Friday 30 November 2007

४६ साल बाद मुशर्रफ ने उतारी वर्दी







पाकिस्तान में चार ऐसे सेनाध्यक्ष रहे हैं जो राष्ट्रपति बनकर सत्ता पर क़ाबिज़ रहे। इनमें जनरल अय्यूब ख़ान, जनरल याहया ख़ान, जनरल ज़ियाउल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ शामिल हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने लंबी अटकलों और भारी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दबाव के बीच 28 नवंबर 2007 को सेनाध्यक्ष का पद छोड़ दिया. परवेज़ मुशर्रफ़ ने अक्तूबर 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार का तख़्तापलट करके सत्ता पाई थी। वे क़रीब आठ साल तक सरकार के मुखिया के साथ-साथ सेनाध्यक्ष भी रहे और अब ४६ साल बाद उन्होंने वर्दी उतार दी है। लोकतंत्र बहाली का वादा करके बतौर असैनिक राष्ट्रपति शपथ ली। यह अलग बात है कि जनरल जियाउल हक ने भी जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलटने के बाद सिर्फ तीन महीने में लोकतंत्र बहाली का वादा किया था जो कभी पूरा नहीं हुआ। देखिए मुशर्रफ के वादों का क्या होता है। पहले असैनिक राष्ट्रपति बन चुके मुशर्रफ के उस भाषण का अवलोकन करें जिसमें उन्होंने अपनी पूरी कवायद को लोकतंत्र की बहाली और पाकिस्तान की भलाई करार दिया है।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने २९ नवंबर को बतौर जनरल विदाई के बाद आयोजित भव्य समारोह में कहा है कि 16 दिसंबर को इमरजेंसी हटा ली जाएगी और चुनाव पूर्व घोषणा के अनुसार आठ जनवरी को ही कराए जाएंगे और चुनावों को किसी भी सूरत में नहीं टाला जाएगा. गुरूवार को असैनिक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि सरकार स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव चाहती है. उन्होंने कहा कि चुनावों की निगरानी के लिए जो देश चाहे और जितने चाहे, पर्यवेक्षक भेज सकता है.परवेज़ मुशर्रफ़ ने बुधवार, 28 नवंबर को सेनाध्यक्ष का पद छोड़ने के एक दिन बाद राष्ट्रपति पद के दूसरे कार्यकाल की शपथ ग्रहण की. इस मौक़े पर परवेज़ मुशर्रफ़ ने दोहराया कि वे पाकिस्तान में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्होंने कहा कि यह एक भावनापूर्ण और ऐतिहासिक दिन है जब वे लगभग आधी सदी के बाद वर्दी उतारने के बाद असैनिक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले रहे हैं. उन्होंने इमरजेंसी लगाए जाने के अपने फ़ैसले की भी हिमायत की. वर्दी उतारने के लिए हुए समारोह की तुलना में कम भावुक नज़र आ रहे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पूर्व प्रधानमंत्रियों बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान वापसी का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि इन दोनों नेताओं की वापसी पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है और इससे राजनीतिक सहमति की शुरुआत हो सकेगी. दोनों नेताओं के नाम लिए बिना उन्होंने कहा, "जो लोग चुनाव बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि चुनाव किसी भी सूरत में नहीं टाले जाएँगे और आठ जनवरी को नई सरकार के लिए चुनाव हो जाएंगे." उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली का आख़िरी दौर चल रहा है और इसमें कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी. परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा, "पाकिस्तान में 1999 से पहले सही मायनों में लोकतंत्र कभी था ही नहीं" और उन्होंने तीन चरणों में लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश की है.
पहला चरण उन्होंने वर्ष 1999 से 2002 को बताया. यह वही समय था जब उन्होंन सेनाध्यक्ष के रूप में नवाज़ शरीफ़ का तख्ता पलटकर सत्ता अपने हाथों में ले ली थी.उन्होंने कहा कि इस चरण में उन्होंने पाकिस्तान को एक विफल राष्ट्र से एक उन्नतशील अर्थव्यवस्था में बदला.वर्ष 2002 से 2007 को दूसरा चरण बताते हुए उन्होंने कहा कि इस दौर में पाकिस्तान में लोकतंत्र को सार रूप में लागू किया गया.उन्होंने कहा, "सिर्फ़ चुनाव करवाने से ही किसी देश में लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो जाती. इस दौर में हमने महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यकों तक सभी को अधिकार संपन्न बनाया और कार्यपालिका को अधिकार देते हुए मीडिया को स्वतंत्रता भी प्रदान की."मौजूदा दौर को तीसरा दौर बताते हुए उन्होंने इसरजेंसी लगाए जाने के फ़ैसले को सही ठहराया.उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के बर्खास्त किए गए मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी का नाम लिए बिना कहा कि पूर्व मुख्यन्यायाधीश लोकतंत्र बहाली की प्रक्रिया को षडयंत्रपूर्वक तरीके से बाधित करना चाहते थे.उन्होंने कहा कि देश के कई हिस्सों में ख़ासकर, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में 'आतंकवादी घटनाएँ' बढ़ गई थीं और मीडिया का एक हिस्सा ठीक तरह काम नहीं कर रहा था.परवेज़ मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी शब्द का उपयोग किए बिना कहा, "यह एक अलग सी परिस्थिति थी और इसमें अलग सा क़दम उठाना ज़रुरी था."उन्होंने आरोप लगाया कि वे नियमानुसार 15 नवंबर को ही वर्दी छोड़ देना चाहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रवैये के कारण वे ऐसा नहीं कर सके.

