मनोज महतो कर रहे थे और उन्होंने कई पुलिस नाकों को पार किया लेकिन पुलिस ने उनसे कुछ नहीं कहा. मनोज महतो का कहना था,''मैं पुलिस को चुनौती देता हूँ कि वो मुझे गिरफ़्तार करे. हमने आदिवासियों को इस रैली में शामिल होने के लिए प्रेरित किया क्योंकि ये राज्य के आतंक के ख़िलाफ़ है। मालूम हो कि पश्चिम बंगाल के पुलिस प्रमुख भूपिंदर सिंह ने घोषणा की थी कि माओवादियों से जुड़े पीपुल्स कमेटी अगेस्ट पुलिस एट्रोसिटीज़ (पीसीपीए) के नेता यदि रैली में दिखाई दिए तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाएगा।



राजनीतिक मकसद

जंगलमहल तीन जिलों (पश्चिमी मिदनापुर, बांकुड़ा और पुरुलिया) में फैला पश्चिम बंगाल का वह इलाका है, जो वामपंथियों का गढ़ है और नक्‍सलियों के प्रभाव में आ चुका है। 2006 के विधानसभा चुनाव में माकपा को इस इलाके की 18 विधानसभा सीटों में से ज्‍यादातर पर जीत मिली थी। 2009 लोकसभा चुनाव में भी यहां तृणमूल को कामयाबी नहीं मिली थी। इसलिए ममता बनर्जी इस इलाके में अपनी पैठ मजबूत कर आने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती हैं।



ममता की मजबूती

रैली को नक्सलियों ने पूरा समर्थन दिया है, जो ममता के लिए उत्‍साहजनक संकेत है। नक्सली नेता किशनजीके अनुसार रैली गैरराजनीतिक है क्योंकि इसे संघर्ष विरोधी मंच के बैनर तले आयोजित किया गयाहै। और इसीलिए नक्सलियों ने इसे समर्थन दिया है।

ममता बनर्जी ने सोमवार को पिछले महीने नक्सलियों के प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद को मारने के लिए अपनाए गए तरीके की निंदा की। नक्सलियों के प्रभाव वाले पश्चिमी मिदनापुर जिले में एक विशाल रैली में उन्होंने कहा, 'मैं महसूस करती हूं कि जिस तरह आजाद को मारा गया वह ठीक नहीं है।' उन्होंने नक्सलियों के इस आरोप का लगभग समर्थन किया कि आजाद को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया। गौरतलब है कि पुलिस ने दावा किया था कि नक्सलियों के तीसरे नंबर के नेता आजाद की आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले के जंगलों में मुठभेड़ में मौत हो गई। बनर्जी ने कहा कि नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता के मध्यस्थ सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने आजाद को वार्ता के लिए तैयार किया था। संत्रास विरोधी फोरम के तहत आयोजित एक गैर राजनीतिक रैली में बनर्जी ने कहा, 'जो हुआ वह ठीक नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति आजाद ने विश्वास जताया था।'

नक्सल समर्थन जनजातीय संस्था पुलिस संत्रास विरोधी जन समिति (पीसीएपीए) ने इस रैली को समर्थन दिया। इस रैली में स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटकर और नक्सल समर्थक लेखिका महाश्वेता देवी जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दूसरे सबसे बड़े घटक की नेता बनर्जी ने आजाद की मौत पर शोक जताया। स्वामी अग्निवेश ने आजाद के मारे जाने की घटना की न्यायिक जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया कि प्रशासन ने अपने संचार माध्यमों का इस्तेमाल करके नक्सली नेता का पता लगाया और उसे मार दिया। वहीं नक्सलियों का कहना है कि आजाद और एक अन्य कार्यकर्ता हेमचंद पांडे को पुलिस ने गत एक जुलाई को नागपुर से उठाया था और अगले दिन आदिलाबाद में मार डाला था। ( साभार-बीबीसी, आजतक, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण व एजंसियां )

Friday, 2 July 2010

गूगल के मेल में छिपा है किराये का खेल !