पश्चिमी देशों को सलाह
लोकतंत्र बहाली के लिए सलाह देने वाले पश्चिमी देशों के परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक बार फिर अपनी पुरानी सलाह दोहराई है.उन्होंने पश्चिमी देशों से कहा कि वे लोकतंत्र और मानवाधिकारों को पाकिस्तान में उस तरह लागू नहीं करवा सकते जिसे उन्होंने सदियों के अनुभव के बाद हासिल किया है.उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में लोकतंत्र अपनी तरह से लागू होगा और फिर उसमें धीरे-धीरे बदलाव आएगा.उन्होंने कहा कि किसी भी देश में समाज परिवर्तन को धीरे-धीरे स्वीकार करता है इसमें दशकों और सदियों का समय लगता है.उन्होंने लोकतंत्र बहाली की इस प्रक्रिया में लगने वाले समय को बर्दाश्त करने की अपील करते हुए पश्चिमी देशों से सहायता का भी अनुरोध किया.परवेज़ मुशर्रफ़ ने देश की जनता से वादा किया, "मैं जो भी निर्णय लूँगा उसमें पाकिस्तान का हित सर्वोपरि होगा."शपथ ग्रहण समारोह के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ ने सलामी गारद का निरीक्षण भी किया.

जनरल मुशर्रफ़ का वह दौर
सेनाध्यक्ष का पद छोड़ने के राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के फ़ैसले को 1999 में सैन्य तख्तापलट के बाद का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है.1999 में तख्तापलट के ज़रिए मुशर्रफ़ सत्ता पर काबिज़ हुए थे. हालांकि तख्तापलट के बाद उनका रास्ता उतना आसान नहीं रहा जितना उन्होंने सोचा था.आगे चलकर वो राष्ट्रपति बने लेकिन दूसरी बार राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पहले उन्हें आपातकाल लगाना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीशों को बर्खास्त करना पड़ा. आपातकाल को लेकर हो रहा विवाद उनका पीछा शायद ही छोड़े. आने वाले दिनों में वो चुनाव के ज़रिए जीत कर आने वाले प्रधानमंत्री और नए सैन्य प्रमुख के साथ सत्ता की भागेदारी करेंगे.हालांकि चुनी गई सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास रहेगा लेकिन इस तरह का फ़ैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि नया प्रधानमंत्री कितना लोकप्रिय है और सेना राष्ट्रपति का कितना साथ देती है. इससे पहले भी राष्ट्रपति की किसी भी प्रकार की कार्रवाई सेना के समर्थन पर निर्भर करती रही है लेकिन पिछले कुछ समय में सेना की भी कड़ी आलोचना होती रही है. आलोचक मानते हैं कि नए सैन्य प्रमुख के लिए सबसे बड़ी चुनौती सेना की छवि सुधारना और सैनिकों का मनोबल ऊंचा करना होगा. उधर मुशर्रफ़ चाहेंगे कि उन्हें सेना का समर्थन मिलता रहे और वोलोकतांत्रिक तौर पर चुने गए नेताओं के साथ सत्ता में पूरी भागेदारी न करने के सेना के सामूहिर रवैये का फ़ायदा उठाएं. ये तो आगे की बात हुई, तत्काल अगर देखा जाए तो मुशर्रफ़ के लिए सबसे बड़ी चिंता आने वाले चुनावों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग क्यू के प्रदर्शन को लेकर है क्योंकि यह दल