   मुफ्त वेबमेल सेवा जीमेल, पीकासा वेब एल्बम्स और गूगल डॉक्स जैसी बेहतरीन एप्लीकेशंस देने वाली कंपनी गूगल इंक आपको कभी गुगली भी मार सकती है। दरअसल, कंपनी की कई एप्लीकेशंस के बारे में यह भ्रांति है कि इन सेवाओं में मुफ्त असीमित स्टोरेज है। लेकिन, ऐसा है नहीं। जब आप इन एप्लीकेशंस में तयशुदा स्टोरेज के पास पहुंच जाते हैं तो आपको पता चलता है कि इसके आगे स्टोरेज करने के लिए आपको सालाना रेंटल यानी किराया देना होगा। जीमेल ऐसी ही एक सेवा है। जीमेल में 7जीबी से ज्यादा स्टोरेज के लिए आपको सालाना रेंटल देना होगा।
जीमेल में अब 7जीबी तक ही स्टोरेज मुफ्त है। इसके बाद अगर आप अपनी स्टोरेज क्षमता बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। 20 जीबी अतिरिक्त स्टोरेज लेने के लिए ग्राहकों को 5 डॉलर सालाना खर्च करने होंगे। इस बारे में बिजनेस भास्कर ने जब गूगल से बात की तो उसके प्रवक्ता ने कहा कि यह निर्णय 2009 के अंत में हुआ था और यह तब से ही प्रभावी है। हालांकि प्रवक्ता के इस दावे के उलट यह बात सही है कि भले ही गूगल का यह फैसला कभी का भी हो, भारत में तो अधिकांश जीमेल उपभोक्ताओं में यही भ्रांति है कि जीमेल में स्टोरेज किसी भी सीमा तक पूरी तरह से मुफ्त है।
दरअसल, जब किसी ग्राहक की स्टोरेज क्षमता 7जीबी के आसपास पहुंच जाती है तब जाकर गूगल की तरफ से इस बारे में जानकारी दी जाती है। ऐसे में ग्राहक बेहद पसोपेश की स्थिति में होता है कि वह अपना स्टोरेज किस तरह खाली करे। खाली करने के झंझट से बचने के लिए ग्राहक मजबूरी में अतिरिक्त स्टोरेज की सुविधा खरीदता है।
वहीं, अगर ग्राहकों को पहले से ही यह पता हो कि 7जीबी के बाद स्टोरेज के लिए चार्ज देना होगा तो वह शुरू से ही उस हिसाब से जीमेल का इस्तेमाल करेगा। इस बारे में पूछे जाने पर गूगल इंडिया के प्रवक्ता ने बताया कि जीमेल में 7 जीबी से कुछ ज्यादा स्टोरेज मुफ्त है। इसके बाद अगर कोई ग्राहक स्टोरेज क्षमता बढ़ाना चाहता है तो उसके लिए सालाना कई प्लान हैं। प्रवक्ता ने बताया कि नवंबर 2009 में इस बाबत निर्णय किया गया था।
इस निर्णय के मुताबिक 20 जीबी की अतिरिक्त स्टोरेज क्षमता के लिए ग्राहकों को 5 डॉलर सालाना का शुल्क अदा करना होगा। इसके अलावा अगर ग्राहक 80 जीबी का अतिरिक्त स्टोरेज स्पेस चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए 20 डॉलर सालाना खर्च करने होंगे।

http://www.bhaskar.com/article/DEL-google-email-service-1115021.html

Wednesday, 19 May 2010

किस जमीन की तलाश है समाजवादियों को !

    लोहिया से मुलायम तक समाजवादियों का सफर निरंतर बिखराव का ही रहा है। लोहिया से जयप्रकाश तक तो विचारधारा की लौ टिमटिमाती रही। आगे के सफर में यह मशाल अब नए दौर के समाजवादी नेता मुलायम सिंह के हाथों में है। उनकी समाजवादी पार्टीं तो है, मगर समाजवादी विचारधारा के लोग एकजुट नहीं है। अगर इसे आरोप न समझा जाए तो मुलायम सिंह समाजवादी कम मगर यादवों के नेता ज्यादा समझे जाते हैं। ऐसा होने की की मजबूरियां भी हो सकती हैं। समाजवादी चिंतक इसके कई कारण मानते हैं। पहली बात तो यह हैं कि भारत में किसी नेता की पहचान उसकी जमात से ज्यादा है। उसके लोग कितना तादाद में हैं। आजादी के बाद से भारत में धर्म, क्षेत्र और जाति ने नेता और दलों की पहचान तय करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। दरअसल लोगों को लुभाने के समाजवादी आर्थिक सिद्धांत कारगर नहीं रहे। समाजवादी नेता अब लोगों को महज विचारधारा से प्रभावित करने में असफल होने लगे। यह बात काफी हद तक वामपंथियों पर भी लागू होती है। लिहाजा संकीर्ण निजी हितों को हथियार बनाना इन नेताओं की मजबूरी हो गई। शायद इसी वजह से मुलायम समाजवादी से ज्यादा पिछड़े तबके ( मूलत: यादवों) के नेता बनकर उभरे। यह उनकी अलग सामाजिक पहचान बनी है जहां समाजवाद दम तोड़ता नजर आता है। भारतीय राजनाति में टिके रहने का यह अलग कारगर राजनीतिक हथियार है जिसे अन्य नेता मसलन मायावती, लालू यादव, रामविलास पासवान वगैरह आजमा रहे हैं। इस नई विधा ने समाजवादियों की लोहिया की उस आर्थिक नीति को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसने कभी किसानों, मजदूरों व समाज के अन्य दबे-कुचले व पिछड़े तबके को सर्वाधिक आकर्षित किया था। दरअसल तब समाजवाद उस सामूहिकता का प्रतीक था जो अन्याय के खिलाफ लड़ता था।