उन्हें पूर्व में रबर स्टांप जैसी संसद उपलब्ध कराती रही है. लेकिन अगर पीएमएल क्यू का प्रदर्शन इतना बेहतर होता है कि प्रधानमंत्री उनका बने तो इसमें आश्चर्य नहीं कि यह पार्टी भी मुशर्रफ़ के हाथ बांधने में पीछे नहीं रहेगी. इतना ही नहीं कुछ आलोचकों के अनुसार चुनावों में गड़बड़ी करने की मुशर्रफ़ की कोई कोशिश उनके लिए आखिरी लड़ाई साबित हो सकती है परवेज़ मुशर्रफ़ के पाँच वर्ष के कार्यकाल में देश में हुई प्रगति का जो ब्यौरा दिया गया है उनमें दस नए टीवी चैनल खुलने और एफएम रेडियो स्टेशनों की स्थापना का भी उल्लेख है.कहा गया है कि मीडिया की आज़ादी और प्रसार के ज़रिए पाकिस्तान की मौजूदा सरकार लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहती है.एक और उदाहरण मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट के क्षेत्र में हुए विकास का दिया गया है, सरकार का कहना है कि 1999 में देश में सिर्फ़ दो लाख मोबाइल फ़ोन कनेक्शन थे जो अब बढ़कर 40 लाख हो गए हैं जबकि इंटरनेट कनेक्शन भी इतनी ही तेज़ी से बढ़े हैं.जबकि पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों का कहना है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के कार्यकाल में देश में अव्यवस्था बढ़ी है, ग़रीबों की समस्याएँ बढ़ी हैं.

बेनज़ीर भुट्टो की कोशिशें
पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो इस समय उसी व्यवस्था की स्थापना करने में लगी हुई हैं जिसके कारण नब्बे के दशक में उन्हें खासा नुकसान उठाना पड़ा था.दो बार प्रधानमंत्री चुनी गईं बेनज़ीर को दोनों ही बार तत्कालीन राष्ट्रपतियों ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए बर्खास्त कर दिया था.लेकिन आलोचकों और विशेषज्ञों का मानना है कि बेनज़ीर अब पहले से अधिक चतुर हो गई हैं. अमरीका और पाकिस्तान के प्रशासन में उनकी ज़बर्दस्त नेटवर्किंग के कारण उन्हें पाकिस्तान वापसी में ख़ास मुश्किलें नहीं हुई हैं. उन्होंने पाकिस्तान आते ही न केवल मुशर्रफ़ को चुनौती दी बल्कि पीएमएल क्यू को भी पंजाब प्रांत में खुली चेतावनी दे डाली है.वरिष्ठ पाकिस्तानी विशेषज्ञ इरशाद अहदम हक्कानी कहते हैं कि बेनज़ीर न केवल खुद वापस आईं बल्कि अमरीकी प्रशासन को नवाज़ शरीफ़ की वापसी को समर्थन देने के लिए भी राज़ी किया है.बेनज़ीर को सिंध प्रांत में व्यापक समर्थन है और पंजाब में भी उनके समर्थकों की संख्या में इज़ाफा हुआ है. पंजाब नवाज़ शरीफ़ का गढ़ माना जाता है और अगर बेनज़ीर पंजाब में पीएमएल क्यू और नवाज़ शरीफ़ के लिए तिकोने संघर्ष की स्थिति पैदा कर दें तो यह बड़ी बात होगी.कहा ये भी जा रहा है कि वो नवाज़ शरीफ़ के साथ पंजाब में सीटों की भागेदारी पर भी विचार कर रही हैं ताकि पीएमएल क्यू की उपस्थिति नगण्य हो सके.हालांकि नवाज़ शरीफ़ के संभावित चुनावी बहिष्कार और चुनावी धांधली की स्थिति में त्रिशंकु संसद बनेगी जिसमें बेनज़ीर के विकल्प सीमित हो सकते हैं