धर्म और जाति की अवधारणा पर खड़े दल संकीर्ण विचारधारा को जन्म देते हैं। ये उस समाजवाद के विरोध में खड़े होते हैं, जो आपसी सामाजिक सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। नतीजा यह कि समाजवादियों को भी जनप्रिय बनने के हथकंडे अपनाने पड़े। जनप्रिय होने का यह रास्ता समाजवादियों को उस संप्रदायवाद के नजदीक ले जाता जो समाजवाद के लिए वर्ज्य है। सामाजिक न्याय की लड़ाई एक पंथ या समुदाय के हित के रास्ते पर चलकर लड़ी नही जा सकती। मतलब समाजवाद और लोकप्रियता दोनों को साथ लेकर चलने से गरीबों में भ्रम व विभाजन की स्थिति पैदा होती है। यही वह दो बुराईयां हैं जो एक दूसरे का विरोध करतीं हैं। अब गरीबी निवारण की नई अवधारणा जन्म लेती है। इसके तहत अमीर पगार बढ़ाकर सामाजिक अन्याय या गरीबी को कम कर सकते हैं। समाजवादियों के यह मान लेने से कि आय बढ़ने और धन वितरण से गरीबी कम की जा सकती है, समाजवादी उस सिद्धांत को नकार देते हैं जिसमें कहा गया है कि गरीबी आदमी की ही गलतियों का नतीजा है। और गरीबी तब बढ़ती है जब धीमी आर्थिक वृद्धि व पूंजी की अपर्याप्त उपलब्धता हो। लोहिया से चलकर मुलायम तक पहुंचे समाजवाद का यह वह नया चेहरा है जिसे अभी भी उस जमीन की तलाश है जिसमें समाजवाद भी जिंदा रह सकें। मगर वजूद की इस लड़ाई में समाजवादी अभी भी बिखराव ही झेल रहे हैं।

स्वतंत्रता के बाद जिसे समाजवादी आंदोलन के नाम से जाना गया, उसका सबसे ज्यादा श्रेय राममनोहर लोहिया को जाता है। लोहिया कभी भी मार्क्सवादी नहीं रहे। मार्क्स से वे प्रभावित जरूर थे। जो समाजवादी मूलतः मार्क्सवादी थे, उन्होंने स्वतंत्रता के बाद मार्क्सवाद का परित्याग कर दिया। कोई धर्म की तरफ चला गया, किसी ने विनोबा की शरण ली और जो बचे रह गए, वे क्रमशः लुंज-पुंज होते गए और अंततः किसी काम के नहीं रहे। लोहिया ने समाजवाद के चिराग को रोशन रखा और उसमें नए-नए आयाम जोड़ने का काम किया। लोहिया के निधन के बाद जयप्रकाश ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। गैरकांग्रेसवाद को उस अंजाम तक पहुंचाया जहां लोहिया भी समाजवादियों को नहीं ले जा पाए थे। जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति का ही नतीजा था कि आपातकाल में सभी गैरकांग्रेसी एकजुट हुए और १९७७ में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में जनता पार्टी की गैर कांग्रेसी सरकार बनी। यहीं से समाजवादियों के उस पतन का इतिहास भी शुरू होता है जो आज तक जारी है। जनता पार्टीं टूटी तो समाजवादी भी बिखर गए। बाद के समय में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन को कर लिया मगर समाजवादी विचारधारा को छिन्न-भिन्न होने से नहीं बचा पाए। फिलहाल मौजूदा दौर के समाजवादी नेता मुलायम सिंह ही हैं।