नवाज़ शरीफ़ की मुश्किलें
नवाज़ शरीफ़ भी उन नेताओं में हैं जो दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हैं और उन्हें बेनज़ीर भुट्टो से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है.लेकिन अगर उनकी पार्टी पूरा ज़ोर लगा दे तो वो पंजाब मे बेहतरीन प्रदर्शन कर पीएमएल क्यू को ख़त्म कर सकते हैं.सन् 2000 में अदालत द्वारा सज़ा सुनाए जाने के कारण भी नवाज़ शरीफ़ की उम्मीदवारी शक के घेरे में है. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी जिसे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने माफ़ कर दिया पर इसके बाद ही मुशर्रफ़ ने उन्हें निर्वासित कर दिया था.शायद यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ के चुनाव में भागेदारी के लिए कड़ी शर्ते रखी हैं. उनकी मांग है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ तीन नवंबर को आपातकाल की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट के बर्खास्त किए गए सभी न्यायाधीशों बहाल करें.ऐसा संभव नहीं है क्योंकि इन्हीं न्यायाधीशों की बर्खास्तगी के बाद अब मुशर्रफ़ दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले हैं. नवाज़ शरीफ़ ने यह भी कहा है कि वो ऐसी किसी सरकार में प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे जिसके राष्ट्रपति मुशर्रफ़ हों. यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ के लिए चुनावों का बहिष्कार करना सबसे अच्छा विकल्प है लेकिन इसके लिए उन्हें बेनज़ीर का भी समर्थन चाहिए होगा. दूसरा विकल्प ये है कि नवाज़ शरीफ़ बेनज़ीर के साथ मिलकर पीएमएल क्यू के ख़िलाफ लड़ें. पीएमएल क्यू नवाज़ शरीफ़ की पार्टो को तोड़कर ही बनवाई गई थी.

जुल्फिकार अली भुट्टों का लोकतंत्र
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने देश में राजनीतिक जागरूकता का दौर शुरू किया. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को चार अप्रेल 1979 को फाँसी दे दी गई थी.भुट्टो को पाकिस्तान में एक नए दौर का प्रतीक माना जाता है और कहा जाता है कि उन्होंने लोगों को न सिर्फ़ अपने अधिकारों का अहसास दिलाया बल्कि राजनीतिक को भी राजाओं-ज़मींदारों के घरों से बाहर निकाला.भुट्टो के दौर के बारे में कहा जाता है उन्होंने समाज के तथाकथित निचले तबकों के लोगों को भी यह अहसास दिलाया कि उनके वोट की क्या अहमियत है और वे इसे अपनी इच्छानुसार इस्तेमाल कर सकते हैं.पाकिस्तान में 1947 से अब तक ज़्यादातर समय सेना का ही शासन रहा है और 1973 में जब ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने लोकतंत्र का दौर शुरू किया.लेकिन वे ज़्यादा दिन तक नहीं टिक सके और 1977 में उन्हें इस पद से हटा दिया गया. इतना ही नहीं उन पर अपने एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या का आरोप लगाया गया.एक मुक़दमें में उन्हें दोषी क़रार दिया गया हालाँकि इस मामले में फ़ैसला सुनाने वाले जजों की निष्पक्षता पर भी उंगलियाँ उठाई गई थीं.कहा जाता है कि उन्हें फ़ाँसी देने से पहले कोई चेतावनी भी जारी नहीं की गई.भुट्टो के परिवार को उस समय नज़रबंद कर दिया गया था लेकिन उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो को फाँसी से पहले अपने पिता से मिलने की इजाज़त दे दी गई थी.बेनज़ीर भुट्टो बाद में प्रधानमंत्री बनीं.

भुट्टो की फाँसी
उस समय सैनिक तानाशाह जनरल ज़ियाउल हक़ थे और सेना की तरफ़ से भुट्टो को फाँसी दिए जाने की सही जानकारी नहीं दी गई थी. प्राप्त जानकारी के अनुसार भुट्टो को स्थानीय समय के मुताबिक़ आधी रात के बाद क़रीब दो बजे रावलपिंडी की ज़िला जेल में फाँसी दी गई. लेकिन दुनिया को भुट्टो की फाँसी के बारे में तब पता चला जब सरकारी रेडियो पर स्थानीय समय के मुताबिक़ ग्यारह बजे इस बारे में सूचना दी गई.फाँसी देने के बाद उनके शव को सिंध प्रांत में उनके गृहनगर ले जाया गया और वहाँ उन्हें दफ़ना दिया गया.ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की पत्नी नुसरत भुट्टो और बेटी बेनज़ीर भुट्टो को जनाज़े में शामिल होने की इजाज़त नहीं दी गई.भुट्टो के साथ-साथ चार अन्य लोगों को भी हत्या का दोषी पाया गया था और वे जेल में बंद रखे गए.ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो एक धनी और प्रभावशाली परिवार से संबंध रखते थे. हालाँकि उन्हें अपने ही अंदाज़ में चलने वाले एक नेता के रूप में देखा जाता था लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी काफ़ी इज़्ज़त थी.कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की मौत के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ जाएगा.उस समय संयुक्त राष्ट्र महासचिव कुर्त वाल्दहीम ने ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फाँसी दिए जाने की निंदा की थी.पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक तानाशाह जनरल ज़ियाउल हक़ ने भुट्टो पर दया दिखाने की तमाम अंतरराष्ट्रीय अपीलों को खारिज कर दिया था.