कोलकाता में समाजवादी

कोलकाता में २१ मई से समाजवादियों का एक जमावड़ा होने जा रहा है। पहले राजबब्बर फिर अमरसिंह प्रकरण के बाद बिखराव झेल चुके मुलायम अब कोलकाता में समाजवादी पार्टी का आधार तलाशने आ रहे हैं। अमरसिंह प्रकरण का कोलकाता पर भी असर पड़ा । कोलकाता में विजय उपाध्याय सपा छोड़कर तृणमूल चले गए हैं। मुलायम सिंह ने अब पश्चिम बंगाल सोशलिस्ट पार्टीं के अध्यक्ष किरणमय नंद को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया है। किरणमय नंद पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार में मत्स्य पाल मंत्री हैं। विजय उपाध्याय के समय से पश्चिम बंगाल के समाजवादियों में जो असंतोष है, उसे क्या कोलकाता में हो रहा सम्मेलन खत्म कर पाएगा। श्यामधर पांडेय जैसे तमाम ऐसे समाजवादी हैं जो लंबे अरसे से पार्टीं से जुड़े हैं मगर हमेशा उनको नजरअंदाज किया गया है। कहा यह जा रहा है कि अगर किरणमय नंद सूझबूझ से काम नहीं लेगें तो कोलकाता में भी समाजवादी और बिखर जाएंगे। आखिर कब और कौन रोकेगा समाजवादियों का बिखराव ? यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि मुलायम सिंह यादव किस बात को तरजीह देते हैं। अगर उनके लिए सिर्फ कुछ व्यक्ति ही महत्वपूर्ण होंगे तो उनकी मनमानी से कोलकाता में समाजवादी पार्टीं की जमीन भी खिसकनी भी तय है। जैसा कि पहले भी हुआ है। सभी को साथ न लेकर का नतीजा यह थी कि तमाम पुराने समाजवादी भी कोलकाता में निष्क्रिय व उदासीन थे। अब उनमें भी आस जगी है। समाजवाद की मशाल तभी जलती रहेगी जब कारवां भी साथ होगा। बिखरना तो इतिहास रहा है समाजवादियों का।

रुका नहीं समाजवादियों का बिखराव

दरअसल पहला आम चुनाव लड़ने वाली देश की जितनी भी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां थीं, उन सभी का आजादी के बाद विभाजन हुआ और समाजवादियों में बिखराव सबसे ज्यादा हुआ। 1967 के बाद सत्ता से स्वभाव बदला। नीति, नैतिकता, मान्य मूल्य प्रभावित हुए। 1977 के बाद समाजवादियों में और बिखराव हुआ और इसके नेताओं ने सुविधा एवं सहूलियत के अनुसार नीति स्वीकार करने का काम किया। आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस के भीतर रह कर काम करने वाली सोशलिस्ट पार्टी पहली बार 1955 में टूटी जब राम मनोहर लोहिया ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई। दोनों पार्टियों ने 1957 और 1962 का चुनाव अलग अलग लड़ा। फिर 1965 में मिल गईं और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी जो उसी साल फिर टूट गई। 67 का चुनाव इन्होंने अलग अलग लड़ा। सोशलिस्ट फिर 1971 में एकजुट हुए लेकिन कुछ राज्यों में इनके छोटे छोटे गुट रह गए। इन सभी ने 1977 में जनता सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं समाजवादियों की जड़ से मौजूदा समाजवादी पार्टी, जनता दल सेक्युलर, जद यू निकली हैं। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में व्यक्तिगत खुन्नस, आकांक्षा और एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह टूटन का कारण बना। उन्होंने कहा कि सोशलिस्ट पार्टियों के नेता समय के अनुसार बदले नहीं और वे दूसरी पार्टियों में जाते रहे।