तानाशाही का दौर
पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल ज़ियाउल हक़ ने पाँच जुलाई 1977 को ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकार का तख़्ता पलटकर सत्ता अपने हाथों में ले ली थी और इसी के साथ देश के इतिहास में एक नया दौर शुरू हुआ था जो 17 अगस्त 1988 को उनकी मौत के साथ समाप्त हुआ. अपने शासन काल में उन्होंने चुनाव कराने का कई बार वादा किया लेकिन उस पर अमल टालते भी रहे.सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद टेलीविज़न पर अपने भाषण में जनरल ज़ियाउल हक़ ने कहा था कि उनका कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है और भरोसा दिलाया था कि वह तीन महीने के अंदर चुनाव करा देंगे जिसके बाद सत्ता चुनी हुई सरकार को सौंप दी जाएगी और सेना अपनी ड्यूटी में लग जाएगी.लेकिन 17 अगस्त 1988 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत होने तक वह सैनिक शासक ही रहे.1977 में तमाम विपक्षी नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया था और कहा गया था उन्हें सिर्फ़ कुछ ही समय के लिए नज़रबंद किया जा रहा है. ज़ियाउल हक़ ने कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने देश को अस्थिर किया है जिसकी वजह से सेना को दख़ल देनी पड़ी है. भुट्टो को 1979 में फाँसी दे दी गई थी.लेकिन जनरल ज़ियाउल हक़ ने 17 अगस्त 1988 को एक विमान हादसे में अपनी मौत तक सत्ता अपने हाथों में ही रखी और 11 साल के उनका शासन काल में देश की राजनीति में अनेक उतार चढ़ाव आए.
ज़ियाउल हक़ ने तीन महीने के अंदर चुनाव कराने का वादा किया था लेकिन चुनाव कई बार स्थगित किए गए और चुनाव हुए तो ख़ुद के मनोनीत किए गए प्रधानमंत्री मोहम्मद ख़ान जुनेजो को भी बर्ख़ास्त कर दिया था.जब जनरल ज़ियाउल हक़ ने जुनेजो को बर्ख़ास्त किया था---29 मई 1988 का दिन पाकिस्तान के इतिहास में ख़ासी अहमियत रखता है क्योंकि उस दिन देश के फौजी शासन ने अपनी ही चुनी हुई सरकार को कुछ इस तरह बर्ख़ास्त किया कि आने वाले दिनों में साफ़ हो जाए कि इस देश में सेना के साथ मिलकर सत्ता चलाना तो संभव है लेकिन सत्ता असैनिक नेताओं के हाथों में कभी नहीं आ सकती.और अगर कोई ऐसा करने की जुर्रत करेगा तो अपने अंजाम को पहुँचेगा.मोहम्मद ख़ान जुनेजो पश्चिमी देशों के दौरे से 29 मई 1988 को लौटने पर हवाई अड्डे पर संवाददाताओं से रूबरू थे कि तभी सूचना मंत्रालय के प्रेस सूचना विभाग के कुछ अधिकारियों ने वरिष्ठ पत्रकारों को सरगोशियों में संदेश देना शुरू कर दिया कि उन्हें जुनेजो के संवाददाता सम्मेलन के बाद राष्ट्रपति भवन पहुँचना है.जुनेजो का संवाददाता सम्मेलन काफ़ी लंबा खिंच गया था इसलिए कुछ पत्रकारों ने राष्ट्रपति भवन जाने के बजाय अपने दफ़्तरों की तरफ़ रुख़ करने का फ़ैसला किया लेकिन फिर भी कुछ पत्रकार राष्ट्रपति भवन पहुँच ही गए.कुछ देर बाद शेरवानी पहने हुए जनरल ज़ियाउल हक़ पत्रकारों के सामने आए और पत्रकारों को बुलंद आवाज़ में सलाम किया. उन्होंने पहले से तैयार किया हुआ संदेश पढ़ना शुरू किया. यह संविधान के 58वें संशोधन के तहत जुनेजो सरकार और प्रांतीय और केंद्रीय एसेंबलियों को बर्ख़ास्त करने का हुक्मनामा था.जिस संसद ने तीन साल पहले फौजी सरकार के अनुरोध पर यह संवैधानिक संशोधन किया था वह ख़ुद ही उसका निशाना बन गई थी.

लोकतंत्र के पक्षधर जुनेजो

प्रधानमंत्री मोहम्मद ख़ान जुनेजो कई अर्थों में विशिष्ट हस्ती थे. उन्हें जनरल ज़ियाउल हक़ ने ख़ुद इस पद के लिए चुना था लेकिन सत्ता में आने के बाद जुनेजो की यह पूरी कोशिश रही कि जितना जल्दी हो सके पूर्ण लोकतंत्र क़ायम किया जाए.इस सिलसिले में उन्होंन कई अहम फ़ैसले भी किए और कुछ मौक़ों पर तो सैनिक अधिकारियों की आलोचना भी की. फौज की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान का मसला हल करने की ख़ातिर उन्होंने जिनेवा समझौता किया.और जब आई एस आई की निगरानी में क़ायम शस्त्रागार में तबाही मची तो उन्होंने उसकी खुली जाँच का आदेश भी दिया.अलबत्ता ये तमाम फ़ैसले करते वक़्त जुनेजो ये भूल गए कि देश का राष्ट्रपति एक सैनिक जनरल भी है और जुनेजो की सत्ता हस्तांतरण असैनिक प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपने की कोशिश उन्हें ख़ासी महंगी पड़ी.संवाददाताओं का कहना है कि ज़ियाउल हक़ के शासन काल में धार्मिक कट्टरता बढ़ी और धर्मनिर्पेक्ष मानी जाने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेताओं को काफ़ी दबाव में रखा गया.संवाददाताओं के अनुसार ज़ियाउल हक़ ने प्रेस की आज़ादी पर भी कुठाराघात किया और ऐसा भी सुनने में आया कि पत्रकारों को कौड़े भी लगाए गए.1977 में सत्ता संभालने के दो साल बाद ही 1979 में पाकिस्तान के पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेनाएँ घुस गई थीं जिनके ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों के अभियान में जनरल ज़ियाउल हक़ को काफ़ी मददगार पाया गया था.

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