भारतीय राजनीति और समाजवादी

पहले सोशलिस्ट मूवमेंट और फिर जेपी आंदोलन ने इस देश में इतिहास रचा। इन्हीं मूवमेंट और आंदोलनों की उपज हैं लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव। शरद यादव सोशलिस्ट पार्टी में तो नहीं थे, लेकिन उन दिनों एक छात्र नेता के रूप में मध्यप्रदेश में समाजवाद की अलख जगाए हुए थे। लालू और मुलायम सोशलिस्ट मूवमेंट में रहे, लेकिन बाद में लालू प्रसाद जेपी आंदोलन में शरीक हो गए। राजनारायण के बारे में कहा जाता है संसद में मार्शल और राजनारायण एक-दूसरे के पूरक बन गए थे। वे इतनी हठधर्मिता और हंगामा खड़ा करते थे कि उन्हें मार्शल से टंगवाकर बाहर करा दिया जाता था। वह दौर इंदिरा गांधी का था। कांग्रेस सरकार के खिलाफ वर्ष 1973-74 में जेपी आंदोलन ने देश के युवाओं में नया जोश फूंका। 1974 में शरद यादव मध्य प्रदेश के एक संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। राजनारायण ने इमरजेंसी (1975) के बाद के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को रायबरेली में शिकस्त दी।

भारतीय राजनीति में समाजवादी विचारधारा का एक अहम रोल रहा है.1948 में कांग्रेस से अलग हुए समाजवादियों ने जिनमें आचार्य नरेन्द्र देव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ राम मनोहर लोहिया शामिल थे सोशलिस्ट पार्टी के नाम से एक दल का गठन किया था, बाद में आचार्य जे बी कृपलानी की किसान मज़दूर प्रजा पार्टी का इस दल में विलल हो जाने के बाद इस दल को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नाम दिया गया लेकिन इस दल के गठन के कुछ वर्षों बाद ही सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन की प्रकिया शुरु हो गई. जय प्रकाश नारायण क्षुब्ध होकर भूदान आंदोलन में शामिल हो गए. डॉ लोहिया ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नाम से अलग दल बना लिया और नरेंद्र देव के नेतृत्व में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का अलग अस्तित्व बना रहा.

ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति

1952, 57 और 1962 में हुए आम चुनावों में समाजवादी दल संख्या के लिहाज़ से तो ज़्यादा सीटें नहीं जीत सके लेकिन संसद में उन्होंने प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाई. 1963 में हुए संसदीय उप चुनावों में आचार्य कृपलानी और डॉ लोहिया के चुनाव जीतने से संसद में विपक्ष की भूमिका और मज़बूत हुई और पहली बार लोक सभा में नेहरु सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास का प्रस्ताव पेश किया गया. इसी साल कलकत्ता में हुए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के वार्षिक सम्मेलन में डॉ लोहिया ने ग़ैर कॉग्रेसवाद की रणनीति पेश की और सभी विपक्षी दलों से कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक साझा गठबंधन बनाने की अपील की.

डॉ. लोहिया की ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति का पहला प्रयोग 1967 के आम चुनावों में हुआ। इन चुनावों में ग़ैर कांग्रेसी दल यानि समाजवादी, वामपंथी, जनसंघी, स्वतंत्र और रिपब्लिकन पार्टियां कोई एक संयुक्त मोर्चा बनाकर तो चुनाव नहीं लड़ीं, लेकिन 9 राज्यों में इन दलों को भारी सफलता मिली और कांग्रेस से अलग हुए विधायकों को मिलाकर 9 राज्यों में संयुक्त विधायक दल यानि एस.वी.डी. का गठन हुआ और ग़ैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। उत्तर प्रदेश में चैधरी चरण सिंह ऐसी ही पहली सरकार के मुख्यमंत्री बनाये गये।

1967 के आम चुनावों में ही डॉ लोहिया के साथ मधुलिमए और जॉर्ज फ़र्नानडीज़ जैसे तेज़ तर्रार समाजवादी लोक सभा में पहुँचे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ विपक्षी मुहिम को और तेज़ किया. मगर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे उत्तरी राज्यों में समाजवादी अपना जनाधार बनाने में सफ़ल रहे.

वर्ष 1971 में इंदिरा गाँधी के आने के बाद समाजवादियों का एक तरह से सफ़ाया ही हो गया। इसी दौर में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का दबदबा बढ़ा और 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने और उसके बाद 1971 में हुए लोक सभा चुनावों में उन्हें जो भारी बहुमत मिला उसमें समाजवादी लगभग साफ़ हो गए. इंदिरागांधी ने ही १९७६ में संविधान में ४२वां संशोधन करके समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा। इतना ही नहीं उनहोंने जनप्रतिनिधित्व कानून में भी संशोधन करके सभी दलों की समाजवादी जिम्मेदारी भी तय की। संविधान में ये परिवर्कन और इंदिरागांधी के गरीबी हटाओ नारे ने समाजवादियों को ध्वस्त कर दिया।

समाजवादी खेमे को उम्मीद की किरण तब दिखी जब. समाजवादी नेता राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका दायर करके आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में अपने पद का दुरुपयोग किया और चुनाव जीतने के लिए सरकारी तंत्रमंत्र का इस्तेमाल किया.इसी समय गुजरात और बिहार में छात्रों का आंदोलन शुरु हुआ जिसमें दो दशक पहले राजनीति छोड़ चुके समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण शामिल हुए. उनकी अगुवाई में सभी विपक्षी दलों ने 6 मार्च 1975 को दिल्ली में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया जिससे इंदिरा गाँधी की सरकार हिल गई.घबराकर इंदिरा गांधी ने २५ जून १९७५ को देश में आपातकाल घोषित कर दिया।

आपातकाल और समाजवादी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को राजनारायण की याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए इंदिरा गाँधी को चुनावी धांधलियां करने का दोषी ठहराया और उनका चुनाव रद्द कर दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट का यही फ़ैसला इंदिरा गांधी के पतन का कारण बना और उन्होंने 25 जून को देश में आपातकाल लागू कर दिया. इसी के तहत देश के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं और कार्यक्रर्त्ताओं को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया जिनमें समाजवादी भी बड़ी तादाद में शामिल थे.

19 माह के आपातकाल के दौरान ही जेल में जनता पार्टी का गठन हुआ और इसमें भी समाजवादियों की भूमिका अहम रही. आपातकाल ख़त्म होने के बाद 1977 में जब लोक सभा के आम चुनाव हुए तो जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला। बड़ी तादाद में समाजवादी संसद में चुनकर आए और पहली बार मंत्री बने. इनमें राजनारायण, जॉर्ज फ़र्नांडीज़, रविराय, ब्रजलाल वर्मा, पुरुषोत्तम कौशिक, जनेश्वर मिश्र आदि शामिल थे. इसी वर्ष हुए विधान सभा चुनावों में समाजवादी आंदोलन से जुड़े कर्पूरी ठाकुर बिहार में, रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश में और गोलप बोरबोरा असम में मुख्यमंत्री बने.

1979 में जनता पार्टी में हुए विभाजन के बाद समाजवादी एक बार फिर छिन्न भिन्न हो गए और एक दशक तक सत्ता की राजनीति से दूर हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनमोर्चा बनाकर राजीव गांधी के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु किया तो समाजवादियों ने उसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और जनता दल बना कर एक बार फ़िर केंद्र में और कई राज्यों में सत्ता हासिल की.

सामाजिक न्याय की शुरुआत

वी पी सिंह सरकार में रहते हुए ही जार्ज फ़र्नांडीज़, शरद यादव, नीतिश कुमार और रामविलास पासवान ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करवाने का फ़ैसला करवाया जिससे भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई. इसी दौर में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव उत्तर प्रदेश और बिहार में मुख्यमंत्री बने. लेकिन एक साल में ही वी पी सिंह सरकार का पतन हो जाने के बाद समाजवादियों में जो विभाजन हुआ उससे यह आंदोलन लगातार कमज़ोर ही होता गया। पिछले आम चुनावों से समाजवादी विचारधारा सामूहिक रुप से अपनी कोई छाप या पहचान नहीं बना पा रही है।

समाजवाद की चर्चा के संदर्भ में लोहिया और जयप्रकाश जैसे महानायकों को याद करना उपयुक्त होगा। इससे संबंधित लेखों को पढ़ने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें...............।

भारतीय समाजवाद



सत्ता के लिए समाजवाद याद रहा, लोहिया को भूल गए

युवाओं के प्रेरणा श्रोत थे जेपी


राममनोहर लोहिया


"एक असमाप्त जीवनी" का प्रथम अध्याय


समाजवादी आंदोलन : पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में


आचार्य नरेन्द्रदेव : समाजवाद के माली


समाजवाद के प्रकार


समाजवादी विचारधारा आज कहाँ है ?


कुछ पार्टियां ऐसी जिन्हें ढूंढते रह जाओगे

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